कैलाश-मेंदोला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कैलाश-मेंदोला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

लोकायुक्त को मिलेगा 300 पेज का जवाब

- कैलाश को  समय कवच  से सुरक्षित रखने के कदम पर सुरेश सेठ की पुख्ता तैयारी
- सुगनीदेवी केस पर अधूरी एफआईआर पर विशेष न्यायालय में बहस आज


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन में हुए 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस के लिए कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने 300 पेज का जवाब तैयार कर लिया है। यह जवाब बुधवार को विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा। उधर, लोकायुक्त पुलिस का जोर मामले में दर्ज अपनी अधूरी एफआईआर को अंतिम साबित करने पर रहेगा।

केस में पिछली सुनवाई 21 सितंबर को हुई थी, तब लोकायुक्त पुलिस को मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) के भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु लोकायुक्त के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर बहस के लिए कोर्ट ने 6 अक्टूबर मुकर्रर किया था।

 सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है, समय सीमा तय हो

सुरेश सेठ ने 'पत्रिकाÓ को बताया मैंने जवाब में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के करीब एक दर्जन न्यायिक दृष्टांत दिए हैं। सभी कोर्टें चाहती हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में समय सीमा में जांच पूरी हो जाए। सोमवार को मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसआर आलम एवं ïआलोक अराधे की युगलपीठ ने अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) आरएन सक्सेना पर भ्रष्टाचार के आरोप से जुड़े केस में लोकायुक्त पुलिस छह महीने में जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं। 

मेंदोला-संघवी की याचिका में छुपा संदेश
सेठ ने बताया इंदौर हाईकोर्ट में जिस तरह से मामले में फंस चुके रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की याचिका खारिज की है, उसका संदेश साफ है कि जांच प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है। लोकायुक्त समय पर जांच पूरी नहीं कर पाए तो उसे साफ इंकार कर देना चाहिए। मैंने तो हाईकोर्ट में भी सीबीआई जांच की मांग उठाई थी।

'मुझे दूर करना संभव नहींÓ
पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस ने तर्क दिया था कि एफआईआर रजिस्टर होने के बाद जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश नहीं हो जाती, तब तक केस कोर्ट व पुलिस के बीच ही रहता है। परिवादी इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है। परिवादी सेठ को कोर्ट के समक्ष उपस्थिति होने का अधिकार भी नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए सेठ कहते हैं जांच प्रक्रिया से शिकायतकर्ता को दूर करने की कोशिश शंका को जन्म देती है। 

हकीकत की कसौटी पर कितने खरे लोकायुक्त पुलिस के तर्क ?


तर्क एक
घटना अवधि 20 वर्ष की है और इसके लिए विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाए जाना है। इसमें वक्त लगेगा।
कसौटी
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज चार के मुताबिक सभी संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है कि फिर लोकायुक्त पुलिस और कौन से कागज चाहती है?

तर्क दो
विभिन्न साक्षियों के विस्तृत कथन लिपिबद्ध किए जाना है। इसमें अधिक समय लगना स्वाभाविक है।
कसौटी
एफआईआर के पेज पांच के मुताबिक मौजूदा और पूर्व निगमायुक्त से लेकर सभी प्रमुख संबंधित अफसरों और लोगों से बयान लिए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है ऐसे कौन लोग शेष हैं, जिनसे लोकायुक्त पुलिस बात करना चाहती है?

तर्क तीन
दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने का जिक्र नहीं किया गया है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अंतिम जांच रिपोर्ट करने के लिए स्वयं कोर्ट से चार महीने का समय मांगा था। परिवादी सुरेश सेठ की आपत्ति पर डेढ़ महीने की समयसीमा तय हुई थी। अब सवाल है कि उस दिन ïदंड प्रक्रिया संहिता क्यों याद नहीं आई?

