सोमवार, 27 दिसंबर 2010

कैलाश पर फैसला आज

- सुगनीदेवी जमीन मामले में विशेष न्यायालय देगा 'समय कवच' पर निर्णय


100 करोड के सुगनीदेवी जमीन घोटाले की शिकायत के आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की जांच की समय सीमा पर विशेष न्यायालय बुधवार को फैसला सुनाएगा। लोकायुक्त पुलिस का तर्क है कोर्ट को समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं, जबकि फरियादी सुरेश सेठ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर साबित किया है कि लोकायुक्त जैसी जांच संस्थाओं के लिए भी समय की बाध्यता होती है। 

केस में पिछली सुनवाई 6 अक्टूबर को हुई थी। तब विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने दोनों पक्षों के तर्क सुनकर फैसला 20 अक्टूबर तक के लिए सुरक्षित रखा था। पिछली सुनवाई में शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के तर्कों की सिलसिलेवार धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट को बताया विजयवर्गीय को बचाने के लिए ही लोकायुक्त पुलिस ने 21 सितंबर को कोर्ट में अर्जी दी थी कि जांच की समय सीमा तय नहीं की जाए। वैसे 21 सितंबर को लोकायुक्त पुलिस को कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु ïविशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। 

'लोकायुक्त पुलिस की भूमिका संदिग्ध'
सुरेश सेठ ने कोर्ट को लिखित में दिया है लोकायुक्त पुलिस मप्र के मंत्री (कैलाश विजयवर्गीय) के दबाव में आकर संदिग्ध भूमिका निभा रही है। विजयवर्गीय इस प्रकरण में न केवल संलिप्त हैं, बल्कि सार्वजनिक घोषणाओं में भी वे यह मंजूर कर चुके हैं। पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने 28 अगस्त 2010 को नंदानगर साख संस्था की विशेष साधारण सभा में विवादित जमीन पर कॉलेज बनाने की घोषणा भी कर दी है।

'हाईकोर्ट ने भी तो तय की समय सीमा'   
सेठ ने बताया अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन सक्सेना के खिलाफ हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को छह माह में जांच करने के निर्देश दिए हैं। उस केस में और मेरे केस में कोई मौलिक अंतर नहीं है। वहां याचिकाककर्ता ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, यहां विशेष न्यायालय में लगाई गई।                                                   
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यूं निकाली लोकायुक्त पुलिस की हवा
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें उन छहों न्यायिक दृष्टांतों को खारिज किया गया है, जो लोकायुक्त पुलिस ने दिए थे।
एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
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जनता के सामने खड़े कई सवाल

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा है-
1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है?

पत्रिका १९ अक्टूबर २०१०

पेनजॉन ने मुबंई को दी तीन करोड़ की कड़वी दवा

- वसूली के लिए मनोज-अंजु कोठरी को खोज रही ग्लोबल ट्रेड फाईनेंस कंपनी
- इंदौर के निवेशकों से साढ़े तीन करोड़ लेकर फरार है दोनों


धोखे का धंधा

इंदौर पुलिस को लगातार चकमा देने में कामयाब रहे पेनजॉन फार्मा के संचालक मनोज नगीन कोठारी और अंजु मनोज कोठारी ने मुंबई की ग्लोबल ट्रेड फाईनेंस कंपनी को 2.90 करोड़ रुपए की चपत लगा दी है। कोठारी दंपत्ति से वसूली के लिए कंपनी ने मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

पेनजॉन फार्मा ने व्यापार के लिए ग्लोबल ट्रेड  फाईनेंस से कर्जा लिया था। जब चुकाने की बारी आई तो कोठारी दंपत्ति गायब हो गए। कंपनी ने अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हाल ही में मुंबई हाईकोर्ट ने समन्स जारी किए हैं।

पते पर ताला
कोठारी दंपत्ति ने कर्जा लेते वक्त जो पता दर्ज किया था, फिलहाल वे वहां नहीं रहते। प्राप्त जानकारी के मुताबिक पेनजॉन ने स्कीम नं. 54 स्थित मान हाउस का पता दिया था। पेनजॉन ने यह ऑफिस किराए पर लिया था। फिलहाल वहां ताला लगा है।

