बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

नकली दवा से इलाज तो नहीं

 ड्रग ट्रायल में महिला की मौत के मामले में उठा नया सवाल

अल्जाइमर रोग के पीडि़त खंडवा की शीला गीते की मौत का कारण कहीं नकली दवा से उनका उपचार तो नहीं? अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। दरअसल, वे जिस ड्रग ट्रायल में शामिल थीं, वह प्लेसिबो ट्रायल था। इस ट्रायल में कुछ मरीजों को नकली दवा दी जाती है, जो दिखती तो दवा जैसी है किंतु उसमें दवा के बजाए स्टार्च या ग्लूकोज होता है।

'पत्रिकाÓ ने सोमवार के अंक में खुलासा किया था कि शीला गीते के पति शरद गीते ने स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया को पत्र लिखकर शिकायत की है कि उनकी पत्नी की मौत के बावजूद उन्हें बीमे के राशि नहीं दी गई है। 'पत्रिकाÓ के पास उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि शीला गीते पर जो ट्रायल हो रहा था, वह प्लेसिबो ट्रायल था। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अपूर्व पुराणिक ने उनसे जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे, उस पर साफ-साफ लिखा है कि आपको सिक्का उछालने वाले खेल की तरह एक अध्ययन में शामिल किया जा रहा है। हो सकता है आपको जो दवा दी जाए, वह नकली हो।

तीन में से दो को नकली दवा
डोनेपेजिल दवा के ट्रायल में हर तीन में से दो मरीजों को नकली दवा मिलता तय था। यह बात डॉक्टर भी जानते हैं। बावजूद इसके मरीज की जान जोखिम में डाली गई।


 जिसे असली दवा मिलती, उसे होता लाभ
डॉ. अपूर्व पुराणिक ने 'न्यूरो-प्रतिध्वनिÓ नाम के अपने ब्लॉग पर लिखा है कि ट्रायल के शुरू में ही हम मरीज को बता देते हैं कि उसे जो दवा दी जाती है, वह असली है या नकलीï, यह हमें पता नहीं रहता। ट्रायल समाप्त होने के बाद ही अंतिम परिणाम का पता चलता है। जिसे असली दवा मिलती है, उसे लाभ होता है।

 प्लेसिबो ट्रायल सबसे खतरनाक
स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के डॉ. आनंद राय कहते हैं प्लेसिबो ट्रायल सबसे खतरनाक होता है। अंतरराष्टï्रीय स्तर पर इसे न्यूनतम करने के निर्देश जारी हो चुके हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में हो रहे ज्यादातर ट्रायल प्लेसिबो हैं। इसमें मरीज को पहले से मिल रहा उपचार भी बंद हो जाता है और नतीजतन उसकी तबीयत सुधरने के बजाए बिगडऩे लगती है।


अभी बता पाना मुश्किल

क्या शीला गीते पर प्लेसिबो ट्रायल हो रहा था?
हां, यह प्लेसिबो ट्रायल ही था।
क्या उन्हें नकली दवा दी गई थी?
अभी यह पता नहीं चल सकता है। कंपनी के पास इसकी जानकारी रहती है। डाटा एनालिसिस के बाद ही इसका पता चलेगा।
प्लेसिबो ट्रायल से होने वाले दुष्परिणाम का जिम्मेदार कौन है?
हम पूरी देखरेख करते हैं और तबीयत बिगडऩे पर ट्रायल से हटा भी लेते हैं।
शीला गीते के केस में ऐसा क्यों नहीं हुआ?
वे हमसे संतुष्ट थे और यही वजह कि वे जनवरी तक उपचार लेती रहीं।
क्या गीते परिवार को बीमे का लाभ नहीं मिलना चाहिए?
मुझे फिलहाल बीमे की जानकारी नहीं है। कागज देखकर ही बता पाऊंगा।
(डॉ. पुराणिक से चर्चा)


