मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सिंधिया ने विजयवर्गीय को दिखा दी ताकत

- 80 से अधिक वरिष्ठ-कनिष्ठ क्रिकेटर ने मिलकर जताया भरोसा
- एमपीसीए का चुनावी रंग

मप्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव के पहले ही केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शनिवार को अपनी ताकत का अहसास मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को करवा दिया। वे सायाजी होटल की सातवीं मंजिल के कमरा नंबर 712 में रूके थे और वहां उनसे मिलने के लिए करीब 80 से अधिक वरिष्ठ और कनिष्ठ क्रिकेटर मौजूद थे। ये सभी एसोसिएशन के सदस्य हैं। सिंधिया ने 10-10 के ग्रुप में इन सभी से चाय की चुस्कियों के बीच इत्मिननान से मुलाकात की। सिलसिला रात 11.30 बजे तक चला। बुधवार को विजयवर्गीय ने भी श्रीमाया सेलिब्रिटी होटल में डीनर पार्टी दी थी, लेकिन उसमें महज 14 सदस्य ही पहुंचे थे।



कमरा नंबर 712 में बिछी एमपीसीए की फिल्डिंग


मप्र क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) के चुनाव के पहले शनिवार को होटल सायाजी के कमरा नंबर 712 में मौजूदा अध्यक्ष सिंधिया की फिल्डिंग जमी। वे यहां पहुंचे और मिलने वाले सदस्यों की होड़ सी लग गई। हर कोई उनसे पहले मिलना चाहता था। उन्होंने सभी से सिलसिलेवार सबसे मुलाकात की।

एसोसिएशन के सचिव संजय जगदाले के साथ ही वहां गुलरेज अली, जितेंद्र जैन, श्रीराम अत्रे, अशोक कुमुट सुमन कामानी, भरत पलोड़, विनोद कुमुट, श्रवण गुप्ता, मोनी नारंग, कन्नू पंवार, भोलू मेहता, मुन्ना कादिर, अनिता अत्रे, नरेंद्र मेनन, महेंद्र सेठिया, डॉ. ऐके भार्गव, भगवानदास सुतार, वासु मंगवानी, नरेंद्र भगतरिया, एसके बायस आदि मौजूद थे। युवा क्रिकेटर अमय खुरासिया, अनिल वाघ, मुकेश साहनी, अमित भट्ट, नितिन कुलकर्णी, सुधीर अस्मानी भी थे। आगंतुकों का स्वागत करने के लिए होटल के मेनगेट पर जावरा विधायक महेंद्रसिंह कालूखेड़ा मौजूद थे, जबकि सातवीं मंजिल पर विधायक तुलसी सिलावट और शहर कांग्रेस अध्यक्ष प्रमोद टंडन ने मोर्चा संभाल रखा था। पहले सीनियर सदस्यों की भेंट करवाई गई और बाद में नौजवानों की।

14 लोगों से अलग मुलाकात
होटल पहुंचने से पहले सिंधिया ने इमली बाजार निवासी विमल जैन के घर पर भी कुछ सदस्यों से भेंट की। वहां वे 14 सदस्यों से मिले।

किसी से समझौता नहीं होगा
सिंधिया के सामने कुछ लोगों ने पूछा कि विजयवर्गीय गुट समझौता टेबल पर आकर किसी 'पदÓ की मांग कर सकता है, ऐसे में क्या किया जाएगा। सिंधिया ने कहा किसी से समझौता नहीं होगा, क्योंकि एसोसिएशन आप लोगों का समूह चला रहा है।

व्यक्तिगत मुलाकात भी करेंगे
सिंधिया के नजदीकी लोगों ने बताया सिंधिया रविवार प्रात: इंदौर से रवाना हो जाएंगे और 20 अगस्त को फिर से लौटेंगे। बाद में वे कुछ वरिष्ठ सदस्यों के घर जाकर भी मुलाकात करेंगे। चुनाव 22 अगस्त को होंगे।

पद की गरिमा का सवाल है
एक बुजुर्ग सदस्य ने सिंधिया को भरोसा जताते हुए कहा यह पद की गरिमा का सवाल है और इस पर किसी कीमत पर ऐसे व्यक्ति को नहीं आने दिया जाएगा, जो गरिमा के अनुकूल न हो।

