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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

कैलाश को नहीं मिला कवच

- सुगनीदेवी मामले में लोकायुक्त पुलिस की कोशिश नाकाम
- अंतिम चालान के लिए विशेष कोर्ट ने तय की चार महीने की सीमा
- लोकायुक्त के सारे दावे सिरे से खारिज


लोकायुक्त पुलिस 100 करोड के सुगनीदेवी जमीन घोटाले में आरोपी क्रमांक दो यानी कैलाश विजयवर्गीय को समय कवच पहनाने में नाकामयाब हो गई है। विशेष कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें जांच के लिए समय सीमा की आड़ ली गई थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिया है कि सुगनीदेवी जमीन मामले में अंतिम चालान 21 फरवरी 2011 तक कोर्ट में पेश किया जाए।
विशेष न्यायाधीश एसके रघवुंशी बुधवार को एक अहम फैसले में कहा कि लोकायुक्त पुलिस को एक नियत समय सीमा में काम करने का आदेश देना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है। सीकरी वासु विरुद्ध उप्र सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2008 में दिए फैसले का दृष्टांत देते हुए कोर्ट ने लिखा है कि यदि पुलिस ठीक ढंग से जांच नहीं करे तो समय सीमा तय करने के साथ ही कोर्ट जांच की निगरानी भी कर सकता है।

मामले में लोकायुक्त के विशेष अभियोजक एलएस कदम ने 21 सितंबर को तर्क दिया था कि जांच की समय सीमा तय करना विशेष न्यायाधीश के अधिकार में नहीं आता है। इसी पर परिवादी सुरेश सेठ ने 6 अक्टूबर को करीब 300 पेज का जवाब कोर्ट के पटल पर रखा था। उन्होंने लोकायुक्त पुलिस की अर्जी के छहों न्यायिक दृष्टांतों की भी तार्किक तरीके से धज्जियां उड़ाई थीं।

सुरेश सेठ को न्यायिक कवच

विशेष कोर्ट ने बुधवार को फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया कि एफआईआर दर्ज होने और चालान पेश होने के बीच फरियादी सुरेश सेठ को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। लोकायुक्त पुलिस ने कहा था कि एफआईआर के बाद मामला जांच एजेंसी व कोर्ट के बीच सिमट जाता है इसलिए फरियादी को कोर्ट में आने का अधिकार नहीं है।

जांच एजेंसियों के लिए ऐतिहासिक सबक
कानूनी जानकारों का मानना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की पड़ताल करने वाली ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, सीआईडी जैसी जांच एजेंसियों के लिए विशेष कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक सबक जैसा है। अब तक जांच एजेंसियां एफआईआर दर्ज करके मामले को ठंडे बस्ते में डालने की आदी रही है। यही वजह है कि कई केस 15-15 सालों तक चालान के मुकाम तक नहीं पहुंच सके। हर बार जांच एजेंसियां यही तर्क देती है कि अनुसंधान की समय सीमा तय करने का कोर्ट को कोई अधिकार नहीं है। यही वजह है कि जांच एजेंसि

'नहीं बचेगा कैलाश' 
फैसले पर सुरेश सेठ ने प्रतिक्रिया दी है कि अब लोकायुक्त पुलिस मामले में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय को नहीं बचा सकती। अंतिम चालान में कैलाश का नाम नहीं आया तो कोर्ट स्वयं भी नाम सम्मिलित करवा सकती है।

मेंदोला सहित फंस चुके सत्रह
इस केस में लोकायुक्त पुलिस 5 अगस्त को 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और अपराधिक षड्यंत्र रचने का केस दर्ज कर चुकी है। इसमें कैलाश विजयवर्गीय के अतिरिक्त तीनों आरोपियों (विधायक रमेश मेंदोला, व्यवसायी मनीष संघवी व विजय कोठारी) की घेराबंदी की गई है। इसमें निगम अफसर सहित 14 अन्य आरोपी हैं।

हाईकोर्ट में भी मुंह की खाई
विशेष कोर्ट द्वारा लोकायुक्त पुलिस को जांच के निर्देश को विधायक रमेश मेंदोला और व्यवसायी मनीष संघवी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस एसएल कोचर व शुभदा वाघमारे ने दोनों की याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया था।

पांच पेज के फैसले के निहितार्थ
1. लोकायुक्त पुलिस ठीक से नहीं कर रही है जांच
(पेज 4 पर लिखा गया जांच एजेंसी अनावश्यक रूप से जांच में विलंब न करें)
2. सुरेश सेठ से बचना चाहती है लोकायुक्त पुलिस।
(पेज 4 व 5 पर लिखा गया है परिवादी सुरेश सेठ को कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है)
3. कोर्ट को मंजूर नहीं राजनीतिक हस्तक्षेप
(फैसले के पेज 2 पर सुरेश सेठ के तर्क को प्रमुखता देते हुए लिखा है कि प्रभावशील राजनीतिक व्यक्ति के हितों को बचाने के लिए जांच में देरी हो रही है)
                                          
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यूं निकाली लोकायुक्त पुलिस की हवा
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें उन छहों न्यायिक दृष्टांतों को खारिज किया गया है, जो लोकायुक्त पुलिस ने दिए थे।
एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
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जनता के सामने खड़े कई सवाल

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए थे। उन्होंने कोर्ट को बताया था कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा था -
1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है? 

पत्रिका २० अक्टूबर २०१०

कैलाश पर फैसला आज

- सुगनीदेवी जमीन मामले में विशेष न्यायालय देगा 'समय कवच' पर निर्णय


100 करोड के सुगनीदेवी जमीन घोटाले की शिकायत के आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की जांच की समय सीमा पर विशेष न्यायालय बुधवार को फैसला सुनाएगा। लोकायुक्त पुलिस का तर्क है कोर्ट को समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं, जबकि फरियादी सुरेश सेठ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर साबित किया है कि लोकायुक्त जैसी जांच संस्थाओं के लिए भी समय की बाध्यता होती है। 

केस में पिछली सुनवाई 6 अक्टूबर को हुई थी। तब विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने दोनों पक्षों के तर्क सुनकर फैसला 20 अक्टूबर तक के लिए सुरक्षित रखा था। पिछली सुनवाई में शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के तर्कों की सिलसिलेवार धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट को बताया विजयवर्गीय को बचाने के लिए ही लोकायुक्त पुलिस ने 21 सितंबर को कोर्ट में अर्जी दी थी कि जांच की समय सीमा तय नहीं की जाए। वैसे 21 सितंबर को लोकायुक्त पुलिस को कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु ïविशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। 

'लोकायुक्त पुलिस की भूमिका संदिग्ध'
सुरेश सेठ ने कोर्ट को लिखित में दिया है लोकायुक्त पुलिस मप्र के मंत्री (कैलाश विजयवर्गीय) के दबाव में आकर संदिग्ध भूमिका निभा रही है। विजयवर्गीय इस प्रकरण में न केवल संलिप्त हैं, बल्कि सार्वजनिक घोषणाओं में भी वे यह मंजूर कर चुके हैं। पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने 28 अगस्त 2010 को नंदानगर साख संस्था की विशेष साधारण सभा में विवादित जमीन पर कॉलेज बनाने की घोषणा भी कर दी है।

'हाईकोर्ट ने भी तो तय की समय सीमा'   
सेठ ने बताया अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन सक्सेना के खिलाफ हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को छह माह में जांच करने के निर्देश दिए हैं। उस केस में और मेरे केस में कोई मौलिक अंतर नहीं है। वहां याचिकाककर्ता ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, यहां विशेष न्यायालय में लगाई गई।                                                   
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यूं निकाली लोकायुक्त पुलिस की हवा
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें उन छहों न्यायिक दृष्टांतों को खारिज किया गया है, जो लोकायुक्त पुलिस ने दिए थे।
एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
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जनता के सामने खड़े कई सवाल

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा है-
1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है?

