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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

कैलाश को नहीं मिला कवच

- सुगनीदेवी मामले में लोकायुक्त पुलिस की कोशिश नाकाम
- अंतिम चालान के लिए विशेष कोर्ट ने तय की चार महीने की सीमा
- लोकायुक्त के सारे दावे सिरे से खारिज


लोकायुक्त पुलिस 100 करोड के सुगनीदेवी जमीन घोटाले में आरोपी क्रमांक दो यानी कैलाश विजयवर्गीय को समय कवच पहनाने में नाकामयाब हो गई है। विशेष कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें जांच के लिए समय सीमा की आड़ ली गई थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिया है कि सुगनीदेवी जमीन मामले में अंतिम चालान 21 फरवरी 2011 तक कोर्ट में पेश किया जाए।
विशेष न्यायाधीश एसके रघवुंशी बुधवार को एक अहम फैसले में कहा कि लोकायुक्त पुलिस को एक नियत समय सीमा में काम करने का आदेश देना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है। सीकरी वासु विरुद्ध उप्र सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2008 में दिए फैसले का दृष्टांत देते हुए कोर्ट ने लिखा है कि यदि पुलिस ठीक ढंग से जांच नहीं करे तो समय सीमा तय करने के साथ ही कोर्ट जांच की निगरानी भी कर सकता है।

मामले में लोकायुक्त के विशेष अभियोजक एलएस कदम ने 21 सितंबर को तर्क दिया था कि जांच की समय सीमा तय करना विशेष न्यायाधीश के अधिकार में नहीं आता है। इसी पर परिवादी सुरेश सेठ ने 6 अक्टूबर को करीब 300 पेज का जवाब कोर्ट के पटल पर रखा था। उन्होंने लोकायुक्त पुलिस की अर्जी के छहों न्यायिक दृष्टांतों की भी तार्किक तरीके से धज्जियां उड़ाई थीं।

सुरेश सेठ को न्यायिक कवच

विशेष कोर्ट ने बुधवार को फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया कि एफआईआर दर्ज होने और चालान पेश होने के बीच फरियादी सुरेश सेठ को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। लोकायुक्त पुलिस ने कहा था कि एफआईआर के बाद मामला जांच एजेंसी व कोर्ट के बीच सिमट जाता है इसलिए फरियादी को कोर्ट में आने का अधिकार नहीं है।

जांच एजेंसियों के लिए ऐतिहासिक सबक
कानूनी जानकारों का मानना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की पड़ताल करने वाली ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, सीआईडी जैसी जांच एजेंसियों के लिए विशेष कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक सबक जैसा है। अब तक जांच एजेंसियां एफआईआर दर्ज करके मामले को ठंडे बस्ते में डालने की आदी रही है। यही वजह है कि कई केस 15-15 सालों तक चालान के मुकाम तक नहीं पहुंच सके। हर बार जांच एजेंसियां यही तर्क देती है कि अनुसंधान की समय सीमा तय करने का कोर्ट को कोई अधिकार नहीं है। यही वजह है कि जांच एजेंसि

'नहीं बचेगा कैलाश' 
फैसले पर सुरेश सेठ ने प्रतिक्रिया दी है कि अब लोकायुक्त पुलिस मामले में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय को नहीं बचा सकती। अंतिम चालान में कैलाश का नाम नहीं आया तो कोर्ट स्वयं भी नाम सम्मिलित करवा सकती है।

मेंदोला सहित फंस चुके सत्रह
इस केस में लोकायुक्त पुलिस 5 अगस्त को 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और अपराधिक षड्यंत्र रचने का केस दर्ज कर चुकी है। इसमें कैलाश विजयवर्गीय के अतिरिक्त तीनों आरोपियों (विधायक रमेश मेंदोला, व्यवसायी मनीष संघवी व विजय कोठारी) की घेराबंदी की गई है। इसमें निगम अफसर सहित 14 अन्य आरोपी हैं।

हाईकोर्ट में भी मुंह की खाई
विशेष कोर्ट द्वारा लोकायुक्त पुलिस को जांच के निर्देश को विधायक रमेश मेंदोला और व्यवसायी मनीष संघवी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस एसएल कोचर व शुभदा वाघमारे ने दोनों की याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया था।

पांच पेज के फैसले के निहितार्थ
1. लोकायुक्त पुलिस ठीक से नहीं कर रही है जांच
(पेज 4 पर लिखा गया जांच एजेंसी अनावश्यक रूप से जांच में विलंब न करें)
2. सुरेश सेठ से बचना चाहती है लोकायुक्त पुलिस।
(पेज 4 व 5 पर लिखा गया है परिवादी सुरेश सेठ को कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है)
3. कोर्ट को मंजूर नहीं राजनीतिक हस्तक्षेप
(फैसले के पेज 2 पर सुरेश सेठ के तर्क को प्रमुखता देते हुए लिखा है कि प्रभावशील राजनीतिक व्यक्ति के हितों को बचाने के लिए जांच में देरी हो रही है)
                                          
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यूं निकाली लोकायुक्त पुलिस की हवा
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें उन छहों न्यायिक दृष्टांतों को खारिज किया गया है, जो लोकायुक्त पुलिस ने दिए थे।
एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
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जनता के सामने खड़े कई सवाल

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए थे। उन्होंने कोर्ट को बताया था कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा था -
1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है? 

पत्रिका २० अक्टूबर २०१०

कैलाश पर फैसला आज

- सुगनीदेवी जमीन मामले में विशेष न्यायालय देगा 'समय कवच' पर निर्णय


100 करोड के सुगनीदेवी जमीन घोटाले की शिकायत के आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की जांच की समय सीमा पर विशेष न्यायालय बुधवार को फैसला सुनाएगा। लोकायुक्त पुलिस का तर्क है कोर्ट को समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं, जबकि फरियादी सुरेश सेठ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर साबित किया है कि लोकायुक्त जैसी जांच संस्थाओं के लिए भी समय की बाध्यता होती है। 

केस में पिछली सुनवाई 6 अक्टूबर को हुई थी। तब विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने दोनों पक्षों के तर्क सुनकर फैसला 20 अक्टूबर तक के लिए सुरक्षित रखा था। पिछली सुनवाई में शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के तर्कों की सिलसिलेवार धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट को बताया विजयवर्गीय को बचाने के लिए ही लोकायुक्त पुलिस ने 21 सितंबर को कोर्ट में अर्जी दी थी कि जांच की समय सीमा तय नहीं की जाए। वैसे 21 सितंबर को लोकायुक्त पुलिस को कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु ïविशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। 

'लोकायुक्त पुलिस की भूमिका संदिग्ध'
सुरेश सेठ ने कोर्ट को लिखित में दिया है लोकायुक्त पुलिस मप्र के मंत्री (कैलाश विजयवर्गीय) के दबाव में आकर संदिग्ध भूमिका निभा रही है। विजयवर्गीय इस प्रकरण में न केवल संलिप्त हैं, बल्कि सार्वजनिक घोषणाओं में भी वे यह मंजूर कर चुके हैं। पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने 28 अगस्त 2010 को नंदानगर साख संस्था की विशेष साधारण सभा में विवादित जमीन पर कॉलेज बनाने की घोषणा भी कर दी है।

'हाईकोर्ट ने भी तो तय की समय सीमा'   
सेठ ने बताया अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन सक्सेना के खिलाफ हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को छह माह में जांच करने के निर्देश दिए हैं। उस केस में और मेरे केस में कोई मौलिक अंतर नहीं है। वहां याचिकाककर्ता ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, यहां विशेष न्यायालय में लगाई गई।                                                   
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यूं निकाली लोकायुक्त पुलिस की हवा
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें उन छहों न्यायिक दृष्टांतों को खारिज किया गया है, जो लोकायुक्त पुलिस ने दिए थे।
एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
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जनता के सामने खड़े कई सवाल

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा है-
1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है?

पत्रिका १९ अक्टूबर २०१०

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

स'चाई छुप नहीं सकती बनावट के असूलों से

 सुगनीदेवी जमीन मामले में लोकायुक्त पुलिस के तर्कों की सुरेश सेठ ने उड़ाई धज्जियां
 विशेष न्यायालय ने सुरक्षित रखा फैसला
  कैलाश को  समय कवच  मिलेगा या नहीं, 20 अक्टूबर को होगा फैसला



सुगनीदेवी जमीन घोटाले की शिकायत के आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के बारे में लोकायुक्त पुलिस द्वारा कोई टिप्पणी नहीं किए जाने का मामला बुधवार को विशेष न्यायालय में गूंजा। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के सभी तर्कों की सिलसिलेवार धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट को बताया विजयवर्गीय को बचाने के लिए ही कोर्ट में अर्जी दी गई है कि जांच की समय सीमा तय नहीं की जाए। कोर्ट ने बेहद गंभीरता से करीब पौन घंटे तक सेठ की बात सुनी और मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया। अब 20 अक्टूबर को पता चलेगा कि लोकायुक्त पुलिस को जांच की समय सीमा में बांधना विशेष न्यायालय के दायरे में आता है या नहीं। सेठ ने मीडिया से चर्चा में कहा बनावट के असूलों से स'चाई को छुपाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वह छुप नहीं सकती है।

केस की पिछली सुनवाई (21 सितंबर) पर लोकायुक्त पुलिस को कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु ïकोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर ही बुधवार को विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में बहस हुई। लोकायुक्त की ओर से विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अपनी बात दोहराई। सुरेश सेठ ने कहा अभी तो एफआईआर ही अधूरी है क्योंकि आरोपी क्रमांक दो के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। छह अगस्त को लोकायुक्त पुलिस भी मान चुकी है कि अभी एफआईआर में और नाम जोड़े जा सकते हैं, फिर समय सीमा का बंधन क्यों नहीं लगाया जाए। दोनों पक्षों की राय सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया, जो 20 अक्टूबर को जारी होगा। बहस के दौरान कोर्ट ने सेठ को कहा आपको मेरा फैसला मंजूर न हो, तो आप हाईकोर्ट भी जा सकते हैं।

'हमने कैलाश को नहीं छोड़ा
कदम ने कोर्ट को बताया लोकायुक्त पुलिस ने अभी विजयवर्गीय को छोड़ा नहीं है। जांच जारी है और अंतिम जांच प्रतिवेदन में सबको पता चल जाएगा कि किसने भ्रष्टाचार किया है और किसने आपराधिक षडयंत्र। सेठ ने जब जोर देकर पूछा कि जांच में कितना समय लगेगा, तो कदम बोले कम से कम एक साल तो लग ही जाएगा।