आपने ही इंदौर में मजबूत किया क्रिकेट
सिंधिया को लोगों ने भरोसा दिलाया कि हम आपकी शक्ति को पहचानते हैं और यह भी जानते हैं कि आपके कारण ही इंदौर में क्रिकेट को मजबूती मिली है। यह क्रम आगे भी जारी रहेगा। सिंधिया वर्तमान में एमपीसीए के चेयरमैन हैं। 22 जुलाई को होने वाले चुनाव में विजयवर्गीय ने भी दावेदारी जताई है।


पत्रिका: १५ अगस्त २०१०

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

मेडिकल कॉलेज को 1 करोड़ के दो हॉल

- कम्युनिटी मेडिसिन और फोरेंसिक मेडिसिन को सौगात

शनिवार को एमजीएम मेडिकल कॉलेज को दो विभागों को एक करोड़ रुपए की सौगात मिलेगी। कम्युनिटी मेडिसिन और फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के डिमोस्ट्रेशन हॉलों को लोकार्पण किया जाएगा। इससे मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की मान्यता की जरूरी औपचारिकता पूरी हो जाएगी।

दोनों विभागों के ठीक पीछे ही ये हॉल बनाए गए हैं। चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया और संभागायुक्त बसंतप्रताप सिंह के आथित्य में दोपहर 12 बजे उद्घाटन होगा। कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत और बिल्डिंग प्रभारी डॉ. संजय दीक्षित ने बताया एनोटॉमी, फिजियोलॉजी, फार्मेकोलॉजी, पैथोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और माइक्रोबायोलॉजी के लिए भी ऐसे ही डिम्ट्रेशन हॉलों का निर्माण जारी है। शीघ्र ही उनका कार्य भी पूरा हो जाएगा।

फर्नीचर के लिए बजट की कमी
दोनों हॉल बनकर तैयार हैं, लेकिन इनमें अभी फर्नीचर उपलब्ध नहीं है। कॉलेज प्रशासन को इसके लिए करीब 10 लाख रुपए की जरूरत है। कॉलेज प्रबंधन ने बताया इस राशि का इंतजाम किया जा रहा है।

होस्टल भी लगभग तैयार
मेडिकल कॉलेज ने 100-100 की क्षमता वाले दो होस्टल भी निर्माणाधीन है। सूत्रों का कहना है कि अगले महीने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के हाथों इनका उद्घाटन करवाया जाएगा। 

पत्रिका : १४ अगस्त २०१०

प्रभात झा केस में अब 17 को सुनवाई

भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष जीतू जिराती की रैली के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा द्वारा कथित रूप से न्यायपालिका पर की गई टिप्पणी पर लगी अवमानना याचिका पर अब 17 अगस्त को सुनवाई होगी। कांग्रेस नेता इंदर प्रजापत द्वारा दायर इस याचिका पर बुधवार को जस्टिस एलएल कोचर और जस्टिस शुभदा वाघमारे की युगलपीठ में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता के वकील मनोहर दलाल ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कोर्ट ने कुछ जानकारियां मांगी है, जिन्हें अगली सुनवाई में पेश कर दिया जाएगा। ज्ञात रहे मीडिया में झा का यह बयान प्रकाशित हुआ था कि समाज से कोर्ट चलता है, कोर्ट से समाज नहीं। 
News in Patrika on 13th August 2010

अफसर-दलाल ने मिलकर की फर्जी रजिस्ट्रियां

- जस्टिस झा आयोग के सामने खुली पोल

 
नर्मदा घाटी बने सरदार सरोवर बांध के संबंध में मप्र सरकार द्वारा विस्थापितों को दिए गए पुनर्वास पैकेज में हुए कथित भ्रष्टाचार और फर्जी रजिस्ट्री मामले में अफसरों और दलालों की मिली भगत उजागर हो रही है। न्यायमूर्ति एसएस झा आयोग के समक्ष आयोजित सुनवाई में दो पुनर्वास अफसरों द्वारा गरीब आदिवासियों को ठगे जाने का मामले सामने आए। फर्जीवाड़े के शिकार प्रभावितों ने बयानों और लिखित कथनों में इसकी पुष्टि की। नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक जनहित याचिका पर सरदार सरोवर बांध प्रभावितों की फर्जी रजिस्ट्रियों और पुनर्वास स्थलों पर हुए भ्रष्टाचार की जाँच के लिए हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एसएस झा की अध्यक्षता में एक सदस्यी आयोग गठित किया है। आयोग 2 अगस्त से इंदौर में है।