पत्रिका १९ अक्टूबर २०१०

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

स'चाई छुप नहीं सकती बनावट के असूलों से

 सुगनीदेवी जमीन मामले में लोकायुक्त पुलिस के तर्कों की सुरेश सेठ ने उड़ाई धज्जियां
 विशेष न्यायालय ने सुरक्षित रखा फैसला
  कैलाश को  समय कवच  मिलेगा या नहीं, 20 अक्टूबर को होगा फैसला



सुगनीदेवी जमीन घोटाले की शिकायत के आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के बारे में लोकायुक्त पुलिस द्वारा कोई टिप्पणी नहीं किए जाने का मामला बुधवार को विशेष न्यायालय में गूंजा। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के सभी तर्कों की सिलसिलेवार धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट को बताया विजयवर्गीय को बचाने के लिए ही कोर्ट में अर्जी दी गई है कि जांच की समय सीमा तय नहीं की जाए। कोर्ट ने बेहद गंभीरता से करीब पौन घंटे तक सेठ की बात सुनी और मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया। अब 20 अक्टूबर को पता चलेगा कि लोकायुक्त पुलिस को जांच की समय सीमा में बांधना विशेष न्यायालय के दायरे में आता है या नहीं। सेठ ने मीडिया से चर्चा में कहा बनावट के असूलों से स'चाई को छुपाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वह छुप नहीं सकती है।

केस की पिछली सुनवाई (21 सितंबर) पर लोकायुक्त पुलिस को कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु ïकोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर ही बुधवार को विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में बहस हुई। लोकायुक्त की ओर से विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अपनी बात दोहराई। सुरेश सेठ ने कहा अभी तो एफआईआर ही अधूरी है क्योंकि आरोपी क्रमांक दो के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। छह अगस्त को लोकायुक्त पुलिस भी मान चुकी है कि अभी एफआईआर में और नाम जोड़े जा सकते हैं, फिर समय सीमा का बंधन क्यों नहीं लगाया जाए। दोनों पक्षों की राय सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया, जो 20 अक्टूबर को जारी होगा। बहस के दौरान कोर्ट ने सेठ को कहा आपको मेरा फैसला मंजूर न हो, तो आप हाईकोर्ट भी जा सकते हैं।

'हमने कैलाश को नहीं छोड़ा
कदम ने कोर्ट को बताया लोकायुक्त पुलिस ने अभी विजयवर्गीय को छोड़ा नहीं है। जांच जारी है और अंतिम जांच प्रतिवेदन में सबको पता चल जाएगा कि किसने भ्रष्टाचार किया है और किसने आपराधिक षडयंत्र। सेठ ने जब जोर देकर पूछा कि जांच में कितना समय लगेगा, तो कदम बोले कम से कम एक साल तो लग ही जाएगा।


 हाईकोर्ट ने भी तो तय की समय सीमा     
'पत्रिकाÓ के 5 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित खबर 'हाईकोर्ट ने तय की लोकायुक्त जांच की अवधिÓ का हवाला देते हुए सेठ ने कोर्ट को बताया अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन सक्सेना के खिलाफ हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को छह माह में जांच करने के निर्देश दिए हैं। उस केस में और मेरे केस में कोई मौलिक अंतर नहीं है। वहां याचिकाककर्ता ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, यहां विशेष न्यायालय में लगाई गई।                                                                                                                                                                              


 लोकायुक्त पुलिस की भूमिका संदिग्ध
- सुगनीदेवी जमीन केस में विशेष न्यायालय के समक्ष सुरेश सेठ का लिखित बयान

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने कोर्ट को लिखित में दिया है कि मप्र के मंत्री (कैलाश विजयवर्गीय) के दबाव में आकर लोकायुक्त पुलिस संदिग्ध भूमिका निभा रही है। सुगनीदेवी जमीन मामले में विजयवर्गीय न केवल संलिप्त हैं, बल्कि सार्वजनिक घोषणाओं में भी वे खुद को इसमें शामिल होने की मंजूरी दे चुके हैं। पद का दुरुपयोग करते हुए विजयवर्गीय ने 28 अगस्त 2010 को नंदानगर साख संस्था की विशेष साधारण सभा में विवादित जमीन पर कॉलेज बनाने की घोषणा भी कर दी है।


जनता के सामने खड़े हो गए कई सवाल : सुरेश सेठ

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा है-

1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है?
6. मामले से परिवादी को दूर करने की कोशिश क्या यह साबित नहीं करती कि विशेष लोक अभियोजक अपने पद का दुरुपयोग करके आरोपी नेताओं, सरकार और अपने वरिष्ठ अधिकारियों की तरफदारी कर रहे हैं?
7. अनुसंधान के नाम पर एक बार मामले को टाल देने से अंतिम जांच प्रतिवेदन पेश करने की तारीख 5-10 वर्ष खींच जाएगी। तब अभियोग पत्र प्रस्तुत करना गैर प्रासंगित हो जाएगा?
 

लोकायुक्त पुलिस के छहों न्यायिक दृष्टांतों को चुनौती
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें लोकायुक्त पुलिस के तर्कों को एक सिरे से खारिज किया गया है। लोकायुक्त पुलिस ने छह न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर कोर्ट को बताया था कि इस कोर्ट को जांच की समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं है। सेठ ने इन दृष्टांतों को तार्किक तरीके से खारिज किया।

एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
 

पत्रिका : ०७ अक्टूबर २०१०

लोकायुक्त को मिलेगा 300 पेज का जवाब

- कैलाश को  समय कवच  से सुरक्षित रखने के कदम पर सुरेश सेठ की पुख्ता तैयारी
- सुगनीदेवी केस पर अधूरी एफआईआर पर विशेष न्यायालय में बहस आज


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन में हुए 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस के लिए कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने 300 पेज का जवाब तैयार कर लिया है। यह जवाब बुधवार को विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा। उधर, लोकायुक्त पुलिस का जोर मामले में दर्ज अपनी अधूरी एफआईआर को अंतिम साबित करने पर रहेगा।

केस में पिछली सुनवाई 21 सितंबर को हुई थी, तब लोकायुक्त पुलिस को मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) के भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु लोकायुक्त के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर बहस के लिए कोर्ट ने 6 अक्टूबर मुकर्रर किया था।

 सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है, समय सीमा तय हो

सुरेश सेठ ने 'पत्रिकाÓ को बताया मैंने जवाब में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के करीब एक दर्जन न्यायिक दृष्टांत दिए हैं। सभी कोर्टें चाहती हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में समय सीमा में जांच पूरी हो जाए। सोमवार को मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसआर आलम एवं ïआलोक अराधे की युगलपीठ ने अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) आरएन सक्सेना पर भ्रष्टाचार के आरोप से जुड़े केस में लोकायुक्त पुलिस छह महीने में जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं। 

मेंदोला-संघवी की याचिका में छुपा संदेश
सेठ ने बताया इंदौर हाईकोर्ट में जिस तरह से मामले में फंस चुके रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की याचिका खारिज की है, उसका संदेश साफ है कि जांच प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है। लोकायुक्त समय पर जांच पूरी नहीं कर पाए तो उसे साफ इंकार कर देना चाहिए। मैंने तो हाईकोर्ट में भी सीबीआई जांच की मांग उठाई थी।

'मुझे दूर करना संभव नहींÓ
पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस ने तर्क दिया था कि एफआईआर रजिस्टर होने के बाद जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश नहीं हो जाती, तब तक केस कोर्ट व पुलिस के बीच ही रहता है। परिवादी इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है। परिवादी सेठ को कोर्ट के समक्ष उपस्थिति होने का अधिकार भी नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए सेठ कहते हैं जांच प्रक्रिया से शिकायतकर्ता को दूर करने की कोशिश शंका को जन्म देती है। 

हकीकत की कसौटी पर कितने खरे लोकायुक्त पुलिस के तर्क ?


तर्क एक
घटना अवधि 20 वर्ष की है और इसके लिए विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाए जाना है। इसमें वक्त लगेगा।
कसौटी
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज चार के मुताबिक सभी संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है कि फिर लोकायुक्त पुलिस और कौन से कागज चाहती है?

तर्क दो
विभिन्न साक्षियों के विस्तृत कथन लिपिबद्ध किए जाना है। इसमें अधिक समय लगना स्वाभाविक है।
कसौटी
एफआईआर के पेज पांच के मुताबिक मौजूदा और पूर्व निगमायुक्त से लेकर सभी प्रमुख संबंधित अफसरों और लोगों से बयान लिए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है ऐसे कौन लोग शेष हैं, जिनसे लोकायुक्त पुलिस बात करना चाहती है?

तर्क तीन
दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने का जिक्र नहीं किया गया है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अंतिम जांच रिपोर्ट करने के लिए स्वयं कोर्ट से चार महीने का समय मांगा था। परिवादी सुरेश सेठ की आपत्ति पर डेढ़ महीने की समयसीमा तय हुई थी। अब सवाल है कि उस दिन ïदंड प्रक्रिया संहिता क्यों याद नहीं आई?

तर्क चार
एफआईआर दर्ज होने के बाद अनुसंधान की प्रक्रिया में परिवादी हिस्सा नहीं ले सकता है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि जो एफआईआर दर्ज की गई है, वह अधूरी है। आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) की भूमिका की पड़ताल के लिए अगली तारीख नियत कर दी जाए। अब सवाल है कि प्रारंभिक जांच में जब एक आरोपी की भूमिका को लेकर पड़ताल ही नहीं की गई तो परिवादी को प्रक्रिया से दूर कैसे किया जा सकता है?

