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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

क्यों छुपाई ड्रग ट्रायल की बातें?

- आरटीआई केस में मेडिकल कॉलेज डीन चेंबर में हुई सुनवाई
- अहम सवालों पर अंदाज के तीर चलाते रहे एमवायएच अधीक्षक


ड्रग ट्रायल का ब्यौरा जब आर्थोपेडिक्स विभाग दे सकता है तो शिशु रोग, मेडिसिन विभाग क्यों नहींï? डॉक्टर और स्पांसर कंपनी के बीच होने वाले क्लिनिकल ट्रायल एग्रीमेंट (सीटीए) को क्या भारत सरकार ने गोपनीय दस्तावेज माना है? विधानसभा को भेजी गई जानकारी और इंदौर में दी गई जानकारी में अंतर क्यों है?
 मंगलवार को ये सवाल एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के चेंबर में गूंजे। मौका सूचना का अधिकार में स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के डॉ. आनंद राय को जानकारी नहीं देने की अपील की सुनवाई का था। जवाब एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को देना थे। तथ्यात्मक बात रखने के बजाए अनुमान के आधार पर तर्क रखते हुए उन्होंने उत्तर दिए जो नामंजूर हो गए। शिशु, नेत्र और मेडिसिन विभाग ने वह जानकारी क्यों नहीं दी जो विधानसभा में भेजी गई, के जवाब में डॉ. भार्गव संतुष्टï नहीं कर पाए। अपीलकर्ता ने तत्काल नि:शुल्क जानकारी देने और दोषियों पर अर्थ दंड करने की मांग की। कॉलेज डीन ने फिलहाल फैसला नहीं दिया है।

'कालिख पोतने की आदत'
अपीलकर्ता ने डीन को बताया एमवायएच प्रबंधन और कुछ विभागाध्यक्षों को काले कारनामों पर कालिख पोतने की आदत है। मेडिसिन विभाग ने ट्रायल से जुड़ी एक सूचना में सीटीए के उस अंश पर कालिख पोत दी थी जिसमें कंपनी से आने वाली राशि की जानकारी थी।

Patrika 26 Oct 2010

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

सफेद हाथी

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रोफेसर ने पांच साल से नहीं ली क्लास
- लीगल सेल, गार्डन प्रभारी बन पा रहे 77 हजार रुपए महीना


एमजीएम मेडिकल कॉलेज के सांख्यिकी प्रोफेसर एलके माथुर ने पांच वर्ष से एक भी क्लास नहीं ली है। उन्हें 77 हजार 208 रुपए महीना वेतन मिलता है। फिलहाल वे कॉलेज के लीगल सेल और गार्डन प्रभारी हैं। प्रो. माथुर की ड्ïयूटी का अधिकांश समय कॉलेज डीन के चेंबर में गुजरता है।
सूचना का अधिकार में जारी एक दस्तावेज में कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभागाध्क्ष डॉ. संजय दीक्षित ने माना कि प्रोफेसर माथुर ने पांच वर्ष में अंडर ग्रे'युएट एवं पोस्ट ग्रे'युएट कोर्स में शिक्षण कार्य नहीं किया है।

प्रो. माथुर के वेतन का ब्यौरा
बेसिक पे                         51700  रु
ग्रेड पे                                 8700 रु
डीए                                  16308 रु
अकादमिय भत्ता                    500 रु
मकान भत्ता                            -
कुल                                   77208 रु


 वे मेरे भरोसेमंद हैं

प्रो. एलके माथुर का क्या दायित्व है?
वे सांख्यिकी के  प्रोफेसर हैं और उन्हें क्लासेस लेकर छात्रों को डॉटा संयोजन और विश्लेषण पढ़ाना चाहिए।
किंतु वे तो पांच वर्ष से क्लास ही नहीं ले रहे हैं?
मैं कम्युनिटी मेडिसिन विभाग से पता करता हंू।
प्रो. माथुर तो आपके चेंबर में ही बैठे रहते हैं। क्या इसीलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता?
वे यहां बैठकर लीगल सेल और गार्डन का कार्य करते हैं। वे मेरे  नजदीकी और भरोसेमंद हैं लेकिन उन्हें मैंने कोई शरण नहीं दे रखी है।
(कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से चर्चा)