जमीन साढ़े तीन एकड़, भुगतान पांच का
ग्राम कोठड़ा (निसरपुर) के राधेश्याम-पन्नालाल ने आयोग को बताया जब वे जमीन के बारे में पुनर्वास अधिकारी जुवानसिंह बघेल से मिले तो उन्होंने निसरपुर के शकील और अनोखी राठौर दलालों के पास भेज दिया। दलालों ने उनसे 2 लाख रूपए वसूले और फर्जी रजिस्ट्री पकड़ा दी। रजिस्ट्री साढ़े तीन एकड़ की है, लेकिन बघेल ने भुगतान पूरे पांच एकड़ का कर दिया। मलवाड़ी (निसरपुर) के रतनसिंह-रूखडिय़ा ने फर्जीवाड़े में पुनर्वास अधिकारी बघेल के साथ पुनर्वास कार्यालय के बाबू चैतराम पाठक को भी शामिल बताया।

साढ़े पांच लाख के बजाए 40 हजार पकड़ाए
ग्राम खापरखेड़ा (कड़माल) के  मुकेश राधेश्याम ने बताया शकील और अनोखी दलाल उन्हें पुनर्वास कार्यालय कुक्षी में मिले। वहीं पुनर्वास अधिकारी  बघेल और आरके माहेश्वरी से बात कर बताया कि वे जमीन दिलवा देंगे। फर्जी रजिस्ट्री के बाद अफसर ने मुकेश के मुआवजे का चेक भी दलालों को ही दे दिया। दलालों ने मुकेश से 1.35 लाख वसूले। खापरखेड़ा के ही बुदन-सात्या ने बताया शकील और अनोखी दलाल ने उसका मुआवजा पुनर्वास कार्यालय से मिलकर निकाला तथा उन्हें मात्र 40 हजार दिए जबकि प्रति प्रभावित साढ़े पाँच लाख का भुगतान किया जाता है। 

षडयंत्र में पटवारी तक शामिल
ग्राम चिखल्दा के  शफी मोहम्मद पीरबक्ष ने बताया वे दलाल शकील और अनोखी तथा पीपरी (बागली) के पटवारी मेहताबसिंह भार्गव के षडयंत्र के शिकार हुए हैं। दलालों ने उनके दो पुत्रों की फर्जी रजिस्ट्री करवाकर उनसे ढाई लाख लूटे। ग्राम मलवाड़ी (निसरपुर) के राजकुमार गोमा और रतनसिंह रूखडिय़ा तथा निसरपुर के जगदीश औंकार ने दलालों के रूप में नारायण-रतनसिंह (भीलसुर) और खेतिया अमरा (मलवाड़ी) का नाम लिया। धरमराय के दीपक पन्नालाल ने लक्ष्मण दलाल (नवादपुरा) और निसरपुर के रूखडिय़ा-मुरार ने शकील एवं अनोखी का नाम बताया। 

News in Patrika on 13th August 2010

बुधवार, 11 अगस्त 2010

नरसिंहराव का पता थी राजीव गांधी की हत्या की योजना

 पुस्तक में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुनसिंह का सनसनीखेज रहस्योद्घाटन


वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नेहरू-गांधी परिवार के वफादार रहे अर्जुनसिंह ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा है 'राजीवजी की हत्या योजनाबद्ध ढंग से की गई थी। यह हो सकता है कि हत्या की प्लानिंग में राव (पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव) का कोई हाथ न हो, लेकिन उन्हें पूर्व जानकारी जरूर थी और वे इन जानकारियों को सबके सामने प्रकट नहीं होने देना चाहते थे, इसलिए कुछ चीजों को लेकर संदेह होना स्वाभाविक है। Ó