सरकार ने मांगी मरीजों की सूची
- एमजीएम मेडिकल कॉलेज में हड़कंप


चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेजों से उन मरीजों की सूची तलब की है, जिन पर ड्रग ट्रायल किया गया। इससे एमजीएम मेडिकल कॉलेज में हड़कंप मच गया है। माना जा रहा है कि विधानसभा के पटल पर स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया के उस बयान को पूरा करने के लिए यह कवायद की जा रही है, जिसमें उन्होंने विधानसभा के सभी सदस्यों को मरीजों की सूची उपलब्ध कराने का  वादा किया था।
ज्ञात रहे कि पिछले पांच वर्ष में राज्य में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ है। इनमें से 1644 ब'चे हैं। मरीजों में से 51 पर ट्रायल के दुष्परिणाम भी हुए हैं।


पत्रिका : ०५ अक्टूबर २०१०

हाईकोर्ट ने मेंदोला को नहीं मिली राहत

- सुगनीदेवी केस की जांच प्रक्रिया को सही ठहराया 
- मनीष संघवी, रमेश ने दी थी विशेष न्यायाधीश के आदेश को चुनौती


परदेशीपुरा चौराहा के पास स्थित सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में लोकायुक्त जांच को चुनौती देने से जुड़ी दो याचिकाओं को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। नंदानगर साख संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला और धनलक्ष्मी केमिकल्स संचालक मनीष संघवी ने ये याचिकाएं दायर की थीं। हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के उस कदम को न्यायिक तौर पर सही माना जिसमें कांग्रेस नेता सुरेश सेठ की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश दिए गए थे।

इंदौर बैंच के जस्टिस एसएल कोचर और शुभदा वाघमारे की युगलपीठ ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए टिप्पणी की है विशेष न्यायाधीश को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का इस्तेमाल करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है और इसी के आधार पर जांच शुरू की गई है। कोर्ट उन सभी न्यायिक दृष्टांतों का भी खारिज कर दिया जिनके आधार पर विशेष न्यायाधीश की शक्तियों को कटघरे में खड़ा किया गया था। मेंदोला के पैरवीकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता एके सेठी और राहुल सेठी ने फैसले की पुष्टि की है। संघवी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रोहित आर्या और अमित अग्रवाल ने जबकि लोकायुक्त की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एलएन सोनी ने पैरवी की थी।

एमिकस क्यूरी की अहम रिपोर्ट

इस केस में कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश देसाई को एमिकस क्यूरी (केस में कोर्ट के सलाहकार) घोषित किया था। उनकी रिपोर्ट में निचली अदालत की कार्रवाई को सही ठहराया गया था।

उठी थी सीबीआई जांच की मांग
केस पर 19 अगस्त को अंतिम बहस हुई थी। तब सुरेश सेठ ने तर्क दिया था कि लोकायुक्त पुलिस की जांच प्रक्रिया बेहद धीमी है इसलिए जांच का कार्य सीबीआई को सौंप दी जाए। सुनवाई के दौरान ही हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अपराध तो हुआ है और केवल प्रक्रिया का हवाला देकर अपराध को खत्म तो नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने जीरो कायमी जिक्र करते हुए कहा था सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोई भी व्यक्ति थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कर सकता है। पहले वह जीरो नंबर पर कायम होती है और बाद में जिस क्षेत्र से संबंध होती है, वहां उसे भेजा जा सकता है। इस केस में लोकायुक्त पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। अब उसे शिफ्ट किया जा सकता है, खत्म तो नहीं किया जा सकता।


मेंदोला-संघवी समेत 17 आरोपी
लोकायुक्त पुलिस ने 5 अगस्त को मेंदोला और संघवी समेत 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक षडयंत्र का केस दर्ज किया है। इसकी अगली पड़ताल सोमवार को ही विधिवत शुरू हुई। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस को मय दस्तावेज बयाद दिए हैं। सभी 17 पर आरोप है कि इन्होंने षडय़ंत्र करके निगम से लीज पर ली गई जमीन को धनलक्ष्मी केमिकल्स से नंदानगर साख संस्था को बिकवाया और इससे शासन को करीब पौने तीन करोड़ के राजस्व की चपत लगी।

