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सोमवार, 24 सितंबर 2012

गुजरात के राज्यपाल अनुमति दे सकते हैं तो मप्र में क्यों नहीं?

गुजरात के राज्यपाल अनुमति दे सकते हैं                 तो मप्र में क्यों नहीं?


मंजूरी के लिए अटके मामलों में गुजरात हाई कोर्ट का फैसला दिखा रहा रास्ता 

 

गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया जो मध्यप्रदेश के भ्रष्ट नेताओं और अफसरों पर शिकंजा कसने की राह आसान बनाता है। यह फैसला कहता है, यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया उच्च पदस्थ व्यक्ति द्वारा भ्रष्टाचार या अनियमितता करना साबित होता है, तो उसके खिलाफ राज्यपाल अभियोजन की अनुमति दे सकते हैं। इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार नहीं करना चाहिए। मध्यप्रदेश में कई मामले ऐसे हैं, जिनकी अनुमति राज्य सरकार के पास लंबित है और कुछ ऐसे भी हैं, जिनमें राजभवन भी कार्रवाई नहीं कर रहा।



यह है गुजरात की कहानी

400  करोड़ की चपत के मामले में कोर्ट की टिप्पणी
वर्ष 2008  में डी. मरडिया नामक शख्स ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करके आरोप लगाया कि मत्स्यपालन मंत्री पुरुषोत्तम सोलंकी ने बगैर नीलामी राज्य के बांधों और तालाबों में मछली मारने के ठेके चहेतों को दे दिए। इससे सरकार को 400 करोड़ रुपए की चपत लगी। कोर्ट ने ठेकों को निरस्त कर दिया और राज्यपाल को कहा कि सरकार से राय मशविरा करके मंत्री के खिलाफ अभियोजन को मंजूरी दें। सरकार ने अनुमति नहीं दी तो मरडिया फिर कोर्ट गए। कोर्ट ने सरकार से कहा, कैबिनेट बैठक बुलाई जाए और प्रोसीडिंग राज्यपाल को भेजें। इसके बाद राज्यपाल कमला बेनीवाल ने मंत्री के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी दी। इस मंजूरी को मंत्री सोलंकी ने हाई कोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि संसदीय ढांचे में मंत्री के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने का अधिकार मंत्रिपरिषद को है, न कि राज्यपाल को। मंत्री की यह अर्जी कोर्ट ने ऊपर लिखी गई टिप्पणी करते हुए खारिज कर दी। अब वहां मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस चलाया जाएगा।

हाई कोर्ट ने यह कहा
प्रथम दृष्टि में यदि किसी उच्च पदस्थ व्यक्ति के खिलाफ अपराध होना पाया जाए और उसके खिलाफ अभियोजन की अनुमति को रोका या टाला जाए तो यह लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक है। ऐसा होता है तो उच्च पदस्थ व्यक्ति को अभियोजन चलाने की अनुमति मिलने का डर ही नहीं रहेगा और वे कानून को बेखौफ तोड़ते रहेंगे।
- जस्टिस राजेश एस. शुक्ला, हाई कोर्ट, गुजरात



ऐसा है मध्यप्रदेश का हाल

गरीबों की पेंशन घोटाले का मामला नजरअंदाज

वर्ष 2004 में इंदौर नगर निगम में भारत सरकार की राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना में 33 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ। कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने विशेष न्यायालय में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला, महापौर परिषद सदस्यों समेत 14 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी का केस दायर किया। आरोप था कि विजयवर्गीय की अगुवाई वाली महापौर परिषद ने व्यवस्था से परे जाकर नंदानगर साख संस्था के जरिए पेंशन वितरित करवाने का आदेश दिलवाया। संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला थे। संस्था ने पेंशन पाने वालों की संख्या 56385 बताई। इसमें से 29500 फर्जी थे। पेंशन बांटी नहीं गई और 33 करोड़ रुपए का घोटाला हो गया। तत्कालीन संभागायुक्त अशोक दास की जांच रिपोर्ट में साबित हुआ कि अपात्र पेंशनभोगियों की संख्या 49 प्रतिशत थी। कोर्ट ने आरोपों को सही पाया और 28 अप्रेल 2006 को विशेष न्यायाधीश एसएस रघुवंशी ने आदेश दिया कि आरोपियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी प्राप्त करके कोर्ट में पेश करें। इतना ही नहीं, 8 फरवरी 2008 को सरकार ने जस्टिस एनके जैन की अध्यक्षता में एक सदस्यी पेंशन आयोग का गठन किया और अधिसूचना में लिखा कि राज्य स्तरीय सत्यापन में साफ हुआ है कि बड़ी संख्या में अपात्र व्यक्तियों को इस योजना का लाभ दिया गया।

