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बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

भारत में रोक, इंदौर में चालू

- चाचा नेहरू अस्पताल में स्वस्थ युवतियों पर ग्रीवा कैंसर टीके के ट्रायल पर उठा सवाल
- आंध्रप्रदेश-गुजरात में जा चुकी जानें, फिर भी नहीं जाग रहा मध्यप्रदेश


जिस टीके के कारण आंध्रप्रदेश में चार स्वस्थ युवतियों की जान चली गई, जिस टीके के प्रयोग पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, जिस टीके के भरोसेमंद होने की गारंटी नहीं है और जो टीका शुरू दिन से ही विवाद में है... उस टीके का एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में प्रयोग हो रहा है। प्रयोग में कई जरूरी मापदंडों को भी ताक में रखा गया है।

'पत्रिकाÓ के पास उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक शिशु रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन की अगुवाई में मल्टीवेलेंट एचपीवी टीके का ट्रायल जारी है। कथित तौर पर यह टीका महिलाओं को बुढ़ापे में विकसित होने वाले ग्रीवा कैंसर को रोकता है। करीब एक वर्ष पहले आंध्रप्रदेश के खम्मम में चार और गुजरात के बढ़ौदा में दो  युवतियों की मौत के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने इस टीके के ट्रायल पर प्रतिबंध लगा दिया था।

आंध्रप्रदेश में टीके को लेकर उठी बहस में अग्रणी रही कल्पना मेहता मंगलवार को इंदौर में थीं। 'पत्रिकाÓ ने जब उन्हें इंदौर में जारी ट्रायल के बारे में बताया तो चकित होते हुए उन्होंने बताया यह टीका कितना कारगर है, यह अभी किसी को पता नहीं। अमेरिकन, ब्रिटिश और आस्ट्रेलियन दवा कंपनियों ने ग्रीवा कैंसर का खौफ फैलाकर यह टीका बाजार में उतार दिया है। इस टीके के प्रयोग में स्वस्थ युवतियों की जरूरत होती है। आंध्रप्रदेश व गुजरात में तो डॉक्टरों ने गल्र्स होस्टल में रहने वाली युवतियों को सब्जेक्ट बनाया था, यहां क्या हो रहा है, यह कोई नहीं जानता।


 आईसीएमआर, डीसीजीआई रोके 
केंद्र सरकार ने इस टीके के ट्रायल पर रोक लगाई है, फिर भी यहां क्यों हो रहा?
यह ट्रायल इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की अनुमति से चल रहा है। वे रोकेंगे, तो बंद कर देंगे।
आपके अस्पताल में तो रोगी आते हैं, जबकि इसमें स्वस्थ युवतियों की जरूरत होती है?
हमारे क्लिनिक में जो लोग आते हैं, उनसे पूछताछ करके हम युवतियों का चयन करते हैं।
आप ब'चों के डॉक्टर हैं, जबकि टीका युवतियों को लगता है?
हमने ट्रायल में एक महिला रोग विशेषज्ञ को भी जोड़ रखा है।
यह ट्रायल आखिर क्यों जरूरी है?
दुनियाभर में 2.75 लाख महिलाओं की हर वर्ष ग्रीवा कैंसर से मौत हो जाती है। यह टीका लगेगा, तो कैंसर नहीं होगा।
ट्रायल से गुजरात-आंध्र में मौतें हो चुकी है, यहां ऐसा केस तो नहीं आया?
वहां हुई मौत के कारण अभी साफ नहीं है। मेरी जानकारी में एक युवती की बुखार से और एक की आत्महत्या के कारण मृत्यु हुई। इंदौर में 39 युवतियों पर ट्रायल हुआ, सभी स्थिति ठीक है। वैसे भी यह फेज फोर का ट्रायल है, यानि टीका बाजार में उपलब्ध है।
आप तीन डोज देते हैं, बूस्टर डोज के बारे में क्या नीति है?
यह तो शून्य, एक व छह महीने के क्रम में लगता है। बूस्टर डोज की जरूरत ही नहीं है।
(डॉ. हेमंत जैन से चर्चा)