तर्क चार
एफआईआर दर्ज होने के बाद अनुसंधान की प्रक्रिया में परिवादी हिस्सा नहीं ले सकता है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि जो एफआईआर दर्ज की गई है, वह अधूरी है। आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) की भूमिका की पड़ताल के लिए अगली तारीख नियत कर दी जाए। अब सवाल है कि प्रारंभिक जांच में जब एक आरोपी की भूमिका को लेकर पड़ताल ही नहीं की गई तो परिवादी को प्रक्रिया से दूर कैसे किया जा सकता है?

पत्रिका : ०६ अक्टूबर २०१०

हाईकोर्ट ने मेंदोला को नहीं मिली राहत

- सुगनीदेवी केस की जांच प्रक्रिया को सही ठहराया 
- मनीष संघवी, रमेश ने दी थी विशेष न्यायाधीश के आदेश को चुनौती


परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स संचालक मनीष संघवी ने ये याचिकाएं दायर की थीं। हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के उस कदम को न्यायिक तौर पर सही माना जिसमें कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश दिए गए थे।

इंदौर बैंच के जस्टिस एसएल कोचर और शुभदा वाघमारे की युगलपीठ ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए टिप्पणी की है विशेष न्यायाधीश को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का इस्तेमाल करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है और इसी के आधार पर जांच शुरू की गई है। कोर्ट उन सभी न्यायिक दृष्टांतों का भी खारिज कर दिया जिनके आधार पर विशेष न्यायाधीश की शक्तियों को कटघरे में खड़ा किया गया था। मेंदोला के पैरवीकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता एके सेठी और राहुल सेठी ने फैसले की पुष्टि की है। संघवी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रोहित आर्या और अमित अग्रवाल ने जबकि लोकायुक्त की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एलएन सोनी ने पैरवी की थी।

एमिकस क्यूरी की अहम रिपोर्ट

इस केस में कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश देसाई को एमिकस क्यूरी (केस में कोर्ट के सलाहकार) घोषित किया था। उनकी रिपोर्ट में निचली अदालत की कार्रवाई को सही ठहराया गया था।

उठी थी सीबीआई जांच की मांग
केस पर 19 अगस्त को अंतिम बहस हुई थी। तब सुरेश सेठ ने तर्क दिया था कि लोकायुक्त पुलिस की जांच प्रक्रिया बेहद धीमी है इसलिए जांच का कार्य सीबीआई को सौंप दी जाए। सुनवाई के दौरान ही हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अपराध तो हुआ है और केवल प्रक्रिया का हवाला देकर अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने जीरो कायमी जिक्र करते हुए कहा था सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोई भी व्यक्ति थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कर सकता है। पहले वह जीरो नंबर पर कायम होती है और बाद में जिस क्षेत्र से संबंध होती है, वहां उसे भेजा जा सकता है। इस केस में लोकायुक्त पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। अब उसे शिफ्ट किया जा सकता है, खत्म तो नहीं किया जा सकता।


मेंदोला-संघवी समेत 17 आरोपी
लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को मेंदोला और संघवी समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज किया है। इसकी अगली पड़ताल सोमवार को ही विधिवत शुरू हुई। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस को मय दस्तावेज बयाद दिए हैं। सभी 17 पर आरोप है कि इन्होंने षडय़ंत्र करके निगम से लीज पर ली गई जमीन को धनलक्ष्मी केमिकल्स से नंदानगर साख संस्था को बिकवाया और इससे शासन को करीब पौने तीन करोड़ के राजस्व की चपत लगी।

कल विशेष अदालत में सुनवाई
सुगनीदेवी केस में 6 अक्टूबर को विशेष न्यायालय में सुनवाई होना है। पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस को अंतिम जांच रिपोर्ट पेश करना थी, किंतु उसने तर्क दिया कि हमारे लिए जांच की समय सीमा तय नहीं की जा सकी है। सेठ की आपत्ति पर अब इस पर बहस होना है। ज्ञात रहे मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) को लेकर अब तक लोकायुक्त पुलिस ने कोई टिप्पणी नहीं की है।