राज्यपाल को 2006 में ही लिखा पत्र
विशेष न्यायालय के फैसले के बाद 10 मई 2006 को ही राज्यपाल को पत्र लिखा था। इसमें जिक्र था कि कैलाश विजयवर्गीय वर्तमान में लोक निर्माण मंत्री हैं और सुप्रीम कोर्ट ने बीआर यादव व राजेंद्र सिंह केस में अभियोजन की मंजूरी का अधिकार राज्यपाल को सौंपा गया है, राजभवन अनुमति प्रदान करें। अनुमति प्रदान नहीं की गई है।
- केके मिश्रा, पेंशन घोटाले में शिकायतकर्ता 

पत्रिका 24 सितम्बर 2012









मंगलवार, 28 सितंबर 2010

100 करोड़ के घोटाले की अंतिम रिपोर्ट आज

कैलाश के खातिर लोकायुक्त पुलिस विशेष न्यायाधीश से मांग सकती है और मोहलत

सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के मामले में मंगलवार को लोकायुक्त पुलिस द्वारा विशेष न्यायाधीश के समक्ष तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश की जाना है। कोर्ट द्वारा दिए गए 45 दिन के समय में जांच एजेंसी से क्या सबूत जुटाए हैं, इस पर सभी की निगाहें हैं। पांच महीने से चल रहे इस केस में लोकायुक्त पुलिस अब तक पर्याप्त समय मांग चुकी है। खासकर कैलाश के खिलाफ। संकेत है कि इस बार भी लोकायुक्त पुलिस द्वारा जांच और सबूतों के नाम पर समय मांगा जाएगा। 

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर विशेष न्यायाधीश के आदेश से लोकायुक्त पुलिस ने 6 अप्रैल को मामले की जांच शुरू की थी। लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी, मनीष संघवी और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपराधिक षडय़ंत्र रचने का केस दर्ज किया था। पिछली सुनवाई (6 अगस्त) पर कोर्ट में सेठ ने लोकायुक्त पुलिस पर आरोप लगाया था कि जानबूझकर आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) को बचाने की कोशिश हो रही है। इस आरोपी के बारे में स्थिति स्पष्ट की जाना चाहिए। इसी पर कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को 21 सितंबर तक केस में अंतिम रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था।  

क्या हो सकता है
  • जांच पूरी नहीं हो पाने के कारण लोकायुक्त पुलिस एक बार फिर समय मांग सकती है।
  • अगर जांच पूरी हो गई है तो गोपनीय रिपोर्ट पर निर्भर रहेगा कि कैलाश को दोषी पाकर एफआईआर दर्ज की गई या क्लीनचिट दी गई।
  • हो सकता है इस मामले में लोकायुक्त पुलिस द्वारा नए दिशा-निर्देश मांगे जा सके।


डेढ़ महीने में नोटिस भी नहीं भेजा
- छह अगस्त को एफआईआर दर्ज करके लोकायुक्त पुलिस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया केस
सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के केस में डेढ़ महीने पहले लोकायुक्त पुलिस ने विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपतियों नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी व मनीष संघवी तथा 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपाराधिक षडयंत्र रचने की एफआईआर तो दर्ज की थी। परंतु इस पर अगला कदम आज तक नहीं उठाया गया है। किसी भी आरोपी को अब तक न तो नोटिस दिया गया है और न ही कोई पूछताछ ही की गई।

लोकायुक्त पुलिस ने प्रारंभिक जांच में माना है कि तीन एकड़ जमीन के लिए धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में 17 लोगों ने मिलकर षडय़ंत्र किया और इससे सरकार को करीब पौने तीन करोड़ रुपए की चपत लगी। इसी आधार पर 5 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई, परंतु इसके बाद चालान पेश करने को लेकर रवैया ठंडा ही है। अफसर चालान के लिए आरोपियों के खिलाफ जांच, दस्तावेज के नाम लंबी प्रक्रिया बताते हैं। सही मायने में शुरुआत हुई या नहीं। इसे लेकर 'पत्रिकाÓ ने जिन 17 लोगों पर केस दर्ज हुआ उनमें से कुछ से बात की तो पता चला कि इस मामले में अभी कोई गति ही नहीं है। 


मुझे अब तक न तो कोई नोटिस मिला है और न ही एफआईआर की प्रतिलिपि। जो भी मालूम हुआ है, वह अखबारों के जरिए ही पता चला है।
हंसकुमार जैन, सिटी इंजीनियर, निगम

कुछ माह पहले लोकायुक्त पुलिस ने बयान के लिए बुलाया था। केस दर्ज होने के बाद इस संबंध में मुझसे न कोई संपर्क किया और न ही किसी प्रकार का नोटिस मिला। मेरा तो यही सवाल है कि भला बताए कि मेरा दोष क्या है आरोप क्या है?
अशोक बैजल, रिटायर्ड भवन अधिकारी