प्रशासन का संरक्षण 
पेनजॉन के खिलाफ इंदौर के 500 से अधिक निवेशकों की लड़ाई जारी है। इन निवेशकों के साढ़े तीन करोड़ रुपए लेकर गायब है। पुलिस ने मनोज-अंजु कोठारी और कीर्तिकुमार शाह पर पांच-पांच हजार रुपए का ईनाम घोषित किया है। निवेशकों का मानना है कि पेनजॉन कंपनी संचालकों को जिला और पुलिस प्रशासन की सुस्ती का फायदा मिल रहा है, अन्यथा कोठारी दंपत्ति को पकडऩा मुश्किल काम नहीं है।

मुंबई में ही कट रही फरारी
सूत्रों के मुताबिक कोठारी दंपत्ति की फरारी मुंबई में ही कट रही है। वहीं रहकर मनोज कोठारी न्यूट्रीचार्ज नाम की दवा का कारोबार कर रहा है। इंदौर में भाजपा नेता अशोक डागा की भतीजी प्राची डागा पेनजॉन फार्मा की सुपर स्टाकिस्ट है।

पत्रिका १७ oct २०१०

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

सफेद हाथी

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रोफेसर ने पांच साल से नहीं ली क्लास
- लीगल सेल, गार्डन प्रभारी बन पा रहे 77 हजार रुपए महीना


एमजीएम मेडिकल कॉलेज के सांख्यिकी प्रोफेसर एलके माथुर ने पांच वर्ष से एक भी क्लास नहीं ली है। उन्हें 77 हजार 208 रुपए महीना वेतन मिलता है। फिलहाल वे कॉलेज के लीगल सेल और गार्डन प्रभारी हैं। प्रो. माथुर की ड्ïयूटी का अधिकांश समय कॉलेज डीन के चेंबर में गुजरता है।
सूचना का अधिकार में जारी एक दस्तावेज में कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभागाध्क्ष डॉ. संजय दीक्षित ने माना कि प्रोफेसर माथुर ने पांच वर्ष में अंडर ग्रे'युएट एवं पोस्ट ग्रे'युएट कोर्स में शिक्षण कार्य नहीं किया है।

प्रो. माथुर के वेतन का ब्यौरा
बेसिक पे                         51700  रु
ग्रेड पे                                 8700 रु
डीए                                  16308 रु
अकादमिय भत्ता                    500 रु
मकान भत्ता                            -
कुल                                   77208 रु


 वे मेरे भरोसेमंद हैं

प्रो. एलके माथुर का क्या दायित्व है?
वे सांख्यिकी के  प्रोफेसर हैं और उन्हें क्लासेस लेकर छात्रों को डॉटा संयोजन और विश्लेषण पढ़ाना चाहिए।
किंतु वे तो पांच वर्ष से क्लास ही नहीं ले रहे हैं?
मैं कम्युनिटी मेडिसिन विभाग से पता करता हंू।
प्रो. माथुर तो आपके चेंबर में ही बैठे रहते हैं। क्या इसीलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता?
वे यहां बैठकर लीगल सेल और गार्डन का कार्य करते हैं। वे मेरे  नजदीकी और भरोसेमंद हैं लेकिन उन्हें मैंने कोई शरण नहीं दे रखी है।
(कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से चर्चा)

 पांच वर्ष पहले तो क्लास लेता था

आप क्लास क्यों नहीं लेते हैं?
टाइम टेबल में किसी ने मेरी क्लास ही नहीं लगाई। पांच वर्ष पहले क्लास लेता था। आप उसके बारे में क्यों नहीं जानना चाहते।
बताईए तब आप क्या करते थे?
मैं क्लास लेता था। बाद में मैं एमवायएच में सहायक अधीक्षक भी रहा। अभी भी फिजियोथेरेपी की क्लास लेता हूं, जिसका मुझे अतिरिक्त रुपया मिलता है।
पांच वर्ष से आपने क्लास मांगना जरूरी क्यों नहीं समझा?
सबको मालूम है कि मैं सांख्यिकी का प्रोफेसर हूं। उन्हें मेरी ड्यूटी लगाना चाहिए। वैसे मार्च 2008 से जनवरी 2010 तक मैं भोपाल में पदस्थ था।
क्या आप भोपाल में क्लास लेते थे?
नहीं, क्योंकि वहां तो दूसरे कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी।
फिलहाल कॉलेज में आप करते क्या हैं?
मैं सबसे जटिल लीगल सेल देखता हूं। साथ ही उन पीजी छात्रों की थिसीस के डॉटा विश्लेषित करता हूं जो मेरे पास आते हैं।
आप बैठते कहां हैं?
कभी डीन चेंबर और कभी लीगल सेल में। मुझे तो स्थाई जगह भी नहीं दी गई है।
(प्रो. एलके माथुर से चर्चा)


