शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

उड़ते वीवीआईपी की जान जोखिम में

- चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर एमपी फ्लाइंग क्लब में भी दे रहे सेवा
- केंद्रीय नागर विमानन विभाग ने मप्र सरकार को दिए जांच के आदेश



राज्य के उन वीवीआईपी की जान जोखिम में है जो सरकारी उड़ान सेवा से यात्राएं करते रहते हैं। उनके विमानों को हवा से बातें करने की जिम्मेदार संभालने वाले चीफ ऑपरेटिंग अधिकारी मप्र फ्लाइंग क्लब में भी सेवाएं दे रहे हैं। केंद्रीय नागर विमानन विभाग ने इसे गंभीर त्रूटि मानते हुए राज्य सरकार को जांच के आदेश दिए हैं।
केंद्रीय नागर विमानन विभाग के सीनियर उडऩयोग्यता अधिकारी आरबी सोनी ने एक जांच में पाया कि मप्र के चीफ ऑपरेटिंग अधिकारी एसएम अख्तर सरकारी सेवा में होने के साथ ही मप्र फ्लाइंग क्लब में बतौर चीफ फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भोपाल काम कर रहे हैं। इससे वीवीआईपी की उड़ान सुरक्षा में भारी चूक की आशंका है। सोनी ने मप्र नागर विमानन संचालक अरुण कोचर को इस मामले की विस्तार से पड़ताल करने के आदेश दिए हैं।

लाखों का भुगतान
सूत्रों के मुताबिक सीएफआई सेवा के लिए एमपी फ्लाइंग क्लब ने एसएम अख्तर को 35 लाख से अधिक का भुगतान किया है। ज्ञात रहे फ्लाइंग क्लब के सचिव मिलिंद महाजन हैं। उनके भाई मंदार महाजन इंदौर में सीएफआई हैं।

तीन बिंदुओं पर होगी जांच
एक: राज्य ने किस नियम के तहत अख्तर को फ्लाइंग क्लब में सीएफआई बनने की अनुमति दी?
दो: एक ही समय में वीआईपी एयरक्राफ्ट का पायलट, एमपी फ्लाइंग क्लब का सीएफआई कैसे रहाï?
तीन: वीआईपी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने क्या कदम उठाए? 

Patrika 27 Oct 2010

चूना था, तो जनता को क्यों नहीं दे दिया?

- यूका कचरे पर भोपाल गैस त्रासदी आयोग का रामकी प्रबंधन से सवाल
- कचरे को पीथमपुर में दफन करने की संभावना तलाशने पहुंचे जस्टिस कोचर


भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ मसलों पर जस्टिस एसएल कोचर की अध्यक्षता में गठित एक सदस्यी जांच आयोग शनिवार को पीथमपुर स्थित रामकी संयंत्र में था। आयोग ने संयंत्र का दौरा कर यूनियन कार्बाइड का कचरा यहां दफन करने की संभावना तलाशी। रामकी प्रबंधन ने बताया भोपाल से यहां लाए गए 33 टन कचरे में कोई विषैली सामग्री नहीं थी, वह तो महज चूना था। इस पर जस्टिस कोचर ने सवाल किया चूना था तो यहां क्यों लाए, आम लोगों को क्यों नहीं दे दिया गया। रामकी के पास इसका कोई जवाब नहीं था। लोकमैत्री संगठन व आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने भी आयोग से मुलाकात कर रामकी की खामियों की जानकारी दी। आयोग ने उनसे मय दस्तावेज सारे तथ्य मांगे हैं। संयंत्र के अधिकारी अमित चौधरी ने औद्योगिक कचरे को नष्टï करने की विधि का प्रेजेंटेशन दिया।

चकित रह गए आपत्तिकर्ता
आयोग के समक्ष बात रखने आए तपन भट्टाचार्य से जब पूछा गया आप कहां तक पढ़े हैं और क्या करते हैं? तो वे चकित रह गए क्योंकि आयोग का इस बात से सीधे तौर पर कोई ताल्लुक नहीं है। हांलाकि, उन्होंने बताया मैं पूर्ण रूप से सामाजिक कार्य में जुटा हूं और मेरे परिवार का खर्च मेरी पत्नी की तनख्वाह से चलता है। शिक्षा का ब्यौरा भी दिया।