पत्रिका : ०६ अक्टूबर २०१०

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

लोकायुक्त पुलिस ने ओढ़ा समयसीमा का कवच

- सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ की जमीन के घोटाले का केस 
- कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर विशेष न्यायालय में पेश नहीं की अंतिम रिपोर्ट
- शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लगाया लोकायुक्त-कैलाश की मिलीभगत का आरोप


परदेशीपुरा चौराहा स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन में हुए 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस ने 'समयसीमाÓ का कवच धारण कर लिया है। इस बहुचर्चित मामले में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को लेकर मंगलवार को अंतिम जांच रिपोर्ट पेश करने के बजाए लोकायुक्त पुलिस ने विशेष न्यायाधीश के आदेश को ही चुनौती दे डाली। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के आठ न्यायिक दृष्टांतों का जिक्र करते हुए कहा कि इस कोर्ट को जांच की समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं है। हम जब तक चाहेंगे, जांच करेंगे। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने इसे लोकायुक्त व कैलाश की मिलीभगत बताया। लोकायुक्त पुलिस के तर्क पर बहस के लिए कोर्ट ने 6 अक्टूबर की तारीख तय की। ï

इस केस में पुलिस ने 5 अगस्त को मेंदोला समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक षडय़ंत्र का केस दर्ज किया था। विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने 6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिया था कि 21 सितंबर तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश कर बताएं कि क्या आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) की इस मामले में क्या भूमिका है। मंगलवार प्रात: 11.20 बजे लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट के समक्ष चार पेज का एक जवाब पेश किया। इसमें कहा गया कि घटना अवधि 20 वर्ष की है और केस की विवेचना के लिए विभिन्न विभागों से मूल दस्तावेज जब्त या प्राप्त किए जाना है। इसमें अधिक समय लगेगा। दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। इस पर कोर्ट में करीब एक घंटेतक कदम और सेठ के बीच जिरह हुई।
सुरेश सेठ को नहीं सुना जाए
जवाब से यह भी स्पष्ट होता है कि लोकायुक्त पुलिस शिकायतकर्ता सुरेश सेठ के तर्कों के आगे निरुत्तर हो रही है। जवाब के पेज चार पर लिखा गया है एफआईआर रजिस्टर होने के बाद जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश नहीं हो जाती, तब तक केस कोर्ट व पुलिस के बीच ही रहता है। परिवादी इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है। परिवादी सेठ को कोर्ट के समक्ष उपस्थिति होने का अधिकार भी नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने इस जवाब को तवज्जो नहीं देते हुए परिवादी सुरेश सेठ के आग्रह को मंजूर किया और 15 दिन बाद सुनवाई की तारीख नियत कर दी। 

जानें...कितने सटीक हैं लोकायुक्त पुलिस के तर्क

पत्रिका पड़ताल

तर्क एक
घटना अवधि 20 वर्ष की है और इसके लिए विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाए जाना है। इसमें वक्त लगेगा।
वास्तविकता
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज चार पर लोकायुक्त एसपी वीरेंद्रसिंह ने लिखा है मेरे द्वारा नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग मंत्रालय भोपाल से तीन एकड़ जमीन से जुड़ी पत्रावली, नोटशीट की प्रमाणित जानकारी, नगरनिगम इंदौर से भूमि की लीज डीड की मूल नस्ती, भूल लीज डीड, परिवाद से जुड़े एमआईसी संकल्प, प्रस्तावों की प्रमाणित जानकारी, संबंधित नोटशीट्स एवं पत्रावली की जानकारी जुटाई जा चुकी है। एसपी ने रजिस्ट्रार इंदौर, सहकारिता विभाग इंदौर, नंदानगर साख संस्था इंदौर से दस्तावेज जुटाने का जिक्र भी किया है।
उठता सवाल
यदि ये दस्तावेज जुटा लिए गए हैं, तो फिर लोकायुक्त पुलिस और क्या कागज लेना चाहती है?

तर्क दो
विभिन्न साक्षियों के विस्तृत कथन लिपिबद्ध किए जाना है। इसमें अधिक समय लगना स्वाभाविक है।
वास्तविकता
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज पांच पर लोकायुक्त एसपी वीरेंद्रसिंह ने लिखा है शिकायतकर्ता सुरेश सेठ, तत्कालीन निगमायुक्त संजय शुक्ल, विनोद शर्मा, आकाश त्रिपाठी, निगमायुक्त सीबी सिंह, तत्कालीन भवन अधिकारी ज्ञानेंद्रसिंह जादौन, तत्कालीन निगम सचिव बंशीलाल जोशी, जिला पंजीयक मोहनलाल श्रीवास्तव, भू-अभिलेख अधीक्षक शिवप्रसाद मंडरा, टीएंडसीपी विजय सावलकर,  नंदानगर साख संस्था मैनेजर प्रवीण कंपलीकर, सहकारिता उपायुक्त महेंद्र दीक्षित, उप सचिव मप्र शासन नरेश पाल, निगम सचिव रणबीरकुमार और धनलक्ष्मी केमिकल्स के नाम पर नक्शा पास करवाने वाले मनीष तांबी के बयान लिपिबद्ध किए जा चुके हैं।
उठता सवाल
वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर धनलक्ष्मी केमिकल्स व नंदानगर साख संस्था से जुड़े लोगों तक बयान लिए जा चुके हैं, तो फिर ऐसे कौन लोग शेष रह गए हैं, जिनसे लोकायुक्त पुलिस बात करना चाहती है?

तर्क तीन
दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने का जिक्र नहीं किया गया है।
वास्तविकता
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अंतिम जांच रिपोर्ट करने के लिए स्वयं कोर्ट से चार महीने का समय मांगा था। इस पर परिवादी सुरेश सेठ ने यह कहकर आपत्ति उठाई थी कि तब तक तो विशेष न्यायाधीश का तबादला करवा दिया जाएगा। इतना अधिक समय देने की आवश्यकता नहीं है। बाद में कदम ने ही कोर्ट में मंजूर कर लिया था कि डेढ़ महीने में हम अंतिम रिपोर्ट सौंप देंगे। कदम के साथ उस दिन लोकायुक्त डीएसपी अशोक सोलंकी भी कोर्ट में मौजूद थे।
उठता सवाल
क्या विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम को उस दिन यह बात ध्यान में नहीं आई कि दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने जिक्र नहीं किया गया है?

तर्क चार
एफआईआर दर्ज होने के बाद अनुसंधान की प्रक्रिया में परिवादी हिस्सा नहीं ले सकता है।
वास्तविकता
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम और डीएसपी अशोक सोलंकी ने कोर्ट को बताया था कि जो एफआईआर दर्ज की गई है, वह अधूरी है। आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) की भूमिका की पड़ताल के लिए अगली तारीख नियत कर दी जाए।
उठता सवाल 
प्रारंभिक जांच में जब एक आरोपी की भूमिका को लेकर पड़ताल ही नहीं की गई तो परिवादी को प्रक्रिया से दूर करने की कोशिश करना कितना न्यायोचित है?

तर्क पांच
जिन लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया है, उनके सुसंगत साक्ष्य का संकलन एवं परीक्षण करने में अधिक समय लगेगा।
वास्तविकता
शासन को करीब पौने तीन करोड़ रुपए की चपत लगाने वाले जिन 17 लोगों के खिलाफ डेढ़ माह पहले एफआईआर दर्ज की थी, उन्हें लोकायुक्त पुलिस ने आज तक नोटिस भी नहीं भेजा है। आरोपी बनाए गए सिटी इंजीनियर हंसकुमार जैन, रिटायर्ड भवन अधिकारी अशोक बैजल और रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री नरेंद्र सुराणा ने 'पत्रिकाÓ को बताया है कि अब तक तो उन्हें यह भी पता नहीं लगा है कि उन पर आरोप क्या है?
उठता सवाल
लोकायुक्त पुलिस ने जांच को आगे ही नहीं बढ़ाया है, तो यह कैसे मान लिया जाए कि इस केस को अंजाम तक पहुंचाने में वह 'ड्यूटीÓ निभा रही है? 

क्या संभागायुक्त-आईजी को नहीं दिखा
सवा करोड़ का खर्चा
कैलाश के कार्यक्रम में मौजूद होने पर सुरेश सेठ ने विशेष न्यायाधीश के सामने उठाया सवाल नंदानगर में ताबड़तोड़ बांट दी गई थीं 20 हजार साडिय़ां

रविवार को गणेशोत्सव के दौरान नंदानगर गोल स्कूल में हुए महाआरती आयोजन में संभागायुक्त बसंतप्रताप सिंह और आईजी संजय राणा की मौजूदगी मंगलवार को सुगनीदेवी कॉलेज परिसर के जमीन घोटाले केस से जुड़ गई। कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी के समक्ष कहा कि उस आयोजन में सवा करोड़ रुपया खर्च हो रहा है और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय व विधायक रमेश मेंदोला की मौजूदगी में ताबड़तोड़ महिलाओं को 20 हजार साडिय़ां बांट दी गई। अवकाश होने के बावजूद रविवार को अचानक ये साडिय़ां कहां से आ गई? क्या दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को यह सबकुछ नहीं दिखा? 

सुरेश सेठ ने मीडिया से चर्चा में बताया कोर्ट ने इस पर आश्चर्य जाहिर किया है। दोनों अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए ही उस कार्यक्रम में बुलाया गया था। दोनों के सामने ही कैलाश-मेंदोला ने कहा यहां इतनी महिलाएं मौजूद हैं, इन्हें खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। सभी को उपहार में साडिय़ां दी जाना चाहिए। इतना कहते ही पता नहीं कहां से साडिय़ों के बक्से आ गए और महिलाओं में इन्हें बांट दिया गया। दरअसल, साडिय़ां पहले से ही वहां मौजूद थीं। इतने वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसे कार्यक्रमों से बचना चाहिए क्योंकि इससे आम लोगों का उनपर से भरोसा उठता है। बड़े अफसर भी मूकदर्शक बने रहेंगे तो भ्रष्ट ताकतों के खिलाफ आवाज उठाने वाले मेरे जैसे लोग आखिर कहां जाकर पनाह लेंगे? 