अर्जुनसिंह का यह खुलासा वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी द्वारा उन पर लिखी जीवनी 'अर्जुनसिंह: एक सहयात्री इतिहास काÓ में हुआ है। इंदौर से प्रकाशित राष्टïरीय हिंदी मैग्जीन 'हैलो हिंदुस्तानÓ ने पुस्तक के अंशों को विस्तार से प्रस्तुत किया है। जोशी की पुस्तक में कहा गया है कि अर्जुनसिंह ने राव से राजीव गांधी की हत्या की वास्तविकता का पता लगाने के लिए कई बार कहा। सिंह का तर्क था कि राजीव की हत्या से किसी को तो लाभ पहुंचा होगा। पुस्तक के मुताबिक अर्जुनसिंह ने राजीव हत्याकांड की जांच कर रहे जस्टिस जैन से अच्छे संबंध बना लिए थे। अर्जुनसिंह कहते हैं 'जस्टिस जैन मुझ पर काफी विश्वास करते थे। पहली बात को उसकी पहचान करनी थी कि यह राजनीतिक हत्या किसे सूट करती थी? इसके पीछे किसका मोटिवेशन हो सकता है? जो लड़की मानव-बम बनी थी, वह तो माध्यम भर थी...किन कारणों से आईबी के तत्कालीन निदेशक नारायणन ने जैन आयोग के समक्ष गवाही के दौरान चुप्पी साध ली। नारायणन, राजीव गांधी की सुरक्षा से संतुष्ट नहीं थे और वे सुरक्षा को लेकर आशंकित भी थे। फिर किसके कहने पर वे चुप रहने का मजबूर हुए?Ó

पुस्तक में यूं जाहिर होता है राज
एक
कांग्रेस की सरकार बनने के बाद अर्जुन चाहते थे कि प्रधानमंत्री राव इस हत्याकांड की तह तक पहुंचने में निजी दिलचस्पी दिखाएं, परंतु ऐसा हुआ नहीं। राव ने कभी भी राजीव गांधी के असली हत्यारों का पता लगाने और पकडऩे में अपेक्षित ईमानदारी व गंभीरता का परिचय नहीं दिया।
दो
हत्याकांड की जांच प्रक्रिया से सोनिया गांधी पूरी तरह संतुष्ट नहीं रही। सोनिया ने स्वयं को बाहरी दुनिया से लगभग काट लिया था। आशंकाओं की दीवार उनके और बाहरी लोगों के बीच खड़ी हो गई थी। राव ने इस दीवार को तोडऩे की अपनी ओर से कभी कोशिश नहीं की। इससे जांच पद्धति और प्रक्रिया पर शंकाओं का कोहरा छाया रहा।

अर्जुन के गोपनीय पत्र आधार
जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी के जनसंचार विभाग में निदेशक रामशरण जोशी ने 'पत्रिकाÓ से चर्चा में बताया करीब 35 वर्ष से मैं अर्जुनसिंह को बेहद करीब से देख रहा हूं। उनके द्वारा नरसिंहराव को लिखे गोपनीय पत्रों और उनसे मेरी लंबी व्यक्तिगत बातचीत पुस्तक के मुख्य आधार हैं। पुस्तक के सभी तथ्य प्रामाणिक हैं।

एक कथन तक ही चर्चित थी पुस्तक
पुस्तक करीब एक वर्ष पहले राजकमल प्रकाशन के जरिए बाजार में आई थी। तब इसका वह हिस्सा बेहद चर्चित हुआ जिसमें अर्जुनसिंह की पत्नी सरोजसिंह ने राष्टï्रपति पद की दावेदारी के लिए अर्जुनसिंह का नाम प्रस्तावित नहीं किए जाने पर टिप्पणी की है। सरोजसिंह ने कहा था 'एक आदमी (अर्जुनसिंह) जो इस परिवार (नेहरू-गांधी परिवार) को वर्षों से अपना सर्वस्व दे रहा है, यदि उसे प्रेसीडेंट बना दिया जाता तो इस मैडम (सोनिया गांधी) का क्या बिगड़ जाता?Ó ï

पुस्तक के बाद ही बढ़ी नाराजगी
कांग्रेस सूत्रों का कहना है इस पुस्तक के बाजार में आने के बाद ही नेहरू-गांधी परिवार की अर्जुनसिंह से दूरियां बढ़ी। न तो उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल सकी और न ही उनकी बेटी वीना सिंह को सीधी से लोकसभा का टिकट। 