भूसे में से गेंहू निकालना मेरा काम
प्रो. प्रसाद ने जब बातें विस्तार से रखना शुरू की तो आयोग ने बीच में ही टोक दिया। प्रोफेसर ने बताया मैं तो अखबार में आयोग की सूचना पढ़कर आया हूं, आप नहीं सुनना चाहें तो आपकी मर्जी। इस पर जस्टिस कोचर बोले मैं आपकी बात सुन रहा हूं, बस मैं कुछ बातें जानना चाहता हूं इसलिए रोक रहा हूं। मेरा काम ही भूसे से गेंहू निकालना है।


नकार चुके केंद्र-राज्य
रामकी सयंत्र की खामियों और आम जनता के विरोध को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार यूका कचरे को यहां लाने की मनाही कर चुके हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 9 जुलाई को और केंद्र सरकार के मंत्री समूह ने 27 सितंबर को इस संबंध में घोषणा की थी।
 उजागर करने के साथ इस अहम लड़ाई की शुरुआत हुई। इसके लिए पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी द्वारा सूचना का अधिकार में जुटाए गए दस्तावेजों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही। लगातार छह महीने से उन्होंने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मप्र पर्यावरण प्रदूषण बोर्ड के यहां अर्जियां लगाई और जानकारियों का पुलिंदा तैयार किया।


टॉस्क फोर्स ने मान चुकी है यूका कचरा विषैला है इसीलिए आयोग को रामकी पर विचार नहीं करना चाहिए। वैसे भी रामकी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार मल्टी इफेक्ट इवेपोरेटर अब तक नहीं लगाया है। हम जो भी कह रहे हैं उसके प्रमाण मौजूद हैं।
- प्रो. आरडी प्रसाद, लोकमैत्री संगठन

रामकी के स्थान का चयन गलत है। संयंत्र की बाउंड्री पर ही तारपुरा गांव है। वहां के लोगों को बीमारियां भी होने लगी है। यहां के पानी का बहाव इंदौर के यशवंत सागर तक जाता है, जो कि पेयजल का स्त्रोत है। आयोग को रामकी का स्थान बदलने की सिफारिश करना चाहिए।
- तपन भट्टाचार्य, आजादी बचाओ आंदोलन

आयोग सात बिंदुओं पर जांच कर रहा है। अब तक भोपाल में दो बैठकें हो चुकी हैं। यूका कचरा निपटान के बारे में भी आयोग को ही फैसला करना है। यह पहला दौरा था। लोगों को बात रखने का पूरा मौका दिया जाएगा। जिसे जो भी कहना है, तथ्य सहित बताना होगा।
- जस्टिस एसएल कोचर, अध्यक्ष, भोपाल गैस त्रासदी जांच आयोग



Patrika 23 oct 2010

ड्रग ट्रायल पर चौंका यूएन का दल

- शुरू होगी अंतरराष्टरीय बहस


मप्र में हो रहे ड्रग ट्रायल की अनियमितताओं पर संयुक्त राष्टï्रसंघ के एशियन लिगल रिसोर्स सेंटर की टीम को भी चौंका दिया है। हांगकांग की टीम ने शुक्रवार को इंदौर में कुछ लोगों से मुलाकात करके जानकारी जुटाई। टीम लौटकर इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय बहस शुरू करेगी।
एशियन लिगल रिसोर्स सेंटर के प्रोग्राम ऑफिसर बिजो फ्रांसिस एक अन्य सहयोगी के साथ मप्र के दौरे पर है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के सदस्य डॉ. आनंद राय ने उनसे मुलाकात करके बताया कि विदेशी कंपनियों के धन के लालच में मप्र के कुछ डॉक्टरों ने डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर के मापदंडों को ताक में रखकर रोगियों की जान जोखिम में डाली। जिन लोगों ने अनियमितताओं का खुलासा किया, उनके प्रति सरकार का रवैय्या भी ठीक नहीं है। ज्ञात रहे ट्रायल करने वालों की शिकायत करने के लिए डॉ. राय पर हड़ताल करवाने का आरोप मढ़कर एमजीएम मेडिकल कॉलेज ने उन्हें  सिनीयर रेसीडेंट के पद से हटा दिया था। यूएन के दल ने इसे विहसल ब्लोअर पर आक्रमण माना है।

