मंगलवार, 28 सितंबर 2010

100 करोड़ के घोटाले की अंतिम रिपोर्ट आज

कैलाश के खातिर लोकायुक्त पुलिस विशेष न्यायाधीश से मांग सकती है और मोहलत

सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के मामले में मंगलवार को लोकायुक्त पुलिस द्वारा विशेष न्यायाधीश के समक्ष तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश की जाना है। कोर्ट द्वारा दिए गए 45 दिन के समय में जांच एजेंसी से क्या सबूत जुटाए हैं, इस पर सभी की निगाहें हैं। पांच महीने से चल रहे इस केस में लोकायुक्त पुलिस अब तक पर्याप्त समय मांग चुकी है। खासकर कैलाश के खिलाफ। संकेत है कि इस बार भी लोकायुक्त पुलिस द्वारा जांच और सबूतों के नाम पर समय मांगा जाएगा। 

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर विशेष न्यायाधीश के आदेश से लोकायुक्त पुलिस ने 6 अप्रैल को मामले की जांच शुरू की थी। लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष व विधायक रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी, मनीष संघवी और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपराधिक षडय़ंत्र रचने का केस दर्ज किया था। पिछली सुनवाई (6 अगस्त) पर कोर्ट में सेठ ने लोकायुक्त पुलिस पर आरोप लगाया था कि जानबूझकर आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) को बचाने की कोशिश हो रही है। इस आरोपी के बारे में स्थिति स्पष्ट की जाना चाहिए। इसी पर कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को 21 सितंबर तक केस में अंतिम रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था।  

क्या हो सकता है
  • जांच पूरी नहीं हो पाने के कारण लोकायुक्त पुलिस एक बार फिर समय मांग सकती है।
  • अगर जांच पूरी हो गई है तो गोपनीय रिपोर्ट पर निर्भर रहेगा कि कैलाश को दोषी पाकर एफआईआर दर्ज की गई या क्लीनचिट दी गई।
  • हो सकता है इस मामले में लोकायुक्त पुलिस द्वारा नए दिशा-निर्देश मांगे जा सके।


डेढ़ महीने में नोटिस भी नहीं भेजा
- छह अगस्त को एफआईआर दर्ज करके लोकायुक्त पुलिस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया केस
सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रु. के जमीन घोटाले के केस में डेढ़ महीने पहले लोकायुक्त पुलिस ने विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपतियों नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी व मनीष संघवी तथा 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार व आपाराधिक षडयंत्र रचने की एफआईआर तो दर्ज की थी। परंतु इस पर अगला कदम आज तक नहीं उठाया गया है। किसी भी आरोपी को अब तक न तो नोटिस दिया गया है और न ही कोई पूछताछ ही की गई।

लोकायुक्त पुलिस ने प्रारंभिक जांच में माना है कि तीन एकड़ जमीन के लिए धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में 17 लोगों ने मिलकर षडय़ंत्र किया और इससे सरकार को करीब पौने तीन करोड़ रुपए की चपत लगी। इसी आधार पर 5 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई, परंतु इसके बाद चालान पेश करने को लेकर रवैया ठंडा ही है। अफसर चालान के लिए आरोपियों के खिलाफ जांच, दस्तावेज के नाम लंबी प्रक्रिया बताते हैं। सही मायने में शुरुआत हुई या नहीं। इसे लेकर 'पत्रिकाÓ ने जिन 17 लोगों पर केस दर्ज हुआ उनमें से कुछ से बात की तो पता चला कि इस मामले में अभी कोई गति ही नहीं है। 


मुझे अब तक न तो कोई नोटिस मिला है और न ही एफआईआर की प्रतिलिपि। जो भी मालूम हुआ है, वह अखबारों के जरिए ही पता चला है।
हंसकुमार जैन, सिटी इंजीनियर, निगम

कुछ माह पहले लोकायुक्त पुलिस ने बयान के लिए बुलाया था। केस दर्ज होने के बाद इस संबंध में मुझसे न कोई संपर्क किया और न ही किसी प्रकार का नोटिस मिला। मेरा तो यही सवाल है कि भला बताए कि मेरा दोष क्या है आरोप क्या है?
अशोक बैजल, रिटायर्ड भवन अधिकारी

सुगनीदेवी कॉलेज की जमीन गड़बड़ी में मुझ पर भी लोकायुक्त पुलिस ने केस दर्ज किया। यह मुझे मीडिया के माध्यम से ही पता चला। पूरा मामला क्या है मुझे ही नहीं पता। जो आरोप लगाए गए हैं वे विरोधभासी हैं। केस दर्ज होने के बाद लोकायुक्त पुलिस की ओर से मुझे न नोटिस मिला न संपर्क किया गया।
नरेंद्र सुराणा, रिटायर्ड कार्यपालन यंत्री  