हमारी मौजूदगी में नहीं बंटे उपहार
कार्यक्रम में बुलाया था, इसलिए गए। मैं और आईजी दोनों ही साथ में थे, परंतु कुछ ही देर में वहां से चले आए थे। हमारी मौजूदगी में वहां कोई उपहार नहीं बांटे गए। संभवत: वहां वीडियो शूटिंग भी हुई है। उसके फुटेज भी देखे जा सकते हैं।
- बसंतप्रताप सिंह, संभागायुक्त

रिपोर्टिंग से कोर्ट हैरान
केस की सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश ने मीडिया के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया। बाद में जिला कोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष सुरेंद्र वर्मा ने कोर्ट से मीडियाकर्मियों को सुनवाई में मौजूद रहने का आग्रह किया। कोर्ट ने इसे मंजूर करते हुए मीडियाकर्मियों को बताया यहां की न्यायिक प्रक्रिया को एक अखबार ने ('पत्रिकाÓ नहीं) बेहद गलत तरीके से रिपोर्ट किया। यहां तक लिख दिया कि बॉबी छाबड़ा ने कोर्ट में बहस की, जबकि वास्तव में ऐसा हुआ ही नहीं था। इससे जनता का न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसा टूटता है। 

पत्रिका : २२ सितम्बर २०१०

100 करोड़ के घोटाले की अंतिम रिपोर्ट आज

कैलाश के खातिर लोकायुक्त पुलिस विशेष न्यायाधीश से मांग सकती है और मोहलत

सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के मामले में मंगलवार को लोकायुक्त पुलिस द्वारा विशेष न्यायाधीश के समक्ष तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश की जाना है। कोर्ट द्वारा दिए गए 45 दिन के समय में जांच एजेंसी से क्या सबूत जुटाए हैं, इस पर सभी की निगाहें हैं। पांच महीने से चल रहे इस केस में लोकायुक्त पुलिस अब तक पर्याप्त समय मांग चुकी है। खासकर कैलाश के खिलाफ। संकेत है कि इस बार भी लोकायुक्त पुलिस द्वारा जांच और सबूतों के नाम पर समय मांगा जाएगा। 

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर विशेष न्यायाधीश के आदेश से लोकायुक्त पुलिस ने 6 अप्रैल को मामले की जांच शुरू की थी। लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी, मनीष संघवी और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपराधिक षडय़ंत्र रचने का केस दर्ज किया था। पिछली सुनवाई (6 अगस्त) पर कोर्ट में सेठ ने लोकायुक्त पुलिस पर आरोप लगाया था कि जानबूझकर आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) को बचाने की कोशिश हो रही है। इस आरोपी के बारे में स्थिति स्पष्ट की जाना चाहिए। इसी पर कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को 21 सितंबर तक केस में अंतिम रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था।  

क्या हो सकता है
  • जांच पूरी नहीं हो पाने के कारण लोकायुक्त पुलिस एक बार फिर समय मांग सकती है।
  • अगर जांच पूरी हो गई है तो गोपनीय रिपोर्ट पर निर्भर रहेगा कि कैलाश को दोषी पाकर एफआईआर दर्ज की गई या क्लीनचिट दी गई।
  • हो सकता है इस मामले में लोकायुक्त पुलिस द्वारा नए दिशा-निर्देश मांगे जा सके।


डेढ़ महीने में नोटिस भी नहीं भेजा
- छह अगस्त को एफआईआर दर्ज करके लोकायुक्त पुलिस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया केस
सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के केस में डेढ़ महीने पहले लोकायुक्त पुलिस ने विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपतियों नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी व मनीष संघवी तथा 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपाराधिक षडयंत्र रचने की एफआईआर तो दर्ज की थी। परंतु इस पर अगला कदम आज तक नहीं उठाया गया है। किसी भी आरोपी को अब तक न तो नोटिस दिया गया है और न ही कोई पूछताछ ही की गई।

लोकायुक्त पुलिस ने प्रारंभिक जांच में माना है कि तीन एकड़ जमीन के लिए धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में 17 लोगों ने मिलकर षडय़ंत्र किया और इससे सरकार को करीब पौने तीन करोड़ रुपए की चपत लगी। इसी आधार पर 5 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई, परंतु इसके बाद चालान पेश करने को लेकर रवैया ठंडा ही है। अफसर चालान के लिए आरोपियों के खिलाफ जांच, दस्तावेज के नाम लंबी प्रक्रिया बताते हैं। सही मायने में शुरुआत हुई या नहीं। इसे लेकर 'पत्रिकाÓ ने जिन 17 लोगों पर केस दर्ज हुआ उनमें से कुछ से बात की तो पता चला कि इस मामले में अभी कोई गति ही नहीं है। 


मुझे अब तक न तो कोई नोटिस मिला है और न ही एफआईआर की प्रतिलिपि। जो भी मालूम हुआ है, वह अखबारों के जरिए ही पता चला है।
हंसकुमार जैन, सिटी इंजीनियर, निगम

कुछ माह पहले लोकायुक्त पुलिस ने बयान के लिए बुलाया था। केस दर्ज होने के बाद इस संबंध में मुझसे न कोई संपर्क किया और न ही किसी प्रकार का नोटिस मिला। मेरा तो यही सवाल है कि भला बताए कि मेरा दोष क्या है आरोप क्या है?
अशोक बैजल, रिटायर्ड भवन अधिकारी

सुगनीदेवी कॉलेज की जमीन गड़बड़ी में मुझ पर भी लोकायुक्त पुलिस ने केस दर्ज किया। यह मुझे मीडिया के माध्यम से ही पता चला। पूरा मामला क्या है मुझे ही नहीं पता। जो आरोप लगाए गए हैं वे विरोधभासी हैं। केस दर्ज होने के बाद लोकायुक्त पुलिस की ओर से मुझे न नोटिस मिला न संपर्क किया गया।
नरेंद्र सुराणा, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री  



तारीख -पे- तारीख

अप्रैल
जांच के लिए तीन माह का समय दिया

कोर्ट ने 6 अप्रैल को तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी की भूमिका की जांच कर दोषी पाए जाने पर कार्रवाई को लेकर तीन महीने का समय दिया था। इसके लिए 6 जुलाई को रिपोर्ट पेश की जानी थी।
जुलाई
फिर समय मांग लिया

 6 जुलाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट में बताया कि जांच पूरी नहीं हुई है। इसके लिए तीन माह समय मांगा गया। इस पर परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने आपत्ति ली व लोकायुक्त अफसरों पर राजनीतिक दबाव का आरोप लगाया। इसके बाद कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को फिर एक माह का समय दिया गया।
अगस्त
मुख्य कर्ताधर्ता कैलाश का नाम छोड़ दिया

6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष व तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी सहित 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज करने के साथ रिपोर्ट विशेष न्यायाधीश के समक्ष पेश की थी। तब परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय का नाम हटाने को लेकर आपत्ति ली थी और आरोप लगाए थे। तब अफसरों ने कहा था कि कैलाश के खिलाफ जांच चल रही है। इसके लिए कोर्ट से चार माह का समय मांगा था जिस पर डेढ़ माह का समय दिया गया था।
...और अब सितंबर
इस तरह करीब साढ़े पांच महीने से जांच चल रही है। कैलाश किन-किन आधारों पर दोषी हो सकते हैं इसे लेकर सेठ प्रमाणित साक्ष्यों का पुलिंदा पेश कर चुके हैं। उधर, लोकायुक्त पुलिस पूर्व में भी कई दस्तावेज जुटा चुकी है। 'पत्रिकाÓ कैलाश के खिलाफ आरोपों के बिंदुओं को सोमवार को उल्लेख कर चुकी है। ऐसे में अब सबकी नजरें कैलाश को लेकर लोकायुक्त की रिपोर्ट पर टिकी है।









पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

कम नहीं होते 45 दिन

सुगनीदेवी जमीन घोटाला
- 100 करोड़ के जमीन घोटाले पर विधि विशेषज्ञों की राय
- विशेष न्यायाल में कल पेश होना है लोकायुक्त पुलिस की जांच रिपोर्ट



सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में 43 दिन पहले यानी 6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस को विशेष न्यायालय ने आदेश दिया था कि 45 दिन में मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट सौंप दे। वह दिन कल है। विधि विशेषज्ञों से रायशुमारी में साफ होता है कि इस मामले में मौजूद दस्तावेज और 17 लोगों के खिलाफ की गई एफआईआर को देखकर लगता है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही, 'दूध का दूधÓ साबित करने के लिए लोकायुक्त जैसी सशक्त जांच एजेंसी को दी गई 45 दिन की समय सीमा पर्याप्त हैं।

पिछली सुनवाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि मामले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति (नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी और मनीष संघवी) और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज कर लिया गया है। नेता, अफसर और उद्योगपतियों के गठजोड़ से सरकार को 2 करोड़ 70 लाख रुपए की चपत लगी है। कोर्ट में 29 पेज की एफआईआर भी पेश की गई थी। तब परिवादी सुरेश सेठ ने सवाल उठाया था कि आरोपी क्रमांक दो यानी विजयवर्गीय के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने 45 दिन का समय दिया था। 'पत्रिकाÓ ने पूरे मामले को विधि विशेषज्ञों के समक्ष रखा।


मूल शिकायत में कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य

तथ्य एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रुप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं। 

तथ्य दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।

तथ्य तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडयंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई।

तथ्य चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।

तथ्य पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।

तथ्य छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।



एफआईआर में ही छुपे हैं कैलाश की भूमिका के आधार

  • पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया। विसंगति यह है कि अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें? 
  • पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई। सवाल उठता है डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?
  • पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनी ही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ। इसी से सवाल उपजता है क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडयंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है?  

