सोमवार, 23 अगस्त 2010

कैलाश को धूल चटाई

ज्योतिरादित्य सिंधिया
कैलाश विजयवर्गीय
क्रिकेट का क,ख,ग भी नहीं जानने वाले मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के सीधे मुकाबले में करारी शिकस्त देते हुए लगभग धूल चटा दी। सिंधिया को 142 वोट मिले, जबकि शुरू दिन से 'अहंकारÓ में डूबे कैलाश को 70 से ही संतोष करना पड़ा। कांग्रेस और भाजपा के लिए भी यह चुनाव बेहद प्रतिष्ठा का बन चुका था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक घोटालों के आरोपों से घिरे कैलाश के लिए यह हार बहुत बड़ा अवरोध साबित होगी।

सिंधिया ने मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के कप्तान (अध्यक्ष) बनकर लंबी पारी के इरादे से मैदान में जम गए हैं। इसी चुनावी मैच को लेकर रविवार सुबह से ही इंदौर समेत पूरे राज्य और देशभर के नेता और क्रिकेटर निगाहें जमाए थे। इंदौर के उषाराजे स्टेडियम में प्रात: 10.30 बजे मैनेजिंग कमेटी की बैठक हुई और 12.30 बजे साधारण सभा की बैठक। सभा में सिंधिया ने समझौते के लिए डाली गई कैलाश समर्थकों की गेंद को वाइड करार देते हुए कहा चुनाव होकर रहेंगे। मैं वॉकओवर देने के मूड में नहीं हूं। ïदोपहर 2.45 बजे चुनावी मैच शुरू हुआ, जो रात 12.30 बजे तक चला। पूरे समय सिंधिया हावी रहे और एक बार तो ऐसी नौबत भी आ गई कि कैलाश को 'बॉल टेम्परिंगÓ जैसी बचकानी हरकत के लिए माफी तक मांगना पड़ी। मैच शुरू होने के पहले सिंधिया ने अपनी टीम के सबसे मजबूत खिलाड़ी (सचिव) संजय जगदाले को बाहर कर लिया क्योंकि उनके आसानी से आउट होने की प्रबल संभावना बन चुकी थी। मैच एंपायर (चुनाव अधिकारी) दिलीप चुडकर को घोषित किया गया था। देर रात घोषित किया गया कि सिंधिया मैन ऑफ द डे, मैच एंड एमपीसीए हैं। 217 में से उन्हें 142 सदस्यों ने समर्थन दिया है और कैलाश टीम 'क्लीन बोल्डÓ हो चुकी है।

जीत-हार के राजनैतिक मायने 
सिंधिया की जीत और कैलाश की हार के गहरे राजनैतिक मायने भी हैं। कैलाश 100 करोड़ रुपए के सुगनीदेवी जमीन घोटाले में जांच से गुजर रहे हैं और चाहते थे कि इस चुनाव के जरिए ताकत दिखाकर 'बचÓ जाएं। हार से उनके धुर विरोधियों को ताकत मिलेगी। कैलाश की यह पहली हार है। उधर, सिंधिया की जीत से इंदौर में कांग्रेस के 'ध्रुवीकरणÓ का दौर शुरू होने की संभावना है।

कार्यकारिणी, संस्थाओं पर सिंधिया का कब्जा

पद/संस्था                          जीते                                   हारे
अध्यक्ष                           ज्योतिरादित्य सिंधिया (१४३)    कैलाश विजयवर्गीय (७२)
चेयरमैन                          एमके भार्गव (१४१)                  अशोक जगदाले (७०)
उपाध्यक्ष एक                    विजय नायडू (१२९)                रमेश भाटिया (५९)   
उपाध्यक्ष दो                      भगवानदास सुतार (१४७)       विजय बडज़ात्या (५३)
उपाध्यक्ष तीन                  श्रवण गुप्ता (११९)                    अनुराग सुरेका (६१)
सचिव                            नरेंद्र मेनन (१३३)                    अमिताभ विजयवर्गीय (६१)
कोषाध्यक्ष                      वासु गंगवानी (१४९)                चंद्रशेखर भाटी (३१)
सहसचिव एक                 अल्पेश शाह (१२४)                  अमरदीप पठानिया (५३)
सहसचिव दो                   नरेंद्र दुआ (१३७)                     संजय लुणावत (४०)
मैनेजिंग कमेटी एक        गुलरेज अली (151)                  गोपालदास मोहता (66)
मैनेजिंग कमेटी दो          भोलू मेहता (158)                    डॉ. अपूर्व वोरा (67)
मैनेजिंग कमेटी तीन       मिलिंद कनमड़ीकर (144)         मानवेंद्रसिंह बैस (55)
मैनेजिंग कमेटी चार        अनिल जोशी (129)                  ————-
क्लब संस्था एक             स्टार क्लब (121)                   वैष्णव हायर सेकंडरी (53)
क्लब संस्था दो               सीसीआई (147)                     डीएवीवी (50)
क्लब संस्था तीन            वायएमसीए (140)                 एसजीएसआईटीएस (35)
क्लब संस्था चार            सिंधिया स्कूल (151)              जहांगीराबाद क्लब जब. (28)
(कोष्टक में वोट संख्या। कुल वोट 215। तृतीय मोर्चे के कुछ को नाममात्र वोट)


साधारण सभा में कैलाश को मांगना पड़ी माफी
- सिंधिया के भाषण में रुकावट डालने का भुगता खामियाजा

मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) की वार्षिक साधारण सभा में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को खुद के बरताव के कारण शर्मिंदा होना पड़ा। वे एमपीसीए अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाषण में व्यवधान पैदा कर रहे थे। बाद में कैलाश को गलती का अहसास हो गया और उन्होंने माफी भी मांगी।

दरअसल, साधारण सभा में रीवा डिवीजन की क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव कमल श्रीवास्तव अंतरराष्टï्रीय मैच में टैक्स से जुड़े एक मुद्दे पर कुछ प्रश्न पूछ रहे थे। सिंधिया ने उन्हें यह कहते हुए समझाइश दी कि अभी बात पूरी हो जाने दीजिए। इस पर कैलाश अचानक खड़े हो गए। उन्होंने कहा यह अलोकतांत्रिक है, सभी को बोलने का मौका दिया जाना चाहिए। शुरू से अंग्रेजी में भाषण दे रहे सिंधिया ने इस पर हिंदी में कहा कैलाशजी, यह इंदौर डिवीजन क्रिकेट एसोसिएशन (आईडीसीए) नहीं है, एमपीसीए है। यहां कुछ नियम कायदे हैं, उन्हीं के तहत मैं बात कर रहा हूं। जब आपका मौका आएगा, तब बोलिएगा। गरिमा बनाकर रखें। इस पर कैलाश मौन हो गए। कुछ ही देर में उन्हें गलती का अहसास भी हो गया और 'समझदारीÓ दिखाते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने व्यवहार पर माफी मांगी।

'लोकतंत्र के लिए किया यह सबकुछÓ
बाहर आने के बाद माफी मांगने के सवाल पर कैलाश ने मीडिया को बताया पहली बार एमपीसीए की साधारण सभा लोकतांत्रिक तरीके से हुई। मैंने इसी के लिए प्रयास किया और मैं उसमें कामयाब भी रहा।