सच नहीं बोल रहे हैं डॉ. जैन
- वे जो ट्रायल कर रहे हैं, वह फेज फोर नहीं, थ्री का ट्रायल है।
- बाजार में गार्डेसिल (वी-501) उपलब्ध है, जबकि ट्रायल मल्टीवेलेंट (वी-503) का हो रहा है।
- विधानसभा में भेजी जानकारी से स्पष्ट है कि ट्रायल में कोई महिला रोग विशेषज्ञ शामिल नहीं है।
- बूस्टर डोज के बगैर यह टीका पूरा नहीं हो सकता। दुनियाभर में इसे लेकर बहस जारी है।
- आईसीएमआर का मानता है कि टीके की सफलता संदिग्ध है।
जानलेवा टीका
- एचपीवी टीके के तीन डोज 10 से 12 हजार रुपए के आते हैं।
- सितंबर 2009 में ब्रिटेन के कोवेंट्री में एक स्कूली छात्रा के रूप में पहली मौत रिपोर्ट की गई।
- टीके के कारण अमेरिका में 15 हजार लड़कियों पर दुष्प्रभाव और 61 की मौत रिपोर्ट हो चुकी है।
- जर्मनी एवं आस्ट्रेलिया में भी एक-एक लड़की की मौत हो चुकी है।



पत्रिका : ०७ अक्टूबर २०१०

नकली दवा से इलाज तो नहीं

 ड्रग ट्रायल में महिला की मौत के मामले में उठा नया सवाल

अल्जाइमर रोग के पीडि़त खंडवा की शीला गीते की मौत का कारण कहीं नकली दवा से उनका उपचार तो नहीं? अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। दरअसल, वे जिस ड्रग ट्रायल में शामिल थीं, वह प्लेसिबो ट्रायल था। इस ट्रायल में कुछ मरीजों को नकली दवा दी जाती है, जो दिखती तो दवा जैसी है किंतु उसमें दवा के बजाए स्टार्च या ग्लूकोज होता है।

'पत्रिकाÓ ने सोमवार के अंक में खुलासा किया था कि शीला गीते के पति शरद गीते ने स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया को पत्र लिखकर शिकायत की है कि उनकी पत्नी की मौत के बावजूद उन्हें बीमे के राशि नहीं दी गई है। 'पत्रिकाÓ के पास उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि शीला गीते पर जो ट्रायल हो रहा था, वह प्लेसिबो ट्रायल था। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अपूर्व पुराणिक ने उनसे जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे, उस पर साफ-साफ लिखा है कि आपको सिक्का उछालने वाले खेल की तरह एक अध्ययन में शामिल किया जा रहा है। हो सकता है आपको जो दवा दी जाए, वह नकली हो।

तीन में से दो को नकली दवा
डोनेपेजिल दवा के ट्रायल में हर तीन में से दो मरीजों को नकली दवा मिलता तय था। यह बात डॉक्टर भी जानते हैं। बावजूद इसके मरीज की जान जोखिम में डाली गई।


 जिसे असली दवा मिलती, उसे होता लाभ
डॉ. अपूर्व पुराणिक ने 'न्यूरो-प्रतिध्वनिÓ नाम के अपने ब्लॉग पर लिखा है कि ट्रायल के शुरू में ही हम मरीज को बता देते हैं कि उसे जो दवा दी जाती है, वह असली है या नकलीï, यह हमें पता नहीं रहता। ट्रायल समाप्त होने के बाद ही अंतिम परिणाम का पता चलता है। जिसे असली दवा मिलती है, उसे लाभ होता है।

 प्लेसिबो ट्रायल सबसे खतरनाक
स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के डॉ. आनंद राय कहते हैं प्लेसिबो ट्रायल सबसे खतरनाक होता है। अंतरराष्टï्रीय स्तर पर इसे न्यूनतम करने के निर्देश जारी हो चुके हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में हो रहे ज्यादातर ट्रायल प्लेसिबो हैं। इसमें मरीज को पहले से मिल रहा उपचार भी बंद हो जाता है और नतीजतन उसकी तबीयत सुधरने के बजाए बिगडऩे लगती है।


अभी बता पाना मुश्किल

क्या शीला गीते पर प्लेसिबो ट्रायल हो रहा था?
हां, यह प्लेसिबो ट्रायल ही था।
क्या उन्हें नकली दवा दी गई थी?
अभी यह पता नहीं चल सकता है। कंपनी के पास इसकी जानकारी रहती है। डाटा एनालिसिस के बाद ही इसका पता चलेगा।
प्लेसिबो ट्रायल से होने वाले दुष्परिणाम का जिम्मेदार कौन है?
हम पूरी देखरेख करते हैं और तबीयत बिगडऩे पर ट्रायल से हटा भी लेते हैं।
शीला गीते के केस में ऐसा क्यों नहीं हुआ?
वे हमसे संतुष्ट थे और यही वजह कि वे जनवरी तक उपचार लेती रहीं।
क्या गीते परिवार को बीमे का लाभ नहीं मिलना चाहिए?
मुझे फिलहाल बीमे की जानकारी नहीं है। कागज देखकर ही बता पाऊंगा।
(डॉ. पुराणिक से चर्चा)