पत्रिका : २० सितम्बर २०१० 

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कैलाश को धूल चटाई

ज्योतिरादित्य सिंधिया
कैलाश विजयवर्गीय
क्रिकेट का क,ख,ग भी नहीं जानने वाले मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के सीधे मुकाबले में करारी शिकस्त देते हुए लगभग धूल चटा दी। सिंधिया को 142 वोट मिले, जबकि शुरू दिन से 'अहंकारÓ में डूबे कैलाश को 70 से ही संतोष करना पड़ा। कांग्रेस और भाजपा के लिए भी यह चुनाव बेहद प्रतिष्ठा का बन चुका था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक घोटालों के आरोपों से घिरे कैलाश के लिए यह हार बहुत बड़ा अवरोध साबित होगी।

सिंधिया ने मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के कप्तान (अध्यक्ष) बनकर लंबी पारी के इरादे से मैदान में जम गए हैं। इसी चुनावी मैच को लेकर रविवार सुबह से ही इंदौर समेत पूरे राज्य और देशभर के नेता और क्रिकेटर निगाहें जमाए थे। इंदौर के उषाराजे स्टेडियम में प्रात: 10.30 बजे मैनेजिंग कमेटी की बैठक हुई और 12.30 बजे साधारण सभा की बैठक। सभा में सिंधिया ने समझौते के लिए डाली गई कैलाश समर्थकों की गेंद को वाइड करार देते हुए कहा चुनाव होकर रहेंगे। मैं वॉकओवर देने के मूड में नहीं हूं। ïदोपहर 2.45 बजे चुनावी मैच शुरू हुआ, जो रात 12.30 बजे तक चला। पूरे समय सिंधिया हावी रहे और एक बार तो ऐसी नौबत भी आ गई कि कैलाश को 'बॉल टेम्परिंगÓ जैसी बचकानी हरकत के लिए माफी तक मांगना पड़ी। मैच शुरू होने के पहले सिंधिया ने अपनी टीम के सबसे मजबूत खिलाड़ी (सचिव) संजय जगदाले को बाहर कर लिया क्योंकि उनके आसानी से आउट होने की प्रबल संभावना बन चुकी थी। मैच एंपायर (चुनाव अधिकारी) दिलीप चुडकर को घोषित किया गया था। देर रात घोषित किया गया कि सिंधिया मैन ऑफ द डे, मैच एंड एमपीसीए हैं। 217 में से उन्हें 142 सदस्यों ने समर्थन दिया है और कैलाश टीम 'क्लीन बोल्डÓ हो चुकी है।

जीत-हार के राजनैतिक मायने 
सिंधिया की जीत और कैलाश की हार के गहरे राजनैतिक मायने भी हैं। कैलाश 100 करोड़ रुपए के सुगनीदेवी जमीन घोटाले में जांच से गुजर रहे हैं और चाहते थे कि इस चुनाव के जरिए ताकत दिखाकर 'बचÓ जाएं। हार से उनके धुर विरोधियों को ताकत मिलेगी। कैलाश की यह पहली हार है। उधर, सिंधिया की जीत से इंदौर में कांग्रेस के 'ध्रुवीकरणÓ का दौर शुरू होने की संभावना है।

कार्यकारिणी, संस्थाओं पर सिंधिया का कब्जा

पद/संस्था                          जीते                                   हारे
अध्यक्ष                           ज्योतिरादित्य सिंधिया (१४३)    कैलाश विजयवर्गीय (७२)
चेयरमैन                          एमके भार्गव (१४१)                  अशोक जगदाले (७०)
उपाध्यक्ष एक                    विजय नायडू (१२९)                रमेश भाटिया (५९)   
उपाध्यक्ष दो                      भगवानदास सुतार (१४७)       विजय बडज़ात्या (५३)
उपाध्यक्ष तीन                  श्रवण गुप्ता (११९)                    अनुराग सुरेका (६१)
सचिव                            नरेंद्र मेनन (१३३)                    अमिताभ विजयवर्गीय (६१)
कोषाध्यक्ष                      वासु गंगवानी (१४९)                चंद्रशेखर भाटी (३१)
सहसचिव एक                 अल्पेश शाह (१२४)                  अमरदीप पठानिया (५३)
सहसचिव दो                   नरेंद्र दुआ (१३७)                     संजय लुणावत (४०)
मैनेजिंग कमेटी एक        गुलरेज अली (151)                  गोपालदास मोहता (66)
मैनेजिंग कमेटी दो          भोलू मेहता (158)                    डॉ. अपूर्व वोरा (67)
मैनेजिंग कमेटी तीन       मिलिंद कनमड़ीकर (144)         मानवेंद्रसिंह बैस (55)
मैनेजिंग कमेटी चार        अनिल जोशी (129)                  ————-
क्लब संस्था एक             स्टार क्लब (121)                   वैष्णव हायर सेकंडरी (53)
क्लब संस्था दो               सीसीआई (147)                     डीएवीवी (50)
क्लब संस्था तीन            वायएमसीए (140)                 एसजीएसआईटीएस (35)
क्लब संस्था चार            सिंधिया स्कूल (151)              जहांगीराबाद क्लब जब. (28)
(कोष्टक में वोट संख्या। कुल वोट 215। तृतीय मोर्चे के कुछ को नाममात्र वोट)


साधारण सभा में कैलाश को मांगना पड़ी माफी
- सिंधिया के भाषण में रुकावट डालने का भुगता खामियाजा

मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) की वार्षिक साधारण सभा में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को खुद के बरताव के कारण शर्मिंदा होना पड़ा। वे एमपीसीए अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाषण में व्यवधान पैदा कर रहे थे। बाद में कैलाश को गलती का अहसास हो गया और उन्होंने माफी भी मांगी।

दरअसल, साधारण सभा में रीवा डिवीजन की क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव कमल श्रीवास्तव अंतरराष्टï्रीय मैच में टैक्स से जुड़े एक मुद्दे पर कुछ प्रश्न पूछ रहे थे। सिंधिया ने उन्हें यह कहते हुए समझाइश दी कि अभी बात पूरी हो जाने दीजिए। इस पर कैलाश अचानक खड़े हो गए। उन्होंने कहा यह अलोकतांत्रिक है, सभी को बोलने का मौका दिया जाना चाहिए। शुरू से अंग्रेजी में भाषण दे रहे सिंधिया ने इस पर हिंदी में कहा कैलाशजी, यह इंदौर डिवीजन क्रिकेट एसोसिएशन (आईडीसीए) नहीं है, एमपीसीए है। यहां कुछ नियम कायदे हैं, उन्हीं के तहत मैं बात कर रहा हूं। जब आपका मौका आएगा, तब बोलिएगा। गरिमा बनाकर रखें। इस पर कैलाश मौन हो गए। कुछ ही देर में उन्हें गलती का अहसास भी हो गया और 'समझदारीÓ दिखाते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने व्यवहार पर माफी मांगी।

'लोकतंत्र के लिए किया यह सबकुछÓ
बाहर आने के बाद माफी मांगने के सवाल पर कैलाश ने मीडिया को बताया पहली बार एमपीसीए की साधारण सभा लोकतांत्रिक तरीके से हुई। मैंने इसी के लिए प्रयास किया और मैं उसमें कामयाब भी रहा।

सिंधिया को देखने उमड़े कांग्रेसियों पर बरसी लाठियां
करीब 9.30 बजे सिंधिया बाहर आए और कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंचे। उन्होंने पुलिस के एक वाहन पर खड़े होकर सभी का अभिवादन किया। कार्यकर्ता उन्हें देखने उमड़े, जिससे अनियंत्रण की स्थिति बनी। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, नहीं माने तो लाठियां बरसाई। बाद में कांग्रेस नेताओं ने कार्यकर्ताओं को काबू किया। सिंधिया के साथ सांसद सज्जन वर्मा और विधायक अश्विन जोशीï, तुलसी सिलावट, सत्यनारायरण पटेल भी मौजूद थे।


सिंधिया ने ठुकराई समझौते की पेशकश

केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की दावेदारी के कारण देशभर में चर्चित हो चुके मप्र क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) के चुनाव की प्रक्रिया रविवार को इंदौर के उषाराजे स्टेडियम में शुरू हुई। साधारण सभा के दौरान चुनाव टालने के लिए सिंधिया से कई सदस्यों ने आग्रह किया, लेकिन उन्होंने समझौते की पेशकश को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा, चुनाव लड़कर ही अध्यक्ष बनूंगा। किसी से किसी पद के लिए कोई समझौता नहीं होगा। उधर, एमपीसीए की साधारण सभा के दौरान कैलाश को अपने ही व्यवहार के कारण माफी मांगना पड़ी।