 हाईकोर्ट ने भी तो तय की समय सीमा     
'पत्रिकाÓ के 5 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित खबर 'हाईकोर्ट ने तय की लोकायुक्त जांच की अवधिÓ का हवाला देते हुए सेठ ने कोर्ट को बताया अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन सक्सेना के खिलाफ हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को छह माह में जांच करने के निर्देश दिए हैं। उस केस में और मेरे केस में कोई मौलिक अंतर नहीं है। वहां याचिकाककर्ता ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, यहां विशेष न्यायालय में लगाई गई।                                                                                                                                                                              


 लोकायुक्त पुलिस की भूमिका संदिग्ध
- सुगनीदेवी जमीन केस में विशेष न्यायालय के समक्ष सुरेश सेठ का लिखित बयान

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने कोर्ट को लिखित में दिया है कि मप्र के मंत्री (कैलाश विजयवर्गीय) के दबाव में आकर लोकायुक्त पुलिस संदिग्ध भूमिका निभा रही है। सुगनीदेवी जमीन मामले में विजयवर्गीय न केवल संलिप्त हैं, बल्कि सार्वजनिक घोषणाओं में भी वे खुद को इसमें शामिल होने की मंजूरी दे चुके हैं। पद का दुरुपयोग करते हुए विजयवर्गीय ने 28 अगस्त 2010 को नंदानगर साख संस्था की विशेष साधारण सभा में विवादित जमीन पर कॉलेज बनाने की घोषणा भी कर दी है।


जनता के सामने खड़े हो गए कई सवाल : सुरेश सेठ

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा है-

1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है?
6. मामले से परिवादी को दूर करने की कोशिश क्या यह साबित नहीं करती कि विशेष लोक अभियोजक अपने पद का दुरुपयोग करके आरोपी नेताओं, सरकार और अपने वरिष्ठ अधिकारियों की तरफदारी कर रहे हैं?
7. अनुसंधान के नाम पर एक बार मामले को टाल देने से अंतिम जांच प्रतिवेदन पेश करने की तारीख 5-10 वर्ष खींच जाएगी। तब अभियोग पत्र प्रस्तुत करना गैर प्रासंगित हो जाएगा?
 

लोकायुक्त पुलिस के छहों न्यायिक दृष्टांतों को चुनौती
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें लोकायुक्त पुलिस के तर्कों को एक सिरे से खारिज किया गया है। लोकायुक्त पुलिस ने छह न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर कोर्ट को बताया था कि इस कोर्ट को जांच की समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं है। सेठ ने इन दृष्टांतों को तार्किक तरीके से खारिज किया।

एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
 

पत्रिका : ०७ अक्टूबर २०१०

लोकायुक्त को मिलेगा 300 पेज का जवाब

- कैलाश को  समय कवच  से सुरक्षित रखने के कदम पर सुरेश सेठ की पुख्ता तैयारी
- सुगनीदेवी केस पर अधूरी एफआईआर पर विशेष न्यायालय में बहस आज


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन में हुए 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस के लिए कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने 300 पेज का जवाब तैयार कर लिया है। यह जवाब बुधवार को विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा। उधर, लोकायुक्त पुलिस का जोर मामले में दर्ज अपनी अधूरी एफआईआर को अंतिम साबित करने पर रहेगा।

केस में पिछली सुनवाई 21 सितंबर को हुई थी, तब लोकायुक्त पुलिस को मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) के भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु लोकायुक्त के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर बहस के लिए कोर्ट ने 6 अक्टूबर मुकर्रर किया था।

 सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है, समय सीमा तय हो

सुरेश सेठ ने 'पत्रिकाÓ को बताया मैंने जवाब में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के करीब एक दर्जन न्यायिक दृष्टांत दिए हैं। सभी कोर्टें चाहती हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में समय सीमा में जांच पूरी हो जाए। सोमवार को मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसआर आलम एवं ïआलोक अराधे की युगलपीठ ने अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) आरएन सक्सेना पर भ्रष्टाचार के आरोप से जुड़े केस में लोकायुक्त पुलिस छह महीने में जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं। 

मेंदोला-संघवी की याचिका में छुपा संदेश
सेठ ने बताया इंदौर हाईकोर्ट में जिस तरह से मामले में फंस चुके रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की याचिका खारिज की है, उसका संदेश साफ है कि जांच प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है। लोकायुक्त समय पर जांच पूरी नहीं कर पाए तो उसे साफ इंकार कर देना चाहिए। मैंने तो हाईकोर्ट में भी सीबीआई जांच की मांग उठाई थी।

'मुझे दूर करना संभव नहींÓ
पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस ने तर्क दिया था कि एफआईआर रजिस्टर होने के बाद जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश नहीं हो जाती, तब तक केस कोर्ट व पुलिस के बीच ही रहता है। परिवादी इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है। परिवादी सेठ को कोर्ट के समक्ष उपस्थिति होने का अधिकार भी नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए सेठ कहते हैं जांच प्रक्रिया से शिकायतकर्ता को दूर करने की कोशिश शंका को जन्म देती है। 

हकीकत की कसौटी पर कितने खरे लोकायुक्त पुलिस के तर्क ?


तर्क एक
घटना अवधि 20 वर्ष की है और इसके लिए विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाए जाना है। इसमें वक्त लगेगा।
कसौटी
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज चार के मुताबिक सभी संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है कि फिर लोकायुक्त पुलिस और कौन से कागज चाहती है?

तर्क दो
विभिन्न साक्षियों के विस्तृत कथन लिपिबद्ध किए जाना है। इसमें अधिक समय लगना स्वाभाविक है।
कसौटी
एफआईआर के पेज पांच के मुताबिक मौजूदा और पूर्व निगमायुक्त से लेकर सभी प्रमुख संबंधित अफसरों और लोगों से बयान लिए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है ऐसे कौन लोग शेष हैं, जिनसे लोकायुक्त पुलिस बात करना चाहती है?

तर्क तीन
दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने का जिक्र नहीं किया गया है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अंतिम जांच रिपोर्ट करने के लिए स्वयं कोर्ट से चार महीने का समय मांगा था। परिवादी सुरेश सेठ की आपत्ति पर डेढ़ महीने की समयसीमा तय हुई थी। अब सवाल है कि उस दिन ïदंड प्रक्रिया संहिता क्यों याद नहीं आई?

तर्क चार
एफआईआर दर्ज होने के बाद अनुसंधान की प्रक्रिया में परिवादी हिस्सा नहीं ले सकता है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि जो एफआईआर दर्ज की गई है, वह अधूरी है। आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) की भूमिका की पड़ताल के लिए अगली तारीख नियत कर दी जाए। अब सवाल है कि प्रारंभिक जांच में जब एक आरोपी की भूमिका को लेकर पड़ताल ही नहीं की गई तो परिवादी को प्रक्रिया से दूर कैसे किया जा सकता है?

पत्रिका : ०६ अक्टूबर २०१०

हाईकोर्ट ने मेंदोला को नहीं मिली राहत

- सुगनीदेवी केस की जांच प्रक्रिया को सही ठहराया 
- मनीष संघवी, रमेश ने दी थी विशेष न्यायाधीश के आदेश को चुनौती


परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स संचालक मनीष संघवी ने ये याचिकाएं दायर की थीं। हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के उस कदम को न्यायिक तौर पर सही माना जिसमें कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश दिए गए थे।

इंदौर बैंच के जस्टिस एसएल कोचर और शुभदा वाघमारे की युगलपीठ ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए टिप्पणी की है विशेष न्यायाधीश को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का इस्तेमाल करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है और इसी के आधार पर जांच शुरू की गई है। कोर्ट उन सभी न्यायिक दृष्टांतों का भी खारिज कर दिया जिनके आधार पर विशेष न्यायाधीश की शक्तियों को कटघरे में खड़ा किया गया था। मेंदोला के पैरवीकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता एके सेठी और राहुल सेठी ने फैसले की पुष्टि की है। संघवी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रोहित आर्या और अमित अग्रवाल ने जबकि लोकायुक्त की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एलएन सोनी ने पैरवी की थी।

एमिकस क्यूरी की अहम रिपोर्ट

इस केस में कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश देसाई को एमिकस क्यूरी (केस में कोर्ट के सलाहकार) घोषित किया था। उनकी रिपोर्ट में निचली अदालत की कार्रवाई को सही ठहराया गया था।

उठी थी सीबीआई जांच की मांग
केस पर 19 अगस्त को अंतिम बहस हुई थी। तब सुरेश सेठ ने तर्क दिया था कि लोकायुक्त पुलिस की जांच प्रक्रिया बेहद धीमी है इसलिए जांच का कार्य सीबीआई को सौंप दी जाए। सुनवाई के दौरान ही हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अपराध तो हुआ है और केवल प्रक्रिया का हवाला देकर अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने जीरो कायमी जिक्र करते हुए कहा था सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोई भी व्यक्ति थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कर सकता है। पहले वह जीरो नंबर पर कायम होती है और बाद में जिस क्षेत्र से संबंध होती है, वहां उसे भेजा जा सकता है। इस केस में लोकायुक्त पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। अब उसे शिफ्ट किया जा सकता है, खत्म तो नहीं किया जा सकता।


मेंदोला-संघवी समेत 17 आरोपी
लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को मेंदोला और संघवी समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज किया है। इसकी अगली पड़ताल सोमवार को ही विधिवत शुरू हुई। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस को मय दस्तावेज बयाद दिए हैं। सभी 17 पर आरोप है कि इन्होंने षडय़ंत्र करके निगम से लीज पर ली गई जमीन को धनलक्ष्मी केमिकल्स से नंदानगर साख संस्था को बिकवाया और इससे शासन को करीब पौने तीन करोड़ के राजस्व की चपत लगी।

कल विशेष अदालत में सुनवाई
सुगनीदेवी केस में 6 अक्टूबर को विशेष न्यायालय में सुनवाई होना है। पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस को अंतिम जांच रिपोर्ट पेश करना थी, किंतु उसने तर्क दिया कि हमारे लिए जांच की समय सीमा तय नहीं की जा सकी है। सेठ की आपत्ति पर अब इस पर बहस होना है। ज्ञात रहे मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) को लेकर अब तक लोकायुक्त पुलिस ने कोई टिप्पणी नहीं की है।