उठते सवाल
- मेडिकल के छात्रों को सांख्यिकी कौन पढ़ा रहा है?
- ऊंची तनख्वाह पाने वालों के कामकाज की निगरानी क्यों नहीं की जा रही है?
- क्या प्रो. माथुर जैसे लोगों के विरू द्ध सरकारी धन का अपव्यय करने का प्रकरण नहीं बनाया जाना चाहिए? 
पत्रिका: १८ अक्टूबर २०१०

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

कैसे कर लें ऐसी न्यायपालिका पर भरोसा

- आठ पूर्व सीजेआई पर भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर इंदौर से उठी आवाज
- सत्यपाल आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में फाइल की जनहित याचिका


पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री शांति भूषण द्वारा भारत के आठ पूर्व मुख्य न्यायमूर्तियों (सीजेआई) पर भ्रष्टाचार का आरोप लगने के आधार पर इंदौर के आनंद ट्रस्ट के ट्रस्टी सत्यपाल आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की है। आंनद का तर्क है कि इस घटनाक्रम से देशवासियों का न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है। अब न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को स्थिति स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही नौ जजों के उस कोलेजियम को भी तत्काल भंग किया जाना चाहिए, जो जजों का चयन करता है।

सैंकड़ों जनहित याचिकाएं दायर करके कई न्यायिक बहसें उपजा चुके आनंद ने मंगलवार को ईमेल के जरिए सुप्रीम कोर्ट में अपनी 32 पेज की याचिका दाखिल की। पत्रकारों से चर्चा में उन्होंने बताया याचिका में मौजूदा सीजेआई एसएच कपाडिय़ा, पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा, केएन सिंह, एएम अहमदी, एनएम मुंशी, एएस आनंद, वायके सबरवाल, प्रधानमंत्री, केंद्रीय विधि मंत्री, नेता प्रतिपक्ष, पूर्व विधि मंत्री शांति भूषण, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मप्र के मुख्यमंत्री और विधि आयोग के चेयरमैन को प्रतिवादी बनाया गया है। उनके साथ धरमदास मोहनलाल और रामकिशन भी याचिकाकर्ता हैं। आनंद ने अहम संवैधानिक सवाल उठाते हुए याचिका में लिखा है कि भारत का संविधान भ्रष्टाचार को रोकने में सफल नहीं हो रहा है, तो क्यों नहीं एक नई संवैधानिक सभा का गठन किया जाए और संविधान को फिर से लिखा जाए। वैसे भी स्वयं डॉ. भीमराव आंबेडकर देश को बता चुके थे कि मैं इस संविधान से संतुष्ट नहीं हूं।

सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग हो
आनंद ने बताया इस याचिका के कारण मुझ पर अवमानना का केस चलाया जा सकता है और मुझे जेल भी भेजा जा सकता है, परंतु मुझे इसकी चिंता नहीं है। याचिका में मांग की है कि इसकी सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए, ताकि जनता भी उसे देख सके। यह मसला कुछ जजों का नहीं, पूरी न्याय प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। भ्रष्टाचार का पौधा ऊपर से नीचे चलता है, इसका उपचार होना ही चाहिए।

मानवाधिकार आयोग तो बुलबुल को किशमिश
मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का पद पूर्व सीजेआई को ही देने को आनंद ने एक किस्म की सरकारी रिश्वत बताया है। उन्होंने लिखा है यह बुलबुल को किशमिश का लालच है। इसी कारण सीजेआई सरकारों के खिलाफ फैसले नहीं देते। सभी को रिटायर होने के बाद आयोगों में अध्यक्ष बनने का लालच सताता है। इस व्यवस्था तत्काल बदला जाना चाहिए।