स्टेडियम में प्रात: 10.30 बजे एमपीसीए की मैनेजिंग कमेटी की बैठक होना थी, लेकिन 8 बजे से ही यहां गहमागहमी शुरू हो गई थी। सिंधिया के समर्थन में वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेश जोशी की अगुवाई में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता जुट गए थे। विजयवर्गीय समर्थक स्टेडियम के बाहर नहीं फटके। प्रात: 10.45 बजे मैनेजिंग कमेटी की बैठक हुई। इसमें कुछ प्रस्ताव पास किए गए और दोपहर 12.30 बजे साधारण सभा शुरू हो गई। राज परिवार की उषाराजे और संतोष मल्होत्रा समेत कई वरिष्ठ सदस्यों ने एमपीसीए के मौजूदा अध्यक्ष सिंधिया से आग्रह किया कि आज तक कभी एमपीसीए के चुनाव नहीं हुए। इसी परंपरा को आगे भी निभाया जाए। इस दौरान कैलाश के चेहरे के हावभाव बता रहे थे कि वे भी चुनाव के पक्ष में नहीं है। बैठक में हिस्सा लेने जाने के पहले ही कैलाश ने मीडिया को कहा भी था हम शुरू दिन से चुनाव के पक्ष में नहीं हैं। हमने सारे विकल्प खुले रखे हैं। सिंधिया ने परंपरा निभाने के प्रस्ताव को नकारते हुए कहा, पंद्रह दिन से जो बातें हो रही हैं, उसे देखते हुए चुनाव अनिवार्य है और बगैर चुनाव के मैं अध्यक्ष नहीं बनना चाहता। आखिर दोपहर 2.40 बजे चुनाव की घोषणा हो गई। दिलीप चुडकर को रिटर्निंग अधिकारी नियुक्त कर दिया गया और दोपहर 3.15 बजे तक नामांकन भरने का समय निर्धारित किया गया। 3.45 बजे तक नाम वापसी का समय तय किया गया। शाम 5.45 से मतदान शुरू हुआ।

जगदाले के लिए बदली रणनीति
चुनाव की घोषणा के बाद सिंधिया पैनल ने तत्काल रणनीति बदलते हुए सचिव पद के लिए पहले से घोषित उम्मीदवार संजय जगदाले को हटा लिया। उनके स्थान पर नरेंद्र मेनन को उतारा गया। दरअसल, जगदाले लगातार दो बार से सचिव पद पर पदस्थ हैं और इस बार फिर से सचिव बनने के लिए उन्हें दो तिहाई वोट हासिल करना अनिवार्य है। चुनाव में किसी किस्म का चौखिम मोल नहीं लेने की रणनीति के तहत सिंधिया ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया।

उषाराजे स्टेडियम का नया नाम होल्कर स्टेडियम
करीब पौने दो घंटे चली मैनेजिंग कमेटी की बैठक में तय किया गया कि उषाराजे स्टेडियम का नाम होल्कर स्टेडियम कर दिया जाएगा। पूर्व क्रिकेटर एसपी चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई, जो स्टेडियम में मौजूद बॉक्सों के नामकरण के लिए क्रिकेटरों के नाम सुझाएगी। यह भी तय हो गया कि इंदौर और ग्वालियर में स्टेडियम के लिए 25-25 एकड़ जमीन का इंतजाम एमपीसीए द्वारा किया जाएगा। 


वेशभूषा में स्मार्ट दिखे सिंधिया

सिंधिया फारमल पेंट शर्ट के साथ ही गहरे नीले रंग का कोट पहनकर आए थे, जबकि कैलाश पारंपरिक अंदाज में सफेद कुर्ते पायजामे पर केशरिया दुपट्टा डालकर। दोनों की वेशभूषा भी चुनावी चर्चा में शामिल रही। लोगों का कहना था एमपीसीए की गरिमा के अनुसार तो जेंटलमेन और स्मार्ट सिंधिया को ही ज्यादा अंक मिलेंगे।

'चुनाव होना ही चाहिए नहीं तो मैं चलाÓ
खेल प्रशाल और आईडीए बिल्डिंग के मेनगेट पर जैसे ही सिंधिया पहुंचे, महेश जोशी से उनकी मुलाकात हुई। जोशी ने सिंधिया को कहा चुनाव होना ही चाहिए, नहीं तो मैं चला जाऊंगा। किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करना है। सिंधिया ने भी उन्हें आश्वस्त किया कि आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा।


सुबह से चलते रहे बयानों के बाउंसर

प्रात: 10.10 बजे : कैलाश विजयवर्गीय
उपाध्यक्ष पद के दावेदार रमेश भाटिया के साथ गाड़ी से उतरे और बोले हम तो शुरू दिन से ही चुनाव नहीं चाहते हैं। इंदौर को मिला स्टेडियम, एकेडेमी और जिम सबकुछ बीसीसीआई ने दिया है, एमपीसीए ने कुछ नहीं दिया। निर्वाचित होने पर पांच वर्ष में पांच अंतरराष्टï्रीय क्रिकेटर तैयार करूंगा। गरीब खिलाडिय़ों के लिए फंड बनाऊंगा।

प्रात: 10.35 बजे: ज्योतिरादित्य सिंधिया
दूसरे बैरिकेट्स के यहां से पैदल चलकर मेनगेट तक पहुंचे। मीडिया से अनौपचारिक चर्चा में बोले अब तो चुनाव हो ही जाए। कुछ ही घंटों में सबके सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। वे आत्मविश्वास से भरे थे और अपने पीए पाराशर के साथ स्टेडियम में प्रविष्ठ हुए। 

प्रात: 11 बजे: सज्जन वर्मा
देवास क्रिकेट एसोसिएशन की नुमाइंदगी की। पैदल आने का कारण पूछा तो बोले कुछ लोगों को सड़क पर लाना है। कहा यह कांग्रेस-भाजपा की लड़ाई नहीं है, क्रिकेटर और गैर क्रिकेटर की जंग है। विजयवर्गीय बताएं कि डेढ़ वर्ष से इंदौर डिवीजन में होने के बावजूद उन्होंने मैदान के लिए जमीन का इंतजाम क्यों नहीं किया?

प्रात: 11.10 बजे: महेश जोशी
मेनगेट पर करीब तीन घंटे तक तैनात रहे। मीडिया से कहा पहले चूक गया था, तो ओलंपिक संघ में गंदगी घूस गई, अब यहां नहीं घुसने दूंगा। कुछ उठाईगिरे किस्म के लोग क्रिकेट की फिजा बिगाडऩा चाहते हैं, उन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।

प्रात: 11.15 बजे: अशोक जगदाले
कैलाश पैनल से चेयरमैन पद के दावेदार बनकर आए और कहा चुनाव लड़कर ही लौटूंगा। इंदौर के खिलाडिय़ों के साथ भेदभाव हुआ और यह सहन नहीं किया जा सकता।

दोपहर 12 बजे : अश्विन जोशी
वोटर ने नाते भीतर गए। हाथ में 'पत्रिकाÓ अखबार की वे खबरें थी, जिनमें कैलाश के घोटाले प्रकाशित हुए। साफगोई से बोले नेताओं को खेल से दूर हो जाना चाहिए। मैं खुद भी इसके लिए तैयार हूं। सिंधिया जेंटलमेन और क्रिकेटर हैं, इसलिए एमपीसीए का अध्यक्ष पद उनका हक है।

दोपहर 2.45 बजे : श्रवण गुप्ता
एमपीसीए के पूर्व अध्यक्ष ने बताया साधारण सभा सद्भावना पूर्ण तरीके से पूरी हुई। विजयवर्गीय कुछ उखड़े थे, लेकिन बाद में गलती मानकर शांत हो गए। 85 प्रतिशत वोटर आ चुके हैं।  


कांग्रेस एकजुट, कैलाश के कारण बिखरी भाजपा
गुटों में बंटी कांग्रेस को भी चुनाव के नाम एकजुटता दिखाने का मौका मिल गया। दिग्गी, पचौरी गुट ने सिंधिया से साथ कंधे से कंधा मिलाकर मैदान संभाला। प्रमोद टंडन, विपीन खुजनेरी, नरेंद्र सलूजा, रघु ठाकुर, संजय शुक्ला, कृपाशंकर शुक्ला, अंतरसिंह दरबार, पंकज संघवी, नरेंद्र सलूजा, अभय दुबे, भल्लू यादव, अभय वर्मा, छोटे यादव के साथ ही विधायक सत्यनारायण पटेल भी मौजूद थे। उधर, भाजपा में बिखराव दिखा। सुमित्रा महाजन, भवंरसिंह शेखावत, सुदर्शन गुप्ता जैसे नेता कैलाश विजयवर्गीय के कारण क्रिकेट के इस मैदान से दूर हो गए। इतना ही नहीं भाजपा ने अंदरूनी तौर पर यह भी तय कर लिया था कि शहर हित में कैलाश को सबक सिखाने का यह सही मौका है।