कल विशेष अदालत में सुनवाई
सुगनीदेवी केस में 6 अक्टूबर को विशेष न्यायालय में सुनवाई होना है। पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस को अंतिम जांच रिपोर्ट पेश करना थी, किंतु उसने तर्क दिया कि हमारे लिए जांच की समय सीमा तय नहीं की जा सकी है। सेठ की आपत्ति पर अब इस पर बहस होना है। ज्ञात रहे मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) को लेकर अब तक लोकायुक्त पुलिस ने कोई टिप्पणी नहीं की है।



मेंदोला-संघवी के सारे तर्क नामंजूर
- सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक दृष्टांतों का आधार लेना गलत
- सुगनीदेवी केस पर हाईकोर्ट में खारिज हुई याचिकाएं


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ मूल्य की तीन एकड़ जमीन मामले में विशेष न्यायाधीश द्वारा लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश देने को चुनौती देने के लिए लगाई याचिकाओं के तर्कों को हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के जिन न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया गया था, हाईकोर्ट ने उन्हें इस केस से संबद्ध नहीं माना।
 मेंदोला व संघवी की ओर से कई न्यायिक दृष्टांत दिए गए थे, किंतु कोर्ट ने उन्हें वाजिब नहीं माना। उधर, सुरेश सेठ ने 284 पेज का एक जवाब पेश किया था। उनके जवाब में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के 21 न्यायिक दृष्टांत थे। ये सभी दृष्टांत मेंदोला और संघवी की याचिकाओं के तर्कों को चुनौती देते थे। कोर्ट द्वारा मेंदोला-संघवी की याचिकाएं खारिज करने से साफ है कि सेठ के तर्कों से कोर्ट सहमत हुई।

 विधायक रमेश मेंदोला की याचिका के आधार

1. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग मजिस्ट्रेट कर सकता है, विशेष न्यायाधीश नहीं।
2. विशेष न्यायाधीश मप्र विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) कानून 1947 एवं मप्र लोकायुक्त कानून के अधीन है। वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत मजिस्ट्रेट नहीं है।
3. विशेष न्यायाधीश द्वारा सीआरपीसी की धारा 190 के तहत कार्रवाई नहीं की।
4. मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून की धारा 4 के तहत कोई भी अनुसंधान कार्य पर सुपरइनटेंडेंस लोकायुक्त की रहती है, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
5. शिकायतकर्ता ने कभी भी लोकायुक्त अथवा एसपीई लेाकायुक्त को शिकायत दर्ज नहीं करवाई, इसलिए विशेष न्यायाधीश द्वारा धारा 153(3) के तहत जांच के आदेश देना त्रूटिपूर्ण है।
6. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी फौजदारी परिवाद के तहत परिवादी के बयान दर्ज नहीं किए और न ही धारा 202 के तहत कोई कार्रवाई की।
7. आरोपी की सुनवाई का अवसर दिए बगैर सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
8. सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत आदेश पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंनचार्ज को ही दिया जा सकता है। एसपीई लोकायुक्त इंदौर इस श्रेणी में नहीं आते।
9. सीआरपीसी की धारा 153(3) की शक्तियों का उपयोग तभी किया जा सकता है, जबकि संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया गया हो।
10. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र विशेष पुलिस स्थापना कानून के प्रावधानों के विपरीत है, क्योंकि इस अधिनियम में रा'य सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है। 


मनीष संघवी की याचिका के आधार
1. याचिकाकर्ता लोक सेवक नहीं है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत एसपीई लोकायुक्त को जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
2. मप्र लोकायुक्त और उपलोकायुक्त नियम 1981 की धारा 8 (सी) के तहत पांच वर्ष से पुराने मामलों पर जांच का प्रतिबंध लगाया गया है।
3. विशेष न्यायाधीश ने सीआरपीसी की धारा 153(3) के तहत याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया।
4. विशेष न्यायाधीश का आदेश मप्र लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम 1981 की धारा 7 के प्रावधानों का उल्लंघन है।