आत्मकथा लिख रहे अर्जुन
यूनियन कार्बाइड कांड में वारेन एंडरसन को मौखिक आदेश पर रिहा करने के रहस्य को दिल में दबाए बैठे अर्जुनसिंह इन दिनों अपनी आत्मकथा लिखने में व्यस्त हैं। उनकी आत्मकथा कितनी विस्फोटक होगी, इसका अंदाज उन पर लिखी जीवनी से ही लगाया जा सकता है। 


राव के साथ अर्जुन के तीन प्रसंग

प्रसंग एक:
हैलो, मिस्टर प्राइममिनिस्टर!
छह दिंसबर की घटना के पहले प्रधानमंत्री राव की इच्छा के विपरीत अर्जुनसिंह लखनऊ मेल से लखनऊ, फैजाबाद और अयोध्या जा रहे थे। उन्हें अयोध्या की अनहोनी का अंदेशा था। जब अर्जुनसिंह लखनऊ मेल के प्रथम श्रेणी के कूपे में बैठे थे तभी एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें कहा सर, पीएम साहब आपसे बात करना चाहते हैं। उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे। सिंह ने अधिकारी से कहा स्टेशन मास्टर के कमरे में बात करने जाएंगे तो गाड़ी चली जाएगी। कैसे संभव होगा। तीन-चार बार अनुरोध करके अधिकारी लौट गया। थोड़ी देर बाद फिर वही अधिकारी आया और बोला सर, प्लेटफार्म पर लगे पब्लिक टेलीफोन बूथ पर पीएम साहब से बातचीत का इंतजाम कर दिया गया है। जब तक बात नहीं हो जाती, ट्रेन नहीं जाएगी। इस पर अर्जुनसिंह चर्चा करने गए। वहां मौजूद लोग बस यह ही सुन सके कि 'हैलो, मिस्टर प्राइममिनिस्टर!Ó अर्जुनसिंह ने ट्रेन में लौटकर जोशी को बताया 'राव साहब, दिल्ली में ही रूकने के लिए कह रहे थे। उन्हें लग रहा है कि मेरे जाने से कहीं लखनऊ, अयोध्या में अशांति न फैल जाए। मैंने उन्हें विश्वासपूर्वक कहा है कि ऐसा कुछ नहीं होगा।Ó

प्रसंग दो :
इस परिवार का मोह छोडि़ए
राव ने गांधी परिवार का लाग आलाप रहे अर्जुनसिंह को अपने साथ जोडऩे के इरादे से एक बार कहा था 'अब आप इस परिवार का मोह छोडि़ए, आपमें राजनीतिक प्रतिभा और तीव्रता है। अब देश को नई राजनीति की जरूरत है। आगे बढि़ए।Ó

प्रसंग तीन:
अब लड़ाई खत्म करें
पुस्तक के आखिर में जोशी ने अर्जुन-राव के मार्मिक प्रसंग का जिक्र किया है। राव अस्पताल में भर्ती थे और अर्जुनसिंह उनसे मिलने गए। राव ने सिंह को कहा अब लड़ाई खत्म करें। मुझे आपके घर आना है। ठीक होते ही आऊंगा। इस मुलाकात के अगले ही दिन राव का देहांत हो गया।  


News in Patrika on 11th August 2010

क्यों नहीं लिए केके गोयल के बयान

- कैलाश को क्यों बख्शा : लोकायुक्त पुलिस की एफआईआर पर सवाल
- भ्रष्टाचार साबित करने वाले लीज सौदे के गवाह होने के बाद भी लोकायुक्त पुलिस ने नहीं की पूछताछ
- निगम उपयंत्री सुरेश चौहान हैं दूसरे गवाह


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन के घोटाले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की खामियां एक-एक कर सामने आ रही हैं। जांच अफसरों ने धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी के दोस्त मनीष तांबी के लिखित बयान लिए परंतु उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय व विधायक रमेश मेंदोला के मित्र केके गोयल और इंदौर नगर निगम के उपयंत्री सुरेश चौहान से भी कोई पूछताछ नहीं की गई। गोयल व चौहान धनलक्ष्मी केमिकल्स और नंदानगर साख संस्था के बीच हुए जमीन सौदे के गवाह हैं। इस सौदे के कारण ही मेंदोला, कोठारी, संघवी समेत 17 लोगों पर भ्रष्टाचार और आपराधिक षडयंत्र रचने का केस दर्ज किया गया है।