तारीख -पे- तारीख

अप्रैल
जांच के लिए तीन माह का समय दिया

कोर्ट ने 6 अप्रैल को तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी की भूमिका की जांच कर दोषी पाए जाने पर कार्रवाई को लेकर तीन महीने का समय दिया था। इसके लिए 6 जुलाई को रिपोर्ट पेश की जानी थी।
जुलाई
फिर समय मांग लिया

 6 जुलाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट में बताया कि जांच पूरी नहीं हुई है। इसके लिए तीन माह समय मांगा गया। इस पर परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने आपत्ति ली व लोकायुक्त अफसरों पर राजनीतिक दबाव का आरोप लगाया। इसके बाद कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को फिर एक माह का समय दिया गया।
अगस्त
मुख्य कर्ताधर्ता कैलाश का नाम छोड़ दिया

6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने नंदानगर साख सहकारी संस्था के अध्यक्ष व तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी सहित 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज करने के साथ रिपोर्ट विशेष न्यायाधीश के समक्ष पेश की थी। तब परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ ने तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय का नाम हटाने को लेकर आपत्ति ली थी और आरोप लगाए थे। तब अफसरों ने कहा था कि कैलाश के खिलाफ जांच चल रही है। इसके लिए कोर्ट से चार माह का समय मांगा था जिस पर डेढ़ माह का समय दिया गया था।
...और अब सितंबर
इस तरह करीब साढ़े पांच महीने से जांच चल रही है। कैलाश किन-किन आधारों पर दोषी हो सकते हैं इसे लेकर सेठ प्रमाणित साक्ष्यों का पुलिंदा पेश कर चुके हैं। उधर, लोकायुक्त पुलिस पूर्व में भी कई दस्तावेज जुटा चुकी है। 'पत्रिकाÓ कैलाश के खिलाफ आरोपों के बिंदुओं को सोमवार को उल्लेख कर चुकी है। ऐसे में अब सबकी नजरें कैलाश को लेकर लोकायुक्त की रिपोर्ट पर टिकी है।









पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

अनुमति लिए बगैर निकली जीतू की रैली

- जनहित याचिका की सुनवाई में प्रशासन ने मानी गलती
- गलती क्यों और किससे हुई, पर चार सप्ताह में देना होगा जवाब



प्रदेश भाजयुमो अध्यक्ष जीतू जिराती की स्वागत रैली के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सोमवार को हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ के जस्टिस एसएस केमकर एवं जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की युगलपीठ में सुनवाई हुई। कोर्ट के समक्ष प्रशासन ने मंजूर किया है कि यह रैली बगैर अनुमति के निकाली गई। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस संबंध में चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ता नंदानगर निवासी संजय मित्तल की ओर से एडवोकेट पीके शुक्ला एवं एमएस चौहान ने पेश की है। चौहान ने 'पत्रिकाÓ को बताया केस में 13 लोगों को प्रतिवादी बनाया गया है। नगरनिगम और जिला प्रशासन के जवाब के आधार पर ही याचिका की अगली दिशा तय होगी।

यह है जनहित
- रैली के कारण सात घंटे तक इंदौर जाम में फंसा रहा।
- रैली में हथियारों का खुलकर उपयोग किया गया, जिससे जनता में दहशत फैली।
- रैली के लिए लगाए गए मंचों की बिजली चुराकर ली गई।
- रैली के लिए रास्ते रोक दिए गए, जिनपर जनता का अधिकार रहता है। 

 पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

काले कारनामों पर पोत दी कालिख

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज में सूचना का अधिकार का माखौल
- कालिख पोत को जानकारी देने का संभवत: देश का पहला मामला


एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने सूचना का अधिकार कानून का माखौल उड़ाते हुए एकाउंट से जुड़े एक दस्तावेज पर जानबूझकर कालिख पोत दी। आवेदक को यह जानकारी देते हुए कालिख पोतने का जिक्र भी प्रबंधन ने किया है। सूचना का अधिकार का इस तरह से मजाक बनाने की संभवत: यह देश का पहला मामला है।