मेंदोला-संघवी के सारे तर्क नामंजूर
- सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक दृष्टांतों का आधार लेना गलत
- सुगनीदेवी केस पर हाईकोर्ट में खारिज हुई याचिकाएं


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में विशेष न्यायाधीश द्वारा लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश देने को चुनौती देने के लिए लगाई याचिकाओं के तर्कों को हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के जिन न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया गया था, हाईकोर्ट ने उन्हें इस केस से संबद्ध नहीं माना।
 मेंदोला व संघवी की ओर से कई न्यायिक दृष्टांत दिए गए थे, किंतु कोर्ट ने उन्हें वाजिब नहीं माना। उधर, सुरेश सेठ ने 284 पेज का एक जवाब पेश किया था। उनके जवाब में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के 21 न्यायिक दृष्टांत थे। ये सभी दृष्टांत मेंदोला और संघवी की याचिकाओं के तर्कों को चुनौती देते थे। कोर्ट द्वारा मेंदोला-संघवी की याचिकाएं खारिज करने से साफ है कि सेठ के तर्कों से कोर्ट सहमत हुई।

 विधायक रमेश मेंदोला की याचिका के आधार

1. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग मजिस्ट्रेट कर सकता है, विशेष न्यायाधीश नहीं।
2. विशेष न्यायाधीश मप्र विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) कानून 1947 एवं मप्र लोकायुक्त कानून के अधीन है। वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत मजिस्ट्रेट नहीं है।
3. विशेष न्यायाधीश द्वारा सीआरपीसी की धारा 190 के तहत कार्रवाई नहीं की।
4. मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून की धारा 4 के तहत कोई भी अनुसंधान कार्य पर सुपरइनटेंडेंस लोकायुक्त की रहती है, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
5. शिकायतकर्ता ने कभी भी लोकायुक्त अथवा एसपीई लेाकायुक्त को शिकायत दर्ज नहीं करवाई, इसलिए विशेष न्यायाधीश द्वारा धारा 153(3) के तहत जांच के आदेश देना त्रूटिपूर्ण है।
6. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी फौजदारी परिवाद के तहत परिवादी के बयान दर्ज नहीं किए और न ही धारा 202 के तहत कोई कार्रवाई की।
7. आरोपी की सुनवाई का अवसर दिए बगैर सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
8. सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत आदेश पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंनचार्ज को ही दिया जा सकता है। एसपीई लोकायुक्त इंदौर इस श्रेणी में नहीं आते।
9. सीआरपीसी की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग तभी किया जा सकता है, जबकि संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया गया हो।
10. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून के प्रावधानों के विपरीत है, क्योंकि इस अधिनियम में रा'य सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है। 


मनीष संघवी की याचिका के आधार
1. याचिकाकर्ता लोक सेवक नहीं है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत एसपीई लोकायुक्त को जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
2. मप्र लोकायुक्त और उपलोकायुक्त नियम 1981 की धारा 8 (सी) के तहत पांच वर्ष से पुराने मामलों पर जांच का प्रतिबंध लगाया गया है।
3. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया।
4. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम 1981 की धारा 7 के प्रावधानों का उल्लंघन है।


सुरेश सेठ के जवाब
1. तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला ने महापौर कैलाश विजयवर्गीय की मौन सहमति के साथ पद का दुरुपयोग करते हुए धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी से आपराधिक षडय़ंत्र रचकर सरकारी जमीन की खरीदी-बिक्री की। इससे निगम और सरकार को करोड़ों की राजस्व हानि हुई।
2. वर्तमान में पुलिस अनुसंधान जारी है, इसलिए दोनों याचिकाएं अपरिपक्व हैं।
3. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (ई) के तहत एसपी स्तर के अधिकारी को जांच का आदेश देने का अधिकार है।
4. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश को संज्ञान लेने का पूर्ण अधिकार है और इससे सेशन न्यायालय के साथ मजिस्ट्रेट की शक्तियों का समावेश हो गया है।
5. सीआरपीसी की धारा 153 (3) के तहत जांच के आदेश जारी करने से पहले अभियुक्त को सुनवाई को अवसर देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
पत्रिका : ०५ अक्टूबर २०१०