सरकार ने मांगी मरीजों की सूची
- एमजीएम मेडिकल कॉलेज में हड़कंप


चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेजों से उन मरीजों की सूची तलब की है, जिन पर ड्रग ट्रायल किया गया। इससे एमजीएम मेडिकल कॉलेज में हड़कंप मच गया है। माना जा रहा है कि विधानसभा के पटल पर स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया के उस बयान को पूरा करने के लिए यह कवायद की जा रही है, जिसमें उन्होंने विधानसभा के सभी सदस्यों को मरीजों की सूची उपलब्ध कराने का  वादा किया था।
ज्ञात रहे कि पिछले पांच वर्ष में राज्य में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ है। इनमें से 1644 ब'चे हैं। मरीजों में से 51 पर ट्रायल के दुष्परिणाम भी हुए हैं।


पत्रिका : ०५ अक्टूबर २०१०

मंत्रीजी, घुट-घुटकर मर गई मेरी पत्नी

- ड्रग ट्रायल मामले में मरीज के परिजन की पहली लिखित शिकायत
- चिकित्सा शिक्षा मंत्री महेंद्र हार्डिया से की जांच करवाने की मांग
- एमवाय अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग में चल रहा था उपचार



 अल्जाइमर रोग से पीडि़त मेरी पत्नी को मैं 29 मार्च 2006 को उपचार के लिए एमवाय अस्पताल लेकर आया था। इलाज के दौरान न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अपूर्व पुराणिक ने 27 जून 2008 को मेरी पत्नी को एक अध्ययन में शामिल करके उपचार शुरू किया और डोनेपोझिल के हेवी डोज उसे दिए जाने लगे। पहले वह मुझे और मेरी परिवार को पहचानती थी। धीरे-धीरे उसे स्मृति भ्रम होने लगा और बाद में तो वह सबकुछ भूल गई। आखिर में घुट-घुटकर 8 अगस्त को उसकी मौत हो गई। अब मुझे पता चला है कि वह अध्ययन एक ड्रग ट्रायल था। मेरी पत्नी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी। ट्रायल के हेवी डोज से उसकी मृत्यु हुई है।

खंडवा निवासी शीला के पति शरद गीते (76) यह कहते-कहते रूंआसे हो जाते हैं। शरद गीते ने अपने साथ हुए धोखे की दास्तां 'पत्रिकाÓ को बताई। साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया को एक शिकायती पत्र लिखकर इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग भी की है। गीते सेवानिवृत्त सहायक पंजीयक हैं और शनिवार को इंदौर में थे। ड्रग ट्रायल का मसला उजागर होने के बाद से मंत्री और सरकारी अधिकारी लगातार कह रहे हैं कि उन्हें अब तक किसी मरीज ने शिकायत नहीं की है। गीते ने बताते हैं 'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के बाद ही पता चला कि हम ट्रायल के शिकार हैं।

क्यों नहीं दिया जीवन बीमा?
गीते ने बताया पत्नी को जब इलाज करवाने ले जाता था, तो मुझे आने-जाने का खर्च दिया जाता था। बाद में यह भी बंद कर दिया गया। इलाज शुरू करने के पहले डॉ. पुराणिक ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे। इस पर लिखा था कि आपका जीवन बीमा करवा गया है, परंतु आज तक हमें यह नहीं दिया गया।

पांच वर्ष बाद तक क्लेम का हक

ड्रग ट्रायल के लिए बीमा कंपनियों ने क्लिनिकल ट्रायल लाइबिलीटी इन्श्योरेंस (सीटीएलआई) का प्रबंध किया है। इसके तहत ट्रायल के बाद के पांच वर्ष तक का जीवन बीमा रहता है।

हालत बिगड़ती गई, पर नहीं हुई सुनवाई
गीते के पुत्र शिताम्शु ने बताया उपचार डॉ. कुंदन खामकर, आरती वासकले और रिचासिंह करती थीं। इलाज शुरू हुआ तब पत्नी सारे रिश्तेदारों को पहचान लिया करती थी। स्थिति बिगड़ती गई और हम डॉक्टरों को शिकायत करते रहे, परंतु किसी ने सुनवाई नहीं की।