याचिका में उठे मुद्दे
- न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा टूट गया है, इसलिए सभी को मिलकर इस सफाई देना चाहिए।
- विधि आयोग ने कोलेजियम को भंग करने की सिफारिश की गई थी, फिर भी ऐसा क्यों नहीं किया गया?
- कोलेजियम को भंग करके हाईपॉवर राष्टï्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना की जाए। इसमें किसी जज को न रखें।
- क्या देश की प्रगति में न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, प्रेस ने मिलकर रुकावट पैदा नहीं की है?
- दस वर्ष तक के लिए आरक्षण प्रस्ताव रखा गया था, फिर भी अब तक उसे खत्म क्यों नहीं किया गया?
- संविधान में दस वर्ष में सभी ब'चों को अनिवार्य शिक्षा का वादा था, परंतु ऐसा नहीं हुआ। क्या इसके लिए न्यायपालिका जिम्मेदार नहीं है।
- गांवों को लूटकर शहरों को बढ़ावा देने की प्रथा देश में क्यों चल रही है? क्या इससे गरीब-अमीर की खाई गहरी नहीं हो रही ?
- सरकारें लगातार संविधान का उल्लंघन करती गई, फिर भी नेता प्रतिपक्ष चुप क्यों रहे? लोकतंत्र में आखिर क्या जरूरत है?

पत्रिका : ७ अक्टूबर २०१० 

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

स'चाई छुप नहीं सकती बनावट के असूलों से

 सुगनीदेवी जमीन मामले में लोकायुक्त पुलिस के तर्कों की सुरेश सेठ ने उड़ाई धज्जियां
 विशेष न्यायालय ने सुरक्षित रखा फैसला
  कैलाश को  समय कवच  मिलेगा या नहीं, 20 अक्टूबर को होगा फैसला



सुगनीदेवी जमीन घोटाले की शिकायत के आरोपी क्रमांक दो यानी तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के बारे में लोकायुक्त पुलिस द्वारा कोई टिप्पणी नहीं किए जाने का मामला बुधवार को विशेष न्यायालय में गूंजा। शिकायतकर्ता सुरेश सेठ ने लोकायुक्त पुलिस के सभी तर्कों की सिलसिलेवार धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट को बताया विजयवर्गीय को बचाने के लिए ही कोर्ट में अर्जी दी गई है कि जांच की समय सीमा तय नहीं की जाए। कोर्ट ने बेहद गंभीरता से करीब पौन घंटे तक सेठ की बात सुनी और मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया। अब 20 अक्टूबर को पता चलेगा कि लोकायुक्त पुलिस को जांच की समय सीमा में बांधना विशेष न्यायालय के दायरे में आता है या नहीं। सेठ ने मीडिया से चर्चा में कहा बनावट के असूलों से स'चाई को छुपाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वह छुप नहीं सकती है।

केस की पिछली सुनवाई (21 सितंबर) पर लोकायुक्त पुलिस को कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु ïकोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर ही बुधवार को विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी की कोर्ट में बहस हुई। लोकायुक्त की ओर से विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अपनी बात दोहराई। सुरेश सेठ ने कहा अभी तो एफआईआर ही अधूरी है क्योंकि आरोपी क्रमांक दो के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। छह अगस्त को लोकायुक्त पुलिस भी मान चुकी है कि अभी एफआईआर में और नाम जोड़े जा सकते हैं, फिर समय सीमा का बंधन क्यों नहीं लगाया जाए। दोनों पक्षों की राय सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया, जो 20 अक्टूबर को जारी होगा। बहस के दौरान कोर्ट ने सेठ को कहा आपको मेरा फैसला मंजूर न हो, तो आप हाईकोर्ट भी जा सकते हैं।

'हमने कैलाश को नहीं छोड़ा
कदम ने कोर्ट को बताया लोकायुक्त पुलिस ने अभी विजयवर्गीय को छोड़ा नहीं है। जांच जारी है और अंतिम जांच प्रतिवेदन में सबको पता चल जाएगा कि किसने भ्रष्टाचार किया है और किसने आपराधिक षडयंत्र। सेठ ने जब जोर देकर पूछा कि जांच में कितना समय लगेगा, तो कदम बोले कम से कम एक साल तो लग ही जाएगा।


 हाईकोर्ट ने भी तो तय की समय सीमा     
'पत्रिकाÓ के 5 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित खबर 'हाईकोर्ट ने तय की लोकायुक्त जांच की अवधिÓ का हवाला देते हुए सेठ ने कोर्ट को बताया अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक आरएन सक्सेना के खिलाफ हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को छह माह में जांच करने के निर्देश दिए हैं। उस केस में और मेरे केस में कोई मौलिक अंतर नहीं है। वहां याचिकाककर्ता ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, यहां विशेष न्यायालय में लगाई गई।                                                                                                                                                                              