सुरेश सेठ के जवाब
1. तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला ने महापौर कैलाश विजयवर्गीय की मौन सहमति के साथ पद का दुरुपयोग करते हुए धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार मनीष संघवी व विजय कोठारी से आपराधिक षडय़ंत्र रचकर सरकारी जमीन की खरीदी-बिक्री की। इससे निगम और सरकार को करोड़ों की राजस्व हानि हुई।
2. वर्तमान में पुलिस अनुसंधान जारी है, इसलिए दोनों याचिकाएं अपरिपक्व हैं।
3. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (ई) के तहत एसपी स्तर के अधिकारी को जांच का आदेश देने का अधिकार है।
4. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश को संज्ञान लेने का पूर्ण अधिकार है और इससे सेशन न्यायालय के साथ मजिस्ट्रेट की शक्तियों का समावेश हो गया है।
5. सीआरपीसी की धारा 153 (3) के तहत जांच के आदेश जारी करने से पहले अभियुक्त को सुनवाई को अवसर देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
पत्रिका : ०५ अक्टूबर २०१०

मंत्रीजी, घुट-घुटकर मर गई मेरी पत्नी

- ड्रग ट्रायल मामले में मरीज के परिजन की पहली लिखित शिकायत
- चिकित्सा शिक्षा मंत्री महेंद्र हार्डिया से की जांच करवाने की मांग
- एमवाय अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग में चल रहा था उपचार



 अल्जाइमर रोग से पीडि़त मेरी पत्नी को मैं 29 मार्च 2006 को उपचार के लिए एमवाय अस्पताल लेकर आया था। इलाज के दौरान न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अपूर्व पुराणिक ने 27 जून 2008 को मेरी पत्नी को एक अध्ययन में शामिल करके उपचार शुरू किया और डोनेपोझिल के हेवी डोज उसे दिए जाने लगे। पहले वह मुझे और मेरी परिवार को पहचानती थी। धीरे-धीरे उसे स्मृति भ्रम होने लगा और बाद में तो वह सबकुछ भूल गई। आखिर में घुट-घुटकर 8 अगस्त को उसकी मौत हो गई। अब मुझे पता चला है कि वह अध्ययन एक ड्रग ट्रायल था। मेरी पत्नी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी। ट्रायल के हेवी डोज से उसकी मृत्यु हुई है।

खंडवा निवासी शीला के पति शरद गीते (76) यह कहते-कहते रूंआसे हो जाते हैं। शरद गीते ने अपने साथ हुए धोखे की दास्तां 'पत्रिकाÓ को बताई। साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया को एक शिकायती पत्र लिखकर इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग भी की है। गीते सेवानिवृत्त सहायक पंजीयक हैं और शनिवार को इंदौर में थे। ड्रग ट्रायल का मसला उजागर होने के बाद से मंत्री और सरकारी अधिकारी लगातार कह रहे हैं कि उन्हें अब तक किसी मरीज ने शिकायत नहीं की है। गीते ने बताते हैं 'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के बाद ही पता चला कि हम ट्रायल के शिकार हैं।

क्यों नहीं दिया जीवन बीमा?
गीते ने बताया पत्नी को जब इलाज करवाने ले जाता था, तो मुझे आने-जाने का खर्च दिया जाता था। बाद में यह भी बंद कर दिया गया। इलाज शुरू करने के पहले डॉ. पुराणिक ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे। इस पर लिखा था कि आपका जीवन बीमा करवा गया है, परंतु आज तक हमें यह नहीं दिया गया।

पांच वर्ष बाद तक क्लेम का हक

ड्रग ट्रायल के लिए बीमा कंपनियों ने क्लिनिकल ट्रायल लाइबिलीटी इन्श्योरेंस (सीटीएलआई) का प्रबंध किया है। इसके तहत ट्रायल के बाद के पांच वर्ष तक का जीवन बीमा रहता है।

हालत बिगड़ती गई, पर नहीं हुई सुनवाई
गीते के पुत्र शिताम्शु ने बताया उपचार डॉ. कुंदन खामकर, आरती वासकले और रिचासिंह करती थीं। इलाज शुरू हुआ तब पत्नी सारे रिश्तेदारों को पहचान लिया करती थी। स्थिति बिगड़ती गई और हम डॉक्टरों को शिकायत करते रहे, परंतु किसी ने सुनवाई नहीं की।