 पांच वर्ष पहले तो क्लास लेता था

आप क्लास क्यों नहीं लेते हैं?
टाइम टेबल में किसी ने मेरी क्लास ही नहीं लगाई। पांच वर्ष पहले क्लास लेता था। आप उसके बारे में क्यों नहीं जानना चाहते।
बताईए तब आप क्या करते थे?
मैं क्लास लेता था। बाद में मैं एमवायएच में सहायक अधीक्षक भी रहा। अभी भी फिजियोथेरेपी की क्लास लेता हूं, जिसका मुझे अतिरिक्त रुपया मिलता है।
पांच वर्ष से आपने क्लास मांगना जरूरी क्यों नहीं समझा?
सबको मालूम है कि मैं सांख्यिकी का प्रोफेसर हूं। उन्हें मेरी ड्यूटी लगाना चाहिए। वैसे मार्च 2008 से जनवरी 2010 तक मैं भोपाल में पदस्थ था।
क्या आप भोपाल में क्लास लेते थे?
नहीं, क्योंकि वहां तो दूसरे कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी।
फिलहाल कॉलेज में आप करते क्या हैं?
मैं सबसे जटिल लीगल सेल देखता हूं। साथ ही उन पीजी छात्रों की थिसीस के डॉटा विश्लेषित करता हूं जो मेरे पास आते हैं।
आप बैठते कहां हैं?
कभी डीन चेंबर और कभी लीगल सेल में। मुझे तो स्थाई जगह भी नहीं दी गई है।
(प्रो. एलके माथुर से चर्चा)


उठते सवाल
- मेडिकल के छात्रों को सांख्यिकी कौन पढ़ा रहा है?
- ऊंची तनख्वाह पाने वालों के कामकाज की निगरानी क्यों नहीं की जा रही है?
- क्या प्रो. माथुर जैसे लोगों के विरू द्ध सरकारी धन का अपव्यय करने का प्रकरण नहीं बनाया जाना चाहिए? 
पत्रिका: १८ अक्टूबर २०१०

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

पीथमपुर नहीं आएगा कचरा

सूचना के अधिकार की जीत
जनता और जनवादियों के समर्थन से चली पत्रिका की मुहिम रंग लाई
 

भोपाल में दफन 27 हजार 600 टन कचरे से पीथमपुर से यूकॉ के कचरे की विदाई के फैसले का उन जनवादियों ने खुलकर स्वागत किया है, जो कचरे के खिलाफ तन-मन-धन से मैदान में डटे थे। दरअसल, यह लड़ाई सूचना का अधिकार कानून की नींव पर बुलंद हुई है। लोगों ने इस कानून को धन्यवाद देते हुए सरकार की संवेदनशीलता को भी सलाम किया है।

पीथमपुर में बने रामकी इनवायो कंपनी के सयंत्र मप्र वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट की खामियों को उजागर करने के साथ इस अहम लड़ाई की शुरुआत हुई। इसके लिए पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी द्वारा सूचना का अधिकार में जुटाए गए दस्तावेजों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही। लगातार छह महीने से उन्होंने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मप्र पर्यावरण प्रदूषण बोर्ड के यहां अर्जियां लगाई और जानकारियों का पुलिंदा तैयार किया।

'पत्रिकाÓ के आगे आते ही बन गया कारंवा

मामले में 'पत्रिकाÓ ने 15 जून से तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक खबरें प्रकाशित करना शुरू किया। इससे पूरे मसले पर लड़ाई शुरू कर चुके लोगों को नई ताकत मिली और उन्होंने पूरे जोर-शोर से मैदान संभाल लिया। 28 जून को 'पत्रिकाÓ के दफ्तर में किए गए टॉक शो में तो विभिन्न संगठनों के लोगों ने घोषणा ही कर दी कि 'पीथमपुर में कचरा नहीं आने देंगे... भले इसके लिए जान चली जाएÓ। लोग अपनी इस घोषणा पर कायम भी रहे और आखिर में केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश को पीथमपुर आना पड़ा। उनके आने से ही संकेत मिल गए थे कि कचरा पीथमपुर में नहीं आएगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी जयराम की यात्रा को देखते हुए एक दिन पहले ही घोषणा कर दी थी इंदौर के लोगों की राय जाने बगैर कचरा यहां नहीं लाया जाएगा।