बुधवार, 11 अगस्त 2010

ईमानदार थे, तो क्यों नहीं बदली अफसरों की राय

- सुगनीदेवी कॉलेज जमीन घोटाले मामले की एफआईआर से उपजा सवाल
- कैलाश विजयवर्गीय को बचाने की कोशिश में लोकायुक्त पुलिस ने किए तीन गोलमाल


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की भाषा से साफ है कि तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय और तत्कालीन निगमायुक्त को बचाने के लिए भरसक कोशिश की गई। अदालत में पेश की गई 29 पेज की एफआईआर को 'पत्रिकाÓ ने विधि विशेषज्ञों को दिखाया, तो वे चौंक गए। इस रिपोर्ट में तीन स्थानों पर स्पष्टï रूप से गोलमाल किया गया है।
जिन तर्कों के आधार पर मेंदोला समेत 17 लोगों को आरोपी बनाया गया है उनसे विजयवर्गीय की ईमानदारी पर सवाल खड़ा हो गया है। विधि विशेषज्ञ कहते हैं कि विजयवर्गीय ईमानदार थे, तो उन्होंने अफसरों के वे गड़बड़ फैसले पलट क्यों नहीं दिए जिनके आधार पर धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज की जमीन नंदानगर साख संस्था को दी गई। ऐसा भी नहीं है कि अफसरों के हस्ताक्षर से आए सभी प्रस्तावों को मंजूर कर लिया जाता हो। अफसरों की सकारात्मक टिप्पणियों के साथ दर्जनों गड़बड़ प्रस्ताव एमआईसी के सामने आते हैं, जिन्हें खारिज करके एमआईसी व महापौर न्याय करते हैं। 

एफआईआर में तीन गोलमाल

गोलमाल एक
पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया।
उठता सवाल
अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें?

गोलमाल दो
पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई।
उठता सवाल
डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?

गोलमाल तीन
पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडय़ंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ।
उठता सवाल 
क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडय़ंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडय़ंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है? 

लोकायुक्त पुलिस को क्यों नहीं दिखे कैलाश-रमेश के ताल्लुकात

- कोर्ट ने जिन बिंदुओं पर सौंपी थी जांच, वे भी नहीं खंगाले
- ऐसी विशेष जांच एजेंसी का क्या औचित्य


सीबीआई, सीआईडी, ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त जैसी विशेष जांच एजेंसियों के गठन के पीछे मंशा होती है कि भ्रष्टाचार या अपराध के किसी भी मामले से जुड़े सूक्ष्मतम पहलू की भी जांच हो जाए और बड़े से बड़े आरोपी को खींचकर अदालत के सामने पेश कर दिया जाए। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 एकड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन मामले में अब तक तो ऐसा नहीं हो सका। विशेष न्यायालय द्वारा चार माह पूर्व (6 अप्रैल को) लोकायुक्त पुलिस को सौंपे गए इस केस में जिन 46 बिदुओं पर जांच सौंपी थी, उनमें से कई की पड़ताल ही नहीं की गई। खासकर वे बिंदु पूरी तरह अछूते रहे जिनके आधार पर तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती थी।

यहां तक कि लोकायुक्त पुलिस ने फरियादी सुरेश सेठ के उस आरोप की भी पूरी तरह अनदेखी की जिसमें उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के व्यक्तिगत ताल्लुकातों का जिक्र था। दोनों के जगजाहिर संबंधों के आधार पर ही संभवत: अदालत ने भी लोकायुक्त पुलिस को दोनों की भूमिका की जांच सौंपी थी। ज्ञात रहे लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को अदालत में 29 पेज की एफआईआर पेश करके जांच से पीछा छुड़ाने की कोशिश की थी। फरियादी ने जब चार में से एक आरोपी (कैलाश) को छोडऩे की बात उठाई, तब लोकायुक्त के वकील बोले जांच अभी जारी है और आरोपी क्रमांक दो यानी कैलाश विजयवर्गीय को भी आरोपी बनाया जा सकता है।