मामला बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाओं के मरीज पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से जुड़ा है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के सदस्य डॉ. आनंद राय ने कॉलेज के विभिन्न विभागों को ट्रायल के लिए मिले रुपए की ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी। मेडिसिन विभाग ने वर्ष 2010 की ऑडिट रिपोर्ट तो दी लेकिन कई महत्वपूर्ण आंकड़ों पर कालिख पोत दी। ऑडिट रिपोर्ट सरिता मूंदड़ा ने तैयार की है। मूंदड़ा के पते और फोन नंबर पर भी कालिख पोती गई है। साथ ही कवरिंग पत्र में यह भी लिख दिया कि आवेदन द्वारा चाही गई जानकारी से यह संबंधित नहीं है, इसलिए इस पर काले रंग का प्रयोग करके इसे अपठनीय बनाया गया है। उधर, आवेदक का कहना है मैंने संपूर्ण ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी, इसलिए उसका सीधा-सीधा मेरे आवेदन से संबंध है। ट्रायल के नाम पर हुए हेरफेर को छुपाने के लिए यह कार्रवाई की है। इसके विरूद्ध मैं संचालक चिकित्सा शिक्षा को अपील कर रहा हूं।

साढ़े 13 लाख का हिसाब छुपाया
ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट है कि 31 मार्च 2010 तक मेडिसिन विभाग की साइंटिफिक कमेटी के खाते में 13.47 लाख रुपए आए हैं। कालिख से यह छुपा लिया गया है कि यह किन लोगों में बंटा।



जानकारी छुपाने वाले विभाग पर गंभीर आरोप

मेडिसिन विभाग के डॉ. अनिल भराणी, डॉ. आशीष पटेल, पूर्व एचओडी डॉ. अशोक वाजपेयी पर गंभीर आरोप है कि इन्होंने राज्य सरकार को जानकारी दिए बगैर ट्रायल करके अकूत संपत्ति जुटाई है। डॉ. भराणी और डॉ. पटेल ने तो एक ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी बताने तक का खेल कर दिया है।

'संभवत: यह देश का पहला मामला है, जब जानकारी पर कालीख पोती गई है। नि:संदेह जानकारी छुपाने की कोशिश के चलते यह कदम उठाया होगा। वही जानकारी छुपाई जा सकती है, जिससे शांति भंग होने या देश की गोपनीयता को खतरा हो। हम इसे राष्टï्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाएंगे।
- रोली शिवहरे, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

'आवेदक को इसके विरूद्ध अपील करना चाहिए। साथ ही जिस दस्तावेज पर कालिख पोती गई है, उसके लिए फिर से आवेदन लगाना चाहिए।
- गौतम कोठारी, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

चौतरफा घिरे ड्रग ट्रायल वाले डॉक्टर

- विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग, एमसीआई, आयकर के साथ ही यूएसएफडीए ने लिया संज्ञान

बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा का मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) करने वाले एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर चौतरफा घिर गए हैं। लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो, मानवाधिकार आयोग, आयकर और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ ही यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (यूएसएफडीए) ने इसे बेहद गंभीर मानकर जांच शुरू कर दी है। यूएसएफडीए ने इस संबंध में भारत सरकार को पत्र भेजा है। 

'पत्रिकाÓ ने ही ड्रग ट्रायल का खुलासा करके बताया था कि कॉलेज से जुड़े एमवाय अस्पताल और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में आने वाले रोगियों को अंधेरे में रखकर ट्रायल किए जा रहे हैं। इसके बाद मामला विधानसभा पहुंचा और मध्यप्रदेश सरकार ने कानूनी बंदिश के लिए एक कमेटी का गठन किया। चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुïख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनी यह कमेटी ट्रायल को नियंत्रित  करने के लिए केंद्र सरकार और दूसरे राज्यों के कानूनी प्रावधानों की पड़ताल कर रही है।

 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव
ड्रग ट्रायल से रा'य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज ले रहे थे। यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उजागर हुई है। सरकार ने विधानसभा को बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 ब'चे और 721 वयस्क हैं। जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुए हैं, उनके नाम अभी जाहिर नहीं किए गए हैं। आशंका है कि इनमें से कुछ की मौत हो चुकी है।

मरीज की सेहत और डॉक्टर के एकाउंट पर नजर

यूएसएफडीए
'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद रशिया टीवी ने एमवाय अस्पताल में ट्रायल को लेकर एक खबर अंतरराष्टï्रीय स्तर पर प्रसारित की थी। रिपोर्ट में जिक्र था कि अमेरिकन कंपनियों की शह पर यहां गरीब मरीजों पर प्रयोग हो रहे हैं। इसी पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश में हुए ट्रायल का विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