सियासती फैसला, पर दूर रहे इंदौरी नेता
यह मामला सीधे-सीधे इंदौर से जुड़ा था, लेकिन इंदौर के नेता इससे दूर ही रहे। जब भी मीडिया ने उनसे राय मांगी वे कचरे के खिलाफ बयान देते रहे, परंतु जमीन पर उतरकर लडऩे का जिम्मा लोकमैत्री संगठन और आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने ही किया। राज्यसभा सांसद विक्रम वर्मा और धार विधायक नीना वर्मा, धार के सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी जरूर इस मसले को आगे बढ़ाते दिखे। जयराम के दौरे के बाद कांग्रेस के अभय दुबे भी थोड़े सक्रिय हुए।

दफन हो चुका है 40 टन कचरा
रामकी प्लांट में यूका का 40 टन कचरा दफन हो चुका है। यह कचरा गुपचुप तरीके से 27 जून 2008 को लाया गया था। लगातार मांग उठ  रही है कि इस कचरे को भी निकाला जाए। हालांकि, जयराम के दौरे के समय घोषणा हो गई थी कि जो दफन हो गया है, उसके बारे में विचार करने की जरूरत नहीं है। बस उसके प्रभाव को समय समय पर जांच लिया जाए।

रामकी में आता रहे औद्योगिक कचरा
रामकी प्लांट में औद्योगिक कचरा अभी भी आता रहेगा, क्योंकि केंद्र ने केवल यूका के कचरे को लेकर फैसला किया है। रामकी में पूरे राज्य का औद्योगिक कचरे पर प्रतिबंध नहीं लगा है। जन आंदोलन करने वालों में इसको लेकर भी आक्रोश है। सूत्रों का कहना है कि सरकार रामकी प्लांट के स्थान को बदलने का निर्णय भी कर सकती है।



इन लोगों को जाता श्रेय
- डॉ. आरडी प्रसाद, लोकमैत्री
- डॉ. गौतम कोठारी, पीथमपुर औद्योगिक संगठन
- डॉ. भरत छपरवाल, लोकमैत्री
- तपन भट्टाचार्य, आजादी बचाओ आंदोलन 
- चिन्मय मिश्र, सामाजिक कार्यकर्ता
- अनिल भंडारी, सीईपीआरडी
- नरेंद्र सुराणा, सीईपीआरडी
- विक्रम वर्मा, राज्यसभा सांसद
- गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी, सांसद, धार



देर आए, दुरस्त आए

'यह कचरा डाऊ कंपनी की जिम्मेदारी है, उसे ही इसके निपटान का इंतजाम करना चाहिए। हम यह नहीं चाहते हैं कि कचरा भोपाल में ही रखा रहे।
- डॉ. आरडी प्रसाद, समाजशास्त्री 

'यह सूचना के अधिकार और मीडिया की जीत है। दरअसल, अब भी फिर वक्त आ गया है कि सरकार तक लोगों की भावनाएं पहुंचाने के लिए जनआंदोलन की राह अपनाई जाए।
- डॉ. गौतम कोठारी, अध्यक्ष, पीथमपुर औद्योगिक संगठन

'यह सूझबूझ भरा फैसला है, परंतु कचरे को दफनाने का फैसला शीघ्र कर लेना चाहिए। सीमेंट फैक्टरियों में कचरा जलाने के प्रस्ताव पर भी गंभीरता से विचार किया जाए तो आसानी से रास्ता निकल सकता है।
- चिन्मय मिश्र, सामाजिक कार्यकर्ता