सिंधिया को देखने उमड़े कांग्रेसियों पर बरसी लाठियां
करीब 9.30 बजे सिंधिया बाहर आए और कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंचे। उन्होंने पुलिस के एक वाहन पर खड़े होकर सभी का अभिवादन किया। कार्यकर्ता उन्हें देखने उमड़े, जिससे अनियंत्रण की स्थिति बनी। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, नहीं माने तो लाठियां बरसाई। बाद में कांग्रेस नेताओं ने कार्यकर्ताओं को काबू किया। सिंधिया के साथ सांसद सज्जन वर्मा और विधायक अश्विन जोशीï, तुलसी सिलावट, सत्यनारायरण पटेल भी मौजूद थे।


सिंधिया ने ठुकराई समझौते की पेशकश

केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की दावेदारी के कारण देशभर में चर्चित हो चुके मप्र क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) के चुनाव की प्रक्रिया रविवार को इंदौर के उषाराजे स्टेडियम में शुरू हुई। साधारण सभा के दौरान चुनाव टालने के लिए सिंधिया से कई सदस्यों ने आग्रह किया, लेकिन उन्होंने समझौते की पेशकश को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा, चुनाव लड़कर ही अध्यक्ष बनूंगा। किसी से किसी पद के लिए कोई समझौता नहीं होगा। उधर, एमपीसीए की साधारण सभा के दौरान कैलाश को अपने ही व्यवहार के कारण माफी मांगना पड़ी।

स्टेडियम में प्रात: 10.30 बजे एमपीसीए की मैनेजिंग कमेटी की बैठक होना थी, लेकिन 8 बजे से ही यहां गहमागहमी शुरू हो गई थी। सिंधिया के समर्थन में वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेश जोशी की अगुवाई में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता जुट गए थे। विजयवर्गीय समर्थक स्टेडियम के बाहर नहीं फटके। प्रात: 10.45 बजे मैनेजिंग कमेटी की बैठक हुई। इसमें कुछ प्रस्ताव पास किए गए और दोपहर 12.30 बजे साधारण सभा शुरू हो गई। राज परिवार की उषाराजे और संतोष मल्होत्रा समेत कई वरिष्ठ सदस्यों ने एमपीसीए के मौजूदा अध्यक्ष सिंधिया से आग्रह किया कि आज तक कभी एमपीसीए के चुनाव नहीं हुए। इसी परंपरा को आगे भी निभाया जाए। इस दौरान कैलाश के चेहरे के हावभाव बता रहे थे कि वे भी चुनाव के पक्ष में नहीं है। बैठक में हिस्सा लेने जाने के पहले ही कैलाश ने मीडिया को कहा भी था हम शुरू दिन से चुनाव के पक्ष में नहीं हैं। हमने सारे विकल्प खुले रखे हैं। सिंधिया ने परंपरा निभाने के प्रस्ताव को नकारते हुए कहा, पंद्रह दिन से जो बातें हो रही हैं, उसे देखते हुए चुनाव अनिवार्य है और बगैर चुनाव के मैं अध्यक्ष नहीं बनना चाहता। आखिर दोपहर 2.40 बजे चुनाव की घोषणा हो गई। दिलीप चुडकर को रिटर्निंग अधिकारी नियुक्त कर दिया गया और दोपहर 3.15 बजे तक नामांकन भरने का समय निर्धारित किया गया। 3.45 बजे तक नाम वापसी का समय तय किया गया। शाम 5.45 से मतदान शुरू हुआ।

जगदाले के लिए बदली रणनीति
चुनाव की घोषणा के बाद सिंधिया पैनल ने तत्काल रणनीति बदलते हुए सचिव पद के लिए पहले से घोषित उम्मीदवार संजय जगदाले को हटा लिया। उनके स्थान पर नरेंद्र मेनन को उतारा गया। दरअसल, जगदाले लगातार दो बार से सचिव पद पर पदस्थ हैं और इस बार फिर से सचिव बनने के लिए उन्हें दो तिहाई वोट हासिल करना अनिवार्य है। चुनाव में किसी किस्म का चौखिम मोल नहीं लेने की रणनीति के तहत सिंधिया ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया।

उषाराजे स्टेडियम का नया नाम होल्कर स्टेडियम
करीब पौने दो घंटे चली मैनेजिंग कमेटी की बैठक में तय किया गया कि उषाराजे स्टेडियम का नाम होल्कर स्टेडियम कर दिया जाएगा। पूर्व क्रिकेटर एसपी चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई, जो स्टेडियम में मौजूद बॉक्सों के नामकरण के लिए क्रिकेटरों के नाम सुझाएगी। यह भी तय हो गया कि इंदौर और ग्वालियर में स्टेडियम के लिए 25-25 एकड़ जमीन का इंतजाम एमपीसीए द्वारा किया जाएगा। 


वेशभूषा में स्मार्ट दिखे सिंधिया

सिंधिया फारमल पेंट शर्ट के साथ ही गहरे नीले रंग का कोट पहनकर आए थे, जबकि कैलाश पारंपरिक अंदाज में सफेद कुर्ते पायजामे पर केशरिया दुपट्टा डालकर। दोनों की वेशभूषा भी चुनावी चर्चा में शामिल रही। लोगों का कहना था एमपीसीए की गरिमा के अनुसार तो जेंटलमेन और स्मार्ट सिंधिया को ही ज्यादा अंक मिलेंगे।

'चुनाव होना ही चाहिए नहीं तो मैं चलाÓ
खेल प्रशाल और आईडीए बिल्डिंग के मेनगेट पर जैसे ही सिंधिया पहुंचे, महेश जोशी से उनकी मुलाकात हुई। जोशी ने सिंधिया को कहा चुनाव होना ही चाहिए, नहीं तो मैं चला जाऊंगा। किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करना है। सिंधिया ने भी उन्हें आश्वस्त किया कि आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा।


सुबह से चलते रहे बयानों के बाउंसर

प्रात: 10.10 बजे : कैलाश विजयवर्गीय
उपाध्यक्ष पद के दावेदार रमेश भाटिया के साथ गाड़ी से उतरे और बोले हम तो शुरू दिन से ही चुनाव नहीं चाहते हैं। इंदौर को मिला स्टेडियम, एकेडेमी और जिम सबकुछ बीसीसीआई ने दिया है, एमपीसीए ने कुछ नहीं दिया। निर्वाचित होने पर पांच वर्ष में पांच अंतरराष्टï्रीय क्रिकेटर तैयार करूंगा। गरीब खिलाडिय़ों के लिए फंड बनाऊंगा।

प्रात: 10.35 बजे: ज्योतिरादित्य सिंधिया
दूसरे बैरिकेट्स के यहां से पैदल चलकर मेनगेट तक पहुंचे। मीडिया से अनौपचारिक चर्चा में बोले अब तो चुनाव हो ही जाए। कुछ ही घंटों में सबके सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। वे आत्मविश्वास से भरे थे और अपने पीए पाराशर के साथ स्टेडियम में प्रविष्ठ हुए। 

प्रात: 11 बजे: सज्जन वर्मा
देवास क्रिकेट एसोसिएशन की नुमाइंदगी की। पैदल आने का कारण पूछा तो बोले कुछ लोगों को सड़क पर लाना है। कहा यह कांग्रेस-भाजपा की लड़ाई नहीं है, क्रिकेटर और गैर क्रिकेटर की जंग है। विजयवर्गीय बताएं कि डेढ़ वर्ष से इंदौर डिवीजन में होने के बावजूद उन्होंने मैदान के लिए जमीन का इंतजाम क्यों नहीं किया?

