शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

इंदौर का अंशुल भारतीय शर्लक होम्स

- 42 जटिल  अंतर्राष्ट्रीय क्राइम फाइल्स निपटाकर दुनियाभर कर दिया अचंभित
- अमेरिकन क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल ने किया नामित 



यह स्कॉटिश लेखक आर्थर डॉयल के काल्पनिक जासूसी पात्र शर्लक होम्स की कहानी नहीं है, जो अपने तौर तरीकों के जरिए अपराधियों को गिरफ्त में ले लिया करता था। यह इंदौर के 23 वर्षीय एक नौजवान की हकीकत है। वह जेनेटिक साइंस का छात्र है और भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उसे ओजोन मैन ऑफ द वर्ल्ड  घोषित किया है। उसने भारत में ही रहकर कुछ ही दिनों में 42 अनसुलझे अंतरराष्टरीय अपराधों को सुलझा दिया है। ये अपराध बरसों पुराने थे और कई ख्यात अपराध विशेषज्ञ, पुलिस अधिकारी और फोरेंसिक मेडिसिन के वैज्ञानिक भी इनके आगे हार गए थे। उसकी अविश्वसनीय बुद्धि से अचंभित होकर दुनियाभर से भारत की राष्टï्रपति को बधाई पत्र मिले हैं। इतना ही नहीं उसे अमेरिका ने तो अपनी फोरेंसिक रिसर्च काउंसिल के क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल में नामित तक कर लिया है। 

बात इंदौर के अंशुल जैन की है। कहने को तो वे डब्ल्यूएचओ के डीओई में बतौर जूनियर साइंटिस्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन जेनेटिक साइंस के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया के जेनेटिक साइंटिस्ट मान चुके हैं। हाल ही में भारत की राष्टï्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटिल ने अंशुल की उपलब्धियों से अभिभूत होकर एक बधाई पत्र भेजा है। मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम ने भी एक व्यक्तिगत पत्र लिखकर अंशुल की इस उपलब्धि को  उत्कृष्ट  बताया है। सुरक्षा के मद्देनजर स्थान की गोपनीयता की शर्त पर अंशुल से 'पत्रिका  से विशेष चर्चा की। उन्होंने बताया कुछ नया करने की मेरी सोच ने ही इस मुकाम तक पहुंचाया है।

यूं सुलझाई क्राइम फाइल्स
अंशुल जेनेटिक साइंटिस्ट हैं और उनका नाता मानव रक्त में मौजूद गुणसूत्रों व डीएनए से है। उन्होंने रक्त और जीन्स के नमूनों के आधार पर ही अपराधियों को बेनकाब किया है। वे बताते हैं यह बहुत ही जटिल प्रक्रिया है और इसमें कई बार कई-कई दिन लग जाते हैं।

हर रात दो घंटे की मशक्कत से मिला मुकाम
अंशुल इंदौर के गुजराती साइंस स्कूल के छात्र रहे हैं। 12 वीं के बाद वर्ष 2006 में उन्होंने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए 15 परीक्षाएं दी और 12 की मेरिट में स्थान बनाया। वे बताते हैं मैं डॉक्टर बनकर पहले ही खोजी जा चुकी दवाइयों के आधार पर इलाज करके रोजी-रोटी नहीं कमाना चाहता था, इसलिए इस चयन से संतुष्ट नहीं हुआ और इंटरनेट पर शोध की दुनिया को खंगालने लगा। इंटरनेट सर्फिंग के दौरान ही मेरा जैनेटिक साइंस की ओर झुकाव बढ़ा। हर रात दो घंटे में इस विषय पर इंटरनेट पर जाता था और एक दिन ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी की ऑन लाइन सेवा में चला गया। वहां जैनेटिक्स से जुड़ी पहेली थी। उसे हल किया तो मुझे ऑन लाइन परीक्षा के लिए आमंत्रित किया गया। पौन घंटे बाद परीक्षा हुई और मैं चयनित हो गया। बस तभी से जैनेटिक्स मेरी दुनिया बन गया है।