 'सरकार गुपचुप तरीके से सबकुछ निपटा देना चाहती थी, लेकिन लोगों ने अपने दम पर लड़ाई लड़कर सबको सीख दे दी है। यह लोकशक्ति की जीत है।
- तपन भट्टाचार्य, संयोजक, आजादी बचाओ आंदोलन

'यह गांधीवादी तरीके से लड़ी गई लड़ाई का नतीजा है कि राज्य व केंद्र सरकार दोनों को झुकना पड़ा। अभी भी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
- डॉ. भरत छपरवाल, पूर्व कुलपति

'इस फैसले से गंभीर नदी को प्रदूषण से बचाया जा सकेगा। रामकी प्लांट की साइट को भी बदलने की जरूरत है, क्योंकि वहां तो अभी भी औद्योगिक कचरा जलेगा ही।
- अभय दुबे, महामंत्री, कांग्रेस

'सरकार फैसला नहीं करती तो हम तो कोर्ट जाते। इसकी पूरी तैयारी कर ली गई थी। हम बस मंत्री समूह की बैठक का इंतजार ही कर रहे थे।
- अनिल भंडारी, उपाध्यक्ष, सीईपीआरडी

'अब भोपाल को बचाने की जरूरत है। सरकार को इस पर तत्काल फैसला कर लेना चाहिए ताकि वहां प्रदूषण नहीं फैले। इसको लेकर भी बात करूंगा।
- विक्रम वर्मा, राज्य सभा सांसद

 'वर्तमान में सबसे आधुनिक तरीका प्लॉज्मा तकनीक से कचरा भस्म करने की है। सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए, ताकि कचरे को मुकाम मिले।
- शिवाकांत वाजपेयी, सदस्य, भारतीय विकिरण संरक्षण परिषद

'सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र और राज्य सरकार की दो-दो करोड़ की मदद से रामकी का प्लांट स्थापित हुआ था। इस पर पुनर्विचार करना होगा।
- वीके जैन, पूर्व निदेशक, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

 

तारपुरावासियों ने मनाई खुशियां
युका के कचरे को लेकर चले आ रहे विरोध पर उस समय विराम लग गया जब दिल्ली से पीथमपुर वासियों के हक में फैसला आया। फैसले की खबर जैसे ही ग्रामवासियों को पता चली, मानों उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा हो। रात करीब 8  बजे काफी संख्या में जमा हुए युवाओं ने गांव की चौपाल पर नाच-गाकर जश्न मनाया। यहां मौजूद युवाओं में जादू नंदराम, बबलू प्रजापत, मनोज मांगीलाल, विनोद रामचंद्र, नवीन गुप्ता, संजय चौहान, महेश कछवारे, जितेंद्र काशीराम, मनासिंह मांगीलाल, जितेंद्र कालूसिंह आदि ने कहा कि लंबे समय से चली आ रही इस लड़ाई में उन्हें इंसाफ मिला हैं। उन्होंने पत्रिका को बताया कि क्षेत्र में प्रभावितों के हक में आए इस फैसले ने कई क्षेत्रवासियों की जान बचाई हैं। साथ ही यहां फैल रहे प्रदूषण से अब लोगों को निजात मिलेगी।


कचरे में थे दस जानलेवा रसासन
पर्यावरणविद् सुनिता नारायण की अगुवाई वाले वैज्ञानिक शोध संस्थान सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट (सीएसई) के मुताबिक भोपाल में यूनियन कार्बाइड के ठिकाने में रखे २७ हजार ६00 टन कचरे में दस किस्म के जानलेवा और विषैले रसायन मिले हैं। इन रसायनों से घातक बीमारियां होती हैं, रोक प्रतिरोधक और प्रजनन क्षमता भी कम या खत्म हो सकती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने भी इस रिपोर्ट से सहमति जताई है।  कचरे में ड्रायक्लोरोबेंजीन, ट्रायक्लोरोबेंजीन, हेक्साक्लोरोबेंजीन, हेक्साक्लोरोसाइक्लोहेक्सेन, कॉरबैरिल, एल्डीकार्ब, पारा, संखिया, सीसा और क्रोमियम की मात्रा मिली है।