कहीं उपचार बंद तो नहीं था उपचार
यह ट्रायल प्लेसिबो था, जिसमें एक नकली (डमी) दवा दी जाती है। यह दिखती तो दवाई जैसी है, किंतु इसमें दवा के बजाए स्टार्च या ग्लूकोज होता है। शीला गीते भी प्लेसिबो ट्रायल में शामिल थीं। डब्ल्यूएचओ ने प्लेसिबो को खतरनाक माना है, क्योंकि इसमें मरीज की तबीयत बहुत तेजी से बिगड़ सकती है।

2008 से चल रही 5.34 लाख की ट्रायल
दवा                                         : डोनेपेजिल एसआर 23 एमजी व डोनेपेजिल आईआर 10 एमजी
कब से                                     : वर्ष 2008 से
डॉक्टर                                     : मुख्य- अपूर्व पुराणिक, सहायक- कुंदन खामकर
डॉक्टरों को मिली राशि             : 5 लाख 34 हजार 241 रुपए
इतनी दवाइयां       : 18.16 लाख प्लेसिबो केप्सूल, 1008 दवा के केप्सूल व 24.19  हजार गोलियां।
स्पांसर कंपनी       : क्विंटल्स
दवा कंपनी            : ईसाई ग्लोबल क्लीनिकल डेवलपमेंट, लंदन
ट्रायल का चरण     : तृतीय


लिखित में पूछेंगे, तभी कुछ बताऊंगा

मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकता हूं। आप मुझसे लिखित में पूछेंगे, तभी आपको कुछ बता पाऊंगा। वैसे, भी मैं अभी इंदौर में नहीं हूं।
- डॉ. अपूर्व पुराणिक, न्यूरोलॉजिस्ट, एमवाय अस्पताल

(पत्रिका ने डॉ. पुराणिक को ईमेल और फैक्स का विकल्प भी सुझाया, परंतु उन्होंने इंकार कर दिया। वैसे, पत्रिका अगस्त में सूचना का अधिकार में ड्रग ट्रायल की जानकारी मांग चुका है। तब डॉ. पुराणिक के विभाग ने 'जानकारी देना जरूरी नहींÓ कहकर इंकार किया था।)


भूलने का रोग अल्जाइमर
अल्जाइमर को विस्मृति रोग कहते हैं। आमतौर पर यह वृद्धावस्था में होता है। जर्मन डॉ. ओलोए अल्जीमीर ने 1906 में एक महिला के मस्तिष्क के परीक्षण में पाया कि उसमें कुछ गांठे पड़ गई हैं, जिन्हें चिकित्सा विज्ञान में प्लेट कहा जाता है। गांठे पडऩा ही रोग है। डॉ. अल्जीमीर के नाम पर अल्जाइमर नाम प्रचलित हुआ।

पत्रिका : ०४ अक्टूबर  २०१० 

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

तिलकनगर मेनरोड की दो बाधाएं खत्म

तिलकनगर मेनरोड में बाधक बन रहे दो मकानों के हिस्सों को तोडऩे के आदेश भी कोर्ट ने दिए हैं। जस्टिस शांतनु केमकर और प्रकाश श्रीवास्तव की युगलपीठ ने रविकुमार जैन और दिनेश त्रिपाठी की दोनों की अपील याचिकाओं को खारिज कर दिया। दोनों का कहना था कि उनकी जमीन निजी है और उसे सेटबेक में नहीं लिया जा सकता। नगरनिगम के तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि जमीन सेटबेक की है और निगम को इसे लेने का अधिकार प्राप्त है। कोर्ट के इस फैसले से सड़क का शेष कार्य पूरा होने की राह खुल गई है।


पत्रिका : ०३ अक्टूबर २०१०

पूर्व गृहमंत्री को देना होंगे मौखिक बयान

चुनाव याचिका में शपथ पत्र पर बयान हाईकोर्ट ने किए नामंजूर

पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी द्वारा रतलाम विधायक पारस सकलेचा के विरूद्ध दायर चुनाव याचिका पर शुक्रवार को हाईकोर्ट में निर्देश दिए कि शपथ पत्र पर बयान मंजूर नहीं किए जा सकते। व्यक्तिगत रूप से ही संबंधित को अपनी बात कोर्ट के समक्ष कहना होगी।