परिवार की अहम भूमिका
अंशुल बताते हैं मेरे ताऊजी डॉ. सुरेंद्र जैन ही मेरे प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं। बाद में पूर्व राष्टï्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कमाल ने मुझे प्रेरित किया। मेरी मां कल्पना जैन, पिता डी. जैन, बड़े भाई डॉ. अंकुर जैन ने भी हरकदम पर मेरी हौंसला अफजाई की है, यही वजह है कि मैं आगे बढ़ रहा हूं।
 
'अंशुल, भारत और दुनिया के दूसरे देशों की ओर से मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहती हूं। मेरी इच्छा है कि मैं आपसे मुलाकात करूं।
- प्रतिभा देवीसिंह पाटिल,
राष्ट्रपति (अंशुल को लिखे पत्र से)

'अंशुल, आपकी उपलब्धि न केवल बधाई के योग्य है, बल्कि यह अविश्वसनीय है। इससे भारत के इतिहास में आपका नाम दर्ज हो गया है।
- एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति (अंशुल को लिखे पत्र से)

'भारत में शोध को बढ़ावा नहीं दिया जाता, इसीलिए यहां वैज्ञानिकों की पूछ परख नहीं है। सरकार को इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। - अंशुल जैन, साइंटिस्ट, जैनेटिक साइंस




 पूरी दुनिया को बदल डालेगा जेनेटिक साइंस
- जेनेटिक साइंटिस्ट अंशुल जैन से विशेष भेंट

चॉकलेटी हीरो जैसे नैन-नक्श वाले 23 वर्षीय अंशुल को देखकर कोई नहीं कह सकता कि उनकी अद्भुत बुद्धिमत्ता के कायल होकर चार वर्ष पहले ही भारत के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें 'ओजोन मैन ऑफ द वर्ल्ड घोषित कर दिया था। तब से आज तक वे जैनेटिक साइंस के क्षेत्र में शोधरत हैं। 'पत्रिका  से विशेष भेंट में उन्होंने बताया जेनेटिक साइंस ऐसा क्षेत्र है, जो कुछ ही वर्षों में पूरी दुनिया को बदल देगा। अभी तो इस विधा में कुछ हुआ ही नहीं है।

प्र- आपको अमेरिका के फोरेंसिक रिसर्च काउंसिल के क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल में नामित क्यों किया गया है?
उ-  जैनेटिक साइंस के क्षेत्र में शोधरत होने के कारण मेरे पास 42 पुराने अपराध सुलझाने के लिए रक्त के नमूने आए थे। मैंने वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके इन्हें निपटाया। इसी को देखते हुए अमेरिकन फोरेंसिक रिसर्च काउंसिल ने यह कदम उठाया।

प्र- आपकी सफलता का क्या राज है?
उ- बचपन से ही कुछ नया करने का सोच था। 12 वीं के बाद मैंने चिकित्सा के क्षेत्र में जाने के लिए 15 प्रवेश परीक्षाएं दी थीं और इनमें से 12 में मुझे मेरिट में स्थान मिला था, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि डॉक्टर बनकर पूर्व में की गई खोजों के आधार पर लोगों का उपचार करूं। बस मुझे जुनून सवार था कि शोध करना है और मैं आगे बढ़ता चला गया।

प्र- आपके प्रेरणास्त्रोत कौन हैं? 
उ- मेरे ताऊजी डॉ. सुरेंद्र जैन। उन्हें देखकर ही मुझे राह मिली। बाद में मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कमाल ने मुझे राह दिखाई। मां कल्पना जैन, पिता डी. जैन, बड़े भाई डॉ. अंकुर जैन ने भी हरकदम पर मेरी हौंसला अफजाई की।

प्र- जैनेटिक साइंस की ओर कैसे मुड़े?
उ- मैंने इंदौर के गुजराती साइंस कॉलेज से 12 वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद इंटरनेट सर्फिंग के दौरान ही जैनेटिक साइंस की ओर झुकाव बढ़ा। हर रात दो घंटे में इस विषय पर नेट पर जाता था और एक दिन ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी की ऑन लाइन सेवा में चला गया। वहां जैनेटिक्स से जुड़ी पहेली थी। उसे हल किया तो मुझे ऑन लाइन परीक्षा के लिए आमंत्रित किया गया। पौन घंटे बाद परीक्षा हुई और मैं चयनित हो गया। बस तभी से जैनेटिक्स मेरी दुनिया बन गया है।