ये थी पांच चिंताएं
एक- जमीनी पानी में जहर

वर्ष 2007 से कचरा संयंत्र पर उद्योगों का अपशिष्टï इक_ा किया जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के आंकड़े गवाह हैं कि इन तीन वर्र्षों में कचरा संयंत्र के आसपास का भूजल दूषित हुआ है। गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के जिस कुएं का पानी लोग पीते थे उसे हाथ लगाते ही अब खुजली और जलन होने लगती है। साइट के समीप तारपुरा गांव के बोरिंग का पानी चाय बनाने लायक भी नहीं रहा। 

दो- हवा में जहर
कचरा संयंत्र में जब औद्योगिक कचरा जलाया जा रहा था, तभी यूनियन कार्बाइड  है, लेकिन जब यूनियन कार्बाइड का कचरा जलेगा तब क्या होगा। हवा के जरिए यह जहर दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचकर लोगों को बीमारियां बांटेगा। कंपनी ने कचरा जलाने के दौरान निकले लीचेड को सुखाने के लिए मल्टीइफेक्ट इवेपोरेटर भी नहीं लगाया है और न ही ड्रायर का इस्तेमाल किया जा रहा है। लीचेड सीधे जमीन पर बहाया जा रहा है।

तीन- मापदंडों का उल्लंघन
औद्योगिक अपशिष्टï प्रबंधन अधिनियम के मुताबिक कचरे का निपटान करने के लिए जिस जगह संयंत्र लगाया जाता है उससे 500 मीटर के दायरे में कोई रहवासी क्षेत्र नहीं होना चाहिए, लेकिन रामकी ने इस नियम को ताक पर रख दिया। साइट से मात्र 100 से 200 मीटर के दायरे में तारपुरा गांव हैं। गांववाले बताते हैं कि जब से इंसीनरेटर चालू हुआ है, बदबू के मारे उनका सांस लेना मुश्किल हो गया है।

चार- बीमारियों का घर 
सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट के मुताबिक कचरे के कारण लीवर सोराइसिस, रक्त कोशिका, फेफड़े, गुर्दे, स्नायु व प्रजनन प्रणाली पर बुरा असर, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना, स्नायु, प्रजनन व श्वसन प्रणाली का क्षतिग्रस्त होना, लीवर रोग, अल्सर की उत्पत्ति, हड्डियों में खराबी, बाल झडऩा, कैंसर की आशंका, ब'चों का असामान्य विकास, क्रोमोसोम असमानता, स्मरण शक्ति पर कमजोर होना, गर्भस्थ शिशु के लिए घातक, अचानक गर्भपात की संभावना, खून की कमी, स्नायु रोग, त्वचा पर जख्म होना, गुर्दों की खराबी, नाक की झिल्ली में छेत, गले में जलन, दमा व श्वसन रोगों का खतरा बढ़ेगा।

पांच- उद्योगों का पलायन
प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र पीथमपुर में 500 से अधिक छोटे-बड़े उद्योगों के लिए कचरा संयंत्र एक-न-एक दिन खतरा जरूर बनेगा। यह बात उद्योगपति भी जानते हैं। कई उद्योगपति यह बात कह भी चुके हैं कि यदि यूनियन कार्बाइड का कचरा यहां जलाया जाता है तो कई उद्योगों का यहां से पलायन हो सकता है। नए उद्योग तो यहां आने से ही कतराएंगे। 
 
