मंगलवार, 31 अगस्त 2010

स्वाइन फ्लू से एक और मौत

- शाजापुर से इलाज के लिए दो दिन पहले आए थे इंदौर
- मौत का आंकड़ा हो गया सात


स्वाइन फ्लू (एच1 एन1) से शनिवार को 35 वर्षीय एक युवक की मौत हो गई। वे शाजापुर निवासी थे और दो दिन पहले उन्हें इंदौर के बांबे अस्पताल में भर्ती हुए थे। इस मौत के बाद स्वाइन फ्लू से इंदौर में मृतकों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। उधर, इसी रोग के पीडि़त चार नए लोग सामने आए हैं। विभिन्न अस्पतालों में उपचार जारी है।  

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शरद पंडित ने बताया शाजापुर के सत्येंद्र को दो दिन पहले बांबे अस्पताल में भर्ती किया गया था। शनिवार को उनकी मौत हो गई। इसी अस्पताल में स्वाइन फ्लू के लक्षणों वाले तीन नए मरीज आए हैं। उनके नाम के द्रव (स्वाब) के सेंपल जबलपुर भेजे गए हैं। संदिग्धों में दो महिलाएं हैं। एक राजगढ़ की हैं, जिनकी उम्र 35 है, जबकि दूसरी 24 वर्षीय हैं व धार जिले से हैं। एक अन्य युवक की उम्र 30 है और वे इंदौर के सुखलिया में रहते हैं। अस्पताल प्रबंधक राहुल पाराशर ने बताया सत्येंद्र के शव को शाजापुर भेज दिया गया है। दूसरे मरीजों का ïतय प्रोटोकॉल के अनुसार उपचार जारी है।

अब तक 16 पॉजिटिव
शनिवार को आई रिपोर्ट के बाद स्वाइन फ्लू के रोगियों की अधिकृत संख्या 16 हो गई है। स्वास्थ्य विभाग अब तक 25 मरीजों के नाक से द्रव (स्वाब) के नमूने जबलपुर की लेब में भेज चुका है। पॉजिटिव मरीजों में से सात की मौत हुई है। इनमें से एक इंदौर, जबकि शेष आसपास के जिलों से है।

एमवायएच में सोमवार से ओपीडी 
स्वाइन फ्लू के बढ़ते मरीजों को देखते हुए एमवाय अस्पताल में स्वाइन फ्लू की स्क्रीनिंग के लिए सोमवार से ओपीडी शुरू होगी। अगर किसी को स्वाइन फ्लू की जरा भी आशंका हो तो वह एमवायएच में जांच करवा सकता है। सूत्रों का कहना है कि ड्यूटी के लिए पैरामेडिकल स्टाफ का बंदोबस्त नहीं हो सका है। 


 
पत्रिका : २९ अगस्त २०१०

निगम सभापति शंकर यादव केस में 6 सितंबर को सुनवाई

गुल्टू हत्याकांड में नगर निगम सभापति शंकर यादव व उनके दोनों भाइयों राजू व दीपक को आरोपी बनाए जाने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट इंदौर में अब 6 सितंबर को सुनवाई होगी। जस्टिस पीके जायसवाल की एकल पीठ के समक्ष शुक्रवार को परिवादी ने कुछ समय मांगा था।
 यादव की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट आनंद मोहन माथुर व अभिनव धानोदकर उपस्थित हुए, जबकि परिवादी मृतक की मां बसंतीबाई की ओर से एडवोकेट एम. सक्सेना मौजूद थे। उल्लेखनीय है कि गुल्टू हत्याकांड में बसंतीबाई के आवेदन पर सेशन कोर्ट ने शंकर यादव सहित तीनों भाइयों को आरोपी बनाते हुए दो बार गिरफ्तारी वारंट जारी किए किंतु पुलिस उन्हें ढूंढ नहीं सकी। अदालत ने तीसरी बार वारंट जारी करते हुए एक सितंबर तक पेश करने के आदेश दिए हैं।