मेंदोला-संघवी के सारे तर्क नामंजूर
- सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक दृष्टांतों का आधार लेना गलत
- सुगनीदेवी केस पर हाईकोर्ट में खारिज हुई याचिकाएं


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में विशेष न्यायाधीश द्वारा लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश देने को चुनौती देने के लिए लगाई याचिकाओं के तर्कों को हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के जिन न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया गया था, हाईकोर्ट ने उन्हें इस केस से संबद्ध नहीं माना।
 मेंदोला व संघवी की ओर से कई न्यायिक दृष्टांत दिए गए थे, किंतु कोर्ट ने उन्हें वाजिब नहीं माना। उधर, सुरेश सेठ ने 284 पेज का एक जवाब पेश किया था। उनके जवाब में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के 21 न्यायिक दृष्टांत थे। ये सभी दृष्टांत मेंदोला और संघवी की याचिकाओं के तर्कों को चुनौती देते थे। कोर्ट द्वारा मेंदोला-संघवी की याचिकाएं खारिज करने से साफ है कि सेठ के तर्कों से कोर्ट सहमत हुई।

 विधायक रमेश मेंदोला की याचिका के आधार

1. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग मजिस्ट्रेट कर सकता है, विशेष न्यायाधीश नहीं।
2. विशेष न्यायाधीश मप्र विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) कानून 1947 एवं मप्र लोकायुक्त कानून के अधीन है। वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत मजिस्ट्रेट नहीं है।
3. विशेष न्यायाधीश द्वारा सीआरपीसी की धारा 190 के तहत कार्रवाई नहीं की।
4. मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून की धारा 4 के तहत कोई भी अनुसंधान कार्य पर सुपरइनटेंडेंस लोकायुक्त की रहती है, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
5. शिकायतकर्ता ने कभी भी लोकायुक्त अथवा एसपीई लेाकायुक्त को शिकायत दर्ज नहीं करवाई, इसलिए विशेष न्यायाधीश द्वारा धारा 153(3) के तहत जांच के आदेश देना त्रूटिपूर्ण है।
6. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी फौजदारी परिवाद के तहत परिवादी के बयान दर्ज नहीं किए और न ही धारा 202 के तहत कोई कार्रवाई की।
7. आरोपी की सुनवाई का अवसर दिए बगैर सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
8. सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत आदेश पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंनचार्ज को ही दिया जा सकता है। एसपीई लोकायुक्त इंदौर इस श्रेणी में नहीं आते।
9. सीआरपीसी की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग तभी किया जा सकता है, जबकि संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया गया हो।
10. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून के प्रावधानों के विपरीत है, क्योंकि इस अधिनियम में रा'य सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है। 


मनीष संघवी की याचिका के आधार
1. याचिकाकर्ता लोक सेवक नहीं है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत एसपीई लोकायुक्त को जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
2. मप्र लोकायुक्त और उपलोकायुक्त नियम 1981 की धारा 8 (सी) के तहत पांच वर्ष से पुराने मामलों पर जांच का प्रतिबंध लगाया गया है।
3. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया।
4. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम 1981 की धारा 7 के प्रावधानों का उल्लंघन है।


सुरेश सेठ के जवाब
1. तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला ने महापौर कैलाश विजयवर्गीय की मौन सहमति के साथ पद का दुरुपयोग करते हुए धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी से आपराधिक षडय़ंत्र रचकर सरकारी जमीन की खरीदी-बिक्री की। इससे निगम और सरकार को करोड़ों की राजस्व हानि हुई।
2. वर्तमान में पुलिस अनुसंधान जारी है, इसलिए दोनों याचिकाएं अपरिपक्व हैं।
3. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (ई) के तहत एसपी स्तर के अधिकारी को जांच का आदेश देने का अधिकार है।
4. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश को संज्ञान लेने का पूर्ण अधिकार है और इससे सेशन न्यायालय के साथ मजिस्ट्रेट की शक्तियों का समावेश हो गया है।
5. सीआरपीसी की धारा 153 (3) के तहत जांच के आदेश जारी करने से पहले अभियुक्त को सुनवाई को अवसर देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
पत्रिका : ०५ अक्टूबर २०१०

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

लोकायुक्त पुलिस ने ओढ़ा समयसीमा का कवच

- सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ की जमीन के घोटाले का केस 
- कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर विशेष न्यायालय में पेश नहीं की अंतिम रिपोर्ट
- शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लगाया लोकायुक्त-कैलाश की मिलीभगत का आरोप


परदेशीपुरा चौराहा स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन में हुए 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस ने 'समयसीमाÓ का कवच धारण कर लिया है। इस बहुचर्चित मामले में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को लेकर मंगलवार को अंतिम जांच रिपोर्ट पेश करने के बजाए लोकायुक्त पुलिस ने विशेष न्यायाधीश के आदेश को ही चुनौती दे डाली। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के आठ न्यायिक दृष्टांतों का जिक्र करते हुए कहा कि इस कोर्ट को जांच की समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं है। हम जब तक चाहेंगे, जांच करेंगे। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने इसे लोकायुक्त व कैलाश की मिलीभगत बताया। लोकायुक्त पुलिस के तर्क पर बहस के लिए कोर्ट ने 6 अक्टूबर की तारीख तय की। ï

इस केस में पुलिस ने 5 अगस्त को मेंदोला समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक षडय़ंत्र का केस दर्ज किया था। विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने 6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिया था कि 21 सितंबर तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश कर बताएं कि क्या आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) की इस मामले में क्या भूमिका है। मंगलवार प्रात: 11.20 बजे लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट के समक्ष चार पेज का एक जवाब पेश किया। इसमें कहा गया कि घटना अवधि 20 वर्ष की है और केस की विवेचना के लिए विभिन्न विभागों से मूल दस्तावेज जब्त या प्राप्त किए जाना है। इसमें अधिक समय लगेगा। दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। इस पर कोर्ट में करीब एक घंटेतक कदम और सेठ के बीच जिरह हुई।
सुरेश सेठ को नहीं सुना जाए
जवाब से यह भी स्पष्ट होता है कि लोकायुक्त पुलिस शिकायतकर्ता सुरेश सेठ के तर्कों के आगे निरुत्तर हो रही है। जवाब के पेज चार पर लिखा गया है एफआईआर रजिस्टर होने के बाद जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश नहीं हो जाती, तब तक केस कोर्ट व पुलिस के बीच ही रहता है। परिवादी इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है। परिवादी सेठ को कोर्ट के समक्ष उपस्थिति होने का अधिकार भी नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने इस जवाब को तवज्जो नहीं देते हुए परिवादी सुरेश सेठ के आग्रह को मंजूर किया और 15 दिन बाद सुनवाई की तारीख नियत कर दी। 

जानें...कितने सटीक हैं लोकायुक्त पुलिस के तर्क

पत्रिका पड़ताल

तर्क एक
घटना अवधि 20 वर्ष की है और इसके लिए विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाए जाना है। इसमें वक्त लगेगा।
वास्तविकता
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज चार पर लोकायुक्त एसपी वीरेंद्रसिंह ने लिखा है मेरे द्वारा नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग मंत्रालय भोपाल से तीन एकड़ जमीन से जुड़ी पत्रावली, नोटशीट की प्रमाणित जानकारी, नगरनिगम इंदौर से भूमि की लीज डीड की मूल नस्ती, भूल लीज डीड, परिवाद से जुड़े एमआईसी संकल्प, प्रस्तावों की प्रमाणित जानकारी, संबंधित नोटशीट्स एवं पत्रावली की जानकारी जुटाई जा चुकी है। एसपी ने रजिस्ट्रार इंदौर, सहकारिता विभाग इंदौर, नंदानगर साख संस्था इंदौर से दस्तावेज जुटाने का जिक्र भी किया है।
उठता सवाल
यदि ये दस्तावेज जुटा लिए गए हैं, तो फिर लोकायुक्त पुलिस और क्या कागज लेना चाहती है?

तर्क दो
विभिन्न साक्षियों के विस्तृत कथन लिपिबद्ध किए जाना है। इसमें अधिक समय लगना स्वाभाविक है।
वास्तविकता
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज पांच पर लोकायुक्त एसपी वीरेंद्रसिंह ने लिखा है शिकायतकर्ता सुरेश सेठ, तत्कालीन निगमायुक्त संजय शुक्ल, विनोद शर्मा, आकाश त्रिपाठी, निगमायुक्त सीबी सिंह, तत्कालीन भवन अधिकारी ज्ञानेंद्रसिंह जादौन, तत्कालीन निगम सचिव बंशीलाल जोशी, जिला पंजीयक मोहनलाल श्रीवास्तव, भू-अभिलेख अधीक्षक शिवप्रसाद मंडरा, टीएंडसीपी विजय सावलकर,  नंदानगर साख संस्था मैनेजर प्रवीण कंपलीकर, सहकारिता उपायुक्त महेंद्र दीक्षित, उप सचिव मप्र शासन नरेश पाल, निगम सचिव रणबीरकुमार और धनलक्ष्मी केमिकल्स के नाम पर नक्शा पास करवाने वाले मनीष तांबी के बयान लिपिबद्ध किए जा चुके हैं।
उठता सवाल
वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर धनलक्ष्मी केमिकल्स व नंदानगर साख संस्था से जुड़े लोगों तक बयान लिए जा चुके हैं, तो फिर ऐसे कौन लोग शेष रह गए हैं, जिनसे लोकायुक्त पुलिस बात करना चाहती है?

तर्क तीन
दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने का जिक्र नहीं किया गया है।
वास्तविकता
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अंतिम जांच रिपोर्ट करने के लिए स्वयं कोर्ट से चार महीने का समय मांगा था। इस पर परिवादी सुरेश सेठ ने यह कहकर आपत्ति उठाई थी कि तब तक तो विशेष न्यायाधीश का तबादला करवा दिया जाएगा। इतना अधिक समय देने की आवश्यकता नहीं है। बाद में कदम ने ही कोर्ट में मंजूर कर लिया था कि डेढ़ महीने में हम अंतिम रिपोर्ट सौंप देंगे। कदम के साथ उस दिन लोकायुक्त डीएसपी अशोक सोलंकी भी कोर्ट में मौजूद थे।
उठता सवाल
क्या विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम को उस दिन यह बात ध्यान में नहीं आई कि दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने जिक्र नहीं किया गया है?