इन आरोपों से घिरा रामकी
  • कायदा कहता है कि कचरा दफन करने के लिए जो गड्ढा (सिक्यूर्ड लैंड फिल) बना है, वह रहवासी बस्ती से 500 मीटर से दूर होना चाहिए, लेकिन गड्ढा तारापुर के पास ही बना दिया गया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मानता है कि गड्ढे की तारापुर से दूरी 100 मीटर से अधिक नहीं है।
  • गड्ढे में मिïट्टी की 1000 एमएम के बजाए 600 एमएम की ही परत बनाई गई। मिट्टी की परत को दबाने के लिए जिस मशीन का प्रयोग किया जाता है, वह बोर्ड को मौके पर नहीं मिली। इस पर कंपनी को नोटिस दिया। कंपनी यह कहकर बच निकली कि दिन में मशीन उपलब्ध नहीं रहती है, इसलिए रात में काम करवाते हैं। अफसरों ने रात में मुआयना करना मुनासिब नहीं समझा। 
  • गड्ढे में सबसे नीचे रेत और बजरी की 30 सेंटीमीटर मोटाई रखी जाना चाहिए लेकिन कंपनी ने मोटाई को 15 सेंमी ही रखा। बोर्ड ने ही इसका खुलासा किया। यह चूक बेहद खतरनाक है, क्योंकि विषैले कचरे से होकर जो पानी जमीन में जाता है, वह कई किमी क्षेत्र के भूजल को प्रदूषित करने की ताकत रखता है। भोपाल में ऐसा ही हुआ और केंद्र सरकार को आखिर में सिफारिश करना पड़ी कि भोपाल के लोग भूजल का प्रयोग न करें।
  • हर दिन कचरा इकठ्ठा करके बाद उस पर मिट्टी की परत जमाना अनिवार्य है, लेकिन खर्च और जगह बचाने के लिए कंपनी ने ऐसा नहीं किया। बीच में परत नहीं होने से प्रदूषण की मात्रा कई गुना बड़ सकती है। 
  •  कचरा निपटान के पहले कंपनी ने नियम विरूद्ध खतरनाक ज्वलनशील कचरे का भंडारण किया। बोर्ड नोटिस देकर चुप बैठ गया, बाद में पुलिस में शिकायत हुई और कंपनी कर्मचारी पार्थ शुक्ला को गिरफ्तार किया गया।
  •  मजदूरों को पर्याप्त सुरक्षा मुहय्या नहीं करवाई जा रही। यही वजह है कि कंपनी में सात मजदूर बीमार हो गए।
  • कंपनी में आपातकालीन सुविधाओं का अभाव है। इसके लिए दो बार औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग नोटिस जारी कर चुका है।


 100 दिन पहले उठी थी आवाज

14 जून
रामकी इंसीनेटर को फायर एनओसी मिलने के साथ ही पत्रिका ने 'इंदौर मांगे इंसाफÓ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी।

19 जून
सांसद विक्रम वर्मा ने कहा यूका का कचरा देश के बाहर ले जाया जाए। लोकमैत्री संगठन की बैठक में रामकी खामियां उजागर की गई।

23 जून
'पत्रिकाÓ ने सवाल उठाया भारी अनियमितताएं मिलने के बाद भी सरकार क्यों रामकी कंपनी को बचाने में लगी है।

26 जून

रामकी इंसीनेटर में काम कर रहे सात मजदूर बीमार हो गए। इससे मजदूरों में दहशत फैल गई।

28 जून

'पत्रिकाÓ में हुए टॉक शो में आंदोलन की रूपरेखा तैयार हुई। लोगों ने कहा भले ही जान देना पड़े, पीथमपुर में कचरा नहीं आने देंगे।

29 जून
रामकी कंपनी ने सरकार पर आरोप लगाया कि हम तो धंधा कर रहे हैं, सरकारी एजेंसियों को ही फिक्र नहीं है कि कहां क्या किया जाना है।

2 जुलाई
'पत्रिकाÓ ने बताया 6 जुलाई 2005 को हुई जनसुनवाई के बाद से ही स्थानीय प्रशासन रामकी पर फिदा है।

3 जुलाई
'पत्रिकाÓ ने खुलासा किया कि रामकी को नोटिस देने के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कार्रवाई नहीं करता है।

7 जुलाई
लोकमैत्री संगठन ने पीथमपुर में रामकी सयंत्र की घेराबंदी की। साथ ही संभागायुक्त को ज्ञापन सौंपा।

8 जुलाई
तारापुर के नागरिकों ने रामकी सयंत्र में कचरा ले जा रहे ट्रकों को रोका क्योंकि उनमें से विषैला बदबूदार कचरा बह रहा था।

9 जुलाई
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने इंदौर में कहा यूका कचरे और रामकी सयंत्र के संबंध में इंदौर के लोगों से चर्चा के बाद ही फैसला किया जाएगा।

10 जुलाई
केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश पीथमपुर गए। उन्हें वहां के लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। बस्ती के पास बनाए गए सयंत्र और कुएं के काले पानी को देखकर वे भी अचंभित रह गए। जयराम ने 40 टन कचरा यहां लाने पर माफी भी मांगी।

12 जुलाई
'पत्रिकाÓ ने बताया जयराम ने माफी मांग ली, लेकिन राज्य सरकार की गलतियों के लिए कौन माफी मांगेगा?