भोजन के अधिकार पर चर्चा
बिजो फ्रांसिस ने तीन दिन तक धार रोड़ स्थित प्रेरणा सेवा समिति भवन में रहकर प्रदेश में भोजन का अधिकार पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और संस्थाओं की बैठक ली। दस जिलों में राईट टू फुड पर काम कर रहे 25 कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। किस तरह एशिया को भूखमरी और कुपोषण से मुक्त बनाया जाए। कृषिप्रधान देश के रूप में भारत की इसमें क्या भूमिका हो सकती है? भारत में व्यास्त विसंगतियों को दूर करने में संस्थाओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका क्या और कैसी होनी चाहिए? सवालों पर लंबी बहस भी यहां हुई।  


Patrika 22 Oct 2010

जांच आयोग आज रामकी में

 भोपाल गैस त्रासदी 1984 से संबंधित अहम मसलों पर प्रदेश सरकार द्वारा जस्टिस एसएल कोचर की अध्यक्षता में गठित एक सदस्यी जांच आयोग शनिवार दोपहर तीन से चार बजे तक पीथमपुर में रहेगा। वहां रामकी इनवायरो कंपनी का निरीक्षण किया जाएगा। आयोग के निजी सचिव वर्गीस मैथ्यू ने बताया दौरे के दौरान कोई भी व्यक्ति अपनी बात मौखिक या लिखित में स्वयं उपस्थित होकर दर्ज कर सकता है।

patrika 22 oct 2010

छह माह में पूरी हो आठ डॉक्टरों की जांच

- एमसीआई ने मप्र मेडिकल काउंसिल को भेजा आदेश
- मामला एनपीए लेकर प्रायवेट प्रेक्टिस करने का

नॉन प्रेक्टिस एलाउंस लेकर प्रायवेट प्रेक्टिस करने के आरोप से घिरे एमजीएम मेडिकल कॉलेज के आठ डॉक्टरों की जांच प्रक्रिया तेज हो गई है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने मप्र मेडिकल काउंसिल को पत्र लिखकर कहा है कि इन डॉक्टरों की जांच छह महीने में पूरी कर ली जाए।
आरोप है कि मेडिकल कॉलेज के डॉ. अपूर्व पुराणिक, पुष्पा वर्मा, हेमंत जैन, जीबी रामटेके, रामगुलाम राजदान, सलिल भार्गव, वीएस पाल एवं अरविंद घनघोरिया एनपीए लेने के साथ प्रायवेट प्रेक्टिस भी करते हैं। इससे शासन को दोहरी मार पड़ रही है। साथ ही एमवाय अस्पताल में आने वाले मरीजों को उपचार मिलने परेशानी होती है। राजेंद्र के. गुप्ता की शिकायत पर एमसीआई की डिप्टी सेक्रेटरी डॉ. रीना नैय्यर ने मप्र मेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार को तत्काल जांच शुरू करने के निर्देश जारी किए हैं।

patrika 21 oct 2010

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

गुजरात-राजस्थान से बेकार मप्र के फोरलेन

- जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की कमेटी की राय

इंदौर हाईकोर्ट की एक कमेटी ने खुलासा किया है कि मध्यप्रदेश के फोरलेन रोड गुजरात और राजस्थान से बेकार हैं। मध्यप्रदेश से गुजरने वाले एबी रोड के करीब 180 किमी हिस्से का मुआयना करने पर कमेटी को पता चला कि इंदौर से ग्वालियर तक का हिस्सा पूरी तरह खराब है। इसी प्रकार इंदौर से अहमदाबाद और बैतूल की सड़कें भी बदहाल हैं। इंदौर-अहमदाबाद राष्टï्रीय राजमार्ग के बीस किमी के एक हिस्से को पार करने में कई घंटे लगते हैं।