कहीं उपचार बंद तो नहीं था उपचार
यह ट्रायल प्लेसिबो था, जिसमें एक नकली (डमी) दवा दी जाती है। यह दिखती तो दवाई जैसी है, किंतु इसमें दवा के बजाए स्टार्च या ग्लूकोज होता है। शीला गीते भी प्लेसिबो ट्रायल में शामिल थीं। डब्ल्यूएचओ ने प्लेसिबो को खतरनाक माना है, क्योंकि इसमें मरीज की तबीयत बहुत तेजी से बिगड़ सकती है।

2008 से चल रही 5.34 लाख की ट्रायल
दवा                                         : डोनेपेजिल एसआर 23 एमजी व डोनेपेजिल आईआर 10 एमजी
कब से                                     : वर्ष 2008 से
डॉक्टर                                     : मुख्य- अपूर्व पुराणिक, सहायक- कुंदन खामकर
डॉक्टरों को मिली राशि             : 5 लाख 34 हजार 241 रुपए
इतनी दवाइयां       : 18.16 लाख प्लेसिबो केप्सूल, 1008 दवा के केप्सूल व 24.19  हजार गोलियां।
स्पांसर कंपनी       : क्विंटल्स
दवा कंपनी            : ईसाई ग्लोबल क्लीनिकल डेवलपमेंट, लंदन
ट्रायल का चरण     : तृतीय


लिखित में पूछेंगे, तभी कुछ बताऊंगा

मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकता हूं। आप मुझसे लिखित में पूछेंगे, तभी आपको कुछ बता पाऊंगा। वैसे, भी मैं अभी इंदौर में नहीं हूं।
- डॉ. अपूर्व पुराणिक, न्यूरोलॉजिस्ट, एमवाय अस्पताल

(पत्रिका ने डॉ. पुराणिक को ईमेल और फैक्स का विकल्प भी सुझाया, परंतु उन्होंने इंकार कर दिया। वैसे, पत्रिका अगस्त में सूचना का अधिकार में ड्रग ट्रायल की जानकारी मांग चुका है। तब डॉ. पुराणिक के विभाग ने 'जानकारी देना जरूरी नहींÓ कहकर इंकार किया था।)


भूलने का रोग अल्जाइमर
अल्जाइमर को विस्मृति रोग कहते हैं। आमतौर पर यह वृद्धावस्था में होता है। जर्मन डॉ. ओलोए अल्जीमीर ने 1906 में एक महिला के मस्तिष्क के परीक्षण में पाया कि उसमें कुछ गांठे पड़ गई हैं, जिन्हें चिकित्सा विज्ञान में प्लेट कहा जाता है। गांठे पडऩा ही रोग है। डॉ. अल्जीमीर के नाम पर अल्जाइमर नाम प्रचलित हुआ।

पत्रिका : ०४ अक्टूबर  २०१० 

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

ड्रग ट्रायल की फाइल पहुंची सोनिया दरबार

- दिल्ली में विधिवत कार्रवाई शुरू
- शिकायतकर्ता ने उठाई सीबीआई जांच की मांग


बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) में मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बरती गई कौताही की पूरी फाइल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पहुंच गई है। उन्होंने इस पर विधिवत कार्रवाई भी शुरू कर दी है। शिकायतकर्ता ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है।

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे ने सोनिया गांधी को शिकायत भेज कर तमाम तथ्य उजागर किए थे। उन्हें सोमवार को कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद का एक पत्र मिला है। इसमें लिखा गया है कि मामले को सोनिया गांधी ने अत्यंत गंभीरता से लिया है और उन्होंने संबंधित पक्ष को कार्रवाई करने और इसकी जानकारी देने को कहा है।

दोषियों के बचाव में है राज्य सरकार
डॉ. राजे का आरोप है कि देश-दुनिया में जो मसला उठ चुका है, उसपर ठोस कार्रवाई करने के बजाए राज्य सरकार दोषियों को बचाने में लगी है। करीब दो महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक ईओडब्ल्यू ने अंतिम रिपोर्ट तैयार नहीं की है। इतना ही नहीं, विधानसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने जो कमेटी गठित करने की घोषणा की थी, उसकी अभी तक बैठक भी नहीं हुई है।