प्रात: 11.10 बजे: महेश जोशी
मेनगेट पर करीब तीन घंटे तक तैनात रहे। मीडिया से कहा पहले चूक गया था, तो ओलंपिक संघ में गंदगी घूस गई, अब यहां नहीं घुसने दूंगा। कुछ उठाईगिरे किस्म के लोग क्रिकेट की फिजा बिगाडऩा चाहते हैं, उन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।

प्रात: 11.15 बजे: अशोक जगदाले
कैलाश पैनल से चेयरमैन पद के दावेदार बनकर आए और कहा चुनाव लड़कर ही लौटूंगा। इंदौर के खिलाडिय़ों के साथ भेदभाव हुआ और यह सहन नहीं किया जा सकता।

दोपहर 12 बजे : अश्विन जोशी
वोटर ने नाते भीतर गए। हाथ में 'पत्रिकाÓ अखबार की वे खबरें थी, जिनमें कैलाश के घोटाले प्रकाशित हुए। साफगोई से बोले नेताओं को खेल से दूर हो जाना चाहिए। मैं खुद भी इसके लिए तैयार हूं। सिंधिया जेंटलमेन और क्रिकेटर हैं, इसलिए एमपीसीए का अध्यक्ष पद उनका हक है।

दोपहर 2.45 बजे : श्रवण गुप्ता
एमपीसीए के पूर्व अध्यक्ष ने बताया साधारण सभा सद्भावना पूर्ण तरीके से पूरी हुई। विजयवर्गीय कुछ उखड़े थे, लेकिन बाद में गलती मानकर शांत हो गए। 85 प्रतिशत वोटर आ चुके हैं।  


कांग्रेस एकजुट, कैलाश के कारण बिखरी भाजपा
गुटों में बंटी कांग्रेस को भी चुनाव के नाम एकजुटता दिखाने का मौका मिल गया। दिग्गी, पचौरी गुट ने सिंधिया से साथ कंधे से कंधा मिलाकर मैदान संभाला। प्रमोद टंडन, विपीन खुजनेरी, नरेंद्र सलूजा, रघु ठाकुर, संजय शुक्ला, कृपाशंकर शुक्ला, अंतरसिंह दरबार, पंकज संघवी, नरेंद्र सलूजा, अभय दुबे, भल्लू यादव, अभय वर्मा, छोटे यादव के साथ ही विधायक सत्यनारायण पटेल भी मौजूद थे। उधर, भाजपा में बिखराव दिखा। सुमित्रा महाजन, भवंरसिंह शेखावत, सुदर्शन गुप्ता जैसे नेता कैलाश विजयवर्गीय के कारण क्रिकेट के इस मैदान से दूर हो गए। इतना ही नहीं भाजपा ने अंदरूनी तौर पर यह भी तय कर लिया था कि शहर हित में कैलाश को सबक सिखाने का यह सही मौका है।

सिलावट ने संभाली कमान
सिंधिया के कट्टर समर्थक तुलसी सिलावट ने कमान संभाल रखी थी। वे वोटरों को एक-एक करके बुलाते रहे और उन्हें ससम्मान भीतर भेजते रहे। हालांकि, बीच में उनकी एक-दो बार पुलिस से बहस भी हो गई। उनके गनमैन को जब पुलिस ने बेरिकेट्स के बाहर करना चाहा तो सिलावट ने कहा मेरा गनमेन मेरे साथ नहीं रहेगा, तो कहां जाएगा।

सागर, बदनावर, महिदपुर के विधायक भी पहुंचे
सिंधिया के समर्थन में सागर के विधायक गोविंदसिंह राजपूत, बदनावर धार के राजवद्र्धनसिंह दत्तेगांव और महिदपुर की कल्पना पैरूलकर भी पहुंची। उज्जैन के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती भी मौजूद थे।


तीन स्थानों पर पुलिस चेकिंग 
स्टेडियम में जाने वाले हर सदस्य की चेकिंग के लिए तीन चरण तय किए गए थे। एक रेसकोर्ट रोड मुहाने पर, दूसरा खेल प्रशाल के मेनगेट के पास में और तीसरा उषाराजे स्टेडियम का मेनगेट। बगैर पहचान पत्र बताए किसी भी पहले गेट से ही अंदर नहीं जाने दिया गया। मीडिया सदस्यों को दूसरे चरण तक की अनुमति थी, जबकि एमपीसीए के वोटर ही तीसरे चरण के पार जा सके।

बार-बार जाम हुआ ट्रैफिक
रेसकोर्स रोड पर प्रात: 11 बजे से ही ट्रैफिक का हाल बिगडऩे लगा था। पुलिस ने कई बंदोबस्त किए, लेकिन वे भी नाकाफी साबित हुए। दोपहर 12 बजे बाद बैरिकेडिंग की गई और इसके बाद कुछ देर के लिए हालात काबू रहे, किंतु बाद में फिर से स्थिति बिगड़ गई।

बारिश से मची अफरातफरी
दोपहर 2.15 बजे हल्की बारिश शुरू होते ही कुछ देर के लिए अफरातफरी मच गई। कांग्रेसी आसपास के शापिंग कॉम्प्लेक्सों की ओर दौड़े और खुद को भीगने से बचाया। हालांकि, बारिश कुछ मिनिटों में ही बंद हो गई और फिर से लोग सड़के आसपास जुट गए।

95 वर्षीय दुबे भी पहुंचे
टसल में तबदील हो चुनाव में वोट देने के लिए 95 वर्षीय एमएम दुबे भी स्टेडियम पहुंचे। उन्होंने कहा क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए मैं यहां आया हूं।


कैलाश बोले, मैं हार-जीत के लिए चुनाव नहीं लड़ा

वोटिंग समाप्त होने के तत्काल बाद कैलाश विजयवर्गीय स्टेडियम से बाहर आए और मीडिया से मुखातिब हुए। पराजित योद्धा की मुद्रा में उन्होंने कहा मैं हार-जीत के लिए चुनाव नहीं लड़ा था। मैं तो उसी दिन जीत गया था, जब सिंधिया जैसे 'महाराजाÓ को सड़क पर उतर कर वोट मांगना पड़े। खुद की मर्जी से नहीं, मैं तो क्रिकेटरों के लिए मैदान में उतरा। साधारण सभा में उनके द्वारा माफी मांगने की घटना पर वे बोले पहली बार साधारण सभा में लोकतांत्रिक तरीके से चर्चा हुई।

कैलाश को नहीं मिला उम्मीदवार
कैलाश पैनल की बुरी हालत का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें मैनेजिंग कमेटी के लिए पूरे चार उम्मीदवार भी नहीं मिले। उन्होंने गोपालदास मेहता, डॉ. अपूर्व वोरा व मानवेंद्रसिंह बैस को ही मैदान में उतारा, जबकि सिंधिया पैनल की ओर से हर पोस्ट के लिए उम्मीदवार मैदान में था।


 
 
 
पत्रिका : २३ अगस्त २०१०
साथ में विकास मिश्रा 

हड़ताली 30 जूनियर डॉक्टर निलंबित

- पांच दिन से कर रखी सेवाएं ठप, सरकार का कड़ा फैसला


पांच दिन से 20 सूत्रीय मांगों को लेकर हड़ताल कर रहे एमजीएम मेडिकल कॉलेज के 30 जूनियर डॉक्टरों को शनिवार रात सरकार ने निलंबित कर दिया है। ये सभी जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के पदाधिकारी है। इनसे होस्टल भी खाली करवाए जाएंगे। हड़तालियों को उकसाने का आरोप मढ़ कर सिनीयर रेसीडेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष को भी निष्काषित किया गया है।  