बड़ा सवाल
कैलाश ने पलट क्यों नहीं दी अफसरों की राय?
विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में नेताओं के बजाए अफसरों को अधिक दोषी बताया गया है। पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का प्रस्ताव पास कर दिया। बड़ा सवाल यह है कि अफसरों की गलती को महापौर और एमआईसी ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प को पारित न करें? ऐसा भी नहीं है कि अफसरों के हस्ताक्षर से आए सभी प्रस्तावों को मंजूर कर लिया जाता हो। दर्जनों प्रस्ताव ऐसे होते हैं, जिन्हें दोषपूर्ण जानकर महापौर व एमआईसी द्वारा खारिज कर दिया जाता है। इस साधारण किंतु बेहद महत्वपूर्ण तथ्य पर लोकायुक्त पुलिस ने आखिर क्यों ध्यान नहीं दिया?


क्या कर रहा 209 लोगों का लवाजमा
मप्र में लोकायुक्त संगठन की स्थापना विशेष पुलिस स्थापना के अंतर्गत की गई है। लोकायुक्त समेत इसमें 209 अधिकारी-कर्मचारी का अमला सरकार ने लगाया है। अमले में महानिदेशक, इंस्पेक्टर जनरल, एसपी से लेकर कानूनी सलाहकार तक शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि इस लवाजमे के पास एकमात्र यही केस जांच के लिए था, लेकिन सवाल यही है कि बहुचर्चित मामले में भी इस अमले ने अदालत की फिक्र नहीं की।

ऐसा काम तो सामान्य पुलिस भी कर ले
इस बहुचर्चित मामले में अब तक के घटनाक्रम पर कानूनी जानकारों का कहना है जिस तरह से लोकायुक्त पुलिस ने जांच कार्य किया है, वह तो सामान्य पुलिस भी कर सकती थी। कानूनन विशेष पुलिस स्थापना को कई विशेष अधिकार दिए गए हैं, लेकिन इस मामले में उनका इस्तेमाल नहीं किया गया।

कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य
बिंदु एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं।
बिंदु दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।
बिंदु तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडय़ंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई। 
बिंदु चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।
बिंदु पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।
बिंदु छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।
बिंदु सात
कैलाश के प्रति रमेश की राजनैतिक निष्ठा समाज में स्थापित है। रमेश कैलाश को अपना राजनैतिक गुरू भी मानते हैं। 





 News in Patrika on 8th August 2010

अदालत ने लोकायुक्त पुलिस से पूछा- कैलाश को क्यों छोड़ा?

Lokayukta Officers

- सुगनीदेवी कॉलेज परिसर से जुड़ी 100 करोड़ की तीन एकड़ जमीन में घोटाले की हो गई पुष्टि
- भाजपा विधायक रमेश मेंदोला और 13 अफसरों समेत 17 के खिलाफ मिले भ्रष्टाचार के सबूत, सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज
- नेता, अफसर और उद्योगपतियों ने आपराधिक षडयंत्र रचकर सरकार को लगाई 2.70 करोड़ की चपत