अमेरिकन सरकार भी मांग चुकी सफाई
'पत्रिकाÓ ने 14 जुलाई के अंक में 'मरीज को बना दिया चूहाÓ शीर्षक से खबर प्रकाशित कर खुलासा किया था कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में आने वाले गरीब और अनपढ़ मरीजों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके बाद मामला विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, आयकर, एमसीआई, आईसीएमआर तक पहुंचा। हाल ही में अमेरिकन सरकार के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने भी भारत सरकार को इस संबंध में पत्र लिखकर सफाई मांगी है।

यह किया उल्लंघन
- एमसीआई द्वारा तय की गई डॉक्टरों की 'मर्यादाओंÓ को लांघा।
- आईसीएमआर के मापदंडों का ताक में रखा।
- मरीजों को धोखे में रखकर ट्रायल में झोंका।
पत्रिका : २८ सितम्बर २०१०

भारतीय मरीज का डीएनए विदेश किसकी अनुमति से भेजा?

- ड्रग ट्रायल के लिए खून के नमूनों की विदेश यात्रा पर उठा सवाल
- आईसीएमआर ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को भेजा पत्र



बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को एक पत्र लिखा है। परिषद जानना चाहती है कि जिन भारतीय रोगियों पर ट्रायल किया गया है, उनके खून के नमूने किसकी इजाजत से विदेश भेजे गए? क्या इसमें नियमों का पालन हुआ है?

कॉलेज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया जिन डॉक्टरों ने ट्रायल किए है, उन्हें आईसीएमआर के पत्र के आधार पर जवाब-तलब किया जा रहा है। यह मसला बायोलॉजिकल प्रोडक्ट कानून से जुड़ा हुआ है। अभी तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया था। माना जा रहा है यह कॉलेज प्रबंधन और पूरे विभाग के लिए नई मुसीबत का कारण बनेगा। उधर, ट्रायल में लिप्त एक डॉक्टर ने 'पत्रिकाÓ को बताया जो दवा कंपनी ट्रायल करवाती है, वह अपनी उ'च क्षमता लेबोरेटरी में नमूनों को परखना चाहती है, यही वजह है कि नमूने विदेश भेजे जाते हैं। उन नमूनों का और क्या इस्तेमाल होता होगा, यह किसी को अंदाजा नहीं है।

आरटीआई से जुड़ा मसला
दरअसल, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता रोली शिवहरे ने आईसीएमआर से सवाल पूछा था कि ट्रायल से गुजर रहे मरीजों के खून, मूत्र, स्वाब आदि के नमूने जांच के लिए विदेश भेजे जाते हैं। इसकी अनुमति ली गई है या नहीं? यदि हां, तो किस कानून के तहत? इन सवालों के जवाब जब आईसीएमआर को नहीं मिले, तो उन्होंने मध्यप्रदेश स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभागों को पत्र लिखकर जानकारी चाही है।



पत्रिका : २६ सितम्बर २०१०
 

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

फिर से भेजो ड्रग ट्रायल के दस्तावेज

- यूएसएफडीए के संज्ञान के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग का मेडिकल कॉलेज को फरमान

यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा मध्यप्रदेश में हुए ड्रग ट्रायल पर संज्ञान लिए जाने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने नए सिरे से पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेजों से फिर से वे दस्तावेज भोपाल बुलवाए हैं, जिनमें ड्रग ट्रायल की जानकारी छुपी है। कॉलेज में इसको लेकर भारी गहमागहमी बनी हुई है।

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। विभागीय सूत्रों का कहना है पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर ली गई थी, परंतु अब दृश्य बदल गया है। विभाग ने विधानसभा सवालों के जवाब के लिए तैयार दस्तावेजों को एक बार फिर से खंगालना शुरू किया है।

पत्रिका : २२ सितम्बर २०१०

चौतरफा घिरे ड्रग ट्रायल वाले डॉक्टर

- विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग, एमसीआई, आयकर के साथ ही यूएसएफडीए ने लिया संज्ञान

बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा का मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) करने वाले एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर चौतरफा घिर गए हैं। लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो, मानवाधिकार आयोग, आयकर और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ ही यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (यूएसएफडीए) ने इसे बेहद गंभीर मानकर जांच शुरू कर दी है। यूएसएफडीए ने इस संबंध में भारत सरकार को पत्र भेजा है। 