सुगनीदेवी कॉलेज की जमीन गड़बड़ी में मुझ पर भी लोकायुक्त पुलिस ने केस दर्ज किया। यह मुझे मीडिया के माध्यम से ही पता चला। पूरा मामला क्या है मुझे ही नहीं पता। जो आरोप लगाए गए हैं वे विरोधभासी हैं। केस दर्ज होने के बाद लोकायुक्त पुलिस की ओर से मुझे न नोटिस मिला न संपर्क किया गया।
नरेंद्र सुराणा, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री  



तारीख -पे- तारीख

अप्रैल
जांच के लिए तीन माह का समय दिया

कोर्ट ने 6 अप्रैल को तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी की भूमिका की जांच कर दोषी पाए जाने पर कार्रवाई को लेकर तीन महीने का समय दिया था। इसके लिए 6 जुलाई को रिपोर्ट पेश की जानी थी।
जुलाई
फिर समय मांग लिया

 6 जुलाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट में बताया कि जांच पूरी नहीं हुई है। इसके लिए तीन माह समय मांगा गया। इस पर परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने आपत्ति ली व लोकायुक्त अफसरों पर राजनीतिक दबाव का आरोप लगाया। इसके बाद कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को फिर एक माह का समय दिया गया।
अगस्त
मुख्य कर्ताधर्ता कैलाश का नाम छोड़ दिया

6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष व तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी सहित 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज करने के साथ रिपोर्ट विशेष न्यायाधीश के समक्ष पेश की थी। तब परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय का नाम हटाने को लेकर आपत्ति ली थी और आरोप लगाए थे। तब अफसरों ने कहा था कि कैलाश के खिलाफ जांच चल रही है। इसके लिए कोर्ट से चार माह का समय मांगा था जिस पर डेढ़ माह का समय दिया गया था।
...और अब सितंबर
इस तरह करीब साढ़े पांच महीने से जांच चल रही है। कैलाश किन-किन आधारों पर दोषी हो सकते हैं इसे लेकर सेठ प्रमाणित साक्ष्यों का पुलिंदा पेश कर चुके हैं। उधर, लोकायुक्त पुलिस पूर्व में भी कई दस्तावेज जुटा चुकी है। 'पत्रिकाÓ कैलाश के खिलाफ आरोपों के बिंदुओं को सोमवार को उल्लेख कर चुकी है। ऐसे में अब सबकी नजरें कैलाश को लेकर लोकायुक्त की रिपोर्ट पर टिकी है।









पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

कम नहीं होते 45 दिन

सुगनीदेवी जमीन घोटाला
- 100 करोड़ के जमीन घोटाले पर विधि विशेषज्ञों की राय
- विशेष न्यायाल में कल पेश होना है लोकायुक्त पुलिस की जांच रिपोर्ट



सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में 43 दिन पहले यानी 6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस को विशेष न्यायालय ने आदेश दिया था कि 45 दिन में मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट सौंप दे। वह दिन कल है। विधि विशेषज्ञों से रायशुमारी में साफ होता है कि इस मामले में मौजूद दस्तावेज और 17 लोगों के खिलाफ की गई एफआईआर को देखकर लगता है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही, 'दूध का दूधÓ साबित करने के लिए लोकायुक्त जैसी सशक्त जांच एजेंसी को दी गई 45 दिन की समय सीमा पर्याप्त हैं।

पिछली सुनवाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि मामले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति (नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी और मनीष संघवी) और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज कर लिया गया है। नेता, अफसर और उद्योगपतियों के गठजोड़ से सरकार को 2 करोड़ 70 लाख रुपए की चपत लगी है। कोर्ट में 29 पेज की एफआईआर भी पेश की गई थी। तब परिवादी सुरेश सेठ ने सवाल उठाया था कि आरोपी क्रमांक दो यानी विजयवर्गीय के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने 45 दिन का समय दिया था। 'पत्रिकाÓ ने पूरे मामले को विधि विशेषज्ञों के समक्ष रखा।


मूल शिकायत में कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य

तथ्य एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रुप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं। 

तथ्य दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।

तथ्य तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडयंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई।

तथ्य चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।

तथ्य पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।

तथ्य छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।



एफआईआर में ही छुपे हैं कैलाश की भूमिका के आधार

  • पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया। विसंगति यह है कि अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें? 
  • पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई। सवाल उठता है डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?
  • पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनी ही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ। इसी से सवाल उपजता है क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडयंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है?  