 लोकायुक्त पुलिस की भूमिका संदिग्ध
- सुगनीदेवी जमीन केस में विशेष न्यायालय के समक्ष सुरेश सेठ का लिखित बयान

कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने कोर्ट को लिखित में दिया है कि मप्र के मंत्री (कैलाश विजयवर्गीय) के दबाव में आकर लोकायुक्त पुलिस संदिग्ध भूमिका निभा रही है। सुगनीदेवी जमीन मामले में विजयवर्गीय न केवल संलिप्त हैं, बल्कि सार्वजनिक घोषणाओं में भी वे खुद को इसमें शामिल होने की मंजूरी दे चुके हैं। पद का दुरुपयोग करते हुए विजयवर्गीय ने 28 अगस्त 2010 को नंदानगर साख संस्था की विशेष साधारण सभा में विवादित जमीन पर कॉलेज बनाने की घोषणा भी कर दी है।


जनता के सामने खड़े हो गए कई सवाल : सुरेश सेठ

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा है-

1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है?
6. मामले से परिवादी को दूर करने की कोशिश क्या यह साबित नहीं करती कि विशेष लोक अभियोजक अपने पद का दुरुपयोग करके आरोपी नेताओं, सरकार और अपने वरिष्ठ अधिकारियों की तरफदारी कर रहे हैं?
7. अनुसंधान के नाम पर एक बार मामले को टाल देने से अंतिम जांच प्रतिवेदन पेश करने की तारीख 5-10 वर्ष खींच जाएगी। तब अभियोग पत्र प्रस्तुत करना गैर प्रासंगित हो जाएगा?
 

लोकायुक्त पुलिस के छहों न्यायिक दृष्टांतों को चुनौती
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें लोकायुक्त पुलिस के तर्कों को एक सिरे से खारिज किया गया है। लोकायुक्त पुलिस ने छह न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर कोर्ट को बताया था कि इस कोर्ट को जांच की समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं है। सेठ ने इन दृष्टांतों को तार्किक तरीके से खारिज किया।

एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
 

पत्रिका : ०७ अक्टूबर २०१०

भारत में रोक, इंदौर में चालू

- चाचा नेहरू अस्पताल में स्वस्थ युवतियों पर ग्रीवा कैंसर टीके के ट्रायल पर उठा सवाल
- आंध्रप्रदेश-गुजरात में जा चुकी जानें, फिर भी नहीं जाग रहा मध्यप्रदेश


जिस टीके के कारण आंध्रप्रदेश में चार स्वस्थ युवतियों की जान चली गई, जिस टीके के प्रयोग पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, जिस टीके के भरोसेमंद होने की गारंटी नहीं है और जो टीका शुरू दिन से ही विवाद में है... उस टीके का एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में प्रयोग हो रहा है। प्रयोग में कई जरूरी मापदंडों को भी ताक में रखा गया है।

'पत्रिकाÓ के पास उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक शिशु रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन की अगुवाई में मल्टीवेलेंट एचपीवी टीके का ट्रायल जारी है। कथित तौर पर यह टीका महिलाओं को बुढ़ापे में विकसित होने वाले ग्रीवा कैंसर को रोकता है। करीब एक वर्ष पहले आंध्रप्रदेश के खम्मम में चार और गुजरात के बढ़ौदा में दो  युवतियों की मौत के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने इस टीके के ट्रायल पर प्रतिबंध लगा दिया था।

आंध्रप्रदेश में टीके को लेकर उठी बहस में अग्रणी रही कल्पना मेहता मंगलवार को इंदौर में थीं। 'पत्रिकाÓ ने जब उन्हें इंदौर में जारी ट्रायल के बारे में बताया तो चकित होते हुए उन्होंने बताया यह टीका कितना कारगर है, यह अभी किसी को पता नहीं। अमेरिकन, ब्रिटिश और आस्ट्रेलियन दवा कंपनियों ने ग्रीवा कैंसर का खौफ फैलाकर यह टीका बाजार में उतार दिया है। इस टीके के प्रयोग में स्वस्थ युवतियों की जरूरत होती है। आंध्रप्रदेश व गुजरात में तो डॉक्टरों ने गल्र्स होस्टल में रहने वाली युवतियों को सब्जेक्ट बनाया था, यहां क्या हो रहा है, यह कोई नहीं जानता।