Suresh Seth


परदेशीपुरा चौराहा स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन मामले में आखिरकार घोटाले की पुष्टि हो ही गई। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के कारण बहुचॢचत हुए १०० करोड़ रुपए के इस मामले में 17 लोगों को भ्रष्टाचार करने का दोषी मानकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। नेता, अफसर और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ से सरकार को 2 करोड़ 70 लाख रुपए की चपत लगी है। मामले में कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ फिलहाल एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। ऐसा क्यों किया गया, इसका जवाब भी लोकायुक्त पुलिस के पास नहीं है। इसी के चलते कोर्ट में लोकायुक्त पुलिस से पूछा गया कि किस आधार पर आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय को छोड़ा गया। लोकायुक्त पुलिस को इसका जवाब 21 सितंबर तक कोर्ट में देना होगा। हालांकि, लोकायुक्त के वकील ने कोर्ट को बताया है कि फिलहाल जांच जारी है और विजयवर्गीय के साथ ही अन्य लोग भी आरोपी बनाए जा सकते हैं। 

भारी गहमागहमी के बीच शुक्रवार दोपहर 12 बजे को लोकायुक्त पुलिस ने विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में जांच रिपोर्ट पेश की। एफआईआर की शक्ल में पेश इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भाजपा विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों ने षडय़ंत्र रचकर भ्रष्टाचार किया। इसी कारण इनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कर ली गई है। 

लोकायुक्त की इस रिपोर्ट पर शिकायतकर्ता व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश सेठ ने भारी आपत्ति जताते हुए कोर्ट को बताया मैंने चार आरोपी बताए थे। इनमें से तीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई, जबकि तत्कालीन महापौर कैलाश विजयगर्वीय को लोकायुक्त ने छोड़ दिया, ऐसा आखिर क्यों किया गया। इस पर कोर्ट ने भी लोकायुक्त पुलिस के वकील से पूछा बताइए ऐसा क्यों हुआ? 

लोकायुक्त की ओर से हाजिर हुए विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने बताया अभी विजयवर्गीय को क्लीन चीट नहीं दी गई है। मामले में जांच जारी है और विजयवर्गीय समेत अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया जा सकता है। करीब 20 मिनिट तक बहस चली। दोपहर बाद विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिए कि मामले में अंतिम जांच प्रतिवेदन 21 सितंबर तक पेश कर दिया जाए।

कैलाश को नहीं दी क्लीन चीट
विशेष कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विशेष पुलिस स्थापना द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में कैलाश विजयवर्गीय का नाम नहीं होने से यह नहीं माना जाए कि उनके खिलाफ केस समाप्त हो गया है। यह जरूरी नहीं है कि एफआईआर में नाम नहीं होने से कैलाश विजयवर्गीय के विरूद्ध मामला समाप्त हो गया। जांच के आधार पर उन्हें आरोपी बनाया जा सकता है।



'लोकायुक्त-कैलाश के बेटे बिजनेस पार्टनरÓ
शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पीपी नावलेकर और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के परिवारोंं के आपसी ताल्लुकतों का हवाला देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। सेठ ने मीडिया से चर्चा में कहा दोनों के बेटे बिजनेस पार्टनर हैं, इसी कारण कैलाश को बचाया गया, अन्यथा उन्हें छोडऩे की कोई वजह मौजूद ही नहीं है।

अब चालान पेश होगा
जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है, उनके खिलाफ विस्तृत जांच होगी। इसके बाद कोर्ट में चालान पेश होगा और गिरफ्तारी होगी। कैलाश विजयवर्गीय और एमआईसी की भूमिका की जांच भी साथ-साथ चलेगी। चालान पेश होने में कितना समय लगेगा, फिलहाल तय नहीं है। 

इन धाराओं में केस
एक- भष्ट्राचार निवारण अधिनियम १९८८ की धारा 13(1) डी और धारा 13 (2) अर्थात भ्रष्टाचार।
दो- भारतीय दंड विधान की धारा १२० बी अर्थात आपराधिक षडय़ंत्र।