उधर हाईकोर्ट के फैसले पर ही सभापति का भविष्य निर्भर है। महापौर कृष्णमुरारी मोघे के साथ ही भाजपा को भी इस फैसले का बेसब्री से इंतजार है। फैसला के आधार पर यादव को लेकर पार्टी अगली कार्रवाई करेगी। हालांकि पार्टी के यादातर नेता उन्हें हटाए जाने के पक्ष में है। 


मोघे के चुनाव का मामला हाईकोर्ट पहुंचा

महापौर कृष्णमुरारी मोघे के चुनाव को चुनौती देने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने जिला निर्वाचन अधिकारी और सेशन कोर्ट में केस दायर करने वाले अजय सेंगर को नोटिस जारी किया है। सेंगर ने सेशन कोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी थी और वहां उनकी अर्जी ग्राह्य हो गई थी। हाईकोर्ट में मोघे की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट शेखर भार्गव और एडवोकेट अमित उपाध्याय ने पैरवी की। एडवोकेट उपाध्याय ने बताया मूल अर्जी के बाद कुछ ओर बातें जोड़ दी गई, इसी को लेकर याचिका दायर की गई है। सेंगर के मुताबिक मतपत्रों की गणना में गड़बड़ी हुई, इसलिए मोघे निर्वाचित हुए।

पत्रिका: २८ अगस्त २०१० 

राजस्थान के फैसले से मध्यप्रदेश को रोजगार

 - वहां लगा प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध, यहां उपजा कागज की थैलियों का धंधा
- राजस्थान से उठी मांग, जितना माल तैयार हो, सब भेज दो



राजस्थान के एक फैसले से मध्यप्रदेश के हजारों हाथों को काम मिल गया। हाथों से कागज की थैली बनाने में माहिर मप्र के बाशिंदों के पास इन दिनों फुर्सत नहीं है, क्योंकि उन्हें कई सौ क्विंटल माल बनाकर पड़ोसी राज्य को भेजना है। वहां इसी महीने की पहली तारीख से प्लास्टिक की थैलियों पर रोक लगा दी गई है।

राजस्थान के फैसले से मप्र की औद्योगिक नगरी इंदौर में मृत हो चुके कागज की थैली के कारोबार को एक तरह से नई जान मिल गई है। आजाद नगर निवासी मुमताज बी कहती हैं करीब 15 बरस पहले थैलियां बनाते थे, तब हमें एक या डेढ़ रुपए मिलता था, अब पांच से सात रुपए किलो मिल रहा है। मांग का इतना दबाव है कि फुर्सत ही नहीं मिल रही है।

एक ही मशीन, कितना लोड सहे 
इंदौर में थैलियां बनाने की एक ही मशीन है। यह इन्वोफ्रेंडली पेपर बैग कंपनी में लगी है। इसके सुपरवाइजर सीएच विश्वकर्मा ने बताया उदयपुर, चित्तौढ़, कोटा, बांसवाड़ा सारे शहरों से खाकी थैलियों की इतनी मांग आ रही है कि काम करने वाले कम पड़ रहे हैं। करीब 20 टन का आर्डर पेंडिंग है। मशीन एक ही है और इसकी भी सीमित क्षमता है। फिलहाल करीब तीन क्विंटल थैलियां रोज बना रहे हैं। उन्होंने बताया मशीन पर केवल कागज रोल से ही थैलियां बन सकती हैं।

घर ही नहीं दुकानों पर शुरू हो गया निर्माण 
आमतौर पर थैलियां महिलाओं और ब'चों द्वारा घरों पर बनाई जाती हैं, लेकिन मांग को देखते हुए रद्दी के कुछ व्यापारियों यह काम दुकानों पर ही शुरू कर दिया है। सिंधी कॉलोनी के अग्रसेन वेस्ट पेपर के संचालक अशोक अग्रवाल ने बताया नब्बे के दशक में भी मैं थैलियां बनाया करता था। मैग्जीन, शेयर पेपर और चिकने कागजों की थैलियों की विशेष मांग है। एक व्यक्ति एक दिन में 10 से 12 किलो थैलियां बना लेता है। 






