गुरुवार, 30 सितंबर 2010

फोन पर हुई सुनवाई

- इंदौर के आरटीआई कार्यकर्ता से दिल्ली में मौजूद केंद्रीय सूचना आयुक्त ने लिए बयान
- मामला एमसीआई द्वारा जानकारी नहीं उपलब्ध कराने का


सूचना का अधिकार का उल्लंघन करने के एक मामले में दिल्ली स्थित केंद्रीय सूचना आयुक्त ने सोमवार को फोन पर सुनवाई की गई। उन्होंने इंदौर में मौजूद एक सूचना कार्यकर्ता से आपत्तियां सूनी और संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर दिए।
मामला मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) से जुड़ा है। इंदौर के सूचना का अधिकार कार्यकर्ता डॉ. आनंद राय ने 6 अप्रैल को तीन जानकारियां मांगी थी, जिसमें से उन्हें एक का ही जवाब दिया गया। इस पर उन्होंने एमसीआई सचिव कर्नल एआरएन सितलवाड़ को प्रथम अपील की थी, परंतु संतोषजनक जवाब नहीं मिला। आखिर उन्होंने केंद्रीय सूचना आयुक्त को अपील कर दी। इस पर जवाब के लिए डॉ. राय को सोमवार को दिल्ली बुलाया गया था, परंतु अन्य काम होने के कारण उन्होंने असमर्थता जताई। इस पर तय किया गया कि दोपहर तीन से चार बजे के बीच फोन पर ही उनके बयान ले लिए जाएंगे। दोपहर 3.25 बजे उनके मोबाइल पर केंद्रीय सूचना आयुक्त अनुपमा दीक्षित का फोन आया।

एमसीआई को दिया नोटिस

आयोग: आपकी आपत्ति बताएं?
अपीलकर्ता: मुझे तीन में से एक ही जानकारियां दी गई हैं। आपके पास मौजूद मूल अर्जी में जिन दो की जानकारी नहीं दी गई, उनका जिक्र है।
आयोग: और क्या आपत्ति है?
अपीलकर्ता: समय सीमा समाप्त होने के बाद में मुझे आयोग ने जानकारी दी और बदले में 150 रुपए लिए, जबकि कानूनन वे ऐसा नहीं कर सकते हैं।
आयोग: आज एमसीआई की और कोई आया नहीं है। हम उन्हें नोटिस जारी कर रहे हैं। जानकारी नहीं देगे, तो उन्हें सजा दी जाएगी।
अपीलकर्ता: मध्यप्रदेश में सूचना कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं होती है, इस पर भी कार्रवाई करें।
आयोग: हम जिस तरह से विभागों पर पैनल्टी लगा रहे हैं, उसी से सरकारों को सबक मिलेगा। आप सूचनाएं मांगते रहें।
(बातचीत की यह जानकारी अपीलकर्ता डॉ. आंनद राय के मुताबिक।)
 
इन प्रश्नों के नहीं मिले जवाब
  • मध्यप्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेसीडेंट के 120 पद रिक्त हैं, फिर भी भोपाल, इंदौर जैसे कॉलेजों को एमसीआई ने मान्यता कैसे प्रदान कर दी?
  • एमसीआई टीम के दौरे के ठीक पहले राज्य सरकार ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य विभाग के 28 डॉक्टरों को प्रतिनियुक्ति पर अस्थायी तौर पर भेजा और दौरा होने के बाद उन्हें वापस मूल पद पर बुला लिया। क्या इसकी जानकारी एमसीआई को थी? यदि हां, तो फिर मान्यता को लेकर इतनी औपचारिकताएं करने की जरूरत ही क्या है?