प्र- जैनेटिक साइंस के क्षेत्र में अभी आप क्या काम रहे हैं?
उ- यह एक गोपनीय मसला है, परंतु इतना जरूर है कि इस क्षेत्र में अभी तो कुछ हुआ ही नहीं है। मनुष्य के बारे में जो भी आप सोच सकते हैं, उसे जैनेटिक्स से हासिल किया जा सकता है। कुछ ही वर्षों में इससे पूरी दुनिया में तब्दीली हो जाएगी।

प्र- इस दिशा में भारत सरकार के प्रयासों के बारे में बताएं?
उ- सबसे बड़ा प्रयास यह है कि मुझे देश में ही रहकर काम करने का मौका मिल गया। वैसे, भारत में शोध को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है, यही वजह है कि छात्र इससे दूर होते जा रहे हैं। यहां लोग उन बातों को शोध बता रहे हैं, जो पहले ही खोजा जा चुका है।

प्र- भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारें में आपकी क्या राय है?
उ- जब तक इसे पूरी तरह बदला नहीं जाएगा, तब तक हम दुनिया के साथ खड़े नहीं हो सकेंगे। वर्तमान में स्कूल-कॉलेज व्यापार का केंद्र बने हुए हैं। जहां से ज्ञान गंगा बहना चाहिए, वहां से गंदे नाले बह रहे हैं।

प्र- भारतीय राजनैतिक व्यवस्था पर आपकी क्या राय है?
उ- कानून बनाने में नेताओं को मास्टर्स डिग्री हासिल है और कानून तोडऩे में पीएचडी। फौरी तौर पर कहूं तो नेताओं को देश की चिंता ही नहीं है। वे न तो यह समझने को तैयार है कि दुनिया बदल रही है और न ही यह कि देश की प्रतिभाएं बोथरी हो रही हैं। इससे अधिक तो क्या कहूं?

प्र- आपको अत्यधिक सुरक्षा प्राप्त है, क्या इससे असहज महसूस नहीं करते हैं?
उ- जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैं सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं हूं। मैं अपने और अपने पारिवारिक लोगों के बीच में हमेशा खुश रहता हूं।

प्र- अभी दिन में आप कितने घंटे काम करते हैं?
उ- उसकी कोई सीमा नहीं है। कई बार तो लगातार दो-दो रात काम होता है और कई बार कोई काम नहीं। दरअसल, यह क्षेत्र जुनून से भरा हुआ है और मुझे तो इसी में डूबे रहने में मजा भी आता है।

प्र- आपका सपना?
उ- दुनिया के लोगों को बीमारियों से बचाना। कई नई-नई बीमारियों आ रही हैं और इनसे लडऩे के तरीके भी नए ढूंढना होंगे। हम लोग इन्हीं पर काम कर रहे हैं। मानवता को महफूज रखना ही जीवन का उद्देश्य है। एक खास बात मैं जैन हूं और जैन धर्म के सिद्धांतों की कसौटी पर ही दुनिया की वैज्ञानिक प्रगति को देख रहा हूं। 
 
(नोट: अंशुल को  अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा हासिल है और इसी के मद्देनजर उनके मौजूदा पते और शहर की जानकारी को छुपाया जा रहा है। जो क्राइम फाइल्स उन्होंने सुलझाई हैं, उनके बारे में भी जिक्र नहीं किया गया है।) 