घोषणा तो यहां भी हुई, पर अमल नहीं
नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर ने पिछले दिनों इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में प्लास्टिक की थैलियों के पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक इसे अमल में नहीं लाया जा सका है।


दुकानदारों के लिए फायदेमंद हैं ये थैलियां


प्लास्टिक की थैलियां सामान के साथ तोलने में चली जाती हैं, लेकिन उसका वजन नाममात्र का ही रहता है। कागज की थैली में सामान देने पर दुकानदार को फायदा होता है, क्योंकि जिस भाव में थैली मिलती है उससे ज्यादा में वह तुल जाती है।
- नारायण कालरा, संचालक, जेके वेस्ट पेपर

मप्र में तो कागज की थैलियों मांग नहीं है। यहां तो सूखी चाय और कचोरी समोसे वाले ही इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि इंदौर में खाकी कागज की थैली बनाने वाली एकमात्र यूनिट भी ऑक्सीजन पर थी। अब उसे ताकत मिलेगी।
- अशोक गोयल, संचालक, अशोक ट्रेडर्स

कागज की थैली का काम शुरू करने वाले लोग डावांडोल हैं। उन्हें डर है कि कहीं राजस्थान सरकार फैसला वापस न ले ले। ऐसा हुआ तो वे बेरोजगार हो जाएंगे।
- राजेश इरानी, मैनेजर, न्यू गुरुनानक ट्रेडर्स 


पुराने कारोबार का नया उदय
'जबरदस्त मांग के कारण भावों में पांच रुपए तक बढ़ोतरी हो गई है। अखबार की रद्दी के दाम भी बढ़ा दिए हैं। दरअसल, राजस्थान में थैली का उद्योग नहीं है, इसलिए यहां से माल जा रहा है। भीलवाड़ा, चित्तौढ़, उदयपुर, कोटा, बांसवाड़ा, जयपुर तक से थैलियों के लिए फोन आ रहे हैं। वहां की सरकार के निर्णय से मप्र में बंद हो चुके कारोबार का नए सिरे से उदय हो रहा है। इससे हजारों लोगों का रोजगार का अवसर मिल गया है।Ó
- प्रवीण पाटनी, अध्यक्ष, इंदौर प्लास्टिक पैकिंग मटेरियल निर्माता एवं विक्रेता संघ


 
पत्रिका : २८ अगस्त २०१०

टेलीग्राम को माना जनहित याचिका

- जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के खिलाफ मप्र के चीफ जस्टिस को इंदौर से भेजा था तार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सयैय्द रफत आलम ने गुरुवार को एक टेलीग्राम को जनहित याचिका माना है। उन्हें यह टेलीग्राम इंदौर के न्यायिक कार्यकर्ता सत्यपाल आनंद ने पूरे राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के बारे में भेजा था। आनंद ने कोर्ट से हड़ताली डॉक्टरों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस दायर करने की मांग की है। टेलीग्राम को याचिका मानने का मध्यप्रदेश में संभवत: यह पहला मामला है।

 बुधवार प्रात: 9.15 बजे आनंद ने चीफ जस्टिस को एक तार भेजा था। इसमें उन्होंने मांग की थी डॉक्टरों की हड़ताल से आम जनता को संविधान में प्रदत्त जीवन सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार खतरे में आ गया है। डॉक्टरों को तत्काल सेवा में बुलाया जाए और अस्पतालों की सेवाएं बहाल की जाए। गुरुवार दोपहर 4 बजे आनंद को हाईकोर्ट से सूचना मिली कि उनके तार को लेटर पीटिशन (पत्र याचिका) माना गया है। इस पर शुक्रवार को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई होगी।