पत्रिका : २८ सितम्बर २०१० 

ड्रग ट्रायल की फाइल पहुंची सोनिया दरबार

- दिल्ली में विधिवत कार्रवाई शुरू
- शिकायतकर्ता ने उठाई सीबीआई जांच की मांग


बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) में मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बरती गई कौताही की पूरी फाइल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पहुंच गई है। उन्होंने इस पर विधिवत कार्रवाई भी शुरू कर दी है। शिकायतकर्ता ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है।

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे ने सोनिया गांधी को शिकायत भेज कर तमाम तथ्य उजागर किए थे। उन्हें सोमवार को कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद का एक पत्र मिला है। इसमें लिखा गया है कि मामले को सोनिया गांधी ने अत्यंत गंभीरता से लिया है और उन्होंने संबंधित पक्ष को कार्रवाई करने और इसकी जानकारी देने को कहा है।

दोषियों के बचाव में है राज्य सरकार
डॉ. राजे का आरोप है कि देश-दुनिया में जो मसला उठ चुका है, उसपर ठोस कार्रवाई करने के बजाए राज्य सरकार दोषियों को बचाने में लगी है। करीब दो महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक ईओडब्ल्यू ने अंतिम रिपोर्ट तैयार नहीं की है। इतना ही नहीं, विधानसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने जो कमेटी गठित करने की घोषणा की थी, उसकी अभी तक बैठक भी नहीं हुई है।

अमेरिकन सरकार भी मांग चुकी सफाई
'पत्रिकाÓ ने 14 जुलाई के अंक में 'मरीज को बना दिया चूहाÓ शीर्षक से खबर प्रकाशित कर खुलासा किया था कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में आने वाले गरीब और अनपढ़ मरीजों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके बाद मामला विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, आयकर, एमसीआई, आईसीएमआर तक पहुंचा। हाल ही में अमेरिकन सरकार के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने भी भारत सरकार को इस संबंध में पत्र लिखकर सफाई मांगी है।

यह किया उल्लंघन
- एमसीआई द्वारा तय की गई डॉक्टरों की 'मर्यादाओंÓ को लांघा।
- आईसीएमआर के मापदंडों का ताक में रखा।
- मरीजों को धोखे में रखकर ट्रायल में झोंका।
पत्रिका : २८ सितम्बर २०१०

विनयनगर के खेल में शालिनी ताई भी छली गई

- बॉबी ने टिका दिया था सड़क का प्लॉट
- हाईकोर्ट के फैसले के बाद खुल रही परतें



झूठ की बुनियाद पर विनय नगर की चालीस फीट चौड़ी सड़क पर मकानों के नक्शे पास करने के केस में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद परतें खुल रही हैं। गड़बड़ी में निगम के इंजीनियर परिवार के शामिल होने के बाद जानकारी मिली है कि जमीन के इस खेल में ख्यात शिक्षाविद शालिनी ताई मोघे भी ठगी जा चुकी हैं। मामले में भूमाफिया बॉबी छाबड़ा भी अहम किरदार हैं।

'पत्रिकाÓ ने रविवार के अंक में 'बागड़ खा गई खेतÓ शीर्षक से समाचार प्रकाशित करके खुलासा किया था कि निगम के पूर्व इंजीनियर अमृतलाल (अंबू) पटेल और मौजूदा इंजीनियर दीपक पटेल के परिवार ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सड़क के हिस्से को हथिया लिया। इस खेल में सरकारी विभागों ने उनकी हर स्तर पर मदद की। 'पत्रिकाÓ पड़ताल में साफ हुआ है कि सड़क पर काटा गया दूसरा प्लॉट (188-ए) हर्षा सतीश वाधवानी ने शालिनीताई से खरीदा था। ताई को यह प्लॉट बॉबी ने बेचा था। 

बॉबी ने बेहद चतुराई से रिश्तों को भुनाया
 बॉबी ने दस वर्ष पहले शालिनी ताई को उलझा था। बात 2000 की है, तब ताई 2/3 स्नेहलतागंज के स्वयं के मकान में रहती थीं। मकान जर्जर हो रहा था, इसलिए मोघे दंपत्ति (ताई और स्व. मोरेश्वर मोघे) ने उसे बेचने का मन बनाया। किसी परिचित ने बॉबी से मिलवाया। उसने मकान खरीदने के साथ ही वादा किया आपकी जमीन पर एक मल्टी बनाऊंगा और उसमें से एक फ्लैट आपको दूंगा। मल्टी बने तब तक आप मेरे 10, आदर्श नगर की तल मंजिल पर रहें। मोघे परिवार इस पर राजी हो गया। बॉबी ने कब्जा लिया और ताई आदर्श नगर में शिफ्ट हो गईं। बॉबी ने मल्टी बनाने के बजाए स्नेहलतागंज की जमीन नितिन पल्टनवाले को बेच दी, लेकिन ताई से किया वादा पीछे ही रह गया। चूंकि सारे वादे मौखिक थे, इसलिए ताई को फ्लैट नहीं मिल सका। इसी बीच बॉबी ने विनय नगर का उक्त प्लॉट (188-ए) ताई को दे दिया। ताई का परिवार इससे खुश था, लेकिन जब उन्होंने इस प्लॉट को बेचने की कोशिश की तो वह बिक नहीं सका। बाद में 2008 में बॉबी ने ही उसे बिकवाया। जो रुपया आया उसी से ताई ने 3/2 पगनीसपागा स्थित सीएमआर रॉयल रिजेंसी में एक छोटा सा फ्लैट खरीदा। अभी वे वहीं रहती हैं।    