तर्क चार
एफआईआर दर्ज होने के बाद अनुसंधान की प्रक्रिया में परिवादी हिस्सा नहीं ले सकता है।
वास्तविकता
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम और डीएसपी अशोक सोलंकी ने कोर्ट को बताया था कि जो एफआईआर दर्ज की गई है, वह अधूरी है। आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) की भूमिका की पड़ताल के लिए अगली तारीख नियत कर दी जाए।
उठता सवाल 
प्रारंभिक जांच में जब एक आरोपी की भूमिका को लेकर पड़ताल ही नहीं की गई तो परिवादी को प्रक्रिया से दूर करने की कोशिश करना कितना न्यायोचित है?

तर्क पांच
जिन लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया है, उनके सुसंगत साक्ष्य का संकलन एवं परीक्षण करने में अधिक समय लगेगा।
वास्तविकता
शासन को करीब पौने तीन करोड़ रुपए की चपत लगाने वाले जिन 17 लोगों के खिलाफ डेढ़ माह पहले एफआईआर दर्ज की थी, उन्हें लोकायुक्त पुलिस ने आज तक नोटिस भी नहीं भेजा है। आरोपी बनाए गए सिटी इंजीनियर हंसकुमार जैन, रिटायर्ड भवन अधिकारी अशोक बैजल और रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री नरेंद्र सुराणा ने 'पत्रिकाÓ को बताया है कि अब तक तो उन्हें यह भी पता नहीं लगा है कि उन पर आरोप क्या है?
उठता सवाल
लोकायुक्त पुलिस ने जांच को आगे ही नहीं बढ़ाया है, तो यह कैसे मान लिया जाए कि इस केस को अंजाम तक पहुंचाने में वह 'ड्यूटीÓ निभा रही है? 

क्या संभागायुक्त-आईजी को नहीं दिखा
सवा करोड़ का खर्चा
कैलाश के कार्यक्रम में मौजूद होने पर सुरेश सेठ ने विशेष न्यायाधीश के सामने उठाया सवाल नंदानगर में ताबड़तोड़ बांट दी गई थीं 20 हजार साडिय़ां

रविवार को गणेशोत्सव के दौरान नंदानगर गोल स्कूल में हुए महाआरती आयोजन में संभागायुक्त बसंतप्रताप सिंह और आईजी संजय राणा की मौजूदगी मंगलवार को सुगनीदेवी कॉलेज परिसर के जमीन घोटाले केस से जुड़ गई। कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी के समक्ष कहा कि उस आयोजन में सवा करोड़ रुपया खर्च हो रहा है और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय व विधायक रमेश मेंदोला की मौजूदगी में ताबड़तोड़ महिलाओं को 20 हजार साडिय़ां बांट दी गई। अवकाश होने के बावजूद रविवार को अचानक ये साडिय़ां कहां से आ गई? क्या दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को यह सबकुछ नहीं दिखा? 

सुरेश सेठ ने मीडिया से चर्चा में बताया कोर्ट ने इस पर आश्चर्य जाहिर किया है। दोनों अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए ही उस कार्यक्रम में बुलाया गया था। दोनों के सामने ही कैलाश-मेंदोला ने कहा यहां इतनी महिलाएं मौजूद हैं, इन्हें खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। सभी को उपहार में साडिय़ां दी जाना चाहिए। इतना कहते ही पता नहीं कहां से साडिय़ों के बक्से आ गए और महिलाओं में इन्हें बांट दिया गया। दरअसल, साडिय़ां पहले से ही वहां मौजूद थीं। इतने वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसे कार्यक्रमों से बचना चाहिए क्योंकि इससे आम लोगों का उनपर से भरोसा उठता है। बड़े अफसर भी मूकदर्शक बने रहेंगे तो भ्रष्ट ताकतों के खिलाफ आवाज उठाने वाले मेरे जैसे लोग आखिर कहां जाकर पनाह लेंगे? 

हमारी मौजूदगी में नहीं बंटे उपहार
कार्यक्रम में बुलाया था, इसलिए गए। मैं और आईजी दोनों ही साथ में थे, परंतु कुछ ही देर में वहां से चले आए थे। हमारी मौजूदगी में वहां कोई उपहार नहीं बांटे गए। संभवत: वहां वीडियो शूटिंग भी हुई है। उसके फुटेज भी देखे जा सकते हैं।
- बसंतप्रताप सिंह, संभागायुक्त

रिपोर्टिंग से कोर्ट हैरान
केस की सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश ने मीडिया के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया। बाद में जिला कोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष सुरेंद्र वर्मा ने कोर्ट से मीडियाकर्मियों को सुनवाई में मौजूद रहने का आग्रह किया। कोर्ट ने इसे मंजूर करते हुए मीडियाकर्मियों को बताया यहां की न्यायिक प्रक्रिया को एक अखबार ने ('पत्रिकाÓ नहीं) बेहद गलत तरीके से रिपोर्ट किया। यहां तक लिख दिया कि बॉबी छाबड़ा ने कोर्ट में बहस की, जबकि वास्तव में ऐसा हुआ ही नहीं था। इससे जनता का न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसा टूटता है। 

पत्रिका : २२ सितम्बर २०१०

100 करोड़ के घोटाले की अंतिम रिपोर्ट आज

कैलाश के खातिर लोकायुक्त पुलिस विशेष न्यायाधीश से मांग सकती है और मोहलत

सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के मामले में मंगलवार को लोकायुक्त पुलिस द्वारा विशेष न्यायाधीश के समक्ष तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश की जाना है। कोर्ट द्वारा दिए गए 45 दिन के समय में जांच एजेंसी से क्या सबूत जुटाए हैं, इस पर सभी की निगाहें हैं। पांच महीने से चल रहे इस केस में लोकायुक्त पुलिस अब तक पर्याप्त समय मांग चुकी है। खासकर कैलाश के खिलाफ। संकेत है कि इस बार भी लोकायुक्त पुलिस द्वारा जांच और सबूतों के नाम पर समय मांगा जाएगा। 

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर विशेष न्यायाधीश के आदेश से लोकायुक्त पुलिस ने 6 अप्रैल को मामले की जांच शुरू की थी। लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी, मनीष संघवी और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपराधिक षडय़ंत्र रचने का केस दर्ज किया था। पिछली सुनवाई (6 अगस्त) पर कोर्ट में सेठ ने लोकायुक्त पुलिस पर आरोप लगाया था कि जानबूझकर आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) को बचाने की कोशिश हो रही है। इस आरोपी के बारे में स्थिति स्पष्ट की जाना चाहिए। इसी पर कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को 21 सितंबर तक केस में अंतिम रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था।  

क्या हो सकता है
  • जांच पूरी नहीं हो पाने के कारण लोकायुक्त पुलिस एक बार फिर समय मांग सकती है।
  • अगर जांच पूरी हो गई है तो गोपनीय रिपोर्ट पर निर्भर रहेगा कि कैलाश को दोषी पाकर एफआईआर दर्ज की गई या क्लीनचिट दी गई।
  • हो सकता है इस मामले में लोकायुक्त पुलिस द्वारा नए दिशा-निर्देश मांगे जा सके।


डेढ़ महीने में नोटिस भी नहीं भेजा
- छह अगस्त को एफआईआर दर्ज करके लोकायुक्त पुलिस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया केस
सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के केस में डेढ़ महीने पहले लोकायुक्त पुलिस ने विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपतियों नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी व मनीष संघवी तथा 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपाराधिक षडयंत्र रचने की एफआईआर तो दर्ज की थी। परंतु इस पर अगला कदम आज तक नहीं उठाया गया है। किसी भी आरोपी को अब तक न तो नोटिस दिया गया है और न ही कोई पूछताछ ही की गई।

लोकायुक्त पुलिस ने प्रारंभिक जांच में माना है कि तीन एकड़ जमीन के लिए धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में 17 लोगों ने मिलकर षडय़ंत्र किया और इससे सरकार को करीब पौने तीन करोड़ रुपए की चपत लगी। इसी आधार पर 5 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई, परंतु इसके बाद चालान पेश करने को लेकर रवैया ठंडा ही है। अफसर चालान के लिए आरोपियों के खिलाफ जांच, दस्तावेज के नाम लंबी प्रक्रिया बताते हैं। सही मायने में शुरुआत हुई या नहीं। इसे लेकर 'पत्रिकाÓ ने जिन 17 लोगों पर केस दर्ज हुआ उनमें से कुछ से बात की तो पता चला कि इस मामले में अभी कोई गति ही नहीं है। 


मुझे अब तक न तो कोई नोटिस मिला है और न ही एफआईआर की प्रतिलिपि। जो भी मालूम हुआ है, वह अखबारों के जरिए ही पता चला है।
हंसकुमार जैन, सिटी इंजीनियर, निगम

कुछ माह पहले लोकायुक्त पुलिस ने बयान के लिए बुलाया था। केस दर्ज होने के बाद इस संबंध में मुझसे न कोई संपर्क किया और न ही किसी प्रकार का नोटिस मिला। मेरा तो यही सवाल है कि भला बताए कि मेरा दोष क्या है आरोप क्या है?
अशोक बैजल, रिटायर्ड भवन अधिकारी

सुगनीदेवी कॉलेज की जमीन गड़बड़ी में मुझ पर भी लोकायुक्त पुलिस ने केस दर्ज किया। यह मुझे मीडिया के माध्यम से ही पता चला। पूरा मामला क्या है मुझे ही नहीं पता। जो आरोप लगाए गए हैं वे विरोधभासी हैं। केस दर्ज होने के बाद लोकायुक्त पुलिस की ओर से मुझे न नोटिस मिला न संपर्क किया गया।
नरेंद्र सुराणा, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री  



तारीख -पे- तारीख

अप्रैल
जांच के लिए तीन माह का समय दिया

कोर्ट ने 6 अप्रैल को तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी की भूमिका की जांच कर दोषी पाए जाने पर कार्रवाई को लेकर तीन महीने का समय दिया था। इसके लिए 6 जुलाई को रिपोर्ट पेश की जानी थी।
जुलाई
फिर समय मांग लिया

 6 जुलाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट में बताया कि जांच पूरी नहीं हुई है। इसके लिए तीन माह समय मांगा गया। इस पर परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने आपत्ति ली व लोकायुक्त अफसरों पर राजनीतिक दबाव का आरोप लगाया। इसके बाद कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को फिर एक माह का समय दिया गया।
अगस्त
मुख्य कर्ताधर्ता कैलाश का नाम छोड़ दिया