हड़ताल के कारण मरीजों की दुर्दशा देखते हुए शासन ने यह कड़ा निर्णय लिया है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत ने बताया शासन के निर्देश के आधार पर देर रात कॉलेज काउंसिल की बैठक बुलाई गई। इसमें निलंबन और बर्खास्तगी का फैसला किया गया। ज्ञात रहे शुक्रवार को चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य राज्यमंत्री महेन्द्र हार्डिया चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव आईएस दाणी और स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव एसआर मोहंती के साथ जूडॉ की बैठक बेनतीजा रहने और जूडा के हड़ताल खत्म नहीं करने को शासन ने गंभीर लापरवाही माना है। डीन ने बताया जो जूडॉ काम पर लौटेंगे, उन्हें पूरी सुरक्षा दी जाएगी। मेडिसिन विभाग में पदस्थ एक लेडी डॉक्टर को भी नोटिस दिया जा रहा है, क्योंकि वे पंद्रह दिन से सेवा पर नहीं आई हैं।


व्हिसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला  
हड़ताल करने वालों के साथ ही सिनीयर रेसीडेंट एसोसिएशन अध्यक्ष डॉ. आनंद राय को भी बर्खास्त कर दिया गया है। राय पर आरोप है कि उन्होंने हड़तालियों को उकसाया। डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर (भ्रष्टाचार सचेतक) हैं, जो सरकारी तंत्र की बुराइयों को उजागर करते रहते हैं। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में जारी ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे के खुलासे में भी डॉ. राय की अग्रणी भूमिका रही है। विभाग के कई डॉक्टरों ने हड़ताल को एक मौके के रूप में लिया और अनावश्यक आरोप लगाकर बर्खास्त करवा दिया। डॉ. राय ने 'पत्रिकाÓ को बताया हड़ताल के दौरान में मैं लगातार ड्यूटी दे रहा हूं। ओपीडी और इमरजेंसी सेवा दे रहा हूं, फिर भी मुझे बर्खास्त कर दिया।

इन्हें किया निलंबित
जेडीए अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया, उपाध्यक्ष जितेंद्र चौहान, सचिव मुकेश शर्मा, कोषाध्यक्ष विजय शंकर, अपूर्व गर्ग, सहायक सचिव पल्लवी चौधरी, अक्षय गुप्ता, गिरीश चतुर्वेदी, लक्ष्मण अहिरवार, संयुक्त सचिव अनिता सिंह, संक ल्प जोशी, भूपेंद्र चौहान, अफसर खान, सलाहकार अंकित वर्मा, कीर्तिमानसिंह, हिमांशु अग्रवाल, विनय वर्मा, दीपक कुमार, कमेटी कार्डिनेटर अमित यादव, निकेत राय, शिवानी पांडे, यश श्रीवास्तव, एक्जीक्यूटिव सदस्य गौरी राय, विद्या शर्मा, श्रद्धा दक्षा, विभूति तोमर, किशोर जैशी, दीपक शर्मा, मनोज गुप्ता, मनीष करोठिया।

' जितनी कड़ी कार्रवाई करेंगे, उतनी ही मजबूती से हम लड़ेंगे। हमारी मांगे जायज हैं। दरअसल, सरकार बातचीत से मसलों का हल निकालना नहीं चाहती है। मांगे पूरी नहीं होने तक हड़ताल पूरे राज्य में जारी रहेगी।Ó
- डॉ. विक्रांत भूरिया, प्रदेश अध्यक्ष, जेडीए


 पत्रिका: २२ अगस्त २०१०

इंदौर के मास्टर प्लान पर नवंबर में होगी सुनवाई

- सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद सरकार ने तय की रणनीति
- शहर के विकास में असमंजस्य के हालात


एक जनवरी 2008 को लागू हुई इंदौर विकास योजना 2021 (मास्टर प्लान) पर आई करीब 800 आपत्तियों पर नवंबर में सुनवाई होगी। यह काम इंदौर कलेक्टर की अगुवाई वाली करीब 85 सदस्यों की कमेटी द्वारा किया जाएगा। कमेटी की सिफारिशों पर आवास एवं पर्यावरण विभाग अंतिम निर्णय लेगा और फिर से मास्टर प्लान का गजट नोटिफिकेशन होगा। 

मास्टर प्लान पर मप्र हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज होने के बाद राज्य सरकार के आवास एवं पर्यावरण विभाग ने यह सैद्धांतिक फैसला कर लिया है। विभाग शीघ्र ही नई कमेटी की घोषणा भी करेगा। विभाग के मंत्री जयंत मलैय्या ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक ही अगली कार्रवाई करने के निर्णय की पुष्टि की है।

2000 एकड़ जमीन पर ही असर
विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने 'पत्रिकाÓ को बताया जो अनुमतियां दी जा चुकी हैं, वे रद्द नहीं होंगी। मोटे तौर पर करीब एक लाख एकड़ निवेश क्षेत्र पर मास्टर प्लॉन लागू किया गया है और जो आपत्तियां हैं, वे 2000 एकड़ पर ही हैं, यानी महज दो फीसदी क्षेत्र में। 



शहर के विकास में पांच अड़चनें

अड़चन एक : हरियाली
ज्यादातर आपत्तियों आमोद प्रमोद क्षेत्र (ग्रीन बेल्ट) को लेकर है। आपत्तिकर्ता चाहते हैं कि जमीनों को आवासीय या वाणिज्यिक कर दिया जाए। ऐसा होता है तो शहर के पर्यावरण की संतुलन बिगड़ेगा।

अड़चन दो : आईडीए की योजनाएं 
मास्टर प्लान के हिसाब से आईडीए के मेडिकल हब, ट्रांसपोर्ट हब, स्कीम-168, सुपर कॉरिडोर के आसपास लगने वाली स्कीम 169-ए पर भी प्रभाव पर पड़ सकता है। 

अड़चन तीन : जोनल प्लान
 नगर निगम ने जोन प्लान का मसौदा तैयार कर लिया है। 12 यूनिट को लेकर कुछ निजी कंपनियों से करार भी कर लिया है। अब जोन प्लान पर भी रोक लग जाएगी। मास्टर प्लान में संशोधन होते हैं तो  मसौदों में बदलाव करना पड़ेगा।

अड़चन चार: हाईराइज इमारतें
 प्लान लागू हुए ढाई वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान नगर निगम और टीएंडसीपी से हाईराइज इमारतें और टाउनशिप के नक्शे पास हुए हैं। उन पर भी असर पड़ सकता है। फिर से सुनवाई होने की दशा में भू-उपयोग बदल सकता है। ऐसे में कुछ प्रोजेक्ट अटक सकते हैं। 

अड़चन पांच : विकास प्रोजेक्ट
विभिन्न योजनाओं के तहत शासकीय निर्माण एजेंसियों ने जो प्रस्ताव राज्य व केंद्र सरकार से स्वीकृत कराए या भेजे हैं उन पर पुनर्विचार हो सकता है।


'सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी खारिज होने और हाईकोर्ट की युगलपीठ का फैसला देखने के बाद ही तय होगा कि निगम के किन कामों पर असर पड़ेगा।Ó
- सीबी सिंह, निगमायुक्त इंदौर 
'मास्टर प्लान के लैंडयूज के हिसाब से ही हम योजनाएं घोषित करते हैं। सुनवाई के बाद भू उपयोग बदला तो योजना बदल देंगे, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई आसार नजर नहीं आ रहा।Ó
- चंद्रमौली शुक्ला, सीईओ, आईडीए

' सुप्रीम कोर्ट का फैसला शिरोधार्य है। उसके मुताबिक ही सरकार आगे की कार्रवाई करेगी।Ó
- जयंत मल्लैया, मंत्री, आवास एवं पर्यावरण विभाग


अफसरों गलतियों का खामियाजा भुगतेगा शहर
- प्रशासनिक अनदेखी के कारण ढाई वर्ष पहले लागू मास्टर प्लान के कुछ हिस्से पर फिर से होगी सुनवाई


आवास एवं पर्यावरण विभाग के अफसरों की गलतियों का खामियाजा इंदौर को भुगतना पड़ेगा। साढ़े तीन वर्ष से अफसर नियमों की अनदेखी करते रहे और अब मास्टर प्लान की सुनवाई की नौबत आ गई। इससे शहर के विकास कार्यों पर असर होगा और आशंका है कि कुछ कार्य रूक भी जाएंगे।
दरअसल, मास्टर प्लान का प्रारूप तैयार करने वाले अफसरों ने वर्ष 2007 में ही गलती करना शुरू कर दी थी। कुछ जानकार इसे गलती के बजाए 'जमीनों का खेलÓ भी कहते हैं। यह गलती आगे बढ़ती गई। मास्टर प्लान पर जनसुनवाई, आपत्तियां, इसके बाद फिर से कमेटी का गठन, हाईकोर्ट की एकल पीठ में फिर से सुनवाई का सुझाव, युगल पीठ में फिर से नया जवाब जैसे कई चरणों पर गलतियां हुई।

चार चूकों से उलझा मास्टर प्लान

चूक एक : धारा 19(2) का पालन नहीं किया

 टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के रिटायर इंजीनियर जयवंत होलकर ने बताया मप्र ग्राम एवं नगर निवेश अधिनियम की धारा 19(2) के तहत शासन द्वारा सुनवाई के उपरांत ही मास्टर प्लान की अधिनियम की धारा 19(5) के तहत अंतिम रूप से मंजूर किया जा सकता है। इसके बाद मास्टर प्लान के प्रावधानानुसार विकास अनुज्ञा जारी होती है। इस प्रक्रिया का पालन नहीं करने के कारण ही यह स्थिति निर्मित हुई है।

चूक दो : कोर्ट के सामने कमजोर साबित

महानगर विकास परिषद के मानद सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया जो आपत्तियां लगी हैं, उन्होंने उस ड्राफ्ट को आधार बनाया है, जो महज प्रस्ताव ही था। इसमें 1991 में के प्लान के कुछ आमोद-प्रमोद के स्थानों ग्रीन लैंड को आवासीय दर्शाया गया। सुनवाई प्रक्रिया के बाद इन भू उपयोगों को पुन: आमोद प्रमोद कर दिया गया, क्योंकि पुराने प्लान में इनमें फेरबदल नहीं किया जा सकता था। वैसे भी इनके उपयोग पर 1975 के पहले ही सुनवाई प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ऐसे में आपत्तियों का आधार ही गलत है। सरकार की ओर से यह बात कोर्ट में रखी जाती है, तो संभवत: स्थिति कुछ और बनती। 

चूक तीन : हाईकोर्ट में दी सुनवाई पर सहमति

वरिष्ठ एडवोकेट मनोहर दलाल बताते हैं 20 याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सरकारी वकील ने जवाब दिया कि सुनवाई की जाएगी। इस पर 17 जून 2008 को जस्टिस विनय मित्तल की एकल पीठ ने अधिनियम की धारा 19(2) में सुनवाई करने को कहा था। आपत्तियां दर्ज कराने का अंतिम दिन 4 जुलाई 2008 तय किया गया था और 30 सितंबर तक इस पर सुनवाई होना थी। सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए युगल पीठ में 11 अपीलें दर्ज की। वहां सरकारी वकील ने कहा दिया धारा 18(2) में सुनवाई करेंगे। दोनों बार सरकार ने सुनवाई को मंजूरी दी, इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने केस खारिज कर दिया।


चूक चार: तीन सदस्यी कमेटी का गठन

एक आपत्तिकर्ता ने बताया मास्टर प्लान पर सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने की तारीख 5 फरवरी 2007 की समय सीमा के बाद कई लोगों ने सरकार को शिकायत की। इस पर सरकार ने 24 मई 2007 को अपर संचालक डीके शर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यी कमेटी का गठन किया। याचिकाकर्ताओं ने इस कमेटी को आधार बनाकर ही कोर्ट में मास्टर प्लान को चुनौती दी। तर्क था कि 7 जुलाई 2007 को प्रस्तावित और 01 जनवरी 2008 को जारी किए गए मास्टर प्लान में उन स्थानों के भू उपयोग बदल दिए गए, जिनको लेकर आपत्ति दर्ज ही नहीं की गई।



 पत्रिका: २२ अगस्त २०१०

शनिवार, 21 अगस्त 2010

हाईकोर्ट से जुड़ी तीन छोटी खबरें

सिविल जज प्री का रिजल्ट घोषित

मप्र हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सिविल जज वर्ग (दो) के 57 पदों की भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम घोषित कर दिया। परीक्षा रजिस्ट्रार बीएस भदौरिया ने बताया 8 अगस्त 2010 को हुई परीक्षा में 630 उम्मीदवारों को मुख्य परीक्षा के लिए योग्य पाया गया है। उम्मीदवारों की सूची हाईकोर्ट की वेबसाइट और सूचना पटल पर उपलब्ध है।


कमल पटेल केस पर आगे बढ़ी सुनवाई

दुर्गेश जाट हत्याकांड में जेल में बंद भाजपा विधायक कमल पटेल की जमानत की एक याचिका पर शुक्रवार हाईकोर्ट में सुनवाई आगे बढ़ गई। वरिष्ठ एडवोकेट जयसिंह के जरिए दायर इस याचिका पर कोर्ट ने सीबीआई से केस डायरी मांगी है। जस्टिस शुभदा वाघमारे की कोर्ट में केस रखा गया था।


स्टॉफ नर्स नियुक्ति में पुरुषों को अंतरिम राहत

स्वास्थ्य विभाग में स्टॉफ नर्स के पदों के लिए जारी भर्ती प्रक्रिया में हाईकोर्ट ने पुरुष उम्मीदवारों को अंतरिम राहत दी है। भर्ती में केवल महिला उम्मीदवारों को योग्य माना जा रहा था। जस्टिस एससी शर्मा की कोर्ट ने आदेश दिया है कि भर्ती प्रक्रिया में पुरुषों को भी शामिल किया जाए, लेकिन कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक उन्हें नियुक्त न दी जाए। कोर्ट ने 25 अक्टूबर के सप्ताह में अगली सुनवाई रखी है।