हमारे बीच में ज्यादा बात नहीं होती थी  
फिलहाल ताई खुश हैं और अपने क्षमाशील स्वभाव के मुताबिक कहती हैं बॉबी ने मुझे कोई तकलीफ नहीं दी। मैं उनके घर में रहती जरूर थी, लेकिन उनके परिवार और हमारे बीच में ज्यादा बातचीत नहीं होती थी। हम नीचे रहते थे और उनका परिवार ऊपर। बॉबी के पिता हम लोगों का खासा ध्यान रखते थे। मैं यह कभी नहीं भूल सकती कि मोघेजी (स्व. मोरेश्वर मोघे) की बीमारी में उनके परिवार ने हमारी पूरी मदद की थी। विनयनगर प्लॉट लफड़े के बारे में वे कहती हैं, मुझे इसकी बहुत जानकारी नहीं क्योंकि उस समय मोघेजी जिंदा थे और उन्होंने ही बॉबी से चर्चा की थी। 

पत्रिका : २७ सितम्बर २०१०

बड़े सवालों के जवाब पर मांगी तारीख

शहर विकास के अहम बिंदुओं से जुड़े जनपयोगी मसलों पर मौन

शहर विकास से जुड़े दस अहम सवालों पर इंदौर विकास प्राधिकरण ने शनिवार को हुई जन उपयोगी लोक अदालत में जवाब पेश नहीं किया। जवाब पर साहब के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, कहकर नई तारीख मांगी गई है। सवाल विकास मित्र दृष्टि के किशोर कोडवानी ने उठाए थे।

वे जानना चाहते हैं कि जो नए रहवासी क्षेत्र बसे हैं या बस रहे हैं। उनमें धर्म स्थलों, बिजली ट्रांसफार्मर, कचरा पेटी, हॉकर्स झोन, सब्जी मंडी, पान-चाय-पंचर की दुकानों के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं? जन संख्या आधारित पानी की टंकियों, ड्रेनेज पानी निकासी, फिल्टर प्लांट, पंपिंग स्टेशन का क्या इंतजाम किया गया है? पारंपरिक जल स्त्रोतों के संवर्धन की क्या कार्ययोजना है? नर्मदा परियोजना के लिए सामंजस्य की क्या योजना है? कोडवानी ने बताया पिछली सुनवाई में कोर्ट ने आईडीए के साथ बैठक करने का सुझाव दिया था। इसी पर 16 सितंबर को बैठक हो चुकी है, परंतु जवाब पेश ही नहीं किया गया है। आईडीए अधिकारी केपी माहेश्वरी ने बताया जवाब तैयार हो गया है, लेकिन अवकाश के कारण हस्ताक्षर नहीं हो सके। अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी, तब सभी के सिलसिलेवार जवाब दे दिए जाएंगे।

बची हुई टंकियों का परीक्षण कराएं
एक अन्य केस में अदालत ने निगम को आदेश दिया है कि कोडवानी को शीघ्र 30 प्रतिशत टंकियों का निरीक्षण करवाएं और शेष दस्तावेज भी उन्हें उपलब्ध कराएं।

आईडीए के पास 49871 पेड़
आईडीए ने एक केस में जवाब पेश करके कोर्ट को बताया कि उसकी योजनाओं में 49 हजार 871 पेड़ लगे हैं। उधर, निगम पहले ही बता चुका है कि 370 बगीचों में करीब 9800 और सड़कों के किनारे करीब 13 हजार 700 पेड़ लगे हैं।

पत्रिका : २६ सितम्बर २०१०

भारतीय मरीज का डीएनए विदेश किसकी अनुमति से भेजा?