पत्रिका : २-३ अक्टूबर २०१० 

हाईकोर्ट में महिलाकर्मियों को मिली छुट्टी

अयोध्या फैसले की उत्सुकता इंदौर हाईकोर्ट में भी देखी गई। दोपहर तीन बजे से ही हाईकोर्ट बार एसोसिएशन सभाकक्ष में एडवोकेट और कर्मचारी जुट गए थे। सभी ने टीवी चैनलों के जरिए फैसले की जानकारी जुटाई। डिप्टी रजिस्ट्रार एमएच कर्णिक, बार एसोसिएशन अध्यक्ष विनय झेलावत, सरकारी एडवोकेट दीपक रावल समेत सभी की निगाह इलाहबाद हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया है? सुरक्षा के मद्देनजर हाईकोर्ट में दोपहर बाद ही करीब 20 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए थे। एक मौखिक आदेश के तहत सभी महिलाकर्मियों को दोपहर तीन बजे अवकाश दे दिया गया था।

दो को श्रद्धांजलि
हाईकोर्ट के एडवोकेट आरके भड़ंग और भृत्य मुन्नालाल हाड़े की मृत्यु के कारण हाईकोर्ट में दो श्रद्धांजलि सभाएं भी हुई।  दो दिन पहले एडवोकेट आरके भड़ंग के निधन के कारण दोपहर बाद श्रद्धांजलि सभा हुई। भृत्य मुन्नालाय हाड़े की लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को हुई मौत के चलते शाम चार बजे मप्र हाईकोर्ट कर्मचारी संघ ने एक श्रद्धांजलि सभा हुई।

पत्रिका : ०१ अक्टूबर २०१०

शिवलिंग के हिस्से को नर्मदा में क्यों बहाया?

- औंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग क्षरण को लेकर मुख्य सचिव से मांगा जवाब

औंकारेश्वर के ज्योर्तिलिंग के टूटे भाग को कलेक्टर ने किसकी अनुमति से नर्मदा में प्रभावित किया? क्या उन्होंने इसके लिए पहले पंचनामा बनाया गया था? वह बेशकीमती पत्थर था, क्या वास्तव में उसे ही बहाया गया है?

ये तीखे सवाल मप्र के मुख्य सचिव अवनि वैश्य से किए गए हैं। सवाल पूछने वाले हैं पर्यावरणविद् और होलकर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. राम श्रीवास्तव। उन्होंने सभी प्रश्नों की जानकारी सूचना का अधिकार में चाही है। डॉ. श्रीवास्तव ने 'पत्रिकाÓ को बताया मीडिया के जरिए जानकारी मिली कि पिछले दिनों ज्योर्तिलिंग का जो टूकड़ा टूट गया था, वह स्थानीय प्रशासन ने बहा दिया। यह लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा मसला है और किसी प्रशासनिक अधिकारी को इस तरह का फैसला करने का अधिकार नहीं है।

ये सवाल भी पूछे
- ज्योर्तिलिंग के पवित्र अंश की रेडियोधर्मिता पद्धति से आयु का वैज्ञानिक आंकलन क्यों नहीं करवाया गया?
- उज्जैन महाकाल का भी लगातार शरण हो रहा है। राज्य सरकार ने इसे रोकने के लिए अब तक क्या प्रयास किए?
- काबा में पवित्र पत्थर को चांदी में सज्जित किया गया है। ऐसा ही कोई उपाय औंकारेश्वर में क्यों नहीं किया गया?


पत्रिका : ३० सितम्बर २०१० 

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

अंधों का हाथी हो गया हमारा ट्रैफिक

- 'ट्रैफिक प्रबंधन और आधारभूत विकास पर टॉक शो में उभरी व्यथा
- राजनैतिक हस्तक्षेप हटेगा, तभी सुधरेगा यातायात का हाल
- पत्रिका स्थापना दिवस विशेष



बेहद तेजी से फैल रहे इंदौर की बदहाल होती यातायात व्यवस्था को शहर के विशेषज्ञ, प्रबुद्ध विशेषज्ञ और ट्रैफिक टेक्नोक्रेट 'अंधों का हाथीÓ की तरह देख रहे हैं। 'अंधों का हाथीÓ ख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी का नाटक है, जिसमें लोकतंत्र पर सटीक प्रहार किया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब इस हाथी को पहचाना ही होगा, वरना ट्रैफिक के दबाव से शहर का दम निकल जाएगा। ट्रैफिक को राजनैतिक फैसलों के बजाए ट्रैफिक इंजीनियरिंग के जरिए सुधारना चाहिए। इसके लिए उ'च स्तर पर नीतिगत फैसले करना होंगे। महज जेएनएनयूआरएम के बजट से कुछ प्रोजेक्ट हाथ में लेना पर्याप्त नहीं है।