लो, कैलाश के दस्तखत वाला सबूत
-सुरेश सेठ का कहना है कि घोटाले के सूत्रधार और तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ उन्होंने लोकायुक्त को पुख्ता सबूत सौंपे हैं। ये सभी सरकारी दस्तावेज प्रमाणित हैं। कैलाश के खिलाफ सबसे पुख्ता सबूत है, खुद उनकी ही अध्यक्षता में तीन जून 2002 को पारित एमआईसी का संकल्प, जिसमें जमीन की गाइडलाइन दर 35 रुपए प्रति दस वर्गमीटर बताकर सरकार को लाखों रुपए का नुकसान पहुंचाया गया। मेंदोला के खिलाफ एफआईआर में इसको आधार बनाया गया है लेकिन विजयवर्गीय को बख्श दिया गया।
    
अफसरों ने किसके लिए किया
निगम के अफसरों ने दबी जुबान अपनी पीड़ा जताई कि उस कार्यकाल में तो आंख दिखाकर काम कराए जाते थे, ये किससे छिपा है। उन्होंने कहा कि कराने वाला कौन था, सबको मालूम है।

'या तो बेईमान कहो या ईमानदारÓ
कोर्ट में हुई जिरह के दौरान सेठ ने लोकायुक्त ïके वकील से कहा भाई, या तो कह दो कि कैलाश बेईमान है या कह दो नहीं है। चाहे तो यह भी कह सकते हैं कि वह ईमानदार है। इस पर कोर्ट में हंसी का ठहाका लग गया।

इनके खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर
1. रमेश मेंदोला, तत्कालीन पार्षद एवं अध्यक्ष नंदानगर साख संस्था
2. विजय नगीन कोठारी, भागीदार, धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज
3. मनीष रमणीकलाल संघवी, भागीदार, धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज
4. नगीनचंद्र कोठारी, भागीदार, धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज
5. हंसकुमार जैन, नगर शिल्पज्ञ, नगरनिगम
6. राकेश शर्मा, भवन अधिकारी, नगरनिगम
7. दिवाकर गाढ़े, सहायक यंत्री, नगरनिगम
8. दिनेश शर्मा, उपयंत्री, नगरनिगम
9. श्याम शर्मा, उपयंत्री, नगरनिगम
10. राकेश मिश्रा, उपयंत्री, नगरनिगम
11. एसके जैन, तत्कालीन सहायक शिल्पज्ञ, नगरनिगम
12. अशोक बैजल, रिटायर्ड भवन अधिकारी, नगरनिगम
13. एनके सुराणा, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री, नगरनिगम
14. जगदीश डगांवकर, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री, नगरनिगम
15. नित्यानंद जोशी, रिटायर्ड सहायक यंत्री, नगरनिगम
16. विमल कुमार जैन, रिटायर्ड सहायक शिल्पज्ञ, नगरनिगम
17. स्व. केआर मंडोवरा, तत्कालीन उपयंत्री, नगरनिगम