कोठारी ने अपनी याचिका के पक्ष में जस्टिस आईए श्रीवास्तव की कोर्ट में शपथ पत्र के जरिए बयान पेश किए थे। सकलेचा के पैरवीकर्ता वरिष्ठ एडवोकेट चंपालाल यादव ने 'पत्रिकाÓ को बताया कोर्ट ने मौखिक बयान की सुनवाई की तारीख 25 अक्टूबर तय की है।

भ्रष्टाचार के आरोप पर लगी है याचिका
यह चुनाव याचिका 7 जनवरी 2009 को दायर की गई थी। चुनाव आयोग से प्राप्त सीडी के आधार पर हिम्मत कोठारी ने इस याचिका में कहा है कि विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान सकलेचा ने उन पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए और इसी के चलते वे चुनाव हार गए। 

पत्रिका : ०२ अक्टूबर २०१०

युगलपीठ में वाघमारे की अपील खारिज

- बीआरटीएस में आ रही जमीन का मामला


एबी रोड पर निर्माणाधीन बीआरटीएस में जमीन अधिग्रहण के मसले पर दायर एक रिट अपील हाईकोर्ट जस्टिस शांतनु केमकर और एसके सेठ की युगलपीठ ने खारिज कर दी। यह अपील रविंद्र रामचंद्र वाघमारे ने दायर की थी। मंगलवार को जस्टिस एससी शर्मा की एकल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने एकलपीठ के निर्णय को सही माना।

ïमूल याचिका में तर्क दिया गया था कि नगरनिगम जमीन अधिग्रहण कर रहा है, लेकिन मुआवजा नहीं दे रहा। चूंकि जमीन निजी है, इसलिए मुआवजा याचिकाकर्ता का हक है। एकल पीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया था क्योंकि निगम के मुताबिक यह जमीन सेटबैक की है और कानूनन इसे निगम अधिग्रहित कर सकता है।

फिलहाल कोई केस नहीं
सूत्रों के मुताबिक बीआरटीएस को लेकर अब कोई मसला लंबित नहीं है। मंगलवार को ही पांच याचिकाएं हाईकोर्ट में लगी थी, इनमें से विजय हालान, जसवंत डोसी और मोहम्मद अकरम ने यह कहकर याचिका वापस ले ली थी कि उन्होंने जमीन निगम को दे दी है। वाघमारे की याचिका को खारिज कर दिया गया था, जबकि भंडारी कोठी से संबंधित भुवन कुमारी केस में निगम को सुनवाई के आदेश हुए थे।

 
पत्रिका : ०२ अक्टूबर २०१०

दिलीप पाटीदार को ढूंढने का जिम्मा सीबीआई को

मालेगांव ब्लॉस्ट केस में एटीएस 688 दिन पहले ले गई थी मुंबई
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट ने दिया जांच का आदेश




मालेगांव ब्लॉस्ट मामले में 11 नवंबर 2008 से रहस्यमय तरीके से लापता दिलीप पाटीदार को खोजने की जिम्मेदारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को दी गई है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सीबीआई को इस आदेश दिया है कि दो महीने बाद इस बारे में रिपोर्ट कोर्ट के पटल पर रखे। पाटीदार के परिवार ने ही सीबीआई जांच की मांग की थी क्योंकि मुबंई एटीएस और मप्र पुलिस उसे खोजने में असमर्थ रही थी।

दिलीप के भाई रामस्वरूप पाटीदार ने हाईकोर्ट में 24 नवंबर 2008 को इंदौर हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। जस्टिस शांतनु केमकर और प्रकाश श्रीवास्तव युगलपीठ ने शुक्रवार को इस पर अंतरिम आदेश जारी किया। पाटीदार की वकील रितु भार्गव ने 'पत्रिकाÓ को बताया हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच की अर्जी मंजूर करते हुए मप्र पुलिस, महाराष्टï्र पुलिस और मुंबई एटीएस को सहयोग करने को कहा है। ज्ञात रहे केस की एक सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा था कि इस तरह की याचिकाओं पर अधिकतम छह महीने में निर्णय हो जाना चाहिए, परंतु पक्ष अड़ंगा डालते रहे और तारीखें बढ़ती गईं।