जा नहीं पाएंगे आंनद
आनंद ने 'पत्रिकाÓ को बताया आंखों की बीमारी के कारण मैं जबलपुर नहीं जा सकूंगा। मैंने कोर्ट से आग्रह किया है मेरी ही जनहित याचिका (8340/09) में 18 नवंबर 2009 को हुए आदेश के मुताबिक राज्य सरकार और डॉक्टर को नोटिस जारी किए जाएं। उन्होंने अगली सुनवाई इंदौर हाईकोर्ट में ही रखने का निवेदन भी कोर्ट से किया है।

लोगों के लिए खुला रास्ता
हाईकोर्ट के इस कदम से लोगों के लिए याचिका दायर करने का एक ओर रास्ता खुल गया है। अखबार, पोस्टकार्ड और किसी पत्र के जरिए तो पहले भी पत्र याचिकाएं मंजूर होती रही हैं। आनंद ने बताया मुझे हाईकोर्ट के इस फैसले की खुशी है, क्योंकि इससे न्यायिक क्षेत्र में एक नई शुरुआत होगी। किसी के मौलिक अधिकार का हनन होता है, तो उसे हाईकोर्ट में टेलीग्राम के जरिए सूचना भेजना चाहिए, ताकि न्यायपालिका उस दिशा में कदम उठा सके।

पत्रिका : २७ अगस्त २०१० 



जूडॉ हड़ताल पर कोर्ट ने सरकार से शपथपत्र पर मांगा जवाब
- टेलीग्राम पर मंजूर हुई जनहित याचिका पर जबलपुर में सुनवाई


सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के विरोध में टेलीग्राम के जरिए मंजूर हुई जनहित याचिका पर जबलपुर हाईकोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने हड़ताल पर राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। सरकार को यह जवाब शपथपत्र पर देना होगा।

हड़ताल से लोगों की जीवन सुरक्षा के अधिकार के खतरे में पडऩे को आधार बनाकर आनंद ट्रस्ट के ट्रस्टी सत्यपाल आनंद ने बुधवार को मप्र के चीफ जस्टिस को टेलीग्राम भेजकर सरकार को निर्देश देकर तत्काल डॉक्टरों को बुलाने का आग्रह किया था। टेलीग्राम को गुरुवार को याचिका माना गया और शुक्रवार को चीफ जस्टिस सयैय्द रफत आलम और आलोक अराधे की युगलपीठ में सुनवाई हुई।

केस की जानकारी देरी से मिलने और बीमारी के कारण आनंद केस के दौरान उपस्थित नहीं हो सके। कोर्ट ने भी यह बात रिकॉर्ड पर ली कि आनंद को सूचना देरी से मिली। आनंद ने 'पत्रिकाÓ को बताया उन्हें खुशी है कि हड़ताल समाप्त होने के बाद भी कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई की और सरकार को नोटिस दिया। अब सरकार को यह बताना होगा कि किन कारणों से हड़ताल हुई और लोगों के मौलिक अधिकारों का किन परिस्थितियों में उल्लंघन हुआ।

पत्रिका : २८ अगस्त २०१०

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

पुलिस को दो हिस्सों में बांट दें

- जनहित याचिका पर मप्र हाईकोर्ट का अहम फैसला
- एक हिस्सा करे अनुसंधान, दूसरा देखे कानून-व्यवस्था


हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में सरकार को आदेश दिया है कि राज्य की पुलिस को दो हिस्सों में बांट दिया जाए। एक हिस्सा अपराधों का अनुसंधान करे और दूसरा कानून व्यवस्था संभाले। कानूनविद् मानते हैं, इससे अपराधों पर नियंत्रण होगा और कमजोर चार्जशीट का फायदा उठाकर कानून से छूट नहीं पाएंगे।