6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष व तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी सहित 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज करने के साथ रिपोर्ट विशेष न्यायाधीश के समक्ष पेश की थी। तब परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय का नाम हटाने को लेकर आपत्ति ली थी और आरोप लगाए थे। तब अफसरों ने कहा था कि कैलाश के खिलाफ जांच चल रही है। इसके लिए कोर्ट से चार माह का समय मांगा था जिस पर डेढ़ माह का समय दिया गया था।
...और अब सितंबर
इस तरह करीब साढ़े पांच महीने से जांच चल रही है। कैलाश किन-किन आधारों पर दोषी हो सकते हैं इसे लेकर सेठ प्रमाणित साक्ष्यों का पुलिंदा पेश कर चुके हैं। उधर, लोकायुक्त पुलिस पूर्व में भी कई दस्तावेज जुटा चुकी है। 'पत्रिकाÓ कैलाश के खिलाफ आरोपों के बिंदुओं को सोमवार को उल्लेख कर चुकी है। ऐसे में अब सबकी नजरें कैलाश को लेकर लोकायुक्त की रिपोर्ट पर टिकी है।









पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

कम नहीं होते 45 दिन

सुगनीदेवी जमीन घोटाला
- 100 करोड़ के जमीन घोटाले पर विधि विशेषज्ञों की राय
- विशेष न्यायाल में कल पेश होना है लोकायुक्त पुलिस की जांच रिपोर्ट



सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में 43 दिन पहले यानी 6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस को विशेष न्यायालय ने आदेश दिया था कि 45 दिन में मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट सौंप दे। वह दिन कल है। विधि विशेषज्ञों से रायशुमारी में साफ होता है कि इस मामले में मौजूद दस्तावेज और 17 लोगों के खिलाफ की गई एफआईआर को देखकर लगता है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही, 'दूध का दूधÓ साबित करने के लिए लोकायुक्त जैसी सशक्त जांच एजेंसी को दी गई 45 दिन की समय सीमा पर्याप्त हैं।

पिछली सुनवाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि मामले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति (नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी और मनीष संघवी) और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज कर लिया गया है। नेता, अफसर और उद्योगपतियों के गठजोड़ से सरकार को 2 करोड़ 70 लाख रुपए की चपत लगी है। कोर्ट में 29 पेज की एफआईआर भी पेश की गई थी। तब परिवादी सुरेश सेठ ने सवाल उठाया था कि आरोपी क्रमांक दो यानी विजयवर्गीय के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने 45 दिन का समय दिया था। 'पत्रिकाÓ ने पूरे मामले को विधि विशेषज्ञों के समक्ष रखा।


मूल शिकायत में कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य

तथ्य एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रुप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं। 

तथ्य दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।

तथ्य तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडयंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई।

तथ्य चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।

तथ्य पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।

तथ्य छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।



एफआईआर में ही छुपे हैं कैलाश की भूमिका के आधार

  • पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया। विसंगति यह है कि अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें? 
  • पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई। सवाल उठता है डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?
  • पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनी ही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ। इसी से सवाल उपजता है क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडयंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है?  

पत्रिका : २० सितम्बर २०१० 

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

सुरेश सेठ ने कहा - सीबीआई से करा लो जांच

- सुगनीदेवी जमीन मामले में हाईकोर्ट में उठी मांग
- मेंदोला, संघवी की याचिका पर पूरे दिन चली बहस, फैसला सुरक्षित



परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं पर गुरुवार को इंदौर हाईकोर्ट में पूरे दिन (प्रात: 10.40 से शाम 4.20 बजे तक) बहस चली। याचिकाकर्ताओं के वकीलों की दलीलों पर शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने कोर्ट के समक्ष एक नई मांग रख दी कि इस केस की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से करवा ली जाए, क्योंकि लोकायुक्त पुलिस के पास भ्रष्टाचार से जुड़े ऐसे कई प्रकरण लंबित हैं, जिनकी जांच आठ-आठ वर्ष से चल रही है। सेठ ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के मामले उठाने वाले व्यक्ति को हतोत्साहित करने के लिए ये याचिकाएं दायर की गई हैं। मामले में कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है। 

विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने 6 अप्रैल 2010 को लोकायुक्त पुलिस को मामले में जांच के आदेश दिए थे। नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी ने दो अलग-अलग याचिकाओं में इस आदेश को चुनौती दी थी। जस्टिस एसएल कोचर और जस्टिस शुभधा वाघमारे की युगलपीठ ने इन्हीं पर सुनवाई की। याचिकाओं में मूल शिकायतकर्ता सुरेश सेठ समेत लोकायुक्त, लोकायुक्त एसपी, पुलिस महानिरीक्षक को प्रतिवादी बनाया गया है। ज्ञात रहे मामले में 5 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने मेंदोला व संघवी समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया है। तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका की जांच अभी जारी है। 21 सितंबर को विशेष न्यायालय में अंतिम जांच प्रतिवेदन पेश होगा।

284 पेज में 21 न्यायिक दृष्टांत
सेठ ने कोर्ट में 284 पेज का एक जवाब प्रस्तुत किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के 21 न्यायिक दृष्टांत पेश किए गए हैं। ये सभी दृष्टांत मेंदोला और संघवी की याचिकाओं के तर्कों को चुनौती देते हैं।

 अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता
बहस के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध तो हुआ है और केवल प्रक्रिया का हवाला देकर अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने जीरो कायमी का हवाला देते हुए कहा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोई भी व्यक्ति थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कर सकता है। पहले वह जीरो नंबर पर कायम होती है और बाद में जिस क्षेत्र से संबंध होती है, वहां उसे भेजा जा सकता है। इस केस में लोकायुक्त पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। अब उसे शिफ्ट किया जा सकता है, खत्म तो नहीं किया जा सकता। 


मैं तो हर दर पर गया था,
किसी ने सुना ही नहीं
- सुगनीदेवी कॉलेज परिसर मामले में हाईकोर्ट के समक्ष सुरेश सेठ ने रखा तर्क
- मेंदोला और संघवी की वकीलों ने भी पूरी तैयारी के साथ रखा पक्ष



जमीन के इस मामले में मैंने तो हर दर पर शिकायत करके न्याय मांगा था, लेकिन किसी ने सुना ही नहीं। यहां तक कि मुख्यमंत्री तक के यहां से आज तक जवाब नहीं आया। वर्ष 2007 से मैं जिम्मेदार अफसरों और जनप्रतिनिधियों को पत्र लिख रहा हूं। सरकार से तीन वर्ष से लड़ रहा हूं। कहां जाऊं... क्या मैं गटर में चला जाऊं। जो वकील यहां पैरवी कर रहे हैं, वे बताएं कि जो जमीन का मालिक ही नहीं था, उसने जमीन कैसे बेच दी। ये लोग तभी हाईकोर्ट के सामने आए, जब इन्हें पता चल गया कि अब लोकायुक्त जांच से बच नहीं सकते। मुझे तो ऐसा लग रहा है, जैसे आजादी की लड़ाई चल रही हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्ति की आवाज दबाने की कोशिश हो रही है। ऐसा ही चलता रहा तो मेरे मरने के बाद तक इस मामले में कोई निर्णय नहीं होगा।

यह बात कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने गुरुवार को हाईकोर्ट में जस्टिस एसएल कोचर और जस्टिस शुभदा वाघमाले की युगलपीठ के समक्ष कही। वे परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं पर जारी बहस में हिस्सा ले रहे थे। नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी ने ये याचिकाएं लगाई हैं। मेंदोला की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट एके सेठी और एडवोकेट राहुल सेठी ने जबकि संघवी की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट रमेश आर्या और एडवोकेट अमित अग्रवाल ने पैरवी की। लोकायुक्त की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट एलएन सोनी ने पक्ष रखा।

एडवोकेट देसाई को बनाया एमिकस क्यूरी
बहस के दौरान ही कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश देसाई को एमिकस क्यूरी (केस में कोर्ट के सलाहकार) घोषित किया। कोर्ट ने करीब एक घंटे तक उनसे विभिन्न पहलूओं पर विमर्श किया।

खचाखचा भरी रही कोर्ट 
उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के कारण बहुचर्चित हुए इस मामले को सुनने के लिए हाईकोर्ट के रूम नंबर 09 में पूरे दिन वकीलों की भीड़ जुटी रही। कई वरिष्ठ से लेकर कनिष्ठ एडवोकेट्स तक बहस को सुनने के लिए मौजूद थे। लोकायुक्त जांच की सीमाएं, विशेष न्यायाधीश के आदेश और भ्रष्टाचार से जुड़े मसलों पर जांच एजेंसियों के लिए तय मापदंडों से जुड़े विभिन्न कानूनी पहलू बहस के दौरान उजागर भी हुए।

टीआई से सीएम तक की सेठ ने शिकायत

17 मई 2007         : इंदौर निगमायुक्त
1 मई 2008           : इंदौर निगमायुक्त
6 अक्टूबर 2008     : इंदौर निगमायुक्त
12 फरवरी 2009     : इंदौर निगमायुक्त
27 फरवरी 2009     : आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू)
2 मार्च 2009           : मुख्य सचिव मप्र, गृह सचिव, आईजी पुलिस, आईजी ईओडब्ल्यू, डीआईजी इंदौर, एसपी इंदौर, कलेक्टर इंदौर, एसपी ईओडब्ल्यू और टीआई परदेशीपुरा।
17 जून 2009          : मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान
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कोर्ट में कानूनी तर्कों की नींव

विधायक रमेश मेंदोला की याचिका के आधार

1. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग मजिस्ट्रेट कर सकता है, विशेष न्यायाधीश नहीं।
2. विशेष न्यायाधीश मप्र विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) कानून 1947 एवं मप्र लोकायुक्त कानून के अधीन है। वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत मजिस्ट्रेट नहीं है।
3. विशेष न्यायाधीश द्वारा सीआरपीसी की धारा 190 के तहत कार्रवाई नहीं की।
4. मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून की धारा 4 के तहत कोई भी अनुसंधान कार्य पर सुपरइनटेंडेंस लोकायुक्त की रहती है, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
5. शिकायतकर्ता ने कभी भी लोकायुक्त अथवा एसपीई लेाकायुक्त को शिकायत दर्ज नहीं करवाई, इसलिए विशेष न्यायाधीश द्वारा धारा 153(3) के तहत जांच के आदेश देना त्रूटिपूर्ण है।
6. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी फौजदारी परिवाद के तहत परिवादी के बयान दर्ज नहीं किए और न ही धारा 202 के तहत कोई कार्रवाई की।
7. आरोपी की सुनवाई का अवसर दिए बगैर सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
8. सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत आदेश पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंनचार्ज को ही दिया जा सकता है। एसपीई लोकायुक्त इंदौर इस श्रेणी में नहीं आते।
9. सीआरपीसी की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग तभी किया जा सकता है, जबकि संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया गया हो।
10. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून के प्रावधानों के विपरीत है, क्योंकि इस अधिनियम में राज्य सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है।