यह 'पत्रिकाÓ के स्थापना दिवस के मौके पर 'पत्रिकाÓ कार्यालय में बुधवार को 'ट्रैफिक प्रबंधन और आधारभूत विकासÓ विषय पर आयोजित टॉक शो का सार है। विशेषज्ञ इस बात बेहद चकित हैं कि इंदौर में न तो कोई ट्रैफिक इंजीनियर पदस्थ है और न ही ओरिजिन डेस्टिनेशन सर्वे (ओडीएस) ही हुआ है। सर्वे नहीं होने से किसी को यह अंदाजा भी नहीं है कि कितने लोग किस दिशा में कब सफर करते हैं और कब-कब किन-किन स्थानों पर वाहनों का कितना दबाव रहता है। ट्रैफिक सुधारने के लिए बार-बार बैठकें, कार्यशाला और विश्लेषण चर्चाएं होती हैं, लेकिन सब सिर्फ बीआरटीएस के इर्दगिर्द ही घुमते रहते हैं। इससे ऊपर उठने की जरूरत है। टॉक शो के अंत में अ'छे नागरिक बनने की शपथ भी ली गई।

अफसरों की विदेश यात्रा पर सवाल
किशोर कोडवानी ने सवाल उठाया कि जब योजनाकार इंदौर आते हैं, तो उनसे मिलकर बात करना कोई जरूरी नहीं समझता। बाद में लंदन, चीन की यात्राएं करते हैं। यह आम आदमी के पैसे का दुरुपयोग है। नरेंद्र सुराणा ने कहा योजनाओं में विशेषज्ञों की राय ले ली जाती है, लेकिन बाद में उसे बगैर चर्चा के खारिज कर दिया जाता है। राय पर मंथन किया जा सकता है, किंतु उसे नकारना अनुचित है। सीएस डगांवकर ने बताया विशेषज्ञों की राय को महत्व देना जरूरी है।

कोयम्बटूर मॉडल क्यों नहीं अपना सकते

कोयम्बटूर शहर में कुल 1100 बसें है, यहां कोई स्कूल बस नहीं चलती। बसों का टाईम-टेबल और प्रबंधन इतना बेहतर है कि स्कूली विद्यार्थी इन्हीं बसों से सुबह स्कूल, दोपहर में कोचिंग और शाम को हॉबी क्लास जाते हैं। सौ रुपए के मासिक पास में उनका सारा आवागमन हो जाता है। हमारे यहां केवल स्कूल बसों की संख्या 2200 है। उसके बावजूद स्कूली छात्र दुपहिया वाहनों की मांग करते हैं। बस की फीस और वाहन के किश्त उनके पालक भुगतते हैं। बहस में इस प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई।

कॉलोनियों के ग्रीन बेल्ट हटाएं
जवाहर मंगवानी ने बताया कि कॉलोनियों में सड़क की जमीन पर बगीचा बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और इन्हें हटाने के लिए संकल्प पारित कर लिया गया है। यह बड़ा काम है और इसमें विरोध भी झेलना पड़ सकता है। सभी लोगों ने कहा निगम को तत्काल इसे शुरू कर देना चाहिए, सभी समर्थन करेंगे।

रोटरी या सिग्नल ?
देश दुनिया में रोटरी को खत्म किया जा रहा है, लेकिन इंदौर में रोटरी को लेकर सीधा फंडा है कि इससे खूबसूरती आती है। अतुल सेठ ने कहा रोटरी को हटाना चाहिए। आरएस राणावत ने बताया रोटरी में ही सिग्नल लगाए जा रहे हैं। यह क्या मजाक है? जगतनारायण जोशी ने बताया रोटरी कहां हो, कहां नहीं इसके लिए ट्रैफिक इंजीनियरिंग में पर्याप्त इंतजाम किया गया है। सीएस डगांवकर ने बताया रोटरी हटाने और सिग्नल लगाने का फैसला वैज्ञानिक आधार पर लिया जाना चाहिए, न कि भावनात्मक आधार पर।