'पत्रिकाÓ ने ही ड्रग ट्रायल का खुलासा करके बताया था कि कॉलेज से जुड़े एमवाय अस्पताल और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में आने वाले रोगियों को अंधेरे में रखकर ट्रायल किए जा रहे हैं। इसके बाद मामला विधानसभा पहुंचा और मध्यप्रदेश सरकार ने कानूनी बंदिश के लिए एक कमेटी का गठन किया। चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुïख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनी यह कमेटी ट्रायल को नियंत्रित  करने के लिए केंद्र सरकार और दूसरे राज्यों के कानूनी प्रावधानों की पड़ताल कर रही है।

 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव
ड्रग ट्रायल से रा'य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज ले रहे थे। यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उजागर हुई है। सरकार ने विधानसभा को बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 ब'चे और 721 वयस्क हैं। जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुए हैं, उनके नाम अभी जाहिर नहीं किए गए हैं। आशंका है कि इनमें से कुछ की मौत हो चुकी है।

मरीज की सेहत और डॉक्टर के एकाउंट पर नजर

यूएसएफडीए
'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद रशिया टीवी ने एमवाय अस्पताल में ट्रायल को लेकर एक खबर अंतरराष्टï्रीय स्तर पर प्रसारित की थी। रिपोर्ट में जिक्र था कि अमेरिकन कंपनियों की शह पर यहां गरीब मरीजों पर प्रयोग हो रहे हैं। इसी पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश में हुए ट्रायल का विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

विधानसभा
विधायक पारस सकलेचा, प्रताप ग्रेवाल और प्रद्युम तोमर ने विधानसभा में पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो रहे ट्रायल को लेकर जो सवाल पूछे थे। उनके जवाब आज तक  सरकार ने नहीं दिए हैं। मानसून सत्र में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने कहा था ट्रायल को काबू करने के लिए सरकार कानून बनाना चाहती है।

ईओडब्ल्यू
स्वास्थ्य सेवा समर्पण सेवा समिति अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर भोपाल ईओडब्ल्यू ने डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. हेमंत जैन और डॉ. पुष्पा वर्मा के खिलाफ जांच शुरू कर रखी है। सभी डॉक्टरों के एकाउंट की जांच जारी है।

लोकायुक्त
ट्रायल करने वाले डॉक्टरों, एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और एथिकल कमेटी के सदस्यों के खिलाफ लोकायुक्त में भी शिकायत हो चुकी है। आरोप है कि सभी ने मिलकर गरीब और अनपढ़ मरीजों की जान जोखिम में डाली है। लोकायुक्त ने शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता को 14 अक्टूबर को भोपाल बुलाया है।

मानवाधिकार आयोग
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों पर संज्ञान लेकर  मप्र मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस डीएम धर्माधिकारी, सदस्य जस्टिस एके सक्सेना व जस्टिस वीके शुक्ल ने एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को नोटिस भेजा है। आयोग जानना चाहता है कि मरीजों के अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा।

आयकर
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर आयकर विभाग ने मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से उन सभी डॉक्टरों की आय का ब्यौरा मांगा है, जो ट्रायल में लिप्त हैं। विभाग की जिज्ञासा इसमें है कि कहीं डॉक्टरों ने बेनामी संपत्ति तो नहीं जुटा ली। 

एमसीआई

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को जो शिकायत भेजी गई थी, उसी पर मप्र के चिकित्सा शिक्षा संचालक से पूरा ब्यौरा मांगा गया है। सभी मेडिकल कॉलेज इसका जवाब तैयार कर रहे हैं। 'पत्रिकाÓ पूर्व में ही यह जानकारी प्रकाशित कर चुका है।








पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

ड्रग ट्रायल का एक ओर कागज ईओडब्ल्यू पहुंचा

मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल द्वारा एक ड्रग ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी पहुंचाने का दस्तावेज भी ईओडब्ल्यू पहुंच गया है। वहां इसे जांच में भी लिया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू इसे गंभीर आर्थिक अपराध मान रहा है, क्योंकि कॉलेज को कंपनी बताने की जानकारी कॉलेज प्रबंधन को नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने ही इसका खुलासा किया है।