सिलावट ने संभाली कमान
सिंधिया के कट्टर समर्थक तुलसी सिलावट ने कमान संभाल रखी थी। वे वोटरों को एक-एक करके बुलाते रहे और उन्हें ससम्मान भीतर भेजते रहे। हालांकि, बीच में उनकी एक-दो बार पुलिस से बहस भी हो गई। उनके गनमैन को जब पुलिस ने बेरिकेट्स के बाहर करना चाहा तो सिलावट ने कहा मेरा गनमेन मेरे साथ नहीं रहेगा, तो कहां जाएगा।

सागर, बदनावर, महिदपुर के विधायक भी पहुंचे
सिंधिया के समर्थन में सागर के विधायक गोविंदसिंह राजपूत, बदनावर धार के राजवद्र्धनसिंह दत्तेगांव और महिदपुर की कल्पना पैरूलकर भी पहुंची। उज्जैन के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती भी मौजूद थे।


तीन स्थानों पर पुलिस चेकिंग 
स्टेडियम में जाने वाले हर सदस्य की चेकिंग के लिए तीन चरण तय किए गए थे। एक रेसकोर्ट रोड मुहाने पर, दूसरा खेल प्रशाल के मेनगेट के पास में और तीसरा उषाराजे स्टेडियम का मेनगेट। बगैर पहचान पत्र बताए किसी भी पहले गेट से ही अंदर नहीं जाने दिया गया। मीडिया सदस्यों को दूसरे चरण तक की अनुमति थी, जबकि एमपीसीए के वोटर ही तीसरे चरण के पार जा सके।

बार-बार जाम हुआ ट्रैफिक
रेसकोर्स रोड पर प्रात: 11 बजे से ही ट्रैफिक का हाल बिगडऩे लगा था। पुलिस ने कई बंदोबस्त किए, लेकिन वे भी नाकाफी साबित हुए। दोपहर 12 बजे बाद बैरिकेडिंग की गई और इसके बाद कुछ देर के लिए हालात काबू रहे, किंतु बाद में फिर से स्थिति बिगड़ गई।

बारिश से मची अफरातफरी
दोपहर 2.15 बजे हल्की बारिश शुरू होते ही कुछ देर के लिए अफरातफरी मच गई। कांग्रेसी आसपास के शापिंग कॉम्प्लेक्सों की ओर दौड़े और खुद को भीगने से बचाया। हालांकि, बारिश कुछ मिनिटों में ही बंद हो गई और फिर से लोग सड़के आसपास जुट गए।

95 वर्षीय दुबे भी पहुंचे
टसल में तबदील हो चुनाव में वोट देने के लिए 95 वर्षीय एमएम दुबे भी स्टेडियम पहुंचे। उन्होंने कहा क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए मैं यहां आया हूं।


कैलाश बोले, मैं हार-जीत के लिए चुनाव नहीं लड़ा

वोटिंग समाप्त होने के तत्काल बाद कैलाश विजयवर्गीय स्टेडियम से बाहर आए और मीडिया से मुखातिब हुए। पराजित योद्धा की मुद्रा में उन्होंने कहा मैं हार-जीत के लिए चुनाव नहीं लड़ा था। मैं तो उसी दिन जीत गया था, जब सिंधिया जैसे 'महाराजाÓ को सड़क पर उतर कर वोट मांगना पड़े। खुद की मर्जी से नहीं, मैं तो क्रिकेटरों के लिए मैदान में उतरा। साधारण सभा में उनके द्वारा माफी मांगने की घटना पर वे बोले पहली बार साधारण सभा में लोकतांत्रिक तरीके से चर्चा हुई।

कैलाश को नहीं मिला उम्मीदवार
कैलाश पैनल की बुरी हालत का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें मैनेजिंग कमेटी के लिए पूरे चार उम्मीदवार भी नहीं मिले। उन्होंने गोपालदास मेहता, डॉ. अपूर्व वोरा व मानवेंद्रसिंह बैस को ही मैदान में उतारा, जबकि सिंधिया पैनल की ओर से हर पोस्ट के लिए उम्मीदवार मैदान में था।


 
 
 
पत्रिका : २३ अगस्त २०१०
साथ में विकास मिश्रा 

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सिंधिया ने विजयवर्गीय को दिखा दी ताकत

- 80 से अधिक वरिष्ठ-कनिष्ठ क्रिकेटर ने मिलकर जताया भरोसा
- एमपीसीए का चुनावी रंग

मप्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव के पहले ही केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शनिवार को अपनी ताकत का अहसास मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को करवा दिया। वे सायाजी होटल की सातवीं मंजिल के कमरा नंबर 712 में रूके थे और वहां उनसे मिलने के लिए करीब 80 से अधिक वरिष्ठ और कनिष्ठ क्रिकेटर मौजूद थे। ये सभी एसोसिएशन के सदस्य हैं। सिंधिया ने 10-10 के ग्रुप में इन सभी से चाय की चुस्कियों के बीच इत्मिननान से मुलाकात की। सिलसिला रात 11.30 बजे तक चला। बुधवार को विजयवर्गीय ने भी श्रीमाया सेलिब्रिटी होटल में डीनर पार्टी दी थी, लेकिन उसमें महज 14 सदस्य ही पहुंचे थे।



कमरा नंबर 712 में बिछी एमपीसीए की फिल्डिंग


मप्र क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) के चुनाव के पहले शनिवार को होटल सायाजी के कमरा नंबर 712 में मौजूदा अध्यक्ष सिंधिया की फिल्डिंग जमी। वे यहां पहुंचे और मिलने वाले सदस्यों की होड़ सी लग गई। हर कोई उनसे पहले मिलना चाहता था। उन्होंने सभी से सिलसिलेवार सबसे मुलाकात की।

एसोसिएशन के सचिव संजय जगदाले के साथ ही वहां गुलरेज अली, जितेंद्र जैन, श्रीराम अत्रे, अशोक कुमुट सुमन कामानी, भरत पलोड़, विनोद कुमुट, श्रवण गुप्ता, मोनी नारंग, कन्नू पंवार, भोलू मेहता, मुन्ना कादिर, अनिता अत्रे, नरेंद्र मेनन, महेंद्र सेठिया, डॉ. ऐके भार्गव, भगवानदास सुतार, वासु मंगवानी, नरेंद्र भगतरिया, एसके बायस आदि मौजूद थे। युवा क्रिकेटर अमय खुरासिया, अनिल वाघ, मुकेश साहनी, अमित भट्ट, नितिन कुलकर्णी, सुधीर अस्मानी भी थे। आगंतुकों का स्वागत करने के लिए होटल के मेनगेट पर जावरा विधायक महेंद्रसिंह कालूखेड़ा मौजूद थे, जबकि सातवीं मंजिल पर विधायक तुलसी सिलावट और शहर कांग्रेस अध्यक्ष प्रमोद टंडन ने मोर्चा संभाल रखा था। पहले सीनियर सदस्यों की भेंट करवाई गई और बाद में नौजवानों की।

14 लोगों से अलग मुलाकात
होटल पहुंचने से पहले सिंधिया ने इमली बाजार निवासी विमल जैन के घर पर भी कुछ सदस्यों से भेंट की। वहां वे 14 सदस्यों से मिले।

किसी से समझौता नहीं होगा
सिंधिया के सामने कुछ लोगों ने पूछा कि विजयवर्गीय गुट समझौता टेबल पर आकर किसी 'पदÓ की मांग कर सकता है, ऐसे में क्या किया जाएगा। सिंधिया ने कहा किसी से समझौता नहीं होगा, क्योंकि एसोसिएशन आप लोगों का समूह चला रहा है।

व्यक्तिगत मुलाकात भी करेंगे
सिंधिया के नजदीकी लोगों ने बताया सिंधिया रविवार प्रात: इंदौर से रवाना हो जाएंगे और 20 अगस्त को फिर से लौटेंगे। बाद में वे कुछ वरिष्ठ सदस्यों के घर जाकर भी मुलाकात करेंगे। चुनाव 22 अगस्त को होंगे।

पद की गरिमा का सवाल है
एक बुजुर्ग सदस्य ने सिंधिया को भरोसा जताते हुए कहा यह पद की गरिमा का सवाल है और इस पर किसी कीमत पर ऐसे व्यक्ति को नहीं आने दिया जाएगा, जो गरिमा के अनुकूल न हो।

आपने ही इंदौर में मजबूत किया क्रिकेट
सिंधिया को लोगों ने भरोसा दिलाया कि हम आपकी शक्ति को पहचानते हैं और यह भी जानते हैं कि आपके कारण ही इंदौर में क्रिकेट को मजबूती मिली है। यह क्रम आगे भी जारी रहेगा। सिंधिया वर्तमान में एमपीसीए के चेयरमैन हैं। 22 जुलाई को होने वाले चुनाव में विजयवर्गीय ने भी दावेदारी जताई है।


पत्रिका: १५ अगस्त २०१०

बुधवार, 11 अगस्त 2010

क्यों नहीं लिए केके गोयल के बयान

- कैलाश को क्यों बख्शा : लोकायुक्त पुलिस की एफआईआर पर सवाल
- भ्रष्टाचार साबित करने वाले लीज सौदे के गवाह होने के बाद भी लोकायुक्त पुलिस ने नहीं की पूछताछ
- निगम उपयंत्री सुरेश चौहान हैं दूसरे गवाह