ये गड़बडिय़ां मिलीं
- रमेश मेंदोला पार्षद और एमआईसी सदस्य होने के साथ ही नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष थे, उन्होंने अफसरों के साथ मिलकर आर्थिक लाभ उठाया। जगदीश डगांवकर, हंसकुमार जैन, राकेश शर्मा, दिवाकर गाढ़े, श्याम शर्मा ने विजय कोठारी और मनीष संघवी के साथ मिलकर यह षडय़ंत्र रचा।
- 23 फरवरी 2004 को नंदानगर संस्था ने लीज नामांतरण का आवेदन दिया। 28 फरवरी 2004 को लीज अधिकार बेचने के लिए धनलक्ष्मी केमिकल्स ने निगमायुक्त को पत्र लिखा। नगर शिल्पज्ञ ने 25 मार्च 2004 को लीज बेचने की एनओसी जारी किया। दोनों पक्षों के बीच लेनदेन 8 सितंबर 2004 को हुआ। लीज नामांतरण के आवेदन के एक महीने पहले ही सौदा हो गया।
- नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर के हस्ताक्षर से 19 अप्रैल 2004 को जारी पत्र के आधार पर महापौर कैलाश विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को जमीन धनलक्ष्मी केमि. से नंदानगर संस्था को 30 वर्ष के लिए दे दी। इसी संकल्प के आधार पर 6 अक्टूबर 2004 को नंदानगर संस्था ने निगम से नामांतरण की मंजूरी ली। 15 अप्रैल 2005 को नगरीय प्रशासन व विकास विभाग भोपाल को सौदे की मंजूरी के लिए निगम ने पत्र भेजा। इस पर आज तक मंजूरी नहीं आई।
- वर्ष 2002 में जमीन के उपयोग में परिवर्तन के लिए भवन अधिकारी और नगर निल्पज्ञ ने अन्य अफसरों के साथ मिलकर मनमाने ढंग से लीज की गणना करके 1 लाख 19 हजार 20 रुपए से लिए।
- 1990-91 की गाइडलाइन (40 रुपए वर्ग फीट) के हिसाब से 13 वर्ष का लीज रेंट 13 लाख 68 हजार 640 रुपए बनता था। अफसरों ने निगम को 12 लाख 49 हजार 620 रुपए की चपत लगाई।
- कलेक्टर गाइडलाइन 2002-03 में बदलकर 40 रुपए से बढ़कर 4000 रुपए वर्गफीट हो गई। इसके मुताबिक लीज रेंट 1.27 करोड़ रुपए बनता था। जगदीश डगांवकर, अशोक बैजल, एसके जैन, दिनेश शर्मा ने पद का दुरूपयोग करके विजय कोठारी और मनीष संघवी को 1 करोड़ 25 लाख 95 हजार 637 रुपए का फायदा पहुंचाया।
- औद्योगिक उपयोग की जमीन पर निगम ने आवासीय नक्क्षे पास किए।
- जमीन का डायवर्शन नहीं किया गया और इससे सरकार को 6 लाख 50 हजार 327 रुपए की हानि हुई।
- नित्यानंद जोशी, केआर मंडोवरा, राकेश शर्मा और नगीन कोठारी ने मिलकर आपराधिक  षडयंत्र रचा और धनलक्ष्मी केमिकल्स को अवैध लाभ पहुंचाया। 
- लीज डीड की शर्तों के विपरीत जमीन बेचने की एनओसी निगम के अफसरों ने जारी की।
- एनओसी के आधार पर ही गलत तरीके से जमीन नंदानगर साख संस्था को 1.38 करोड़ रुपए में बेच दी।
- नियमानुसार 1.38 करोड़ रुपए निगम के खाते में आने थे, लेकिन ये विजय कोठारी व मनीष संघवी को मिले।
- नंदानगर संस्था को यह जमीन 1.38 करोड़ की मामूली कीमत मिली, जो कि आर्थिक फायदा पहुंचाने का मामला है। 


कैलाश-मेंदोला के नहीं लिए बयान
लोकायुक्त जांच के दौरान जिन 15 लोगों के बयान लिए गए, उनमें कैलाश-मेंदाला के नाम शामिल नहीं है। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ के साथ ही निगमायुक्त सीबी सिंह, तत्कालीन भवन अधिकारी ज्ञानेंद्रसिंह जादौन, जिला पंजीयक मोहनलाल श्रीवास्तव, भू अभिलेख अधीक्षक शिवप्रसाद मंडरा, टीएंडसीपी संयुक्त संचालक विजय सावलकर, तत्कालीन निगमायुक्त संजय शुक्ल, नंदानगर साख संस्था मैनेजर प्रवीण कंपलीकर, सहकारिता उपायुक्त महेंद्र दीक्षित, उप सचिव मप्र शासन नरेश पाल, तत्कालीन निगमायुक्त विनोद शर्मा, तत्कालीन निगमायुक्त आकाश त्रिपाठी, तत्कालीन सचिव निगम बंशीलाल जोशी,  सचिव निगम रणबीरकुमार के साथ ही विजय कोठारी व मनीष संघवी के मित्र मनीष तांबी के बयान भी लोकायुक्त पुलिस ने लिए हैं।
News in Patrika 7th August 2010