- ड्रग ट्रायल के लिए खून के नमूनों की विदेश यात्रा पर उठा सवाल
- आईसीएमआर ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को भेजा पत्र



बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को एक पत्र लिखा है। परिषद जानना चाहती है कि जिन भारतीय रोगियों पर ट्रायल किया गया है, उनके खून के नमूने किसकी इजाजत से विदेश भेजे गए? क्या इसमें नियमों का पालन हुआ है?

कॉलेज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया जिन डॉक्टरों ने ट्रायल किए है, उन्हें आईसीएमआर के पत्र के आधार पर जवाब-तलब किया जा रहा है। यह मसला बायोलॉजिकल प्रोडक्ट कानून से जुड़ा हुआ है। अभी तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया था। माना जा रहा है यह कॉलेज प्रबंधन और पूरे विभाग के लिए नई मुसीबत का कारण बनेगा। उधर, ट्रायल में लिप्त एक डॉक्टर ने 'पत्रिकाÓ को बताया जो दवा कंपनी ट्रायल करवाती है, वह अपनी उ'च क्षमता लेबोरेटरी में नमूनों को परखना चाहती है, यही वजह है कि नमूने विदेश भेजे जाते हैं। उन नमूनों का और क्या इस्तेमाल होता होगा, यह किसी को अंदाजा नहीं है।

आरटीआई से जुड़ा मसला
दरअसल, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता रोली शिवहरे ने आईसीएमआर से सवाल पूछा था कि ट्रायल से गुजर रहे मरीजों के खून, मूत्र, स्वाब आदि के नमूने जांच के लिए विदेश भेजे जाते हैं। इसकी अनुमति ली गई है या नहीं? यदि हां, तो किस कानून के तहत? इन सवालों के जवाब जब आईसीएमआर को नहीं मिले, तो उन्होंने मध्यप्रदेश स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभागों को पत्र लिखकर जानकारी चाही है।



पत्रिका : २६ सितम्बर २०१०
 

बागड़ खा गई खेत

विनयनगर में अवैध निर्माण
- निगम इंजीनियर ने सड़क पर पास करवाया मकान का नक्शा
- हाईकोर्ट में उजागर हो गया निगम-टीएंडसीपी का झूठ इंदौर




विनय नगर की 40 फीट चौड़ी सड़क की जमीन पर जिन लोगों ने मकान का नक्शा पास करवा लिया था, उनमें से एक का सीधा ताल्लुक इंदौर नगरनिगम के इंजीनियर से है। सरकारी इंजीनियर को पनाह देने के लिए निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग तक ने गलती पर पर्दा डालने की भरसक कोशिश की, लेकिन हाईकोर्ट की निगाह से वे बच नहीं सके। सरकारी दफ्तरों ने तो 'फाइल गायबÓ तक के तर्क दे दिए थे, परंतु फरियादी के दस्तावेजों ने पोल खोल दी। हाईकोर्ट ने नक्शे को अवैध माना और निर्माण ध्वस्त करने का आदेश दे दिया।

मामला विनय नगर के भीतरी बगीचे के पास की सड़क का है। वहां पहले डामर की सड़क हुआ करती थी। विनयनगर हाउसिंग सोसाइटी ने सड़क के किनारे मौजूद प्लॉट नंबर 173 और 188 के पास में क्रम से 173 (ए) और 188 (ए) नाम से प्लॉट काट दिए। प्लॉट नंबर 173 पर बने मकान में दीपक पटेल रहते हैं, जो निगम में इंजीनियर हैं। उनके पिता अमृतलाल (अंबू) पटेल भी रिटायर्ड निगम इंजीनियर हैं। नया नक्शा दीपक के भाई हितेष पटेल के नाम से है।

निगम की गाड़ी होती है पार्क
पटेल के प्लॉट पर फिलहाल बाउंड्रीवाल बनी है और इसमें एमपी09, एचडी-9058 इंडिका खड़ी रहती है। इस पर 'नगरनिगम सेवाÓ  लिखा गया है। पटेल परिवार की महिलाओं ने बताया यह प्लॉट हमारा हो गया है। हमारे खिलाफ अर्जी लगाने वालों की फाइल एक बार हाईकोर्ट ने फेंक दी थी।