सेंधवा के बीएल जैन की जनहित याचिका पर इंदौर हाईकोर्ट की फुल बेंच जस्टिस एसएन कोचर, शांतनु केमकर और प्रकाश श्रीवास्तव ने 8 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिवक्ता चंपालाल यादव, एडवोकेट रमेश छाजेड़ एवं अब्दुल सलीम की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी को राष्टरीय राजमार्ग क्रमांक-3 के इंदौर से खलघाट एवं खलघाट से बिजासन घाट तक का निरीक्षण कर रिपोर्ट पेश करना था। बुधवार को कमेटी ने 19 फोटोग्राफ एवं 9 पेज की रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी। शुक्रवार को इस पर बहस होगी।

राजमार्ग कहने में शर्म
कमेटी ने राजमार्र्गों की हालत पर टिप्पणी की है कि इन्हें राष्टï्रीय राजमार्ग कहना शर्म की बात है। क्योंकि कई स्थानों पर सामान्य सड़क भी नहीं मिली। इंदौर से कन्नौद की ऐसी ही स्थिति है।

पेचवर्क कर भर दिए गड्ढे

कमेटी का मानना है कि कोर्ट के आदेश के तत्काल बाद संबंधित सड़क के गड्ढों को पेचवर्क करके भर दिया गया है। अपने तर्क को आधार देने के लिए कमेटी ने कुछ ऐसे फोटो पेश किए हैं जिनमें ताजा डामर स्पष्टï दिखाई देता है।

हाईकोर्ट से संज्ञान की अपील
कमेटी ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि इंदौर से ग्वालियर, अहमदाबाद और बैतूल तक के राष्टï्रीय राजमार्र्गों की बदहाली पर जरूरी निर्देश जारी किए जाएं। यदि कोर्ट इस पर संज्ञान लेती है तो जनहित में यह एक बड़ा कार्य होगा।

लोक परिवहन का इंतजाम नहीं

सेंधवा में सवारी जीप एवं ट्राले की टक्कर में 21 लोगों की मौत पर कमेटी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है कि मध्य प्रदेश में लोक परिवहन की उचित व्यवस्था नहीं है। इस कारण अवैध परिवहन होता है और मुसाफिरों की जान हमेशा जोखिम में रहती है। प्रदेश सरकार को चाहिए कि तत्काल लोक परिवहन का इंतजाम हो।

रोड पर पत्थरों का खतरा
मानपुर से बीकानेर घाट के दोनों ओर पक्की नालियों की कोई व्यवस्था नहीं है। घाट क्षेत्र में समय-समय पर पहाड़ से पत्थर गिरते रहते हैं। पत्थरों को रोकने का इंतजाम नहीं किया गया तो कभी भी गंभीर दुर्घटना हो सकती है।

ये खामियां भी मिलीं

- राजमार्ग के दोनों ओर सर्विस रोड पूरी नहीं बनाई गई है।
- रास्ते में अ'छे यात्री प्रतीक्षालय और चौराहों की कमी है।
- डिवाइडर पर गाजर घास उगी है जबकि वहां सुंदर पौधे होना चाहिए।
- इंदौर से सेंधवा के बीच नर्मदा पुल की हालत नहीं सुधारी तो दुर्घटना का खतरा है।
- खलघाट से सेंधवा के रास्ते पर डेब नदी पुल पर रेलिंग नहीं है।
- जिन किसानों से राजमार्ग के लिए जमीन ली गई उन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला।

पत्रिका २७ अक्टूबर २०१० 
सड़क 

कैलाश को नहीं मिला कवच

- सुगनीदेवी मामले में लोकायुक्त पुलिस की कोशिश नाकाम
- अंतिम चालान के लिए विशेष कोर्ट ने तय की चार महीने की सीमा
- लोकायुक्त के सारे दावे सिरे से खारिज