...और हवाई सफर का प्रस्ताव भी
नारायण प्रसाद शुक्ला ने हवाई सफर का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने बताया इसी तरह से दबाव बनता रहा तो एक समय ऐसा आएगा कि विजयनगर से अन्नपूर्णा तक के लिए हवाई सफर लेना पड़ेगा। मंथन में मोनो रेल और मेट्रो ट्रेन की चर्चा भी हुई।




  •  चर्चा में उभरे दस मुद्दे
  • छोटे-छोटे बायपास बनाकर मुख्य सड़कों तक पहुंचने की राह आसान हो।
  • पैदल यात्रियों के लिए भूमिगत सब-वे बनाए जाएं।
  • बॉटल नेक (दोनों और चौड़ा, बीच में संकरा) चिह्नित हों, उन्हें सुधारा जाए।
  • निगम, आईडीए, टीएंडसीपी खरीदे सैटेलाइट इमेज सॉफ्टवेयर।
  • उज्जैन, देवास, महू, पीथमपुर को यातायात की दृष्टि से विकसित करें।
  • मौजूदा पार्किंग स्थलों का सही उपयोग हो।
  • ट्रैफिक मोबेलाइजेशन प्लान समय सीमा में बन जाए।
  • नेबरहूड स्कूलिंग पर ध्यान दें, ताकि बसों की संख्या घटे।
  • मुख्य बाजारों से दूर पार्किंग बनाई जाए, ताकि ग्राहकों को सुविधा रहे।
  • पूर्व-पश्चिम के साथ ही उत्तर-दक्षिण को जोडऩे वाले रास्तों पर ध्यान दिया जाए।




राजनैतिक हस्तक्षेप जिम्मेदार
व्यवस्थाओं और राजनीति से ऊपर उठकर बात करना होगी। शहर में सामूहिक चरित्र बनाने की जरूरत है। ऐसा करके ही हम समस्याओं को सुलझा सकेंगे। शहर बहुत अधिक विकास कर सकता था, लेकिन राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण कई बातें पीछे छूट गईं। किसी वातानुकूलित कमरे में दावत के साथ की गई चर्चा से यातायात को सुधारा नहीं जा सकता है। ऐसे रास्तों की सूची बनाई जाना चाहिए, जो बॉटल नेक की तरह हैं।
- नारायण प्रसाद शुक्ल, पूर्व मंत्री व महापौर

छोटे बायपास पर ध्यान दें
  छोटे-छोटे बायपास बनाकर मुख्य सड़कों तक पहुंचा जा सकता है। नारायण कोठी से अटल द्वार, ïहाथीपाला से जबरन कॉलोनी जैसी करीब 30 छोटी सड़कें हैं, जिनसे व्यवस्थाएं सुधर सकती हैं। कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां एक खंभा या एक चेम्बर बाधा बना हुआ है। जो गड़बड़ी करे, उसे बड़ा से बड़ा दंड दिया जाए। छोटे फ्लïाय ओवर भी मदद कर सकते हैं। बीआरटीएस पूरा होने पर एकदम सुधार नजर आएगा। 
- मधु वर्मा, पूर्व अध्यक्ष, आईडीए

कहां है सैटेलाइट इमेज का सॉफ्टवेयर
20 लाख का आंकड़ा पार करते ही ओरिजिन डेस्टिनेशन सर्वे करवाया जाना चाहिए, ताकि यात्रियों की संख्या और दबाव का सही अनुमान सामने आए। किसी भी विभाग के पास सैटेलाइट इमेज का सॉफ्टवेयर तक नहीं है। इसके बगैर समस्याओं को आधुनिकतम तरीकों के पिन पाइंटेड कैसे किया जा सकेगा? मजाक तो यह है कि पहले प्रस्ताव तैयार होता है और बाद में उसकी जरूरत सिद्ध करना होती है।
- नरेंद्र सुराणा, सेवानिवृत्त इंजीनियर

50 बसों के लिए 900 करोड़ !