जस्टिस एसएल कोचर और शुभदा वाघमारे की युगलपीठ ने यह फैसला एडवोकेट संजय मेहरा की जनहित याचिका पर दिया। अनुसंधान करने वाले हिस्से की जिम्मेदारी तय करते हुए कहा है कि वह थानों में दर्ज होने वाले अपराधोंं का गहराई से विश्लेषण करे और कोर्ट में उपस्थित होकर अपराधी को अंजाम तक पहुंचाए। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी कहा है कि पुलिस सुधार और अपराध नियंत्रण के संबंध में वे सुप्रीम कोर्ट में लंबित प्रकाशसिंह एवं अन्य की याचिका में पक्षकार बन सकते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सुनील जैन ने भी पैरवी की। बढ़ते अपराध और बिगड़ेल ट्रैफिक इंतजाम के मुद्दे पर 16 अप्रैल 2008 को दायर इस याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस आरएस गर्ग और एएम सप्रे की युगलपीठ नाराजगी जता चुके हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के भी हैं आदेश
एक लंबित याचिका में सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को निर्देश दे चुका है कि पहले चरण में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में पुलिस को दो हिस्सों में बांटकर कार्य किया जाए, ताकि अपराध काबू में रहें।

पुलिस बल की कमी का शपथ पत्र
जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान 2008 में तत्कालीन इंदौर पुलिस महानिरीक्षण अनिल कुमार ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र दिया था कि राज्य में पुलिस बल की भारी कमी है और कई थानों में बेहद कम पुलिसकर्मियों के साथ कार्य किया जा रहा है।

इंदौर में हो चुकी प्रयोग की घोषणा
इंदौर में प्रयोग के बतौर पुलिस के विभाजन के संबंध में दो माह पहले ही घोषणा हो चुकी है। गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने इंदौर में कहा था कि सेंट्रल कोतवाली, एमजी रोड और तुकोगंज थानों में यह व्यवस्था शुरू की जाएगी। इसके बाद दूसरे थानों में भी इसे अमल में लाएंगे।

पत्रिका : २४ अगस्त २०१०

आवाज बंद करने का सरकारी इंतजाम

निगम का गर्वनेंस ?
पड़ोसी के अतिक्रमण की लोकायुक्त में शिकायत की तो मामला रफादफा करने की मांग से साथ खड़ी की अड़चनें 
मोती तबेला की अवैध इमारत

शहरी विकास की योजनाओं के लिए केंद्रीय स्तर पर गठित एडवायजरी कमेटी की अध्यक्ष ईशा जज आहलुवालिया ने दो दिन पहले इंदौर नगरनिगम को सीख दी थी कि गुड गर्वनेंस (सुशासन) के बगैर न तो बड़े प्रोजेक्ट मिलेंगे और न ही लोगों की जिंदगी आसान होगी। हम आपको बता रहे हैं एक उदाहरण जो निगम गर्वनेंस का आलम बयां करता है। यह व्हिसल ब्लोअर को परेशान करने का मामला भी है.

खबर के पात्र का नाम मोहम्मद इस्हाक खान है। वे 9/2, मोतीतबेला में रहते हैं। उन्होंने कुछ वर्ष पहले अपने पड़ोसी इज्जत नूर पिता एहमद नूर (10/2, मोती तबेला) द्वारा नगरनिगम और सार्वजनिक रास्ते की भूमि पर अतिक्रमण करने पर आपत्ति ली थी। मामले को वे लोकायुक्त तक ले गए हैं। अब खुद परेशान हैं, क्योंकि निगम के अफसरों ने साफ शब्दों में कह दिया है हमारे तंत्र के खिलाफ की शिकायतों को वापस लो तभी आपको 'चैनÓ देंगे। वे निराश होने लगे हैं क्योंकि उनके साथ ही उनके भाई के मकान का नक्शा भी निगम के अफसरान ने रोक दिया है।