 आईसीएमआर, डीसीजीआई रोके 
केंद्र सरकार ने इस टीके के ट्रायल पर रोक लगाई है, फिर भी यहां क्यों हो रहा?
यह ट्रायल इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की अनुमति से चल रहा है। वे रोकेंगे, तो बंद कर देंगे।
आपके अस्पताल में तो रोगी आते हैं, जबकि इसमें स्वस्थ युवतियों की जरूरत होती है?
हमारे क्लिनिक में जो लोग आते हैं, उनसे पूछताछ करके हम युवतियों का चयन करते हैं।
आप ब'चों के डॉक्टर हैं, जबकि टीका युवतियों को लगता है?
हमने ट्रायल में एक महिला रोग विशेषज्ञ को भी जोड़ रखा है।
यह ट्रायल आखिर क्यों जरूरी है?
दुनियाभर में 2.75 लाख महिलाओं की हर वर्ष ग्रीवा कैंसर से मौत हो जाती है। यह टीका लगेगा, तो कैंसर नहीं होगा।
ट्रायल से गुजरात-आंध्र में मौतें हो चुकी है, यहां ऐसा केस तो नहीं आया?
वहां हुई मौत के कारण अभी साफ नहीं है। मेरी जानकारी में एक युवती की बुखार से और एक की आत्महत्या के कारण मृत्यु हुई। इंदौर में 39 युवतियों पर ट्रायल हुआ, सभी स्थिति ठीक है। वैसे भी यह फेज फोर का ट्रायल है, यानि टीका बाजार में उपलब्ध है।
आप तीन डोज देते हैं, बूस्टर डोज के बारे में क्या नीति है?
यह तो शून्य, एक व छह महीने के क्रम में लगता है। बूस्टर डोज की जरूरत ही नहीं है।
(डॉ. हेमंत जैन से चर्चा)

सच नहीं बोल रहे हैं डॉ. जैन
- वे जो ट्रायल कर रहे हैं, वह फेज फोर नहीं, थ्री का ट्रायल है।
- बाजार में गार्डेसिल (वी-501) उपलब्ध है, जबकि ट्रायल मल्टीवेलेंट (वी-503) का हो रहा है।
- विधानसभा में भेजी जानकारी से स्पष्ट है कि ट्रायल में कोई महिला रोग विशेषज्ञ शामिल नहीं है।
- बूस्टर डोज के बगैर यह टीका पूरा नहीं हो सकता। दुनियाभर में इसे लेकर बहस जारी है।
- आईसीएमआर का मानता है कि टीके की सफलता संदिग्ध है।
जानलेवा टीका
- एचपीवी टीके के तीन डोज 10 से 12 हजार रुपए के आते हैं।
- सितंबर 2009 में ब्रिटेन के कोवेंट्री में एक स्कूली छात्रा के रूप में पहली मौत रिपोर्ट की गई।
- टीके के कारण अमेरिका में 15 हजार लड़कियों पर दुष्प्रभाव और 61 की मौत रिपोर्ट हो चुकी है।
- जर्मनी एवं आस्ट्रेलिया में भी एक-एक लड़की की मौत हो चुकी है।



पत्रिका : ०७ अक्टूबर २०१०

लोकायुक्त को मिलेगा 300 पेज का जवाब

- कैलाश को  समय कवच  से सुरक्षित रखने के कदम पर सुरेश सेठ की पुख्ता तैयारी
- सुगनीदेवी केस पर अधूरी एफआईआर पर विशेष न्यायालय में बहस आज


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की तीन एकड़ जमीन में हुए 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच कर रही लोकायुक्त पुलिस के लिए कांग्रेस नेता सुरेश सेठ ने 300 पेज का जवाब तैयार कर लिया है। यह जवाब बुधवार को विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा। उधर, लोकायुक्त पुलिस का जोर मामले में दर्ज अपनी अधूरी एफआईआर को अंतिम साबित करने पर रहेगा।