एसबीआई सुने चार अफसरों का केस
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के चार अधिकारियों की याचिका का हाईकोर्ट ने निराकरण कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया है कि चूंकि अब इंदौर बैंक का विलय स्टेट ऑफ इंडिया में हो चुका है, इसलिए उनकी बात वहीं सुनी जाना चाहिए। चारों अधिकारियों का इंदौर बैंक ने तबादला कर दिया था। इसे ही चुनौती देने के लिए वे हाईकोर्ट गए थे। सिंगल बैंच ने इसे खारिज कर दिया था और मामला युगलपीठ में लंबित था।



 
पत्रिका : ०३ सितम्बर २०१०

व्हिसल ब्लोअर के पक्ष में उतरे मेडिकल छात्र

जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल उकसाने के आरोप में बर्खास्त किए गए एमजीएम मेडिकल कॉलेज के सीनियर रेसीडेंट डॉ. आनंद राय के पक्ष में 73 मेडिकल छात्र सामने आ गए हैं। ये सभी 2005 से 2007 की एमबीबीएस बेच के छात्र हैं। छात्रों ने डॉ. राय की बर्खास्तगी का कारण उनका व्हिसल ब्लोअर (भ्रष्टाचार सचेतक) होना बताया है।

छात्रों ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन को एक पत्र लिखा है। इसके मुताबिक डॉ. राय पर की गई कार्रवाई पूर्वाग्रह से ग्रसित है। उन्होंने व्यवस्था में रहकर कुछ डॉक्टरों द्वारा ड्रग ट्रायल के जरिए मरीजों के साथ हो रहे धोखे का खुलासा किया है, इसीलिए बाहर किया गया। छात्रों ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि कॉलेज काउंसिल की जिस बैठक में डॉ. राय को बाहर करने का निर्णय लिया है, उसमें 38 में से 16 सदस्य ही इसमें शामिल थे, जो कि कोरम का अभाव है। छात्रों ने डॉ. राय का निलंबन समाप्त करने की मांग की है।

हाईकोर्ट ने कॉलेज को दी पोस्ट भरने की छूट
डॉ. आनंद राय द्वारा दायर याचिका पर बुधवार को इंदौर हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को छूट दे दी कि वह नेत्र रोग विभाग में सीनियर रेसीडेंट के रिक्त पद को भर ले। पिछली सुनवाई में जस्टिस एससी शर्मा ने पद भरने पर रोक लगाई थी। शासकीय अधिवक्ता विवेक पटवा ने बताया कोर्ट ने पद भरने का आदेश देते हुए केस में अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद रखी है। उधर, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन 30 अगस्त को ही पद पर भर्ती के लिए साक्षात्कार ले चुका है। संभावना है कि शुक्रवार को पद भर लिया जाएगा।

पत्रिका : ०२ सितम्बर २०१०

ड्रग ट्रायल में सुस्ती का संक्रमण

- चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में कमेटी ही बना सका


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) के मामले में चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में महज एक कमेटी का गठन ही किया है। न तो इस कमेटी की बैठक हुई है और न ही अब तक किसी दूसरे राज्य के कानूनों का अध्ययन ही किया गया।
चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने 30 जुलाई को विधानसभा में तीन सदस्यों की कमेटी बनाकर राज्य में ड्रटग ट्रायल पर कानूनी बंदिश लगाने की घोषणा की थी। विभाग के प्रमुख सचिव और कमेटी चेयरमैन आईएस दाणी ने बुधवार को बताया कि कमेटी तीन के बजाए पांच सदस्यों की बनाई गई है। इसमें विधि विभाग के प्रमुख सचिव पीसी मीणा के साथ ही संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल और भोपाल के डॉ. एनआर भंडारी सदस्य हैं।


बंदिश नहीं होने से मरीजों की जान सांसत में
अभी तक राज्य में ड्रग ट्रायल की निगरानी की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। यही वजह है कि पिछले पांच वर्षों में बहुराष्टï्रीय कंपनियों ने राज्य के प्रतिष्ठित डॉक्टरों के जरिए मरीजों पर धड़ल्ले से दवाओं के ट्रायल किए। सरकारी के साथ ही निजी क्षेत्रों में अंधाधुंध ट्रायल हो रहे हैं। पांच वर्ष में मप्र के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हुए ट्रायल से ही 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव हुआ। इनमें से कुछ की मौत की भी आशंका है। विधायक पारस सकलेचा और प्रताप ग्रेवाल ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. हेमंत जैन, डॉ. सलिल भार्गव और डॉ. अशोक वाजपेयी की जांच कर रहा है।

पत्रिका : 02 सितंबर 2010

बुधवार, 25 अगस्त 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला


Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।