मनीष संघवी की याचिका के आधार
1. याचिकाकर्ता लोक सेवक नहीं है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत एसपीई लोकायुक्त को जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
2. मप्र लोकायुक्त और उपलोकायुक्त नियम 1981 की धारा 8 (सी) के तहत पांच वर्ष से पुराने मामलों पर जांच का प्रतिबंध लगाया गया है।
3. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया।
4. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम 1981 की धारा 7 के प्रावधानों का उल्लंघन है।


सुरेश सेठ के जवाब
1. तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला ने महापौर कैलाश विजयवर्गीय की मौन सहमति के साथ पद का दुरुपयोग करते हुए धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी से आपराधिक षडय़ंत्र रचकर सरकारी जमीन की खरीदी-बिक्री की। इससे निगम और सरकार को करोड़ों की राजस्व हानि हुई।
2. वर्तमान में पुलिस अनुसंधान जारी है, इसलिए दोनों याचिकाएं अपरिपक्व हैं।
3. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (ई) के तहत एसपी स्तर के अधिकारी को जांच का आदेश देने का अधिकार है।
4. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश को संज्ञान लेने का पूर्ण अधिकार है और इससे सेशन न्यायालय के साथ मजिस्ट्रेट की शक्तियों का समावेश हो गया है। 
5. सीआरपीसी की धारा 153 (3) के तहत जांच के आदेश जारी करने से पहले अभियुक्त को सुनवाई को अवसर देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।

पत्रिका : २० अगस्त २०१० 

बुधवार, 11 अगस्त 2010

क्यों नहीं लिए केके गोयल के बयान

- कैलाश को क्यों बख्शा : लोकायुक्त पुलिस की एफआईआर पर सवाल
- भ्रष्टाचार साबित करने वाले लीज सौदे के गवाह होने के बाद भी लोकायुक्त पुलिस ने नहीं की पूछताछ
- निगम उपयंत्री सुरेश चौहान हैं दूसरे गवाह


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन के घोटाले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की खामियां एक-एक कर सामने आ रही हैं। जांच अफसरों ने धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी के दोस्त मनीष तांबी के लिखित बयान लिए परंतु उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय व विधायक रमेश मेंदोला के मित्र केके गोयल और इंदौर नगर निगम के उपयंत्री सुरेश चौहान से भी कोई पूछताछ नहीं की गई। गोयल व चौहान धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए जमीन सौदे के गवाह हैं। इस सौदे के कारण ही मेंदोला, कोठारी, संघवी समेत 17 लोगों पर भ्रष्टाचार और आपराधिक षडयंत्र रचने का केस दर्ज किया गया है।


लोकायुक्त पुलिस के दो चेहरे

पहला चेहरा
जांच के दौरान लोकायुक्त पुलिस ने 15 लोगों के बयान लिए। इसमें एक नाम मनीष तांबी का भी है। लोकायुक्त पुलिस ने तांबी को बयान लेने का कारण एक नक्शे को बताया है। सूत्रों के मुताबिक चर्चित जमीन पर धनलक्ष्मी केमि. ने आवासीय ईकाइयों जो नक्शा टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से पास करवाया था, उस पर तांबी ने बतौर गवाह हस्ताक्षर किए थे।

दूसरा चेहरा
फरियादी सुरेश सेठ की शिकायत में नत्थी किए गए दस्तावेजों में लीज अधिकारों का विक्रय पत्र भी मौजूद था।  इस पर मेंदोला, कोठारी और संघवी के साथ ही केके गोयल और सुरेश चौहान के हस्ताक्षर भी हैं। चूंकि इसी सौदे के आधार पर भ्रष्टाचार साबित हुआ है, इसलिए इन लोगों से बयान लेना लोकायुक्त पुलिस की जिम्मेदारी था।

कैलाश-मेंदोला के मित्र हैं गोयल 
 
केके गोयल विजयवर्गीय और मेंदोला के मित्र हैं। वे विकास अपार्टमेंट हाउसिंग सोसाइटी के भंग संचालक मंडल में मेंदोला के साथ ही सदस्य भी हैं। इस दागी सोसाइटी की जांच चल रही है। आरोप है कि संचालकों ने सदस्यों के उपयोग की 9 एकड़ जमीन भवन्स प्रोविनेंट स्कूल को लीज पर दी है। अवैध मल्टियों के कारण विवादित हुए आलोक नगर की जमीन भी इसी सोसाइटी की है।

News in Patrika on 9th August 2010

ईमानदार थे, तो क्यों नहीं बदली अफसरों की राय

- सुगनीदेवी कॉलेज जमीन घोटाले मामले की एफआईआर से उपजा सवाल
- कैलाश विजयवर्गीय को बचाने की कोशिश में लोकायुक्त पुलिस ने किए तीन गोलमाल


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की भाषा से साफ है कि तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय और तत्कालीन निगमायुक्त को बचाने के लिए भरसक कोशिश की गई। अदालत में पेश की गई 29 पेज की एफआईआर को 'पत्रिकाÓ ने विधि विशेषज्ञों को दिखाया, तो वे चौंक गए। इस रिपोर्ट में तीन स्थानों पर स्पष्टï रूप से गोलमाल किया गया है।
जिन तर्कों के आधार पर मेंदोला समेत 17 लोगों को आरोपी बनाया गया है उनसे विजयवर्गीय की ईमानदारी पर सवाल खड़ा हो गया है। विधि विशेषज्ञ कहते हैं कि विजयवर्गीय ईमानदार थे, तो उन्होंने अफसरों के वे गड़बड़ फैसले पलट क्यों नहीं दिए जिनके आधार पर धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज की जमीन नंदानगर साख संस्था को दी गई। ऐसा भी नहीं है कि अफसरों के हस्ताक्षर से आए सभी प्रस्तावों को मंजूर कर लिया जाता हो। अफसरों की सकारात्मक टिप्पणियों के साथ दर्जनों गड़बड़ प्रस्ताव एमआईसी के सामने आते हैं, जिन्हें खारिज करके एमआईसी व महापौर न्याय करते हैं। 

एफआईआर में तीन गोलमाल

गोलमाल एक
पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया।
उठता सवाल
अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें?

गोलमाल दो
पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई।
उठता सवाल
डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?

गोलमाल तीन
पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडय़ंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ।
उठता सवाल 
क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडय़ंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडय़ंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है? 

लोकायुक्त पुलिस को क्यों नहीं दिखे कैलाश-रमेश के ताल्लुकात

- कोर्ट ने जिन बिंदुओं पर सौंपी थी जांच, वे भी नहीं खंगाले
- ऐसी विशेष जांच एजेंसी का क्या औचित्य


सीबीआई, सीआईडी, ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त जैसी विशेष जांच एजेंसियों के गठन के पीछे मंशा होती है कि भ्रष्टाचार या अपराध के किसी भी मामले से जुड़े सूक्ष्मतम पहलू की भी जांच हो जाए और बड़े से बड़े आरोपी को खींचकर अदालत के सामने पेश कर दिया जाए। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 एकड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन मामले में अब तक तो ऐसा नहीं हो सका। विशेष न्यायालय द्वारा चार माह पूर्व (6 अप्रैल को) लोकायुक्त पुलिस को सौंपे गए इस केस में जिन 46 बिदुओं पर जांच सौंपी थी, उनमें से कई की पड़ताल ही नहीं की गई। खासकर वे बिंदु पूरी तरह अछूते रहे जिनके आधार पर तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती थी।

यहां तक कि लोकायुक्त पुलिस ने फरियादी सुरेश सेठ के उस आरोप की भी पूरी तरह अनदेखी की जिसमें उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के व्यक्तिगत ताल्लुकातों का जिक्र था। दोनों के जगजाहिर संबंधों के आधार पर ही संभवत: अदालत ने भी लोकायुक्त पुलिस को दोनों की भूमिका की जांच सौंपी थी। ज्ञात रहे लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को अदालत में 29 पेज की एफआईआर पेश करके जांच से पीछा छुड़ाने की कोशिश की थी। फरियादी ने जब चार में से एक आरोपी (कैलाश) को छोडऩे की बात उठाई, तब लोकायुक्त के वकील बोले जांच अभी जारी है और आरोपी क्रमांक दो यानी कैलाश विजयवर्गीय को भी आरोपी बनाया जा सकता है।

बड़ा सवाल
कैलाश ने पलट क्यों नहीं दी अफसरों की राय?
विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में नेताओं के बजाए अफसरों को अधिक दोषी बताया गया है। पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का प्रस्ताव पास कर दिया। बड़ा सवाल यह है कि अफसरों की गलती को महापौर और एमआईसी ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प को पारित न करें? ऐसा भी नहीं है कि अफसरों के हस्ताक्षर से आए सभी प्रस्तावों को मंजूर कर लिया जाता हो। दर्जनों प्रस्ताव ऐसे होते हैं, जिन्हें दोषपूर्ण जानकर महापौर व एमआईसी द्वारा खारिज कर दिया जाता है। इस साधारण किंतु बेहद महत्वपूर्ण तथ्य पर लोकायुक्त पुलिस ने आखिर क्यों ध्यान नहीं दिया?