केस में पिछली सुनवाई 21 सितंबर को हुई थी, तब लोकायुक्त पुलिस को मूल शिकायत के आरोपी क्रमांक दो (तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय) के भूमिका को लेकर अंतिम रिपोर्ट पेश करना थी। परंतु लोकायुक्त के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने कोर्ट को बताया था कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है और चालान पेश करने का लिए समय सीमा तय करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस तर्क पर बहस के लिए कोर्ट ने 6 अक्टूबर मुकर्रर किया था।

 सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है, समय सीमा तय हो

सुरेश सेठ ने 'पत्रिकाÓ को बताया मैंने जवाब में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के करीब एक दर्जन न्यायिक दृष्टांत दिए हैं। सभी कोर्टें चाहती हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में समय सीमा में जांच पूरी हो जाए। सोमवार को मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसआर आलम एवं ïआलोक अराधे की युगलपीठ ने अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) आरएन सक्सेना पर भ्रष्टाचार के आरोप से जुड़े केस में लोकायुक्त पुलिस छह महीने में जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं। 

मेंदोला-संघवी की याचिका में छुपा संदेश
सेठ ने बताया इंदौर हाईकोर्ट में जिस तरह से मामले में फंस चुके रमेश मेंदोला और मनीष संघवी की याचिका खारिज की है, उसका संदेश साफ है कि जांच प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है। लोकायुक्त समय पर जांच पूरी नहीं कर पाए तो उसे साफ इंकार कर देना चाहिए। मैंने तो हाईकोर्ट में भी सीबीआई जांच की मांग उठाई थी।

'मुझे दूर करना संभव नहींÓ
पिछली सुनवाई में लोकायुक्त पुलिस ने तर्क दिया था कि एफआईआर रजिस्टर होने के बाद जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट पेश नहीं हो जाती, तब तक केस कोर्ट व पुलिस के बीच ही रहता है। परिवादी इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है। परिवादी सेठ को कोर्ट के समक्ष उपस्थिति होने का अधिकार भी नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए सेठ कहते हैं जांच प्रक्रिया से शिकायतकर्ता को दूर करने की कोशिश शंका को जन्म देती है। 

हकीकत की कसौटी पर कितने खरे लोकायुक्त पुलिस के तर्क ?


तर्क एक
घटना अवधि 20 वर्ष की है और इसके लिए विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाए जाना है। इसमें वक्त लगेगा।
कसौटी
5 अगस्त को दर्ज एफआईआर के पेज चार के मुताबिक सभी संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है कि फिर लोकायुक्त पुलिस और कौन से कागज चाहती है?

तर्क दो
विभिन्न साक्षियों के विस्तृत कथन लिपिबद्ध किए जाना है। इसमें अधिक समय लगना स्वाभाविक है।
कसौटी
एफआईआर के पेज पांच के मुताबिक मौजूदा और पूर्व निगमायुक्त से लेकर सभी प्रमुख संबंधित अफसरों और लोगों से बयान लिए जा चुके हैं। यहीं सवाल उठता है ऐसे कौन लोग शेष हैं, जिनसे लोकायुक्त पुलिस बात करना चाहती है?

तर्क तीन
दंड प्रक्रिया संहिता में अनुसंधान की समय सीमा तय करने का जिक्र नहीं किया गया है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस के विशेष लोक अभियोजक एलएस कदम ने अंतिम जांच रिपोर्ट करने के लिए स्वयं कोर्ट से चार महीने का समय मांगा था। परिवादी सुरेश सेठ की आपत्ति पर डेढ़ महीने की समयसीमा तय हुई थी। अब सवाल है कि उस दिन ïदंड प्रक्रिया संहिता क्यों याद नहीं आई?

तर्क चार
एफआईआर दर्ज होने के बाद अनुसंधान की प्रक्रिया में परिवादी हिस्सा नहीं ले सकता है।
कसौटी
6 अगस्त को लोकायुक्त पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि जो एफआईआर दर्ज की गई है, वह अधूरी है। आरोपी क्रमांक दो (कैलाश विजयवर्गीय) की भूमिका की पड़ताल के लिए अगली तारीख नियत कर दी जाए। अब सवाल है कि प्रारंभिक जांच में जब एक आरोपी की भूमिका को लेकर पड़ताल ही नहीं की गई तो परिवादी को प्रक्रिया से दूर कैसे किया जा सकता है?

पत्रिका : ०६ अक्टूबर २०१०