लोकायुक्त पुलिस 100 करोड के सुगनीदेवी जमीन घोटाले में आरोपी क्रमांक दो यानी कैलाश विजयवर्गीय को समय कवच पहनाने में नाकामयाब हो गई है। विशेष कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें जांच के लिए समय सीमा की आड़ ली गई थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से लोकायुक्त पुलिस को आदेश दिया है कि सुगनीदेवी जमीन मामले में अंतिम चालान 21 फरवरी 2011 तक कोर्ट में पेश किया जाए।
विशेष न्यायाधीश एसके रघवुंशी बुधवार को एक अहम फैसले में कहा कि लोकायुक्त पुलिस को एक नियत समय सीमा में काम करने का आदेश देना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है। सीकरी वासु विरुद्ध उप्र सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2008 में दिए फैसले का दृष्टांत देते हुए कोर्ट ने लिखा है कि यदि पुलिस ठीक ढंग से जांच नहीं करे तो समय सीमा तय करने के साथ ही कोर्ट जांच की निगरानी भी कर सकता है।

मामले में लोकायुक्त के विशेष अभियोजक एलएस कदम ने 21 सितंबर को तर्क दिया था कि जांच की समय सीमा तय करना विशेष न्यायाधीश के अधिकार में नहीं आता है। इसी पर परिवादी सुरेश सेठ ने 6 अक्टूबर को करीब 300 पेज का जवाब कोर्ट के पटल पर रखा था। उन्होंने लोकायुक्त पुलिस की अर्जी के छहों न्यायिक दृष्टांतों की भी तार्किक तरीके से धज्जियां उड़ाई थीं।

सुरेश सेठ को न्यायिक कवच

विशेष कोर्ट ने बुधवार को फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया कि एफआईआर दर्ज होने और चालान पेश होने के बीच फरियादी सुरेश सेठ को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। लोकायुक्त पुलिस ने कहा था कि एफआईआर के बाद मामला जांच एजेंसी व कोर्ट के बीच सिमट जाता है इसलिए फरियादी को कोर्ट में आने का अधिकार नहीं है।

जांच एजेंसियों के लिए ऐतिहासिक सबक
कानूनी जानकारों का मानना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की पड़ताल करने वाली ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, सीआईडी जैसी जांच एजेंसियों के लिए विशेष कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक सबक जैसा है। अब तक जांच एजेंसियां एफआईआर दर्ज करके मामले को ठंडे बस्ते में डालने की आदी रही है। यही वजह है कि कई केस 15-15 सालों तक चालान के मुकाम तक नहीं पहुंच सके। हर बार जांच एजेंसियां यही तर्क देती है कि अनुसंधान की समय सीमा तय करने का कोर्ट को कोई अधिकार नहीं है। यही वजह है कि जांच एजेंसि

'नहीं बचेगा कैलाश' 
फैसले पर सुरेश सेठ ने प्रतिक्रिया दी है कि अब लोकायुक्त पुलिस मामले में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय को नहीं बचा सकती। अंतिम चालान में कैलाश का नाम नहीं आया तो कोर्ट स्वयं भी नाम सम्मिलित करवा सकती है।

मेंदोला सहित फंस चुके सत्रह
इस केस में लोकायुक्त पुलिस 5 अगस्त को 17 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और अपराधिक षड्यंत्र रचने का केस दर्ज कर चुकी है। इसमें कैलाश विजयवर्गीय के अतिरिक्त तीनों आरोपियों (विधायक रमेश मेंदोला, व्यवसायी मनीष संघवी व विजय कोठारी) की घेराबंदी की गई है। इसमें निगम अफसर सहित 14 अन्य आरोपी हैं।

हाईकोर्ट में भी मुंह की खाई
विशेष कोर्ट द्वारा लोकायुक्त पुलिस को जांच के निर्देश को विधायक रमेश मेंदोला और व्यवसायी मनीष संघवी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस एसएल कोचर व शुभदा वाघमारे ने दोनों की याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया था।