पत्रिका : २० सितम्बर २०१० 

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

चुनाव याचिका में शपथ पत्र पर बयान मंजूर नहीं

- पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी के कथन को हाईकोर्ट में चुनौती
- अगली सुनवाई के बाद ही होंगे बयान 


पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी द्वारा रतलाम विधायक पारस सकलेचा के विरूद्ध दायर चुनाव याचिका पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें मुद्दा उठा कि चुनाव याचिका में शपथ पत्र पर बयान मंजूर नहीं किया जा सकता है। व्यक्तिगत रूप से ही संबंधित व्यक्ति को अपनी बात कहना चाहिए।

कोठारी ने अपनी याचिका के पक्ष में जस्टिस आईए श्रीवास्तव की कोर्ट में शपथ पत्र के जरिए बयान पेश किए थे। सकलेचा की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ एडवोकेट चंपालाल यादव ने तर्क दिया कि यह याचिका जिस कानून के तहत दायर की गई है उसमें लिखित बयान की अनुमति नहीं है। कोठारी के एडवोकेट सुबोध अभ्यंकर और वीरकुमार जैन ने इस पर बहस के लिए समय मांगा। अब 14 सितंबर को इस मसले पर सुनवाई होगी और 23 सितंबर को बयान।

भ्रष्टाचार के आरोप पर लगी है याचिका
यह चुनाव याचिका 7 जनवरी 2009 को दायर की गई थी। चुनाव आयोग से प्राप्त सीडी के आधार पर हिम्मत कोठारी ने इस याचिका में कहा है कि विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान सकलेचा ने उन पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए और इसी के चलते वे चुनाव हार गए। कोठारी ने बताया भाषणों में सकलेचा ने उनपर लाठी खरीदी में 32 करोड़, दानापानी में 25 करोड़, बंदूक 14 करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। साथ ही यह भी कहा था कि मेरी बैंग्लूर में होटल है और मुंबई में कॉलोनी काटने वाला हूं। ये सभी आरोप मिथ्या थे क्योंकि अब तक इनके पक्ष में कोई बात कोर्ट में नहीं की गई है। 


पत्रिका : ०८ सितम्बर २०१०

रविवार, 5 सितंबर 2010

15 वर्ष पहले मृत बुजुर्ग की जमीन नौजवान बनके बेच दी

सरदार सरोवर बांध फर्जी रजिस्ट्री मामला


पंद्रह वर्ष पहले जिस 65 वर्षीय बुजुर्ग की मौत हो चुकी थी, उसकी जमीन एक 25 वर्षीय युवक ने बेच दी। युवक ने खुद को वह बुजुर्ग बताया जिसकी जमीन थी।
दस्तावेजों पर यह बात शुक्रवार को जस्टिस एसएस झा के सामने साबित हुई। जस्टिस झा सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों को दी गई जमीनों में हुई फर्जी रजिस्ट्रियों की जांच करने वाले आयोग के अध्यक्ष हैं। देवास जिले के पोरला गांव के वेरसिंह भाई की मौत करीब 15 वर्ष पहले हो गया था। वर्ष 2006 में उनके नाम से 25 वर्ष के व्यक्ति का फोटो लगाया गया और जमीन बेच दी गई। इसी जमीन पर वेरसिंह का पूरा निर्भर है। ऐसी ही हकीकत प्रेमगढ़ निवासी भंगड़ा पिता सोमला के साथ भी हुई। 
 एमजी रोड स्थित एलआईसी भवन के बाजू में स्थित आयोग के दफ्तर में जस्टिस झा ने देवास जिले के रतनपुर, निमनपुर, पोटला, पुजापुरा जैसे गांव के आदिवासियों, किसानों, बलाई समाज के लोगों की बात सुनी। नर्मदा बचाओ आंदोलन का दावा है कि नर्मदा घाटी के करीब 2000 विस्थापितों की घाटी में फैले दलाल, सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के गिरोह के जरिए जमीन खरीदी-बेच दी गई। इसमें 300 करोड़ रुपए से अधिक का भ्रष्टाचार हुआ। 

पत्रिका: ०४ सितम्बर २०१०

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

झा आयोग आज से फिर इंदौर में

नर्मदा घाटी में बने सरदार सरोवर बांध के संबंध में मप्र सरकार द्वारा विस्थापितों को दिए गए पुनर्वास पैकेज में हुए कथित भ्रष्टाचार और फर्जी रजिस्ट्री मामले के लिए गठित जस्टिस एसएस झा आयोग शुक्रवार से इंदौर में फिर से सुनवाई शुरू करेगा। एमजीरोड स्थित एलआईसी भवन के बाजू में स्थित आयोग के दफ्तर में जस्टिस झा देवास जिले के पीडि़तों से मिलेंगे। उधर, नर्मदा बचाओ आंदोलन ने जबलपुर में एक अर्जी दाखिल करके मांग की है कि झा आयोग की अंतरिम रिपोर्ट जारी की जाए, ताकि इसके आधार पर नीतिगत फैसले लिए जा सकें।

ज्ञात रहे आंदोलन की याचिका पर ही हाईकोर्ट ने झा आयोग का गठन किया है। आरोप है कि पुनर्वास पैकेज में ढाई हजार से अधिक फर्जी रजिस्ट्रयां की गई और इससे सरकार को 300 करोड़ की चपत लगी। दलालों और अफसरों के गठजोड़ ने विस्थापितों को भूमिहीन कर छोड़ा। मप्र सरकार भी मान चुकी है कि 750 से अधिक रजिस्ट्रियां फर्जी है। हर रजिस्ट्री के लिए सरकार ने साढ़े पांच लाख रुपए का भुगतान किया है।