पत्रिका : २१ अगस्त २०१०

चंदे जुटाने के लिए तैनात किए नोडल अधिकारी

- मंदसौर में मंदिर नवनिर्माण के नाम पर प्रशासनिक जबरदस्ती


मंदसौर जिले के सरकारी दफ्तरों से चल रहे चंदे के धंधे को कामयाब बनाने के लिए मंदसौर, मल्हारगढ़, सीतामऊ और गरोठ में बकायदा नोडल अधिकारी नियुक्ति किए गए हैं। ये नोडल अधिकारी किसी विभाग के सरकारी अधिकारी हैं। इनका काम विभिन्न सरकारी दफ्तरों में रसीद कट्टे पहुंचाना और वहां से रुपए इकठ्ठे करके जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली श्रीपशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध समिति को भेजना है।

'पत्रिकाÓ ने शुक्रवार को ही खुलासा किया था कि पशुपतिनाथ मंदिर के नवनिर्माण के लिए सावन माह में मनोकामना अभिषेक का कार्यक्रम शुरू किया गया है। एक अभिषेक के 2100 या 1100 रुपए तक लिए जा रहे हैं और चंदे का सारा कार्य जिले के सरकारी दफ्तरों से ही संचालित हो रहा है। अब जानकारी मिली है कि कलेक्टर के मौखिक आदेश से बकायदा सभी ब्लॉकों में एक अफसर को नोडल अधिकारी बनाकर चंदा जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह अधिकारी सात-सात दिन में चंदे का हिसाब जिला मुख्यालय पहुंचाता है।

दो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को एक रसीद
सभी कर्मचारियों को रसीद कटवाना अनिवार्य किया गया है। यहां तक कि मामूली मानदेय पाने वाले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को भी रुपए देना जरूरी है। नोडल अधिकारियों ने फार्मूला निकाला लिया है कि दो मिलकर एक रसीद कटवा लो।


रात-दिन इसी काम में लगे हैं
प्रश्न: क्या आप मनोकामना अभिषेक के लिए रुपए जुटा रहे हैं?
उत्तर: हां, गरोठ, भानपुरा, शामगढ़ के लिए मैं ही नोडल अधिकारी हूं। वैसे, मेरा पद पंचायत विभाग में समन्वयक अधिकारी का है।
प्रश्न: आपको नोडल अधिकारी किसने बनाया?
उत्तर: एसडीएम एएस ओहरिया और जनपद पंचायत सीईओ धर्मपाल मशराम ने।
प्रश्न: अब तक कितने रुपए जुटा लिए हैं?
उत्तर: 40 लाख रुपए इकठ्ठे हो गए हैं। अब तक 2100 जोड़ों को अभिषेक के लिए मंदसौर भेज चुके हैं।
प्रश्न: रुपए इकठ्ठे करने का काम कैसा चल रहा है?
उत्तर: सरपंच, सचिव से लेकर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तक से रुपए ले रहे हैं। सभी काम में लगे हैं।
प्रश्न : इन दिनों आप तो बहुत व्यस्त होंगे ?
उत्तर : रात-दिन काम कर रहा हूं। यही काम चल रहा है। ï
(नोडल अधिकारी ओपी राठौर से चर्चा) 


पत्रिका: २१ अगस्त २०१० 

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

मनोकामना के लिए सरकारी चंदाखोरी

- मंदसौर जिले के हर सरकारी दफ्तर में काटी जा रही चंदे की रसीदें
- आस्था और श्रद्धा के नाम पर प्रशासनिक जबरदस्ती


एक नजर
सोसाइटी : श्री पशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध सोसाइटी, मंदसौर
पदाधिकारी : कलेक्टर (अध्यक्ष) और एसडीएम मंदसौर (सचिव)
इतने की रसीद : 1100 और 2100 रुपए
इस नाम पर : मंदिर में मनोकामना अभिषेक (25 जुलाई से 27 अगस्त तक)
यह है लक्ष्य : पांच करोड़ रुपए
चंदे का उद्देश्य: पशुपतिनाथ मंदिर के मास्टर प्लॉन को पूरा करना।
यहां से : भानपुरा, गरोठ, शामगढ़, सुवासरा, सीतामऊ, मल्हारगढ़ और मंदसौर के गांव-गांव से।
चंदे का जरिया:  सभी सरकारी दफ्तरों और सरपंच।
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मंदसौर जिले में इन दिनों सरकारी चंदे का धंधा जोरों पर हैं। चंदा धर्म के नाम पर किया जा रहा है और जुटाने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन ने ही ले रखी है। चंदे के लिए जिले के हर सरकारी दफ्तर में 'पूरी उगाहीÓ की हिदायत के साथ रसीद कट्टे पहुंचाए गए हैं। सावन मास की समाप्ति तक का लक्ष्य पांच करोड़ है और अब तक सवा दो करोड़ रुपए एकत्रित भी हो चुके हैं। चंदा देने वालों में ज्यादातर वे लोग शामिल हैं, जिन्हें बीते एक महीने में किसी काम के सिलसिले में सरकारी दफ्तर जाना पड़ा। चंदा दिए बगैर फिलहाल कोई भी सरकारी काम अघोषित रूप से 'असंभवÓ है।

चंदा जुटाने का काम मंदसौर की श्री पशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध सोसाइटी कर रही है। इसके अध्यक्ष जिला कलेक्टर और सचिव मंदसौर के अनुविभागीय अधिकारी हैं। सोसाइटी ने मंदिर का नया मास्टर प्लॉन बनाया है, जिसके लिए करोड़ों रुपए की जरूरत है। चूंकि हिंदु धर्मावलंबी सावन माह में  पशुपतिनाथ की भक्ति को मनोकामना पूरी करने का जरिया मानते हैं, इसलिए सोसाइटी ने भी इसका फायदा उठाने का 'षडय़ंत्रÓ रचा। ïजून-जुलाई से ही चंदे की रूपरेखा तैयार हो गई। रसीद कट्टे छापकर तैयार किए गए। कम से कम 1100 और अधिकतम 2100 रुपए का दाम रखा गया और पूरे जिले में 'मनोकामना अभिषेक वर्ष 2010Ó का ऐलान कर दिया गया। कट्टे सरकारी दफ्तरों से लेकर ग्राम पंचायतों तक में भेज दिए गए और शुरू हो गया 'सरकारी चंदाÓ। 

प्रशासन और धर्म से बंधे लोग
चंदा देने वाले मौन हैं, क्योंकि मुंह पर प्रशासन के डर का ताला डला है। कुछ लोग धर्म से जुड़ा मसला होने के कारण भी चुप हैं। सीतामऊ तहसील के एक सरपंच ने बताया मुझे 20 हजार रुपए इकठ्ठे करके देना है और मैं विरोध करूंगा तो मेरे सारे सरकारी काम रोक दिए जाएंगे। गरोठ तहसील की खजूरी पंचायत के एक पंच ने बताया दो रसीदें कटवाई हैं, लेकिन कुछ बोल नहीं सकता हूं। ऐसा किया तो गांव के लोग मेरे खिलाफ होकर कहेंगे, धर्म के काम में रोढ़ा बन रहे हो। 

पूर्व कलेक्टर ने जुटाए थे साढ़े चार करोड़
मनोकामना अभिषेक की योजना पूर्व कलेक्टर डॉ. जीके सारस्वत ने तैयार की थी। उनके कार्यकाल में पिछले वर्ष मनोकामना अभिषेक के नाम से साढ़े चार करोड़ रुपए जुटाए गए थे। सूत्रों का कहना है, इसी आंकड़े को पीछे छोडऩे के लिए इस वर्ष पांच करोड़ रुपए का लक्ष्य तय किया गया।