क्या कर रहा 209 लोगों का लवाजमा
मप्र में लोकायुक्त संगठन की स्थापना विशेष पुलिस स्थापना के अंतर्गत की गई है। लोकायुक्त समेत इसमें 209 अधिकारी-कर्मचारी का अमला सरकार ने लगाया है। अमले में महानिदेशक, इंस्पेक्टर जनरल, एसपी से लेकर कानूनी सलाहकार तक शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि इस लवाजमे के पास एकमात्र यही केस जांच के लिए था, लेकिन सवाल यही है कि बहुचर्चित मामले में भी इस अमले ने अदालत की फिक्र नहीं की।

ऐसा काम तो सामान्य पुलिस भी कर ले
इस बहुचर्चित मामले में अब तक के घटनाक्रम पर कानूनी जानकारों का कहना है जिस तरह से लोकायुक्त पुलिस ने जांच कार्य किया है, वह तो सामान्य पुलिस भी कर सकती थी। कानूनन विशेष पुलिस स्थापना को कई विशेष अधिकार दिए गए हैं, लेकिन इस मामले में उनका इस्तेमाल नहीं किया गया।

कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य
बिंदु एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं।
बिंदु दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।
बिंदु तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडय़ंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई। 
बिंदु चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।
बिंदु पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।
बिंदु छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।
बिंदु सात
कैलाश के प्रति रमेश की राजनैतिक निष्ठा समाज में स्थापित है। रमेश कैलाश को अपना राजनैतिक गुरू भी मानते हैं। 





 News in Patrika on 8th August 2010

इनके एसपी में दम नहीं जो यहां आ जाए

 - सुरेश सेठ ने लोकायुक्त के वकील को कोर्ट में दी चुनौती
- तमतमाए वकील ने कहा मुझसे ऐसी बातें न कहें
- कोर्ट ने भी पूछा क्यों नहीं आए आपके एसपी

उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय अंौर विधायक रमेश मेंदोला से जुड़े 100 करोड़ की जमीन घोटाले के मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के वकील को कोर्ट में ही खुली चुनौती दे दी। कोर्ट ने जब वकील से पूछा आपके एसपी क्यों नहीं आए, तो सेठ तपाक से बोले इनके एसपी में दम नहीं जो यहां आ जाए। बाद में कोर्ट ने एसपी को बुलाने को कहा, लेकिन वे नहीं आए।

विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में दोपहर 12 बजे लोकायुक्त डीएसपी अशोक सोलंकी और विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम घुसे। जैसे ही उन्होंने कोर्ट को बताया हमने 17 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी है, वैसे ही सेठ ने बोले मुझे तो इसकी कॉपी ही नहीं दी गई। कोर्ट तत्काल आदेश दिया कि एक कॉपी इन्हें दे दी जाए। जिरह शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद सोलंकी रिपोर्ट लेने के बहाने बाहर चले गए और आखिर तक नहीं लौटे। तब सेठ के सवालों का सामना कदम को ही करना पड़ा। इसी दौरान कोर्ट ने पूछा एसपी वीरेंद्रसिंह कहां हैं? 

इतना दबाव है, तो नौकरी क्यों कर रहे
सेठ ने कहा लोकायुक्त के अफसरों पर कैलाश विजयवर्गीय का भारी दबाव है इसी कारण रिपोर्ट में उसका नाम तक नहीं है। अगर दबाव में ही काम करता है तो इन लोगों को नौकरी करने की जरूरत ही क्या है? इस पर कदम थोड़ा तेश में आ गए, उन्होंने कहा मैं तो वकील हूं और मुझे किसी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है। सेठ ने उन्हें संभालते हुए कहा मैं आपको बेईमान नहीं कह रहा हूं, आप तो ईमानदार हैं। कदम ने कहा ईमानदारी के लिए मुझे आपके प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है।  

'कह दो ना, वह ईमानदार हैंÓ
कोर्ट में हुई जिरह के दौरान सेठ लोकायुक्त पुलिस के अफसरों से कहा भाई, या तो कह दो कि कैलाश बेईमान है या कह दो नहीं है। यह यह ही

'वह डॉन है, इसलिए गुर्गों को फंसा दियाÓ
कोर्ट के बाहर आते ही सेठ ने विजयवर्गीय पर आरोपों की झड़ी लगा दी। उन्होंने कहा वह दाऊद जैसा डॉन है, इसलिए सब डरते हैं। जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है, उनमें से अधिकांश उसके गुर्गें हैं। डॉन तो ऐसा ही करता है, गुर्गों को फंसा देता है। जब सरकार डरती है, तो लोकायुक्त क्यों नहीं डरेंगे।

'दो-दो करोड़ में विधायकों को खरीदने की ताकतÓ
सेठ ने मीडिया को यह भी कहा कि विजयवर्गीय मप्र का मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहा है। 

गुर्गों ने खींचे पत्रकारों के फोटो 
सुनवाई के दौरान कैलाश-मेंदोला के गुर्गे भी कोर्ट में मौजूद थे। केस का मीडिया कवरेज कर रहे पत्रकारों पर उनकी नजर थी। कोर्ट के बाहर उन्होंने पत्रकारों के फोटो भी अपने मोबाइल में ले लिए। 

अदालत ने लोकायुक्त पुलिस से पूछा- कैलाश को क्यों छोड़ा?

Lokayukta Officers

- सुगनीदेवी कॉलेज परिसर से जुड़ी 100 करोड़ की तीन एकड़ जमीन में घोटाले की हो गई पुष्टि
- भाजपा विधायक रमेश मेंदोला और 13 अफसरों समेत 17 के खिलाफ मिले भ्रष्टाचार के सबूत, सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज
- नेता, अफसर और उद्योगपतियों ने आपराधिक षडयंत्र रचकर सरकार को लगाई 2.70 करोड़ की चपत

Suresh Seth


परदेशीपुरा चौराहा स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन मामले में आखिरकार घोटाले की पुष्टि हो ही गई। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के कारण बहुचॢचत हुए १०० करोड़ रुपए के इस मामले में 17 लोगों को भ्रष्टाचार करने का दोषी मानकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। नेता, अफसर और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ से सरकार को 2 करोड़ 70 लाख रुपए की चपत लगी है। मामले में कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ फिलहाल एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। ऐसा क्यों किया गया, इसका जवाब भी लोकायुक्त पुलिस के पास नहीं है। इसी के चलते कोर्ट में लोकायुक्त पुलिस से पूछा गया कि किस आधार पर आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय को छोड़ा गया। लोकायुक्त पुलिस को इसका जवाब 21 सितंबर तक कोर्ट में देना होगा। हालांकि, लोकायुक्त के वकील ने कोर्ट को बताया है कि फिलहाल जांच जारी है और विजयवर्गीय के साथ ही अन्य लोग भी आरोपी बनाए जा सकते हैं। 

भारी गहमागहमी के बीच शुक्रवार दोपहर 12 बजे को लोकायुक्त पुलिस ने विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में जांच रिपोर्ट पेश की। एफआईआर की शक्ल में पेश इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भाजपा विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों ने षडय़ंत्र रचकर भ्रष्टाचार किया। इसी कारण इनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कर ली गई है। 

लोकायुक्त की इस रिपोर्ट पर शिकायतकर्ता व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश सेठ ने भारी आपत्ति जताते हुए कोर्ट को बताया मैंने चार आरोपी बताए थे। इनमें से तीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई, जबकि तत्कालीन महापौर कैलाश विजयगर्वीय को लोकायुक्त ने छोड़ दिया, ऐसा आखिर क्यों किया गया। इस पर कोर्ट ने भी लोकायुक्त पुलिस के वकील से पूछा बताइए ऐसा क्यों हुआ? 

लोकायुक्त की ओर से हाजिर हुए विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने बताया अभी विजयवर्गीय को क्लीन चीट नहीं दी गई है। मामले में जांच जारी है और विजयवर्गीय समेत अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया जा सकता है। करीब 20 मिनिट तक बहस चली। दोपहर बाद विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिए कि मामले में अंतिम जांच प्रतिवेदन 21 सितंबर तक पेश कर दिया जाए।

कैलाश को नहीं दी क्लीन चीट
विशेष कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विशेष पुलिस स्थापना द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में कैलाश विजयवर्गीय का नाम नहीं होने से यह नहीं माना जाए कि उनके खिलाफ केस समाप्त हो गया है। यह जरूरी नहीं है कि एफआईआर में नाम नहीं होने से कैलाश विजयवर्गीय के विरूद्ध मामला समाप्त हो गया। जांच के आधार पर उन्हें आरोपी बनाया जा सकता है।



'लोकायुक्त-कैलाश के बेटे बिजनेस पार्टनरÓ
शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पीपी नावलेकर और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के परिवारोंं के आपसी ताल्लुकतों का हवाला देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। सेठ ने मीडिया से चर्चा में कहा दोनों के बेटे बिजनेस पार्टनर हैं, इसी कारण कैलाश को बचाया गया, अन्यथा उन्हें छोडऩे की कोई वजह मौजूद ही नहीं है।

अब चालान पेश होगा
जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है, उनके खिलाफ विस्तृत जांच होगी। इसके बाद कोर्ट में चालान पेश होगा और गिरफ्तारी होगी। कैलाश विजयवर्गीय और एमआईसी की भूमिका की जांच भी साथ-साथ चलेगी। चालान पेश होने में कितना समय लगेगा, फिलहाल तय नहीं है। 

इन धाराओं में केस
एक- भष्ट्राचार निवारण अधिनियम १९८८ की धारा 13(1) डी और धारा 13 (2) अर्थात भ्रष्टाचार।
दो- भारतीय दंड विधान की धारा १२० बी अर्थात आपराधिक षडय़ंत्र।

लो, कैलाश के दस्तखत वाला सबूत
-सुरेश सेठ का कहना है कि घोटाले के सूत्रधार और तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ उन्होंने लोकायुक्त को पुख्ता सबूत सौंपे हैं। ये सभी सरकारी दस्तावेज प्रमाणित हैं। कैलाश के खिलाफ सबसे पुख्ता सबूत है, खुद उनकी ही अध्यक्षता में तीन जून 2002 को पारित एमआईसी का संकल्प, जिसमें जमीन की गाइडलाइन दर 35 रुपए प्रति दस वर्गमीटर बताकर सरकार को लाखों रुपए का नुकसान पहुंचाया गया। मेंदोला के खिलाफ एफआईआर में इसको आधार बनाया गया है लेकिन विजयवर्गीय को बख्श दिया गया।
    
अफसरों ने किसके लिए किया
निगम के अफसरों ने दबी जुबान अपनी पीड़ा जताई कि उस कार्यकाल में तो आंख दिखाकर काम कराए जाते थे, ये किससे छिपा है। उन्होंने कहा कि कराने वाला कौन था, सबको मालूम है।

'या तो बेईमान कहो या ईमानदारÓ
कोर्ट में हुई जिरह के दौरान सेठ ने लोकायुक्त ïके वकील से कहा भाई, या तो कह दो कि कैलाश बेईमान है या कह दो नहीं है। चाहे तो यह भी कह सकते हैं कि वह ईमानदार है। इस पर कोर्ट में हंसी का ठहाका लग गया।