पत्रिका: ०३ सितम्बर २०१०

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

आवाज बंद करने का सरकारी इंतजाम

निगम का गर्वनेंस ?
पड़ोसी के अतिक्रमण की लोकायुक्त में शिकायत की तो मामला रफादफा करने की मांग से साथ खड़ी की अड़चनें 
मोती तबेला की अवैध इमारत

शहरी विकास की योजनाओं के लिए केंद्रीय स्तर पर गठित एडवायजरी कमेटी की अध्यक्ष ईशा जज आहलुवालिया ने दो दिन पहले इंदौर नगरनिगम को सीख दी थी कि गुड गर्वनेंस (सुशासन) के बगैर न तो बड़े प्रोजेक्ट मिलेंगे और न ही लोगों की जिंदगी आसान होगी। हम आपको बता रहे हैं एक उदाहरण जो निगम गर्वनेंस का आलम बयां करता है। यह व्हिसल ब्लोअर को परेशान करने का मामला भी है.

खबर के पात्र का नाम मोहम्मद इस्हाक खान है। वे 9/2, मोतीतबेला में रहते हैं। उन्होंने कुछ वर्ष पहले अपने पड़ोसी इज्जत नूर पिता एहमद नूर (10/2, मोती तबेला) द्वारा नगरनिगम और सार्वजनिक रास्ते की भूमि पर अतिक्रमण करने पर आपत्ति ली थी। मामले को वे लोकायुक्त तक ले गए हैं। अब खुद परेशान हैं, क्योंकि निगम के अफसरों ने साफ शब्दों में कह दिया है हमारे तंत्र के खिलाफ की शिकायतों को वापस लो तभी आपको 'चैनÓ देंगे। वे निराश होने लगे हैं क्योंकि उनके साथ ही उनके भाई के मकान का नक्शा भी निगम के अफसरान ने रोक दिया है।

आधारहीन नहीं थी आवाज
इस्हाक खान के पास शिकायत के कई मजबूत आधार हैं। उन्होंने 'पत्रिकाÓ को बताया इज्जतनूर ने 16 सितंबर 2003 को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने के इरादे से निगम के अफसरों से सांठगांठ करके नक्शा पास करवाया और मकान व दुकान बना लिए। जिस जमीन पर निर्माण हुआ है, उसे स्वयं इज्जतनूर पूर्व में मंजूर अपने तीन नक्शों में (23 मार्च 1977, 5 अगस्त 1977 और 2 जून 1995 को) सार्वजनिक रास्ते की बता चुके हैं। अफसरों ने नक्शा पास करके सरकार को राजस्व की चपत लगाई है। लोकायुक्त ने तीन बिंदुओं पर जांच की और यह पाया कि झूठे दस्तावेजों के आधार पर इज्जतनूर ने नक्शा पास करवाया।

शिकायत होते ही गुम हो गई फाइल
निगम के अधिकारियों ने लोकायुक्त के समक्ष बयान में कहा कि रिकार्ड 30 वर्ष पुराना है, इसलिए बहुत खोजने के बाद भी उपलब्ध नहीं हो रहा है। दूसरी ओर शिकायत के ठीक पहले इस्हाक खान ने सूचना का अधिकार में पूरी फाइल की प्रमाणित प्रतिलिपि हासिल कर ली थी। खान कहते हैं यूं ही सरकारी रिकॉर्ड गायब होता रहा तो करोड़ों की सरकारी जमीन निजी लोगों के हाथों में जाने से कोई नहीं रोक सकता।


फाइल पर लिखा है 'मिंदोलाजीÓ 
सूचना का अधिकार में प्राप्त एक प्रमाणित दस्तावेज में अतिक्रमण करने वाले इज्जतनूर के नक्शे की फाइल के सबसे ऊपर वाले पेज पर 'मिंदोलाजीÓ लिखा है। लोकायुक्त को दी शिकायत में इस्हाक खान ने इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि संभवत: यह विधायक रमेश मेंदाला की ओर इशारा करता है और हो सकता है, उनके प्रभाव में ही मेरे साथ निगम द्वारा यह व्यवहार किया जा रहा है।