लोकायुक्त पुलिस के दो चेहरे

पहला चेहरा
जांच के दौरान लोकायुक्त पुलिस ने 15 लोगों के बयान लिए। इसमें एक नाम मनीष तांबी का भी है। लोकायुक्त पुलिस ने तांबी को बयान लेने का कारण एक नक्शे को बताया है। सूत्रों के मुताबिक चर्चित जमीन पर धनलक्ष्मी केमि. ने आवासीय ईकाइयों जो नक्शा टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से पास करवाया था, उस पर तांबी ने बतौर गवाह हस्ताक्षर किए थे।

दूसरा चेहरा
फरियादी सुरेश सेठ की शिकायत में नत्थी किए गए दस्तावेजों में लीज अधिकारों का विक्रय पत्र भी मौजूद था।  इस पर मेंदोला, कोठारी और संघवी के साथ ही केके गोयल और सुरेश चौहान के हस्ताक्षर भी हैं। चूंकि इसी सौदे के आधार पर भ्रष्टाचार साबित हुआ है, इसलिए इन लोगों से बयान लेना लोकायुक्त पुलिस की जिम्मेदारी था।

कैलाश-मेंदोला के मित्र हैं गोयल 
 
केके गोयल विजयवर्गीय और मेंदोला के मित्र हैं। वे विकास अपार्टमेंट हाउसिंग सोसाइटी के भंग संचालक मंडल में मेंदोला के साथ ही सदस्य भी हैं। इस दागी सोसाइटी की जांच चल रही है। आरोप है कि संचालकों ने सदस्यों के उपयोग की 9 एकड़ जमीन भवन्स प्रोविनेंट स्कूल को लीज पर दी है। अवैध मल्टियों के कारण विवादित हुए आलोक नगर की जमीन भी इसी सोसाइटी की है।

News in Patrika on 9th August 2010

ईमानदार थे, तो क्यों नहीं बदली अफसरों की राय

- सुगनीदेवी कॉलेज जमीन घोटाले मामले की एफआईआर से उपजा सवाल
- कैलाश विजयवर्गीय को बचाने की कोशिश में लोकायुक्त पुलिस ने किए तीन गोलमाल


सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 करोड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन घोटाले में विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की भाषा से साफ है कि तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय और तत्कालीन निगमायुक्त को बचाने के लिए भरसक कोशिश की गई। अदालत में पेश की गई 29 पेज की एफआईआर को 'पत्रिकाÓ ने विधि विशेषज्ञों को दिखाया, तो वे चौंक गए। इस रिपोर्ट में तीन स्थानों पर स्पष्टï रूप से गोलमाल किया गया है।
जिन तर्कों के आधार पर मेंदोला समेत 17 लोगों को आरोपी बनाया गया है उनसे विजयवर्गीय की ईमानदारी पर सवाल खड़ा हो गया है। विधि विशेषज्ञ कहते हैं कि विजयवर्गीय ईमानदार थे, तो उन्होंने अफसरों के वे गड़बड़ फैसले पलट क्यों नहीं दिए जिनके आधार पर धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज की जमीन नंदानगर साख संस्था को दी गई। ऐसा भी नहीं है कि अफसरों के हस्ताक्षर से आए सभी प्रस्तावों को मंजूर कर लिया जाता हो। अफसरों की सकारात्मक टिप्पणियों के साथ दर्जनों गड़बड़ प्रस्ताव एमआईसी के सामने आते हैं, जिन्हें खारिज करके एमआईसी व महापौर न्याय करते हैं। 

एफआईआर में तीन गोलमाल

गोलमाल एक
पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का संकल्प 286 और प्रस्ताव 58 पास कर दिया।
उठता सवाल
अफसरों की गलती को महापौर, एमआईसी और निगमायुक्त ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या महापौर जैसे जिम्मेदार पद पर आसिन होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प व प्रस्ताव को नामंजूर कर दें?

गोलमाल दो
पेज आठ के तीसरे पैरा में लिखा कि नगर शिल्पज्ञ जगदीश डगांवकर ने 19 अप्रैल 2004 को एक ऑफिस नोट पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर कैलाश की अध्यक्षता में एमआईसी ने 22 सितंबर 2004 को संकल्प क्रमांक 759 पास किया। इसी के जरिए जमीन अगले तीस वर्ष के लिए नंदानगर संस्था को दी गई।
उठता सवाल
डगांवकर के ऑफिस नोट और संकल्प प्रस्ताव के बीच में पांच माह का अंतराल था। इतने समय में भी इस प्रस्ताव के दोषों की विजयवर्गीय ने अनदेखी क्यों की?