18 जुलाई

कांग्रेस ने पीथमपुर में धरना देकर घोषणा की कि रामकी का देशभर में विरोध किया जाएगा।

22 जुलाई
विधानसभा में मामला उठा कि क्या रामकी सयंत्र से इंदौर का पानी दूषित नहीं होगा।

24 सितंबर

'पत्रिकाÓ ने खुलासा किया कि सुप्रीम कोर्ट में रामकी के झूठे बयान के आधार पर गुजरात सरकार ने हलफनामा पेश किया। रामकी के अधिकारियों ने भी माना यह कंपनी के तत्कालीन अधिकारी की गलती थी।


 पत्रिका : २८ सितम्बर २०१०

फोन पर हुई सुनवाई

- इंदौर के आरटीआई कार्यकर्ता से दिल्ली में मौजूद केंद्रीय सूचना आयुक्त ने लिए बयान
- मामला एमसीआई द्वारा जानकारी नहीं उपलब्ध कराने का


सूचना का अधिकार का उल्लंघन करने के एक मामले में दिल्ली स्थित केंद्रीय सूचना आयुक्त ने सोमवार को फोन पर सुनवाई की गई। उन्होंने इंदौर में मौजूद एक सूचना कार्यकर्ता से आपत्तियां सूनी और संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर दिए।
मामला मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) से जुड़ा है। इंदौर के सूचना का अधिकार कार्यकर्ता डॉ. आनंद राय ने 6 अप्रैल को तीन जानकारियां मांगी थी, जिसमें से उन्हें एक का ही जवाब दिया गया। इस पर उन्होंने एमसीआई सचिव कर्नल एआरएन सितलवाड़ को प्रथम अपील की थी, परंतु संतोषजनक जवाब नहीं मिला। आखिर उन्होंने केंद्रीय सूचना आयुक्त को अपील कर दी। इस पर जवाब के लिए डॉ. राय को सोमवार को दिल्ली बुलाया गया था, परंतु अन्य काम होने के कारण उन्होंने असमर्थता जताई। इस पर तय किया गया कि दोपहर तीन से चार बजे के बीच फोन पर ही उनके बयान ले लिए जाएंगे। दोपहर 3.25 बजे उनके मोबाइल पर केंद्रीय सूचना आयुक्त अनुपमा दीक्षित का फोन आया।

एमसीआई को दिया नोटिस

आयोग: आपकी आपत्ति बताएं?
अपीलकर्ता: मुझे तीन में से एक ही जानकारियां दी गई हैं। आपके पास मौजूद मूल अर्जी में जिन दो की जानकारी नहीं दी गई, उनका जिक्र है।
आयोग: और क्या आपत्ति है?
अपीलकर्ता: समय सीमा समाप्त होने के बाद में मुझे आयोग ने जानकारी दी और बदले में 150 रुपए लिए, जबकि कानूनन वे ऐसा नहीं कर सकते हैं।
आयोग: आज एमसीआई की और कोई आया नहीं है। हम उन्हें नोटिस जारी कर रहे हैं। जानकारी नहीं देगे, तो उन्हें सजा दी जाएगी।
अपीलकर्ता: मध्यप्रदेश में सूचना कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं होती है, इस पर भी कार्रवाई करें।
आयोग: हम जिस तरह से विभागों पर पैनल्टी लगा रहे हैं, उसी से सरकारों को सबक मिलेगा। आप सूचनाएं मांगते रहें।
(बातचीत की यह जानकारी अपीलकर्ता डॉ. आंनद राय के मुताबिक।)
 