यूं कर रहे शिकायतकर्ता को परेशान
इस्हाक खान
  • इस्हाक खान के 70 वर्षीय भाई मोहम्मद नूर ने 9/2 मोती तबेला में मकान निर्माण के लिए नक्शा मंजूर करवाने की निगम में अर्जी दी, जिसे मंौखिक रूप से यह कहकर रोक दिया गया कि आपके छोटे भाई इस्हाक ने निगम के खिलाफ शिकायतें की है। नूर ने 22 जुलाई को न्यायिक शपथ पत्र पेश कर निगम को कहा कि जमीन पर मेरा एकमात्र स्वामित्व है और मेरा कोई न्यायिक प्रकरण भी नहीं चल रहा है, इसलिए नक्शा मंजूर किया जाए। फिर भी सुनवाई नहीं हुई तो अब नूर ने चेतावनी दी है कि सुनवाई नहीं होने पर गांधी प्रतिमा पर नंगे बदन धरना दूंगा।
  • इस्हाक खान ने जमीन नामांतरण की एक अर्जी 2006 में निगम में दाखिल की थी। उन्हें भी कहा गया कि शिकायतें वापस लो, तो ही दाखिला मंजूर होगा। खान ने इस बात की शिकायत मानवाधिकार आयोग को भी कर दी है।
  • इस्हाक खान ने सूचना का अधिकार में 1 जुलाई 2010 को इज्जतनूर के खिलाफ की शिकायतों पर की गई कार्रवाइयों की जानकारी मांगी तो उन्हें पत्र भेजा गया कि आपके मकान 9/2, मोती तबेला की फाइल आकर देख लें। खान का कहना है यह तो मैंने मांगा ही नहीं था। 


इज्जतनूर और इस्हाक खान का मामला कॉफी पुराना है। मेरी जानकारी में भी हाल ही यह केस आया है। विधिक राय लेकर इस पर शीघ्र ही उचित कार्रवाई की जाएगी।
- अवधेश जैन, भवन निरीक्षक, हरसिद्धी जोन 


पत्रिका : २४ अगस्त २०१०
 

बुधवार, 25 अगस्त 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला


Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।

सोमवार, 23 अगस्त 2010

व्हिसल ब्लोअर की सफाई ?

चिन्मय मिश्र 

ये  किस तरह का समय है, जब पेड़ों के बारे में बात करना लगभग अपराध है।

मध्यप्रदेश में चल रही जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल की आड़ में डॉ. आनंद राय की बर्खास्तगी उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए चेतावनी है, जो प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। डॉ. राय ने इंदौर के महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय व महाराजा यशवन्त राव अस्पताल में बिना अनुमति के बहुराष्ट्रीय दवाई कंपनियों के लिए किए जा रहे 'ड्रग ट्रायलÓ का पर्दाफाश किया था। उनकी बर्खास्तगी के आदेश को मीडिया के लिए भी एक चेतावनी माना जा सकता है। क्योंकि डॉ. राय द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन को अंतत: मीडिया ने ही व्यापक समाज तक पहुंचाया था। इसलिए यह आदेश मीडिया को भी उसकी हैसियत बताने का तरीका है कि वे भले ही समाज हित के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दें, लेकिन प्रशासन वही करेगा जो कि उसके स्वयं के हित में है।

इस आदेश का अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हड़ताल की वजह से जहां अन्य जूनियर डॉक्टर्स को 15 दिनों के लिए निलंबित किया गया है, वहीं डॉ. राय के अनुसार उन्होंने हड़ताल की अवधि में भी ओपीडी और इमरजेंसी विभाग में अपनी सेवाएं दी थी। इसके बावजूद सूत्रों का कहना है कि उन्हें 'बेहतरीÓ के लिए बर्खास्त किया गया है। सवाल उठता है कि यह किसकी बेहतरी के लिए किया गया है? हड़ताल के दौरान भी अपना काम करना क्या 'बेहतरीÓ की श्रेणी में नहीं आता? दरअसल बात बहुत दूर तक जा रही है। एक ओर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली तो चर्चा में थी ही, वहीं दूसरी ओर मई में प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा चार बहुराष्ट्रीय दवाई कंपनियों  नोवारिटस, बीएमएस, इलिलिली और फाइजर के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ बैठक में भारतीय दवाई निर्माताओं का मानना है कि देश में निर्मित 'जेनेरिकÓ दवाइयों के कारण भारत व तीसरी दुनिया के देशों और कुछ हद तक विकसित देशों में भी दवाई की कीमतें काबू में रहती हैं। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात मान ली जाती है, तो आम आदमी को जीवनरक्षक दवाइयों के लिए काफी अधिक मूल्य देना होगा।

इसी दौरान मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर के लिए सरकारी तौर पर चंदा इक_ा करना भी गंभीर मामला है। कहा जा रहा है कि पिछले वर्ष तत्कालीन कलेक्टर ने 'मनोकामना अभिषेक योजनाÓ के माध्यम से 4.5 करोड़ रुपये इक_े किए थे और इस बार तो जिलेभर में 'मनोकामना अभिषेक वर्ष 2010Ó समारोहित कर पांच करोड़ रुपये इक_े करने की योजना है। इस हेतु सरकारी अधिकारियों को नोडल ऑफिसर नियुक्त कर दिया गया है और रसीद कट्टे छपवाकर 'टारगेटÓ तय कर वितरित कर दिए गए हैं।