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन के घोटाले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की खामियां एक-एक कर सामने आ रही हैं। जांच अफसरों ने धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी के दोस्त मनीष तांबी के लिखित बयान लिए परंतु उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय व विधायक रमेश मेंदोला के मित्र केके गोयल और इंदौर नगर निगम के उपयंत्री सुरेश चौहान से भी कोई पूछताछ नहीं की गई। गोयल व चौहान धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए जमीन सौदे के गवाह हैं। इस सौदे के कारण ही मेंदोला, कोठारी, संघवी समेत 17 लोगों पर भ्रष्टाचार और आपराधिक षडयंत्र रचने का केस दर्ज किया गया है।


लोकायुक्त पुलिस के दो चेहरे

पहला चेहरा
जांच के दौरान लोकायुक्त पुलिस ने 15 लोगों के बयान लिए। इसमें एक नाम मनीष तांबी का भी है। लोकायुक्त पुलिस ने तांबी को बयान लेने का कारण एक नक्शे को बताया है। सूत्रों के मुताबिक चर्चित जमीन पर धनलक्ष्मी केमि. ने आवासीय ईकाइयों जो नक्शा टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से पास करवाया था, उस पर तांबी ने बतौर गवाह हस्ताक्षर किए थे।

दूसरा चेहरा
फरियादी सुरेश सेठ की शिकायत में नत्थी किए गए दस्तावेजों में लीज अधिकारों का विक्रय पत्र भी मौजूद था।  इस पर मेंदोला, कोठारी और संघवी के साथ ही केके गोयल और सुरेश चौहान के हस्ताक्षर भी हैं। चूंकि इसी सौदे के आधार पर भ्रष्टाचार साबित हुआ है, इसलिए इन लोगों से बयान लेना लोकायुक्त पुलिस की जिम्मेदारी था।

कैलाश-मेंदोला के मित्र हैं गोयल 
 
केके गोयल विजयवर्गीय और मेंदोला के मित्र हैं। वे विकास अपार्टमेंट हाउसिंग सोसाइटी के भंग संचालक मंडल में मेंदोला के साथ ही सदस्य भी हैं। इस दागी सोसाइटी की जांच चल रही है। आरोप है कि संचालकों ने सदस्यों के उपयोग की 9 एकड़ जमीन भवन्स प्रोविनेंट स्कूल को लीज पर दी है। अवैध मल्टियों के कारण विवादित हुए आलोक नगर की जमीन भी इसी सोसाइटी की है।

News in Patrika on 9th August 2010

इनके एसपी में दम नहीं जो यहां आ जाए

 - सुरेश सेठ ने लोकायुक्त के वकील को कोर्ट में दी चुनौती
- तमतमाए वकील ने कहा मुझसे ऐसी बातें न कहें
- कोर्ट ने भी पूछा क्यों नहीं आए आपके एसपी

उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय अंौर विधायक रमेश मेंदोला से जुड़े 100 करोड़ की जमीन घोटाले के मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के वकील को कोर्ट में ही खुली चुनौती दे दी। कोर्ट ने जब वकील से पूछा आपके एसपी क्यों नहीं आए, तो सेठ तपाक से बोले इनके एसपी में दम नहीं जो यहां आ जाए। बाद में कोर्ट ने एसपी को बुलाने को कहा, लेकिन वे नहीं आए।

विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में दोपहर 12 बजे लोकायुक्त डीएसपी अशोक सोलंकी और विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम घुसे। जैसे ही उन्होंने कोर्ट को बताया हमने 17 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी है, वैसे ही सेठ ने बोले मुझे तो इसकी कॉपी ही नहीं दी गई। कोर्ट तत्काल आदेश दिया कि एक कॉपी इन्हें दे दी जाए। जिरह शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद सोलंकी रिपोर्ट लेने के बहाने बाहर चले गए और आखिर तक नहीं लौटे। तब सेठ के सवालों का सामना कदम को ही करना पड़ा। इसी दौरान कोर्ट ने पूछा एसपी वीरेंद्रसिंह कहां हैं? 

इतना दबाव है, तो नौकरी क्यों कर रहे
सेठ ने कहा लोकायुक्त के अफसरों पर कैलाश विजयवर्गीय का भारी दबाव है इसी कारण रिपोर्ट में उसका नाम तक नहीं है। अगर दबाव में ही काम करता है तो इन लोगों को नौकरी करने की जरूरत ही क्या है? इस पर कदम थोड़ा तेश में आ गए, उन्होंने कहा मैं तो वकील हूं और मुझे किसी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है। सेठ ने उन्हें संभालते हुए कहा मैं आपको बेईमान नहीं कह रहा हूं, आप तो ईमानदार हैं। कदम ने कहा ईमानदारी के लिए मुझे आपके प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है।  

'कह दो ना, वह ईमानदार हैंÓ
कोर्ट में हुई जिरह के दौरान सेठ लोकायुक्त पुलिस के अफसरों से कहा भाई, या तो कह दो कि कैलाश बेईमान है या कह दो नहीं है। यह यह ही

'वह डॉन है, इसलिए गुर्गों को फंसा दियाÓ
कोर्ट के बाहर आते ही सेठ ने विजयवर्गीय पर आरोपों की झड़ी लगा दी। उन्होंने कहा वह दाऊद जैसा डॉन है, इसलिए सब डरते हैं। जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है, उनमें से अधिकांश उसके गुर्गें हैं। डॉन तो ऐसा ही करता है, गुर्गों को फंसा देता है। जब सरकार डरती है, तो लोकायुक्त क्यों नहीं डरेंगे।

'दो-दो करोड़ में विधायकों को खरीदने की ताकतÓ
सेठ ने मीडिया को यह भी कहा कि विजयवर्गीय मप्र का मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहा है। 

गुर्गों ने खींचे पत्रकारों के फोटो 
सुनवाई के दौरान कैलाश-मेंदोला के गुर्गे भी कोर्ट में मौजूद थे। केस का मीडिया कवरेज कर रहे पत्रकारों पर उनकी नजर थी। कोर्ट के बाहर उन्होंने पत्रकारों के फोटो भी अपने मोबाइल में ले लिए। 

सिरकाट कर लाओगे तो भी कर दूंगा मदद

उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बोल



उद्योग मंत्री कैलाश विजयगर्वीय ने भाजपा कार्यकर्ताओं का संदेश दिया है कि सिर काटकर लाने पर भी वे कार्यकर्ताओं की मदद कर देंगे, परंतु पेड़ काटकर लाए तो सजा मिलेगी। उन्होंने खुद ही अपने इस संदेश को जनता के बीच में हंसते-हंसते सुनाया।

विजयवर्गीय रविवार को महू विधानसभा क्षेत्र के आशापुरा गांव में वन मंत्री सरताज सिंह के साथ पौधारोपण कार्यक्रम में बतौर अतिथि शामिल हुए। उक्त कथन की जानकारी देते हुए उन्होंने मंच से ही कहा यह बात मैंने पिछले दिनों कार्यकर्ताओं की एक बैठक में भी कही थी।

कैमरे बंद करवाए
विजयवर्गीय ने मौजूद मीडियाकर्मियों की ओर इशारा करके कहा, अपने कैमरे बंद कर लो, क्योंकि अब मैं जो बोलूंगा वह छापना या दिखाना नहीं है। वैसे भी मुझे मालूम है महू के पत्रकार काफी समझदार हैं।

खाली जमीन देख मुंह में आता है पानी
जमीन विवादों से घिरे कैलाश ने यह भी कह डाला कि सरकार की खाली पड़ी जमीनों के देखकर हमारे मुंह में पानी आता हैं। बाद में थोड़ा संभलकर बोले खाली पड़ी जमीन पर लोग कब्जा कर लेते है, इससे अच्छा है उन पर पौधारोपण कर दिया जाए।

भाजपा को ये क्या हो गया

नितिन गडकरी, राष्टरीय अध्यक्ष
13 मई - बड़े दहाड़ते थे शेर जैसे, बाद में कुत्तों की तरह सोनिया और कांग्रेस के तलवे चाटने लगे। (मुलायम और लालू यादव के लिए)

4 जुलाई - फांसी का मुद्दा क्यों लटका रखा है, क्या अफजल गुरु कांग्रेस का दामाद है ?

12 जुलाई -दिग्विजय आजमगढ़ क्यों जाते हैं, क्या वे औरंगजेब की औलाद हैं।

प्रभात झा, प्रदेश अध्यक्ष
16 जुलाई-  मुझे चिंता होने लगी है कि कहीं दिग्विजय सिंह नक्सलियों के एजेंट तो नहीं।

29 जुलाई- समाज से कोर्ट चलता है, कोर्ट से समाज नहीं। कल से कोर्ट कह देगा तो क्या दीपावली भी नहीं मनाएंगे? क्या मिठाई नहीं खाएंगे? रोक के बाद पटाखे तो फोड़े जाते हैं। इंदौर में क्या धारा 370 लगी है ...जम्मू-कश्मीर है क्या? 

31 जुलाई - बीएसएफ और सीआरपीएफ, सब डकैत हो गए हैं। ये लोग हथियारों और बंदूकों की तस्करी कर रहे हैं और नक्सलियों को बेच रहे हैं।


पत्रिका में २ अगस्त २०१० को प्रकाशित