इन प्रश्नों के नहीं मिले जवाब
  • मध्यप्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेसीडेंट के 120 पद रिक्त हैं, फिर भी भोपाल, इंदौर जैसे कॉलेजों को एमसीआई ने मान्यता कैसे प्रदान कर दी?
  • एमसीआई टीम के दौरे के ठीक पहले राज्य सरकार ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य विभाग के 28 डॉक्टरों को प्रतिनियुक्ति पर अस्थायी तौर पर भेजा और दौरा होने के बाद उन्हें वापस मूल पद पर बुला लिया। क्या इसकी जानकारी एमसीआई को थी? यदि हां, तो फिर मान्यता को लेकर इतनी औपचारिकताएं करने की जरूरत ही क्या है?


पत्रिका : २८ सितम्बर २०१० 

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

काले कारनामों पर पोत दी कालिख

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज में सूचना का अधिकार का माखौल
- कालिख पोत को जानकारी देने का संभवत: देश का पहला मामला


एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने सूचना का अधिकार कानून का माखौल उड़ाते हुए एकाउंट से जुड़े एक दस्तावेज पर जानबूझकर कालिख पोत दी। आवेदक को यह जानकारी देते हुए कालिख पोतने का जिक्र भी प्रबंधन ने किया है। सूचना का अधिकार का इस तरह से मजाक बनाने की संभवत: यह देश का पहला मामला है।

मामला बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाओं के मरीज पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से जुड़ा है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के सदस्य डॉ. आनंद राय ने कॉलेज के विभिन्न विभागों को ट्रायल के लिए मिले रुपए की ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी। मेडिसिन विभाग ने वर्ष 2010 की ऑडिट रिपोर्ट तो दी लेकिन कई महत्वपूर्ण आंकड़ों पर कालिख पोत दी। ऑडिट रिपोर्ट सरिता मूंदड़ा ने तैयार की है। मूंदड़ा के पते और फोन नंबर पर भी कालिख पोती गई है। साथ ही कवरिंग पत्र में यह भी लिख दिया कि आवेदन द्वारा चाही गई जानकारी से यह संबंधित नहीं है, इसलिए इस पर काले रंग का प्रयोग करके इसे अपठनीय बनाया गया है। उधर, आवेदक का कहना है मैंने संपूर्ण ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी, इसलिए उसका सीधा-सीधा मेरे आवेदन से संबंध है। ट्रायल के नाम पर हुए हेरफेर को छुपाने के लिए यह कार्रवाई की है। इसके विरूद्ध मैं संचालक चिकित्सा शिक्षा को अपील कर रहा हूं।

साढ़े 13 लाख का हिसाब छुपाया
ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट है कि 31 मार्च 2010 तक मेडिसिन विभाग की साइंटिफिक कमेटी के खाते में 13.47 लाख रुपए आए हैं। कालिख से यह छुपा लिया गया है कि यह किन लोगों में बंटा।



जानकारी छुपाने वाले विभाग पर गंभीर आरोप

मेडिसिन विभाग के डॉ. अनिल भराणी, डॉ. आशीष पटेल, पूर्व एचओडी डॉ. अशोक वाजपेयी पर गंभीर आरोप है कि इन्होंने राज्य सरकार को जानकारी दिए बगैर ट्रायल करके अकूत संपत्ति जुटाई है। डॉ. भराणी और डॉ. पटेल ने तो एक ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी बताने तक का खेल कर दिया है।

'संभवत: यह देश का पहला मामला है, जब जानकारी पर कालीख पोती गई है। नि:संदेह जानकारी छुपाने की कोशिश के चलते यह कदम उठाया होगा। वही जानकारी छुपाई जा सकती है, जिससे शांति भंग होने या देश की गोपनीयता को खतरा हो। हम इसे राष्टï्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाएंगे।
- रोली शिवहरे, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

'आवेदक को इसके विरूद्ध अपील करना चाहिए। साथ ही जिस दस्तावेज पर कालिख पोती गई है, उसके लिए फिर से आवेदन लगाना चाहिए।
- गौतम कोठारी, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०