सरसरी तौर पर देखने में उक्त दोनों मामलों में कोई समानता नजर नहीं आएगी, परन्तु गहराई से देखने पर समझ में आता है कि दोनों मामलों में शासन-प्रशासन अपनी तरह से मूल्य व मानक तय कर रहा है। 'व्हिसल ब्लोअरÓ बिल को अभी कैबिनेट से ही सहमति मिली है, अतएव प्रशासन में रहकर भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की अभी खैर नहीं है। इस अधिनियम के अभाव में सूचना का अधिकार कानून को लेकर अमित जेठवा जैसे भ्रष्टाचार उजागर करने वालों का हश्र हम देख चुके हैं।

सरकारें भी चाहती हैं कि व्हिसल ब्लोअर अधिनियम पारित होने से पहले जितनी 'सफाईÓ संभव हो कर ली जाए परन्तु यह विध्वंसकारी परिपाटी है जिससे सार्वजनिक क्षेत्र को बचाया जाना चाहिए। दहशत फैलाने की कोशिशों के समक्ष चुप बैठना भी समझदारी नहीं है।


चिन्मय मिश्र  सामाजिक कार्यकर्ता  हैं.
पत्रिका : २३ अगस्त २०१०

अफसर की सनक

भुवनेश जैन

मध्यप्रदेश के मंदसौर शहर में एक अजीब खेल चल रहा है। यहां सरकारी अफसर बाकायदा 'लक्ष्यÓ तय कर एक मंदिर के लिए चंदा उगाही कर रहे हैं। सरकार के किसी भी दफ्तर में कलेक्टर कार्यालय से लेकर ग्राम पंचायत में किसी को कोई भी काम करवाना हो तो पहले चंदे की रसीद कटवाए, फिर फाइल आगे चलेगी। हर सरकारी दफ्तर को उसके स्तर के अनुरूप लक्ष्य दिए गए हैं।
यूं तो पूरे देश में समाजकंटक चंदे के नाम पर अवैध उगाही करते मिल जाएंगे, पर मध्यप्रदेश इस बीमारी से ज्यादा ही ग्रस्त है। कभी कलश यात्रा के नाम पर, कभी भंडारे के नाम पर तो कभी भजन-कीर्तन के नाम पर आए दिन चंदेबाजों के गिरोह रसीदें लेकर वसूली के लिए पहुंच जाते हैं, लेकिन जब सरकारी अफसर चंदा वसूली में जुट जाएं तो औरों को कौन रोकेगा?

मंदसौर में पशुपतिनाथ मंदिर के कलेक्टर प्रशासक हैं और एसडीएम सचिव। मंदिर में मनोकामना अभिषेक के नाम पर चंदा उगाही हो रही है। बाकायदा ११०० व २१०० रुपए की रसीदें छपवाई गई हैं। हद तो यह है कि पांच करोड़ रुपए इकटï्ठा करने का लक्ष्य पूरा हो, इसके लिए चार विकासखंडों में नोडल अफसर बनाए गए हैं। एक तरह से उन्हें यह भी सुनिश्चित करना है कि कहीं किसी का काम बिना चंदा दिए न हो जाए। सवाल यह उठता है कि अगर सरकारी अफसर मंदिर के नवनिर्माण के लिए चंदा उगाह रहे हैं तो क्या उन्होंने राज्य सरकार को प्रस्ताव भेज इसकी अनुमति ली है? पूरे प्रदेश में यदि इसी तरह अफसरों को चंदा वसूली की छूट दे दी गई तो कैसी अराजकता होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। सरकारी दफ्तरों में तो आदमी अपनी तकलीफें लेकर ही जाता है, चाहे वह ब्लॉक का ऑफिस हो या कलेक्टर का। ऐसे पीडि़त से जबरन चंदा वसूली करना अमानवीय ही है।

धर्मस्थलों के निर्माण के लिए श्रद्धालु अपनी श्रद्धा से योगदान देते हैं। जबरन वसूली जहां होती है, वहां श्रद्धा तो हो ही नहीं सकती। यह तो धर्मस्थल है, यदि किसी अधिकारी को सनक चढ़े कि वह शहर में होटल या मॉल बनवाने के लिए चंदा उगाहेगा, तो क्या उसे छूट दी जाएगी। इस चंदा वसूली में एक तरफ जनता की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उस पर जबरन ऐसे 'करÓ का भार डाल दिया गया है, जिसका एक धेला भी सरकारी खजाने में जमा नहीं होगा।