विधानसभा
विधायक पारस सकलेचा, प्रताप ग्रेवाल और प्रद्युम तोमर ने विधानसभा में पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो रहे ट्रायल को लेकर जो सवाल पूछे थे। उनके जवाब आज तक  सरकार ने नहीं दिए हैं। मानसून सत्र में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने कहा था ट्रायल को काबू करने के लिए सरकार कानून बनाना चाहती है।

ईओडब्ल्यू
स्वास्थ्य सेवा समर्पण सेवा समिति अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर भोपाल ईओडब्ल्यू ने डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. हेमंत जैन और डॉ. पुष्पा वर्मा के खिलाफ जांच शुरू कर रखी है। सभी डॉक्टरों के एकाउंट की जांच जारी है।

लोकायुक्त
ट्रायल करने वाले डॉक्टरों, एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और एथिकल कमेटी के सदस्यों के खिलाफ लोकायुक्त में भी शिकायत हो चुकी है। आरोप है कि सभी ने मिलकर गरीब और अनपढ़ मरीजों की जान जोखिम में डाली है। लोकायुक्त ने शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता को 14 अक्टूबर को भोपाल बुलाया है।

मानवाधिकार आयोग
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों पर संज्ञान लेकर  मप्र मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस डीएम धर्माधिकारी, सदस्य जस्टिस एके सक्सेना व जस्टिस वीके शुक्ल ने एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को नोटिस भेजा है। आयोग जानना चाहता है कि मरीजों के अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा।

आयकर
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर आयकर विभाग ने मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से उन सभी डॉक्टरों की आय का ब्यौरा मांगा है, जो ट्रायल में लिप्त हैं। विभाग की जिज्ञासा इसमें है कि कहीं डॉक्टरों ने बेनामी संपत्ति तो नहीं जुटा ली। 

एमसीआई

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को जो शिकायत भेजी गई थी, उसी पर मप्र के चिकित्सा शिक्षा संचालक से पूरा ब्यौरा मांगा गया है। सभी मेडिकल कॉलेज इसका जवाब तैयार कर रहे हैं। 'पत्रिकाÓ पूर्व में ही यह जानकारी प्रकाशित कर चुका है।








पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

कम नहीं होते 45 दिन

सुगनीदेवी जमीन घोटाला
- 100 करोड़ के जमीन घोटाले पर विधि विशेषज्ञों की राय
- विशेष न्यायाल में कल पेश होना है लोकायुक्त पुलिस की जांच रिपोर्ट



सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में 43 दिन पहले यानी 6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस को विशेष न्यायालय ने आदेश दिया था कि 45 दिन में मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट सौंप दे। वह दिन कल है। विधि विशेषज्ञों से रायशुमारी में साफ होता है कि इस मामले में मौजूद दस्तावेज और 17 लोगों के खिलाफ की गई एफआईआर को देखकर लगता है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए सौदे में आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही, 'दूध का दूधÓ साबित करने के लिए लोकायुक्त जैसी सशक्त जांच एजेंसी को दी गई 45 दिन की समय सीमा पर्याप्त हैं।

पिछली सुनवाई को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि मामले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति (नगीनचंद्र कोठारी, विजय कोठारी और मनीष संघवी) और 13 अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज कर लिया गया है। नेता, अफसर और उद्योगपतियों के गठजोड़ से सरकार को 2 करोड़ 70 लाख रुपए की चपत लगी है। कोर्ट में 29 पेज की एफआईआर भी पेश की गई थी। तब परिवादी सुरेश सेठ ने सवाल उठाया था कि आरोपी क्रमांक दो यानी विजयवर्गीय के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने 45 दिन का समय दिया था। 'पत्रिकाÓ ने पूरे मामले को विधि विशेषज्ञों के समक्ष रखा।


मूल शिकायत में कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य

तथ्य एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रुप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं। 

तथ्य दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।

तथ्य तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडयंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई।

तथ्य चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।

तथ्य पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।

तथ्य छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।



एफआईआर में ही छुपे हैं कैलाश की भूमिका के आधार

  • पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया। विसंगति यह है कि अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें? 
  • पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई। सवाल उठता है डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?
  • पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनी ही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ। इसी से सवाल उपजता है क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडयंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडयंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है?  