गोलमाल तीन
पेज नौ के पैरा दो में लिखा है कि धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार और पार्षद रमेश मेंदोला ने अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडय़ंत्र में संगमत होकर पद का दुरुपयोग किया और सरकार को 2.70 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाई। पार्षद मेंदोला को इतनही राशि का अवैध आर्थिक लाभ हुआ।
उठता सवाल 
क्या एक अकेला पार्षद अफसरों व कर्मचारियों के साथ आपराधिक षडय़ंत्र में संगमत होकर इतना फायदा उठा सकता है? अपराध वर्ष 2000 से 04 के बीच हुआ है, क्या महापौर के सर्वाधिक नजदीकी पार्षद मेंदोला लगातार चार वर्ष तक अकेले ऐसा षडय़ंत्र रच सकता है? यदि ऐसा हुआ है तो विजयवर्गीय व एमआईसी ने अपनी अहम जिम्मेदारी को नहीं निभाया है। क्या यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता है? 

लोकायुक्त पुलिस को क्यों नहीं दिखे कैलाश-रमेश के ताल्लुकात

- कोर्ट ने जिन बिंदुओं पर सौंपी थी जांच, वे भी नहीं खंगाले
- ऐसी विशेष जांच एजेंसी का क्या औचित्य


सीबीआई, सीआईडी, ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त जैसी विशेष जांच एजेंसियों के गठन के पीछे मंशा होती है कि भ्रष्टाचार या अपराध के किसी भी मामले से जुड़े सूक्ष्मतम पहलू की भी जांच हो जाए और बड़े से बड़े आरोपी को खींचकर अदालत के सामने पेश कर दिया जाए। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की 100 एकड़ रुपए की तीन एकड़ जमीन मामले में अब तक तो ऐसा नहीं हो सका। विशेष न्यायालय द्वारा चार माह पूर्व (6 अप्रैल को) लोकायुक्त पुलिस को सौंपे गए इस केस में जिन 46 बिदुओं पर जांच सौंपी थी, उनमें से कई की पड़ताल ही नहीं की गई। खासकर वे बिंदु पूरी तरह अछूते रहे जिनके आधार पर तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती थी।

यहां तक कि लोकायुक्त पुलिस ने फरियादी सुरेश सेठ के उस आरोप की भी पूरी तरह अनदेखी की जिसमें उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के व्यक्तिगत ताल्लुकातों का जिक्र था। दोनों के जगजाहिर संबंधों के आधार पर ही संभवत: अदालत ने भी लोकायुक्त पुलिस को दोनों की भूमिका की जांच सौंपी थी। ज्ञात रहे लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को अदालत में 29 पेज की एफआईआर पेश करके जांच से पीछा छुड़ाने की कोशिश की थी। फरियादी ने जब चार में से एक आरोपी (कैलाश) को छोडऩे की बात उठाई, तब लोकायुक्त के वकील बोले जांच अभी जारी है और आरोपी क्रमांक दो यानी कैलाश विजयवर्गीय को भी आरोपी बनाया जा सकता है।

बड़ा सवाल
कैलाश ने पलट क्यों नहीं दी अफसरों की राय?
विधायक रमेश मेंदोला, तीन उद्योगपति और 13 अफसरों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में नेताओं के बजाए अफसरों को अधिक दोषी बताया गया है। पेज छह के दूसरे पैरा में लिखा गया है कि तत्कालीन भवन अधिकारी, नगर शिल्पज्ञ और संबंधित अन्य अफसरों व कर्मचारियों ने नियम विरूद्ध मनमाने ढंग से लीज राशि की गणना की, जिसके आधार पर विजयवर्गीय की अध्यक्षता वाली एमआईसी ने नंदानगर संस्था को जमीन सौंपने का प्रस्ताव पास कर दिया। बड़ा सवाल यह है कि अफसरों की गलती को महापौर और एमआईसी ने हूबहू मान क्यों लिया? क्या जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका दायित्व नहीं था कि संकल्प को पारित न करें? ऐसा भी नहीं है कि अफसरों के हस्ताक्षर से आए सभी प्रस्तावों को मंजूर कर लिया जाता हो। दर्जनों प्रस्ताव ऐसे होते हैं, जिन्हें दोषपूर्ण जानकर महापौर व एमआईसी द्वारा खारिज कर दिया जाता है। इस साधारण किंतु बेहद महत्वपूर्ण तथ्य पर लोकायुक्त पुलिस ने आखिर क्यों ध्यान नहीं दिया?