चार वर्ष पहले ट्रैफिक इंजीनियरिंग सेल का गठन किया गया, लेकिन उसकी बैठक ही नहीं हुई। इस शहर को नेता और अफसर अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं, जबकि यहां बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है। एक अफसर की जिद पर 900 करोड़ का बीआरटीएस बनाया जा रहा है। इस पर महज 50 सिटी बसें चलेगी। जब लोग इंदौर में आकर अफसरों से चर्चा करना चाहते हैं, तो वे सुनते-समझते नहीं और बाद में विदेश यात्रा करते हैं। 
-किशोर कोडवानी, कार्यकर्ता, विकास मित्र दृष्टि

नेताजी के कारण नहीं हटी रोटरी

 उज्जैन, देवास, महू, पीथमपुर को ट्रैफिक की दृष्टि से उन्नत बनाएंगे, तो इंदौर में सुधार हो जाएगा। ïमोनो ट्रेन सस्ती और सुलभ सेवा हो सकती है। जहां डिवाइडर नहीं होना चाहिए, वहां आज भी डिवाइडर बने हुए हैं। बंगाली चौराहा और ग्रेटर कैलाश रोड इसके उदाहरण है। जानकारी ली तो पता लगा, एक क्षेत्रीय नेता की मर्जी के खिलाफ बंगाली चौराहा की रोटरी हटाना संभव नहीं हो पा रहा है। राह में ऐसे रोड़े आएंगे, तो भला कैसे हालत सुधरेंगे।
-आरएस राणावत, पूर्व ट्रैफिक डीएसपी

ट्रैफिक इंजीनियर को दूसरे काम में झोंका

यह गोलाकार शहर है, जबकि मुंबई लंबाई पर बसा है। वहां ट्रेन चलाई जा सकती है, यहां नहीं। इन मौलिक बातों को समझने की जरूरत है। जिन विभागों के पास ट्रैफिक की जिम्मेदारी है वहां ट्रैफिक के विशेषज्ञ इंजीनियर नहीं है। आईडीए में ट्रैफिक विषय में एमई किया हुआ इंजीनियर है तो उसे ट्रैफिक से दूर रखा गया है। बीतें सालों में नगर-निगम से लेकर भारत सरकार ने 5-6 सर्वे करवाए। इन पर बहुत राशि खर्च हुई, लेकिन इसकी रिपोर्ट को किसी ने तवज्जो ही नहीं दी। 
-अतुल सेठ, स्ट्रक्चर इंजीनियर

ïहोलकर काल के योजनाकारों से सीखें

हम जब भी ट्रैफिक से संबंधित किसी बैठक में भाग लेते हैं, वहां इंजीनियरिंग के महत्व पर चर्चा होती है। अब हमें इस सवाल पर गौर करना होगा कि क्यों सही इंजीनियरिंग लागू नहीं हो पाती। हम सारे स्कूल पूर्वी क्षेत्र में खोलते हैं फिर पश्चिम के रहवासी इलाकों से बस में बैठकर हजारों ब"ो स्कूल आते-जाते हैं। यही हालत बाजारों की भी हैं, बरसों पहले राजाओं ने कितना सोच-समझ सारा होलसेल मार्केट साथ में और सारा रिटेल मार्केट साथ में बनाया। कोई भी आदमी पैदल चलकर पूरा बाजार घूम सकता है। वैसी दूरदर्शिता की आज भी दरकार है।
-अशोक कोठारी, अभ्यास मंडल

नेबरहूड स्कूल अपनाते तो कम होती बसें

शहर में पूर्व से पश्चिम की ओर जाने के लिए तीन प्रमुख मार्ग हैं, जबकि उत्तर से दक्षिण की ओर जाने के लिए एक भी मार्ग नहीं है। मास ट्रांसपोर्टेशन के क्षेत्र में बहुत काम करने की जरुरत है। इंदौर और महू के बीच मीटरगेज रेललाईन है, हमें इसे न केवल जीवित रखना होगा बल्कि रेलमार्ग से यातायात को बढ़ावा भी देना होगा। नेबरहुड स्कूलिंग (पड़ोस में स्कूल) को अपनाया होता तो ट्रैफिक की समस्या से बच जाते। 
-नूर मोहम्मद कुरैशी, कार्यकर्ता, विकास दृष्टि मित्र