रामजी का किराएदार था दिलीप
दिलीप पाटीदार मूलत: शाजापुर जिले के दुपाड़ा का निवासी है और इंदौर में इलेक्ट्रिशियन का कार्य करता था। 2008 में शांतिविहार कॉलोनी के शिवनारायण कलसांगरा और रामजी कलसांगरा के मकान में किराए से पत्नी और एक ब'चे के साथ रहता था। मालेगांव ब्लास्ट में शिवनारायण मुंबई एटीएस की गिरफ्त में है, जबकि हैदराबाद की मक्का मस्जिद में 18 मई 2007 को हुए ब्लॉस्ट के आरोपी रामजी पर सीबीआई ने दस लाख का इनाम घोषित किया है। लापता होने के कुछ दिन पहले ही दिलीप ने खजराना थाने में रिपोर्ट लिखवाई थी कि मुंबई एटीएस का एक दल चोरी से शिवनारायण के घर में घुसा और वहां रखे हथियार व अन्य सामान अपने साथ ले गया। इसके बाद ही मुबंई एटीएस ने 10-11 नवंबर 2008 की रात में दिलीप को उठाया था। एटीएस का कहना है कि दिलीप मालेगांव ब्लॉस्ट का अहम गवाह है। दिलीप की पत्नी और ब'चा फिलहाल दुपाड़ा में रहता है।

एटीएस पर गंभीर आरोप
दिलीप के भाई रामस्वरूप का आरोप है एटीएस ने पूछताछ के दौरान दिलीप की हत्या कर दी। उधर, एटीएस का मानना है कि परिजन ने ही उसे छुपा रखा है।


केस से जुड़ी अहम तारीखें

11 नवंबर 2008
मुंबई एटीएस पूछताछ के लिए दिलीप पाटीदार को मुंबई ले गई।
24 नवंबर 2008
दिलीप के नहीं लौटने पर उनके भाई रामस्वरूप ने एडवोकेट दीपक रावल के जरिए बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की।
1 दिसंबर 2008
कोर्ट ने मामले में मुंबई एटीएस और स्थानीय पुलिस को नोटिस जारी किए।
2 अप्रैल 2009
जस्टिस एएम सप्रे व प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने इंदौर एसपी को एक महीने में मामले में रिपोर्ट पेश करने को कहा।
17 सितंबर 2009
कोर्ट ने कहा मुंबई एटीएस और इंदौर पुलिस मिलकर नहीं ढूंढ पाए तो एटीएस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में आना होगा।
5 नवंबर 2009
जस्टिस सप्रे और एसके सेठ की पीठ ने एटीएस और मप्र पुलिस की संयुक्त कमेटी गठित की, ताकि दिलीप को ढूंढा जा सके।
10 दिसंबर 2009
जस्टिस एसएल कोचर और सेठ की पीठ के समक्ष एटीएस ने रिपोर्ट पेश की कि दिलीप की सिम से बात की गई है और वह जिंदा है। कोर्ट ने कहा दो महीने में अंतिम रिपोर्ट दी जाए।
29 जुलाई 2010
एडवोकेट रितु भार्गव ने जस्टिस कोचर व शुभदा वाघमारे की पीठ के समक्ष सीबीआई जांच की मांग रखी। कोर्ट ने नाराजगी जताई कि दोनों पक्षों की अड़चनों के कारण फैसला नहीं हो पा रहा, जबकि छह महीने में यह केस निपट जाना था।
17 अगस्त 2010
जस्टिस केमकर और प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने सहायक सोलिसिटर जनरल विवेक शरण के जरिए सीबीआई को नोटिस देकर पूछा कि क्या वह इस केस की जांच कर सकती है?
9 सितंबर 2010
सीबीआई ने कोर्ट को बताया हम भ्रष्टाचार के केस हाथ में लेते हैं, जबकि यह क्रिमिनल केस है। यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के आदेश पर हम केस में जांच करते हैं।
23 सितंबर 2010
सभी पक्षों की राय सुनने के बाद केस में फैसला सुरक्षित रखा गया।
1 अक्टूबर 2010
कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश जारी किए। 

 पत्रिका : ०२ अक्टूबर २०१०