पांच पेज के फैसले के निहितार्थ
1. लोकायुक्त पुलिस ठीक से नहीं कर रही है जांच
(पेज 4 पर लिखा गया जांच एजेंसी अनावश्यक रूप से जांच में विलंब न करें)
2. सुरेश सेठ से बचना चाहती है लोकायुक्त पुलिस।
(पेज 4 व 5 पर लिखा गया है परिवादी सुरेश सेठ को कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है)
3. कोर्ट को मंजूर नहीं राजनीतिक हस्तक्षेप
(फैसले के पेज 2 पर सुरेश सेठ के तर्क को प्रमुखता देते हुए लिखा है कि प्रभावशील राजनीतिक व्यक्ति के हितों को बचाने के लिए जांच में देरी हो रही है)
                                          
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यूं निकाली लोकायुक्त पुलिस की हवा
सेठ ने कोर्ट में करीब 300 पेज का जो जवाब पेश किया है, उसमें उन छहों न्यायिक दृष्टांतों को खारिज किया गया है, जो लोकायुक्त पुलिस ने दिए थे।
एक-
निर्मलजीतसिंह हून बनाम पश्चिम बंगला सरकार केस में कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारी को अनुसंधान की दिशा या सीमाओं के संबंध में कोई दिशा नहीं दी थी।
दो-
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रकाश पी. हिंदुजा केस में फैसला आरोपी के संबंध में विचार तय करने से जुड़ा है, जबकि मौजूदा केस में विशेष न्यायालय ने कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कोई विचार धारणा प्रकट नहीं की है।
तीन-
पश्चिम बंगाल बनाम एसएन बासक केस में कोर्ट के दिशा निर्देश अंतिम जांच प्रतिवेदन के संबंध में है, जबकि सुगनीदेवी केस में अब तक लोकायुक्त पुलिस ने अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया है।
चार -
बिहार बनाम जेएसी सल्धाना केस भी समर्थन नहीं करता है, क्योंकि विशेष कोर्ट द्वारा अंतिम जांच रिपोर्ट के लिए तारीख तय करना अनुसंधान कार्य में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
पांच -
टीटी ऐथोनी बनाम केरल केस सक्सेसिव एफआईआर से जुड़ा है, इसलिए यहां प्रासंगिक नहीं है।
छह -
एसएन शर्मा बनाम बिपिन कुमार तिवारी, मेसर्स जयंत विटामिन्स बनाम चैतन्य कुमार एंड अदर्स, हरियाणा बनाम भजनलाल केस में एफआईआर और उसके बाद अनुसंधान की स्थिति की व्याख्या की गई है।
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जनता के सामने खड़े कई सवाल

सुरेश सेठ ने कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में कई सवाल उठाए थे। उन्होंने कोर्ट को बताया था कि लोकायुक्त पुलिस के वकील के तर्कों से जनता के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं, न्यायहित में इनका समाधान बेहद आवश्यक है। उन्होंने लिखा था -
1. प्रथम दृष्टया दोषी होने के बावजूद कैलाश के खिलाफ पहली एफआईआर में नाम नहीं जोड़ा जाना कितना न्यायसंगत है?
2. क्या लोक अभियोजक ने 6 अगस्त की पेशी पर जो जवाब पेश किया, वह राज्य सरकार के दबाव में आकर दिया गया है?
3. क्या विशेष लोक अभियोजक दुर्भावनापूर्ण तरीके से विजयवर्गीय के राजनैतिक हितों को साधने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?
4. हाईकोर्ट में 19 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सेठ ने लोकायुक्त संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था, तब लोकायुक्त के वकील ने कोई कोई आपत्ति नहीं ली थी, इसका अर्थ क्या है?
5. क्या भ्रष्टाचार से जुड़े इस केस में विशेष लोक अभियोजक को बतौर लोकस स्टेंडी (पक्ष रखने का अधिकार) प्राप्त है? 

पत्रिका २० अक्टूबर २०१०