क्या कर रहा 209 लोगों का लवाजमा
मप्र में लोकायुक्त संगठन की स्थापना विशेष पुलिस स्थापना के अंतर्गत की गई है। लोकायुक्त समेत इसमें 209 अधिकारी-कर्मचारी का अमला सरकार ने लगाया है। अमले में महानिदेशक, इंस्पेक्टर जनरल, एसपी से लेकर कानूनी सलाहकार तक शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि इस लवाजमे के पास एकमात्र यही केस जांच के लिए था, लेकिन सवाल यही है कि बहुचर्चित मामले में भी इस अमले ने अदालत की फिक्र नहीं की।

ऐसा काम तो सामान्य पुलिस भी कर ले
इस बहुचर्चित मामले में अब तक के घटनाक्रम पर कानूनी जानकारों का कहना है जिस तरह से लोकायुक्त पुलिस ने जांच कार्य किया है, वह तो सामान्य पुलिस भी कर सकती थी। कानूनन विशेष पुलिस स्थापना को कई विशेष अधिकार दिए गए हैं, लेकिन इस मामले में उनका इस्तेमाल नहीं किया गया।

कैलाश की भूमिका को साबित करने वाले तथ्य
बिंदु एक
कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में रमेश मेंदोला ने 1999 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में क्रमश: महापौर और पार्षद का चुनाव साथ-साथ लड़ा। विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली एमआईसी में रमेश मेंदोला स्वास्थ्य प्रभारी के पद पर जनवरी 2000 से जनवरी 2005 तक आसीन रहे। दोनों ही समान राजनैतिक पृष्ठभूमि के होकर एक साथ राजनैतिक कार्य करते हैं।
बिंदु दो
 कैलाश ने अपने राजनैतिक प्रभाव का दुरुपयोग करके रमेश मेंदोला की अध्यक्षता वाली नंदानगर साख संस्था को खुद के महापौर रहते जमीन हस्तांतरित करवाई। इस संस्था में विजयवर्गीय की पत्नी आशा विजयवर्गीय भी संचालक हैं।
बिंदु तीन
 कैलाश-रमेश ने वर्ष 2000 में पद संभालते ही आपराधिक षडय़ंत्र की शुरुआत कर दी थी। यही वजह है कि धनलक्ष्मी केमिकल्स कंपनी को इस भूमि पर बगैर भूमि उपयोग में बदलाव के 18 जून 2000 को मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की अनुमति दे दी गई। 
बिंदु चार
घोटाले के दौरान कैलाश महापौर के साथ ही उसी क्षेत्र के विधायक भी थे, जहां घोटाला हुआ। लोकसेवक होने के नाते कैलाश व रमेश भलीभांति जानते थे कि मप्र शासन की अनुमति के बगैर न तो भूमि बेची जा सकती थी और न हस्तांतरित।
बिंदु पांच
 कैलाश ने एमआईसी अध्यक्ष के नाते 3 जून 2002 को उस संकल्प क्रमांक 289 की अनुशंसा कर दी जिसमें सुगनीदेवी जमीन को नंदानगर साख संस्था को देने का जिक्र था।
बिंदु छह
कैलाश-रमेश की मौन सहमति से धनलक्ष्मी केमिकल्स इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी एवं मनीष संघवी को अनुचित लाभ देते हुए 10 हजार वर्गफीट जमीन उन्हें दे दी गई। शेष जमीन ही नंदानगर संस्था अध्यक्ष को दी गई।
बिंदु सात
कैलाश के प्रति रमेश की राजनैतिक निष्ठा समाज में स्थापित है। रमेश कैलाश को अपना राजनैतिक गुरू भी मानते हैं। 





 News in Patrika on 8th August 2010