पत्रिका : २० सितम्बर २०१० 

मेंदोला के खिलाफ थाने में एक और शिकायत

- भारतीय साख संस्था के सदस्य को धमकाने का आरोप
- थाने में हुई शिकायत, पर टीआई को जानकारी ही नहीं



विधायक रमेश मेंदोला के खिलाफ संयोगितागंज पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई है। फरियादी का आरोप है मेंदोला ने पद का दुरुपयोग करते हुए उसे धमकाकर एक ऐसे कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए जिससे उसे पौने सात लाख रुपए का नुकसान हो गया। उधर, पुलिस ने शिकायत की जानकारी नहीं होने की बात कहकर चौंका दिया है। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ की जमीन के मामले में मेंदोला के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस भ्रष्टाचार का केस दर्ज कर चुकी है।

शिकायतकर्ता उदय जायसवाल भारतीय साख सहकारिता संस्था के सदस्य हैं। उनके मुताबिक ढाई महीने पहले नंदानगर साख सहकारिता संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला, मैनेजर प्रवीण कंपलीकर, भारतीय साख संस्था अध्यक्ष महेश चौकसे कुछ अन्य लोगों के साथ उनके घर पर आए थे। भारतीय साख संस्था से मेरे 9 लाख रुपए लेना थे, लेकिन सभी ने दबाव बनाकर मुझसे सवा दो लाख रुपए लेने को कहा। इसके लिए उन्होंने मेरे और मेरी पत्नी से हस्ताक्षर भी करवा लिए। जायसवाल के वकील वाजिब खान ने बताया पुलिस को तत्काल मुकदमा दर्ज कर लेना चाहिए। मामले में पद का दुरुपयोग, धमकाने, झगड़ा करने की नीयत से घर पर जाने की धाराएं लगाई जा सकती है।

मुझे फिलहाल कोई जानकारी नहीं
संयोगितागंज टीआई अनिलसिंह राठौर ने बताया पुलिस के पास फिलहाल इस किस्म की कोई शिकायत नहीं आई है। मुझे फिलहाल इस केस की कोई जानकारी नहीं है। देर रात थाने पर फोन किया तो बताया गया यहां अब तक कोई शिकायत नहीं आई है। उधर, जायसवाल के पास थाने की रिसीव्ड कॉपी मौजूद है।

दोनों संस्थाओं को एक करने की कोशिश
भारतीय साख संस्था को नंदानगर खास संस्था खुद में शामिल करना चाहती है। यही वजह है कि दोनों संस्थाओं के संचालक मंडल मिलकर भारतीय संस्था के बकायेदारों से जैसे-तैसे 'निपटनाÓ चाहते हैं। दोनों संस्थाओं की हाल ही में हुई साधारण सभा में मर्जर के प्रस्ताव पास किए जा चुके हैं। हालांकि, सदस्यों की दिली इ'छा नहीं है कि दोनों संस्थाएं एक हो।

पत्रिका : १७ सितम्बर २०१०

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

चुनाव याचिका में शपथ पत्र पर बयान मंजूर नहीं

- पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी के कथन को हाईकोर्ट में चुनौती
- अगली सुनवाई के बाद ही होंगे बयान 


पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी द्वारा रतलाम विधायक पारस सकलेचा के विरूद्ध दायर चुनाव याचिका पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें मुद्दा उठा कि चुनाव याचिका में शपथ पत्र पर बयान मंजूर नहीं किया जा सकता है। व्यक्तिगत रूप से ही संबंधित व्यक्ति को अपनी बात कहना चाहिए।

कोठारी ने अपनी याचिका के पक्ष में जस्टिस आईए श्रीवास्तव की कोर्ट में शपथ पत्र के जरिए बयान पेश किए थे। सकलेचा की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ एडवोकेट चंपालाल यादव ने तर्क दिया कि यह याचिका जिस कानून के तहत दायर की गई है उसमें लिखित बयान की अनुमति नहीं है। कोठारी के एडवोकेट सुबोध अभ्यंकर और वीरकुमार जैन ने इस पर बहस के लिए समय मांगा। अब 14 सितंबर को इस मसले पर सुनवाई होगी और 23 सितंबर को बयान।

भ्रष्टाचार के आरोप पर लगी है याचिका
यह चुनाव याचिका 7 जनवरी 2009 को दायर की गई थी। चुनाव आयोग से प्राप्त सीडी के आधार पर हिम्मत कोठारी ने इस याचिका में कहा है कि विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान सकलेचा ने उन पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए और इसी के चलते वे चुनाव हार गए। कोठारी ने बताया भाषणों में सकलेचा ने उनपर लाठी खरीदी में 32 करोड़, दानापानी में 25 करोड़, बंदूक 14 करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। साथ ही यह भी कहा था कि मेरी बैंग्लूर में होटल है और मुंबई में कॉलोनी काटने वाला हूं। ये सभी आरोप मिथ्या थे क्योंकि अब तक इनके पक्ष में कोई बात कोर्ट में नहीं की गई है। 


पत्रिका : ०८ सितम्बर २०१०