आश्चर्य की बात यह है कि इस चंदा वसूली को लेकर जनप्रतिनिधि भी मौन हैं। अब तक ढाई करोड़ रुपए इकट्ठा किए जा चुके हैं। क्या जनता की नब्ज पर हाथ रखने वालों को उसकी चीख नहीं सुनाई देती? तो क्या फिर यह माना जाए कि इस चंदा वसूली के पीछे उनके भी स्वार्थ हैं। भ्रष्टाचार का यह एक अनूठा उदाहरण है, जिसमें सरकारी अफसरों की छत्रछाया में जनता से ऐसी वसूली की जा रही है, जिसका हिसाब पूछने वाला कोई नहीं है। अवैध वसूली में राजनीतिज्ञों और अफसरों के गठजोड़ का यह नया उदाहरण है। राज्य सरकार भी चुप है तो यह या तो उसके सूचना तंत्र की कमजोरी है या उसकी मौन स्वीकृति से यह उगाही हो रही है।




भुवनेशजी जैन पत्रिका के समूह संपादक हैं.
पत्रिका : २३ अगस्त २०१०

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

अफसर-दलाल ने मिलकर की फर्जी रजिस्ट्रियां

- जस्टिस झा आयोग के सामने खुली पोल

 
नर्मदा घाटी बने सरदार सरोवर बांध के संबंध में मप्र सरकार द्वारा विस्थापितों को दिए गए पुनर्वास पैकेज में हुए कथित भ्रष्टाचार और फर्जी रजिस्ट्री मामले में अफसरों और दलालों की मिली भगत उजागर हो रही है। न्यायमूर्ति एसएस झा आयोग के समक्ष आयोजित सुनवाई में दो पुनर्वास अफसरों द्वारा गरीब आदिवासियों को ठगे जाने का मामले सामने आए। फर्जीवाड़े के शिकार प्रभावितों ने बयानों और लिखित कथनों में इसकी पुष्टि की। नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक जनहित याचिका पर सरदार सरोवर बांध प्रभावितों की फर्जी रजिस्ट्रियों और पुनर्वास स्थलों पर हुए भ्रष्टाचार की जाँच के लिए हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एसएस झा की अध्यक्षता में एक सदस्यी आयोग गठित किया है। आयोग 2 अगस्त से इंदौर में है।

जमीन साढ़े तीन एकड़, भुगतान पांच का
ग्राम कोठड़ा (निसरपुर) के राधेश्याम-पन्नालाल ने आयोग को बताया जब वे जमीन के बारे में पुनर्वास अधिकारी जुवानसिंह बघेल से मिले तो उन्होंने निसरपुर के शकील और अनोखी राठौर दलालों के पास भेज दिया। दलालों ने उनसे 2 लाख रूपए वसूले और फर्जी रजिस्ट्री पकड़ा दी। रजिस्ट्री साढ़े तीन एकड़ की है, लेकिन बघेल ने भुगतान पूरे पांच एकड़ का कर दिया। मलवाड़ी (निसरपुर) के रतनसिंह-रूखडिय़ा ने फर्जीवाड़े में पुनर्वास अधिकारी बघेल के साथ पुनर्वास कार्यालय के बाबू चैतराम पाठक को भी शामिल बताया।

साढ़े पांच लाख के बजाए 40 हजार पकड़ाए
ग्राम खापरखेड़ा (कड़माल) के  मुकेश राधेश्याम ने बताया शकील और अनोखी दलाल उन्हें पुनर्वास कार्यालय कुक्षी में मिले। वहीं पुनर्वास अधिकारी  बघेल और आरके माहेश्वरी से बात कर बताया कि वे जमीन दिलवा देंगे। फर्जी रजिस्ट्री के बाद अफसर ने मुकेश के मुआवजे का चेक भी दलालों को ही दे दिया। दलालों ने मुकेश से 1.35 लाख वसूले। खापरखेड़ा के ही बुदन-सात्या ने बताया शकील और अनोखी दलाल ने उसका मुआवजा पुनर्वास कार्यालय से मिलकर निकाला तथा उन्हें मात्र 40 हजार दिए जबकि प्रति प्रभावित साढ़े पाँच लाख का भुगतान किया जाता है। 

षडयंत्र में पटवारी तक शामिल
ग्राम चिखल्दा के  शफी मोहम्मद पीरबक्ष ने बताया वे दलाल शकील और अनोखी तथा पीपरी (बागली) के पटवारी मेहताबसिंह भार्गव के षडयंत्र के शिकार हुए हैं। दलालों ने उनके दो पुत्रों की फर्जी रजिस्ट्री करवाकर उनसे ढाई लाख लूटे। ग्राम मलवाड़ी (निसरपुर) के राजकुमार गोमा और रतनसिंह रूखडिय़ा तथा निसरपुर के जगदीश औंकार ने दलालों के रूप में नारायण-रतनसिंह (भीलसुर) और खेतिया अमरा (मलवाड़ी) का नाम लिया। धरमराय के दीपक पन्नालाल ने लक्ष्मण दलाल (नवादपुरा) और निसरपुर के रूखडिय़ा-मुरार ने शकील एवं अनोखी का नाम बताया। 

News in Patrika on 13th August 2010