आधारहीन नहीं थी आवाज
इस्हाक खान के पास शिकायत के कई मजबूत आधार हैं। उन्होंने 'पत्रिकाÓ को बताया इज्जतनूर ने 16 सितंबर 2003 को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने के इरादे से निगम के अफसरों से सांठगांठ करके नक्शा पास करवाया और मकान व दुकान बना लिए। जिस जमीन पर निर्माण हुआ है, उसे स्वयं इज्जतनूर पूर्व में मंजूर अपने तीन नक्शों में (23 मार्च 1977, 5 अगस्त 1977 और 2 जून 1995 को) सार्वजनिक रास्ते की बता चुके हैं। अफसरों ने नक्शा पास करके सरकार को राजस्व की चपत लगाई है। लोकायुक्त ने तीन बिंदुओं पर जांच की और यह पाया कि झूठे दस्तावेजों के आधार पर इज्जतनूर ने नक्शा पास करवाया।

शिकायत होते ही गुम हो गई फाइल
निगम के अधिकारियों ने लोकायुक्त के समक्ष बयान में कहा कि रिकार्ड 30 वर्ष पुराना है, इसलिए बहुत खोजने के बाद भी उपलब्ध नहीं हो रहा है। दूसरी ओर शिकायत के ठीक पहले इस्हाक खान ने सूचना का अधिकार में पूरी फाइल की प्रमाणित प्रतिलिपि हासिल कर ली थी। खान कहते हैं यूं ही सरकारी रिकॉर्ड गायब होता रहा तो करोड़ों की सरकारी जमीन निजी लोगों के हाथों में जाने से कोई नहीं रोक सकता।


फाइल पर लिखा है 'मिंदोलाजीÓ 
सूचना का अधिकार में प्राप्त एक प्रमाणित दस्तावेज में अतिक्रमण करने वाले इज्जतनूर के नक्शे की फाइल के सबसे ऊपर वाले पेज पर 'मिंदोलाजीÓ लिखा है। लोकायुक्त को दी शिकायत में इस्हाक खान ने इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि संभवत: यह विधायक रमेश मेंदाला की ओर इशारा करता है और हो सकता है, उनके प्रभाव में ही मेरे साथ निगम द्वारा यह व्यवहार किया जा रहा है।



यूं कर रहे शिकायतकर्ता को परेशान
इस्हाक खान
  • इस्हाक खान के 70 वर्षीय भाई मोहम्मद नूर ने 9/2 मोती तबेला में मकान निर्माण के लिए नक्शा मंजूर करवाने की निगम में अर्जी दी, जिसे मंौखिक रूप से यह कहकर रोक दिया गया कि आपके छोटे भाई इस्हाक ने निगम के खिलाफ शिकायतें की है। नूर ने 22 जुलाई को न्यायिक शपथ पत्र पेश कर निगम को कहा कि जमीन पर मेरा एकमात्र स्वामित्व है और मेरा कोई न्यायिक प्रकरण भी नहीं चल रहा है, इसलिए नक्शा मंजूर किया जाए। फिर भी सुनवाई नहीं हुई तो अब नूर ने चेतावनी दी है कि सुनवाई नहीं होने पर गांधी प्रतिमा पर नंगे बदन धरना दूंगा।
  • इस्हाक खान ने जमीन नामांतरण की एक अर्जी 2006 में निगम में दाखिल की थी। उन्हें भी कहा गया कि शिकायतें वापस लो, तो ही दाखिला मंजूर होगा। खान ने इस बात की शिकायत मानवाधिकार आयोग को भी कर दी है।
  • इस्हाक खान ने सूचना का अधिकार में 1 जुलाई 2010 को इज्जतनूर के खिलाफ की शिकायतों पर की गई कार्रवाइयों की जानकारी मांगी तो उन्हें पत्र भेजा गया कि आपके मकान 9/2, मोती तबेला की फाइल आकर देख लें। खान का कहना है यह तो मैंने मांगा ही नहीं था। 


इज्जतनूर और इस्हाक खान का मामला कॉफी पुराना है। मेरी जानकारी में भी हाल ही यह केस आया है। विधिक राय लेकर इस पर शीघ्र ही उचित कार्रवाई की जाएगी।
- अवधेश जैन, भवन निरीक्षक, हरसिद्धी जोन 


पत्रिका : २४ अगस्त २०१०
 

बुधवार, 25 अगस्त 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला


Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।