तहसील कार्यालयों पर लगती बसें
मनोकामना अभिषेक करवाने वालों को मंदसौर लाने- ले जाने के लिए भानपुरा, गरोठ, सीतामऊ और मल्हारगढ़ तहसील मुख्यालयों पर एक-दो दिन के अंतराल से बसें लगती हैं। इनका प्रबंध भी सरकारी महकमों द्वारा ही किया जाता है।



हम तो बस प्रेरित कर रहे हैं
देखिए यह धर्म का काम है और हम लोग केवल प्रेरक का काम कर रहे हैं। कोई विरोध करता है, तो उसकी रसीद नहीं काटी जाती है। विरोध होना था, तो हो जाता। अब तक 11 हजार जोड़े मनोकामना अभिषेक करने आ चुके हैं। वैसे भी यह मामला जिले के पूरे मीडिया और जनप्रतिनिधियों की जानकारी में है।
- एके रावल, सचिव, श्रीपशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध सोसाइटी एवं एसडीएम मंदसौर

रसीद कट्टे आए हैं। यह सब श्रद्धा का मामला है। कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की जा रही ह। वैसे भी इस रुपए से पशुपतिनाथ मंदिर का नवनिर्माण किया जाना है। अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि, व्यापारी सभी से रुपए लिए जा रहे हैं।
- अभयसिंह ओहरिया, एसडीएम, गरोठ

सावन साल में एक बार आता है और इस दौरान राशि जुटाई जा रही है। यह स्वेच्छा का काम है। पूरे जिले से ही रसीदें काटी जा रही हैं। रुपए आएंगे, तभी तो पशुपतिनाथ मंदिर का मास्टर प्लॉन पूरा हो सकेगा। ज्यादा जानकारी के लिए कलेक्टर से बात कर लें।
- एलपी बौरासी, एसडीएम, सीतामऊ

समिति के लोगों ने रसीद कट्टे भेजे हैं और यहां के लोग भी मनोकामना अभिषेक करने जा रहे हैं। रसीद कटवाने का किसी पर कोई दबाव नहीं डाला जा रहा है।
- एनएस राजावत, एसडीएम, मल्हारगढ़ 


'सभी की सहमति से शुरू कियाÓ
मुझे तो यहां आए अभी चार महीने ही हुए हैं। पूर्व कलेक्टर ने यह काम शुरू किया था। इसके लिए मैंने भी कुछ बैठकें बुलाई और सोसाइटी के सभी सदस्यों ने जब मंजूरी दी तो मनोकामना अभिषेक की रसीदों का कार्य शुरू किया गया। जो रुपया आएगा, उसे मंदिर में लगाया जाएगा और इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। सभी लोगों से कहा गया है कि वे किसी पर किसी किस्म का दबाव न डाले। मर्जी से जो देना चाहे, उसी से लें।
- महेंद्र ज्ञानी, अध्यक्ष, श्रीपशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध सोसाइटी एवं कलेक्टर मंदसौर


ये कैसे हो रहा है?
मुझे इस मसले की फिलहाल जानकारी नहीं है। दिखवाता हूं कि सरकारी दफ्तरों में यह काम कैसे चल रहा है। ऐसा होना नहीं चाहिए।
- टी. धर्माराव, संभागायुक्त, उज्जैन 


ऑफिस-ऑफिस चंदे की कहानी

दृश्य एक : रजिस्ट्रार ऑफिस
किसान: साहब, जमीन की रजिस्ट्री के ये कागज हैं, कृपा करें।
डिप्टी रजिस्ट्रार: सब काम हो जाएगा, पहले 2100 रुपए जमा करके रसीद लो।
किसान: यह किस बात की रसीद है, साहब। 
डिप्टी रजिस्ट्रार: पशुपतिनाथ मंदिर में मनोकामना अभिषेक की। यह जरूरी है।

दृश्य दो  : ग्राम पंचायत
ग्रामीण : सरपंच साहब, कूपन बना दो, ताकि परिवार को गेहूं, शक्कर आदि मिल सके।
सरपंच: वो, तो अभी बना देंगे। सचिव को कहने भर की देर है। परंतु, इसके बदले में पहले मनोकामना अभिषेक की रसीद कटवाना होगी।
ग्रामीण: मुझे मालूम था कि यह जरूरी है, इसलिए रुपए साथ में लेकर आया था।

दृश्य तीन : शिक्षा विभाग
शिक्षक: मेरा मेडिकल बिल अटका है, कृपया मंजूर कर दें। तीन बार अर्जी दे चुका हूं।
बीईओ: सही समय पर आए हो। अभी हो जाएगा। अकेले अर्जी से काम नहीं चलेगा। पहले 'मनोकामनाÓ तो पूरी कर लो।
शिक्षक: वह कैसे होगी?
बीईओ: बहुत आसान है। कलेक्टर साहब के यहां से यह रसीद कट्टा आया है। पशुपतिनाथ मंदिर में मनोकामना पूरी करने के लिए 2100 रुपए लगेंगे।
शिक्षक: यह तो बहुत ज्यादा है, करीब इतना ही तो मेरा बिल है।
बीईओ: ठीक है, 1100 रुपए वाली कटवा लो।

(सभी के नाम गोपनीय रखे हैं, ताकि उन पर प्रशासनिक दबाव न आए।) 

पत्रिका : २० अगस्त २०१०

सुरेश सेठ ने कहा - सीबीआई से करा लो जांच

- सुगनीदेवी जमीन मामले में हाईकोर्ट में उठी मांग
- मेंदोला, संघवी की याचिका पर पूरे दिन चली बहस, फैसला सुरक्षित



परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं पर गुरुवार को इंदौर हाईकोर्ट में पूरे दिन (प्रात: 10.40 से शाम 4.20 बजे तक) बहस चली। याचिकाकर्ताओं के वकीलों की दलीलों पर शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने कोर्ट के समक्ष एक नई मांग रख दी कि इस केस की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से करवा ली जाए, क्योंकि लोकायुक्त पुलिस के पास भ्रष्टाचार से जुड़े ऐसे कई प्रकरण लंबित हैं, जिनकी जांच आठ-आठ वर्ष से चल रही है। सेठ ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के मामले उठाने वाले व्यक्ति को हतोत्साहित करने के लिए ये याचिकाएं दायर की गई हैं। मामले में कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है। 

विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने 6 अप्रैल 2010 को लोकायुक्त पुलिस को मामले में जांच के आदेश दिए थे। नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी ने दो अलग-अलग याचिकाओं में इस आदेश को चुनौती दी थी। जस्टिस एसएल कोचर और जस्टिस शुभधा वाघमारे की युगलपीठ ने इन्हीं पर सुनवाई की। याचिकाओं में मूल शिकायतकर्ता सुरेश सेठ समेत लोकायुक्त, लोकायुक्त एसपी, पुलिस महानिरीक्षक को प्रतिवादी बनाया गया है। ज्ञात रहे मामले में 5 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने मेंदोला व संघवी समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया है। तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका की जांच अभी जारी है। 21 सितंबर को विशेष न्यायालय में अंतिम जांच प्रतिवेदन पेश होगा।

284 पेज में 21 न्यायिक दृष्टांत
सेठ ने कोर्ट में 284 पेज का एक जवाब प्रस्तुत किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के 21 न्यायिक दृष्टांत पेश किए गए हैं। ये सभी दृष्टांत मेंदोला और संघवी की याचिकाओं के तर्कों को चुनौती देते हैं।

 अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता
बहस के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध तो हुआ है और केवल प्रक्रिया का हवाला देकर अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने जीरो कायमी का हवाला देते हुए कहा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोई भी व्यक्ति थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कर सकता है। पहले वह जीरो नंबर पर कायम होती है और बाद में जिस क्षेत्र से संबंध होती है, वहां उसे भेजा जा सकता है। इस केस में लोकायुक्त पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। अब उसे शिफ्ट किया जा सकता है, खत्म तो नहीं किया जा सकता। 


मैं तो हर दर पर गया था,
किसी ने सुना ही नहीं
- सुगनीदेवी कॉलेज परिसर मामले में हाईकोर्ट के समक्ष सुरेश सेठ ने रखा तर्क
- मेंदोला और संघवी की वकीलों ने भी पूरी तैयारी के साथ रखा पक्ष



जमीन के इस मामले में मैंने तो हर दर पर शिकायत करके न्याय मांगा था, लेकिन किसी ने सुना ही नहीं। यहां तक कि मुख्यमंत्री तक के यहां से आज तक जवाब नहीं आया। वर्ष 2007 से मैं जिम्मेदार अफसरों और जनप्रतिनिधियों को पत्र लिख रहा हूं। सरकार से तीन वर्ष से लड़ रहा हूं। कहां जाऊं... क्या मैं गटर में चला जाऊं। जो वकील यहां पैरवी कर रहे हैं, वे बताएं कि जो जमीन का मालिक ही नहीं था, उसने जमीन कैसे बेच दी। ये लोग तभी हाईकोर्ट के सामने आए, जब इन्हें पता चल गया कि अब लोकायुक्त जांच से बच नहीं सकते। मुझे तो ऐसा लग रहा है, जैसे आजादी की लड़ाई चल रही हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्ति की आवाज दबाने की कोशिश हो रही है। ऐसा ही चलता रहा तो मेरे मरने के बाद तक इस मामले में कोई निर्णय नहीं होगा।

यह बात कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने गुरुवार को हाईकोर्ट में जस्टिस एसएल कोचर और जस्टिस शुभदा वाघमाले की युगलपीठ के समक्ष कही। वे परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं पर जारी बहस में हिस्सा ले रहे थे। नंदानगर साख संस्था के अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी ने ये याचिकाएं लगाई हैं। मेंदोला की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट एके सेठी और एडवोकेट राहुल सेठी ने जबकि संघवी की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट रमेश आर्या और एडवोकेट अमित अग्रवाल ने पैरवी की। लोकायुक्त की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट एलएन सोनी ने पक्ष रखा।

एडवोकेट देसाई को बनाया एमिकस क्यूरी
बहस के दौरान ही कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश देसाई को एमिकस क्यूरी (केस में कोर्ट के सलाहकार) घोषित किया। कोर्ट ने करीब एक घंटे तक उनसे विभिन्न पहलूओं पर विमर्श किया।

खचाखचा भरी रही कोर्ट 
उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के कारण बहुचर्चित हुए इस मामले को सुनने के लिए हाईकोर्ट के रूम नंबर 09 में पूरे दिन वकीलों की भीड़ जुटी रही। कई वरिष्ठ से लेकर कनिष्ठ एडवोकेट्स तक बहस को सुनने के लिए मौजूद थे। लोकायुक्त जांच की सीमाएं, विशेष न्यायाधीश के आदेश और भ्रष्टाचार से जुड़े मसलों पर जांच एजेंसियों के लिए तय मापदंडों से जुड़े विभिन्न कानूनी पहलू बहस के दौरान उजागर भी हुए।

टीआई से सीएम तक की सेठ ने शिकायत

17 मई 2007         : इंदौर निगमायुक्त
1 मई 2008           : इंदौर निगमायुक्त
6 अक्टूबर 2008     : इंदौर निगमायुक्त
12 फरवरी 2009     : इंदौर निगमायुक्त
27 फरवरी 2009     : आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू)
2 मार्च 2009           : मुख्य सचिव मप्र, गृह सचिव, आईजी पुलिस, आईजी ईओडब्ल्यू, डीआईजी इंदौर, एसपी इंदौर, कलेक्टर इंदौर, एसपी ईओडब्ल्यू और टीआई परदेशीपुरा।
17 जून 2009          : मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान
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कोर्ट में कानूनी तर्कों की नींव

विधायक रमेश मेंदोला की याचिका के आधार

1. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग मजिस्ट्रेट कर सकता है, विशेष न्यायाधीश नहीं।
2. विशेष न्यायाधीश मप्र विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) कानून 1947 एवं मप्र लोकायुक्त कानून के अधीन है। वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत मजिस्ट्रेट नहीं है।
3. विशेष न्यायाधीश द्वारा सीआरपीसी की धारा 190 के तहत कार्रवाई नहीं की।
4. मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून की धारा 4 के तहत कोई भी अनुसंधान कार्य पर सुपरइनटेंडेंस लोकायुक्त की रहती है, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
5. शिकायतकर्ता ने कभी भी लोकायुक्त अथवा एसपीई लेाकायुक्त को शिकायत दर्ज नहीं करवाई, इसलिए विशेष न्यायाधीश द्वारा धारा 153(3) के तहत जांच के आदेश देना त्रूटिपूर्ण है।
6. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी फौजदारी परिवाद के तहत परिवादी के बयान दर्ज नहीं किए और न ही धारा 202 के तहत कोई कार्रवाई की।
7. आरोपी की सुनवाई का अवसर दिए बगैर सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
8. सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत आदेश पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंनचार्ज को ही दिया जा सकता है। एसपीई लोकायुक्त इंदौर इस श्रेणी में नहीं आते।
9. सीआरपीसी की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग तभी किया जा सकता है, जबकि संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया गया हो।
10. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून के प्रावधानों के विपरीत है, क्योंकि इस अधिनियम में राज्य सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है।


मनीष संघवी की याचिका के आधार
1. याचिकाकर्ता लोक सेवक नहीं है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत एसपीई लोकायुक्त को जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
2. मप्र लोकायुक्त और उपलोकायुक्त नियम 1981 की धारा 8 (सी) के तहत पांच वर्ष से पुराने मामलों पर जांच का प्रतिबंध लगाया गया है।
3. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया।
4. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम 1981 की धारा 7 के प्रावधानों का उल्लंघन है।


सुरेश सेठ के जवाब
1. तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला ने महापौर कैलाश विजयवर्गीय की मौन सहमति के साथ पद का दुरुपयोग करते हुए धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी से आपराधिक षडय़ंत्र रचकर सरकारी जमीन की खरीदी-बिक्री की। इससे निगम और सरकार को करोड़ों की राजस्व हानि हुई।
2. वर्तमान में पुलिस अनुसंधान जारी है, इसलिए दोनों याचिकाएं अपरिपक्व हैं।
3. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (ई) के तहत एसपी स्तर के अधिकारी को जांच का आदेश देने का अधिकार है।
4. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश को संज्ञान लेने का पूर्ण अधिकार है और इससे सेशन न्यायालय के साथ मजिस्ट्रेट की शक्तियों का समावेश हो गया है। 
5. सीआरपीसी की धारा 153 (3) के तहत जांच के आदेश जारी करने से पहले अभियुक्त को सुनवाई को अवसर देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।

पत्रिका : २० अगस्त २०१०