अवैध को ध्वस्त करना ही रास्ता : हाईकोर्ट
विनयनगर निवासी अनिल कुकरेजा और अन्य ने इस मामले को लगातार तीन बार हाईकोर्ट में दायर किया। पूर्व में जस्टिस विनय मित्तल ने निर्माण कार्य पर स्थगन आदेश दिया था और बाद में जस्टिस शांतनु केमकर ने भी निर्माण को अतिक्रमण माना था। 9 सितंबर 2010 को जस्टिस एससी शर्मा ने 21 पृष्ठ का अंतिम फैसला सुनाया। इसमें सुप्रीम कोर्ट एक कुछ फैसलों का जिक्र दर्ज है, जिनमें सड़क या पार्किंग की जमीन पर बने बहुमंजिला भवन, स्कूल या अस्पताल तक को नेस्तनाबूत करने के उदाहरण मौजूद हैं। हाईकोर्ट ने सड़क की जमीन खरीदने वालों को छूट दी है कि वे कानूनी तरीके से अपने रुपए उस व्यक्ति से वसूलें, जिसने गलत नक्शा दिखाकर उन्हें प्लॉट बेच दिया।


अफसरों ने किया अतिक्रमण को मजबूत

नगरनिगम : बगैर रिकॉर्ड देखे दी अनुमति
विनयनगर का मूल नक्शा 16 अगस्त 1985 को पास हुआ, तब 40 फीट की सड़क दर्शाई गई थी। जुलाई 1998 में टीएंडसीपी ने सड़क की चौड़ाई 10 फीट करके पटेल का नक्शा पास कर दिया। इसी के आधार पर 25 जनवरी 2008 को निगम ने निर्माण की अनुमति दे दी।

टीएंडसीपी : गायब कर दिया रिकॉर्ड
टीएंडसीपी के द्वारा पारित नक्शे के आधार पर दोनों प्लॉटों पर निर्माण की राह खुली और टीएंडसीपी ने ही बाद में कहा दिया कि मामले में 1998 के बाद के दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं है। रिकॉर्ड गायब होने को हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर मानते हुए टिप्पणी की है कि संभवत: जानबूझकर रिकॉर्ड गायब किया गया है।

हाउसिंग सोसाइटी : खाली जगह बेचने का सिलसिला
मीठालाल राका की अध्यक्षता वाली विनयनगर हाउसिंग सोसाइटी ने 1985 में मंजूर हुए नक्शे को बाद में बेचना शुरू कर दिया। मूलत: करीब 20 एकड़ में फैली इस कॉलोनी का वर्तमान में करीब 22 एकड़ पर कब्जा है। नक्शे में पार्क और वाणिज्यिक उपयोग की जमीन को भी मकानों के लिए बेच दिया। हाईकोर्ट में परिवादी बनाने के बावजूद सोसाइटी की ओर से कोई मौजूद नहीं हुआ।


'मैं इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता हूं। आपका नंबर मेरे मोबाइल पर आ गया है। मैं अपने भाई दीपक और पिता अमृतलाल पटेल से कह दूंगा। वे आपसे बात कर लेंगे।Ó
- हितेष पटेल, सड़क पर नक्शा पास करवाने वाले
(लगातार कोशिश के बावजूद भी तीनों ने बात नहीं की।)

फैसले के पांच सबक
- दस्तावेजों के साथ लड़ाई लड़ी जाए तो सरकारी अफसरों की मिलीभगत भी आखिर में उजागर होती है।
- जब एक ही जमीन के दो नक्शे उपलब्ध हों, तो सबसे पुराने वाले नक्शे को ही सही माना जाए।
- आपकी आंखों के सामने अतिक्रमण हो, तो तत्काल शिकायत करें। ये शिकायतें ही कोर्ट में आधार बनती हैं।
- सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके मूल दस्तावेज जुटा लें।
- फाइल गायब करने के प्रचलित फंडे का इस्तेमाल करने के बाद भी झूठ को छुपाया नहीं जा सकता।