इनके खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर
1. रमेश मेंदोला, तत्कालीन पार्षद एवं अध्यक्ष नंदानगर साख संस्था
2. विजय नगीन कोठारी, भागीदार, धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज
3. मनीष रमणीकलाल संघवी, भागीदार, धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज
4. नगीनचंद्र कोठारी, भागीदार, धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज
5. हंसकुमार जैन, नगर शिल्पज्ञ, नगरनिगम
6. राकेश शर्मा, भवन अधिकारी, नगरनिगम
7. दिवाकर गाढ़े, सहायक यंत्री, नगरनिगम
8. दिनेश शर्मा, उपयंत्री, नगरनिगम
9. श्याम शर्मा, उपयंत्री, नगरनिगम
10. राकेश मिश्रा, उपयंत्री, नगरनिगम
11. एसके जैन, तत्कालीन सहायक शिल्पज्ञ, नगरनिगम
12. अशोक बैजल, रिटायर्ड भवन अधिकारी, नगरनिगम
13. एनके सुराणा, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री, नगरनिगम
14. जगदीश डगांवकर, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री, नगरनिगम
15. नित्यानंद जोशी, रिटायर्ड सहायक यंत्री, नगरनिगम
16. विमल कुमार जैन, रिटायर्ड सहायक शिल्पज्ञ, नगरनिगम
17. स्व. केआर मंडोवरा, तत्कालीन उपयंत्री, नगरनिगम


ये गड़बडिय़ां मिलीं
- रमेश मेंदोला पार्षद और एमआईसी सदस्य होने के साथ ही नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष थे, उन्होंने अफसरों के साथ मिलकर आर्थिक लाभ उठाया। जगदीश डगांवकर, हंसकुमार जैन, राकेश शर्मा, दिवाकर गाढ़े, श्याम शर्मा ने विजय कोठारी और मनीष संघवी के साथ मिलकर यह षडय़ंत्र रचा।
- 23 फरवरी 2004 को नंदानगर संस्था ने लीज नामांतरण का आवेदन दिया। 28 फरवरी 2004 को लीज अधिकार बेचने के लिए धनलक्ष्मी केमिकल्स ने निगमायुक्त को पत्र लिखा। नगर शिल्पज्ञ ने 25 मार्च 2004 को लीज बेचने की एनओसी जारी किया। दोनों पक्षों के बीच लेनदेन 8 सितंबर 2004 को हुआ। लीज नामांतरण के आवेदन के एक महीने पहले ही सौदा हो गया।
- नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर के हस्ताक्षर से 19 अप्रैल 2004 को जारी पत्र के आधार पर महापौर कैलाश विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को जमीन धनलक्ष्मी केमि. से नंदानगर संस्था को 30 वर्ष के लिए दे दी। इसी संकल्प के आधार पर 6 अक्टूबर 2004 को नंदानगर संस्था ने निगम से नामांतरण की मंजूरी ली। 15 अप्रैल 2005 को नगरीय प्रशासन व विकास विभाग भोपाल को सौदे की मंजूरी के लिए निगम ने पत्र भेजा। इस पर आज तक मंजूरी नहीं आई।
- वर्ष 2002 में जमीन के उपयोग में परिवर्तन के लिए भवन अधिकारी और नगर निल्पज्ञ ने अन्य अफसरों के साथ मिलकर मनमाने ढंग से लीज की गणना करके 1 लाख 19 हजार 20 रुपए से लिए।
- 1990-91 की गाइडलाइन (40 रुपए वर्ग फीट) के हिसाब से 13 वर्ष का लीज रेंट 13 लाख 68 हजार 640 रुपए बनता था। अफसरों ने निगम को 12 लाख 49 हजार 620 रुपए की चपत लगाई।
- कलेक्टर गाइडलाइन 2002-03 में बदलकर 40 रुपए से बढ़कर 4000 रुपए वर्गफीट हो गई। इसके मुताबिक लीज रेंट 1.27 करोड़ रुपए बनता था। जगदीश डगांवकर, अशोक बैजल, एसके जैन, दिनेश शर्मा ने पद का दुरूपयोग करके विजय कोठारी और मनीष संघवी को 1 करोड़ 25 लाख 95 हजार 637 रुपए का फायदा पहुंचाया।
- औद्योगिक उपयोग की जमीन पर निगम ने आवासीय नक्क्षे पास किए।
- जमीन का डायवर्शन नहीं किया गया और इससे सरकार को 6 लाख 50 हजार 327 रुपए की हानि हुई।
- नित्यानंद जोशी, केआर मंडोवरा, राकेश शर्मा और नगीन कोठारी ने मिलकर आपराधिक  षडयंत्र रचा और धनलक्ष्मी केमिकल्स को अवैध लाभ पहुंचाया। 
- लीज डीड की शर्तों के विपरीत जमीन बेचने की एनओसी निगम के अफसरों ने जारी की।
- एनओसी के आधार पर ही गलत तरीके से जमीन नंदानगर साख संस्था को 1.38 करोड़ रुपए में बेच दी।
- नियमानुसार 1.38 करोड़ रुपए निगम के खाते में आने थे, लेकिन ये विजय कोठारी व मनीष संघवी को मिले।
- नंदानगर संस्था को यह जमीन 1.38 करोड़ की मामूली कीमत मिली, जो कि आर्थिक फायदा पहुंचाने का मामला है। 


कैलाश-मेंदोला के नहीं लिए बयान
लोकायुक्त जांच के दौरान जिन 15 लोगों के बयान लिए गए, उनमें कैलाश-मेंदाला के नाम शामिल नहीं है। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ के साथ ही निगमायुक्त सीबी सिंह, तत्कालीन भवन अधिकारी ज्ञानेंद्रसिंह जादौन, जिला पंजीयक मोहनलाल श्रीवास्तव, भू अभिलेख अधीक्षक शिवप्रसाद मंडरा, टीएंडसीपी संयुक्त संचालक विजय सावलकर, तत्कालीन निगमायुक्त संजय शुक्ल, नंदानगर साख संस्था मैनेजर प्रवीण कंपलीकर, सहकारिता उपायुक्त महेंद्र दीक्षित, उप सचिव मप्र शासन नरेश पाल, तत्कालीन निगमायुक्त विनोद शर्मा, तत्कालीन निगमायुक्त आकाश त्रिपाठी, तत्कालीन सचिव निगम बंशीलाल जोशी,  सचिव निगम रणबीरकुमार के साथ ही विजय कोठारी व मनीष संघवी के मित्र मनीष तांबी के बयान भी लोकायुक्त पुलिस ने लिए हैं।
News in Patrika 7th August 2010

मनीष संघवी ने भी लगाई याचिका

सुगनीदेवी कॉलेज परिसर के पास मौजूद तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच से गुजर रहे मनीष संघवी ने भी हाईकोर्ट में याचिका दायर करके पूरी प्रक्रिया को चुनौती दी है। जांच में उलझे विधायक रमेश मेंदोला ने दो दिन पूर्व हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मेंदोला की याचिका में हाईकोर्ट ने 15 दिन बाद सुनवाई के आदेश दिए हैं। संघवी की याचिका में लोकायुक्त कार्यालय और सुरेश सेठ को प्रतिवादी बनाने की सूचना है। याचिकाकर्ता मनीष संघवी ने बताया याचिका के लिए मैंने दिल्ली के एक एडवोकेट से चर्चा की थी। याचिका मंजूर हुई या नहीं, इसकी जानकारी नहीं है।



धनलक्ष्मी केमिकल्स संचालक हैं संघवी
नगरनिगम ने सुगनीदेवी कॉलेज परिसर के पास मौजूद तीन एकड़ जमीन की लीज धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज को दी थी। मनीष संघवी और विजय कोठारी इस कंपनी के संचालक हैं। कांग्रेस नेता सुरेश सेठ का आरोप है कि कंपनी ने नियम विरूद्ध जमीन की लीज नंदानगर साख संस्था को ट्रांसफर कर दी। सेठ के मुताबिक जमीन की कीमत 100 करोड़ रुपए है और तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय और एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला ने जमीन के लेनदेन में भ्रष्टाचार किया है। 




News in Patrika 6th August 2010.

लोकायुक्त जांच के खिलाफ मेंदोला की याचिका



- हाईकोर्ट ने जारी किए नोटिस
- मामला सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन का



सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन मामले में विधायक रमेश मेंदोला ने हाईकोट में एक याचिका दाखिल की है। याचिका में लोकायुक्त जांच को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने लोकायुक्त और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) मप्र समेत चार को मामले में नोटिस जारी किए हैं।

जस्टिस एसएल कोचर और जस्टिस शुभदा वाघमारे की युगलपीठ में मंगलवार को पेश इस याचिका में मेंदोलो की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट एके सेठी और एडवोकेट राहुल सेठी ने जबकि सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता गिरीश देसाई उपस्थित हुए। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 में दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि विशेष न्यायाधीश को लोकायुक्त को जांच के आदेश देने का अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ता ने लोकायुक्त एसपी इंदौर और सुरेश सेठ को भी प्रतिवादी बनाया है। डीजीपी और लोकायुक्त व लोकायुक्त एसपी के नोटिस की एडवांस कॉपी एडवोकेट्स को दे दी गई, जबकि सुरेश सेठ को तीन दिन में नोटिस देने के आदेश दिए गए। नोटिस तामिल होने के 15 दिन बाद कोर्ट में अगली सुनवाई होगी। 



6 अगस्त को पेश होगी जांच रिपोर्ट

इधर, शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी को अर्जी देकर आरोप लगाया था कि जमीन की कीमत 100 करोड़ रुपए है आर इसके लेन-देन में भ्रष्टाचार हुआ है। इसी पर विशेष न्यायाधीश ने 6 अप्रैल 2010 को लोकायुक्त एसपी इंदौर को आदेश दिए थे कि वे तीन माह में मामले में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स के भागीदार विजय कोठारी व मनीष संघवी की भूमिका की जांच करके रिपोर्ट पेश करें। तीन माह बाद 6 जुलाई को विशेष न्यायालय में एसपी वीरेंद्रसिंह उपस्थित हुए और उन्होंने बताया कि नगरीय प्रशासन मंत्रालय समेत संबंधित विभाग जांच से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं। उन्होंने जांच के लिए कोर्ट से चार महीने का समय मांगा। कोर्ट ने मांग नामंजूर करके एक माह का समय दिया। अब 6 अगस्त को विशेष न्यायाधीश के समक्ष रिपोर्ट पेश हो

News in Patrika on 4th August 2010