पत्रिका :  २६ सितम्बर २०१०

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

झूठ की बुनियाद पर हुआ पीथमपुर में कचरे का फैसला

- गुजरात सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में रामकी कंपनी ने दी गलत जानकारी

भोपाल में रखे यूनियन कार्बाइड के कचरे को गुजरात के अंकलेश्वर के बजाए मध्यप्रदेश के पीथमपुर में लाए जाने के फैसले की बुनियाद झूठी है। सुप्रीम कोर्ट में गुजरात सरकार ने जो हलफनामा पेश किया था, उसमें रामकी इनवारो इंजीनियर्स का एक पत्र लगाकर कर दावा किया गया था कि पीथमपुर में स्थापित प्लांट में कचरा भस्म करने की तमाम तकनीकी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन असल में ऐसा नहीं था। उस वक्त न तो प्लांट शुरू हुआ था और न ही होने की तैयारी ही थी।

गुजरात सरकार की ओर से गुजरात प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारी आरसी तंबोली ने 13 अप्रैल 2009 को सुप्रीम कोर्ट हलफनामा पेश किया था। इसमें 15 जनवरी 2009 को गुजरात सरकार को रामकी इनवायरो द्वारा लिखा पत्र भी दिया गया। रामकी के वाइस प्रेसीडेंट डॉ. के. श्रीनिवास ने इसमें लिखा था कि पीथमपुर में लगे कंपनी का प्लांट फरवरी के दूसरे सप्ताह में पूरी तरह से शुरू हो जाएगा और हम गुजरात सरकार से हर महीने 300 मेट्रिक टन औद्योगिक कचरा लेकर उसे भस्म करना शुरू कर देंगे। असलियत यह है कि वर्तमान में भी यह प्लांट शुरू नहीं हुआ है, जबकि इसी को एक आधार बनाकर गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला अपने हक में करवा लिया।


पीथमपुर में यूका कचरा जलाए जाने के विरोध की अगुवाई करने वाले संगठन लोकमैत्री का कहना है गुजरात सरकार ने बेहद चतुराई से यह फैसला करवाया है। वहां की सरकार ने अंकलेश्वर के भस्मक को कमजोर बताते हुए कहा है कि इसमें लीकेज है। यदि ऐसा है, तो वहां की सरकार उसे बंद क्यों नहीं कर रही है। साफ दिखता है कि यूका का कचरा टालने के लिए ही हलफनामा तैयार किया गया।

रामकी कंपनी का पत्र नहीं जाता, तो पीथमपुर में कचरा भस्म करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट फैसला ही नहीं सुनाता। 
- डॉ. गौतम कोठारी, लोकमैत्री संगठन

 पत्र डॉ. के. श्रीनिवास ने लिखा था और वे अब हमारी कंपनी में नहीं हैं। उन्होंने यह पत्र क्यों और किन परिस्थितियों में गुजरात सरकार को भेजा, यह तो वे ही जानते होंगे।
 अमित चौधरी, प्रभारी, रामकी सयंत्र, पीथमपुर


भस्मक बंद, कचरा भी नहीं
रामकी सयंत्र पर लगा भस्मक फिलहाल बंद है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ट्रायल रन के लिए कंपनी को अनुमति दी थी। दस दिन पहले ही ट्रायल रन समाप्त हुआ। इसके बाद प्लांट को फिर से शुरू करने के लिए बोर्ड से अनुमति की जरूरत है। भस्मक प्रबंधन ने बताया मई से अब तक 1700 मेट्रिक टन कचरा जलाया जा चुका है और फिलहाल कचरा भी मौजूद नहीं है।

ढाई महीने का ठंडा बस्ता
पीथमपुर में कचरा लाने का विरोध जब चरम पर पहुंचा तो 9 अगस्त को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जारी किया था कि इंदौर के लोगों की सहमति के बगैर कचरा पीथमपुर में नहीं लाया जाएगा। उधर, 10 अगस्त को केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश ने पीथमपुर पहुंचकर लोगों से वादा किया था कि एक उ'च स्तरीय कमेटी बनेगी, जो अंतिम फैसला करेगी। न तो मुख्यमंत्री ने अब तक इंदौर के लोगों से चर्चा की है और न ही जयराम ने कमेटी की घोषणा।




 पत्रिका : २४ सितम्बर २०१०