ट्रैफिक मोबेलाइजेशन प्लान शीघ्र बने

मध्यप्रदेश में इंदौर को छोड़कर सभी शहरों के पास उनका ट्रैफिक मोबाईलेशन प्लान है। इंदौर का प्लान जल्द से जल्द बनकर तैयार होना चाहिए। दूसरी बात विशेषज्ञों की राय और उनके ज्ञान को तवज्जो मिलनी चाहिए। यदि कोई विशेषज्ञ कहता है कि फलां स्थान पर रोटरी बनाना ठीक नहीं है, दूसरी ओर कोई नेता वहीं पर रोटरी बनाना चाहता है। ऐसे में विशेषज्ञ की राय पर नेताजी का दबाव भारी पड़ता है। यह प्रवृत्ति बदलना बेहद आवश्यक है। 
-चंद्रशेखर डगांवकर, मास्टर प्लान विशेषज्ञ 

एक वर्ष में बन जाएगा टीएमपी

हम 60 लाख के खर्च से शहर का ट्रैफिक मोबेलिटी प्लान बनवा रहे हैं। दिल्ली की राईट्स इंडिया संस्था के साथ हमारे विशेषज्ञ मिलकर इस प्लान को तैयार करेंगे। उनकी विशेषज्ञता को हम अपने अनुभवों और जरूरतों की कसौटी पर परखने के बाद ही उपयोग में लाएंगे। ना केवल प्लान जल्द से जल्द बनवाने की कोशिश की जाएगी बल्कि उसका क्रियान्वयन भी शीघ्रता से किया जाएगा।
-जवाहर मंगवानी, प्रभारी, जनकार्य समिति प्रभारी

मौजूदा पार्किंग पर ही ध्यान नहीं

मौजूदा पार्किंग 12 सालों तक हमें मुख्य क्षेत्रों में नए पार्किंग्स बनाने की जरुरत नहीं रहेगी। नंदलालपुरा के पार्किंग में गंदगी पड़ी है और उस क्षेत्र में जाने-आने वाले लोग पार्किंग होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं करते। पालिका प्लाजा फेज टू के पार्किंग का तो शटर ही नहीं खोला गया है। रोड मार्किंग तीन दिन से ज्यादा नहीं टिक पाती क्यों? समय सीमा में प्रोजेक्ट पूरे नहीं होने से लागत बढ़ रही है, इसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है।
-प्रफुल्ल जोशी, ट्रैफिक विशेषज्ञ

लायसेंस या मौत का लायसेंस?

आरटीओ में जाकर कोई भी व्यक्ति हजार रुपए की रिश्वत देकर लायसेंस बनवा लेता है। यह गाड़ी चलाने का लायसेंस नहीं है, यह मौत का लायसेंस है। चालान इस समस्या का हल नहीं है। लोग पैसा देकर भूल जाते हैं, उन्हें सबक सीखाने के लिए चार दिन उनकी गाड़ी बंद करवानी पड़ेगी। बाजार की सड़क का इस्तेमाल दुकानदार सामान डिस्प्ले करने में करते हैं, तो राहगीरों और वाहनचालकों के लिए सड़क संकरी हो जाती है।
-जगत नारायण जोशी, यातायात विशेषज्ञ

एक खंभा हटाने में आता पसीना

मैंने अनुभव किया है कि एक खंभा हटाने में पूरी व्यवस्था को पसीना आ जाता है। बजट बनता है, फाइल चलती है और फिर मंजूली मिलती है। चार अफसरों को एक साथ बैठाकर बात करना मुश्किल है, तो समग्र सोच विकसित कैसे होगा? लोगों को समझना होगा कि वे पार्किंग का सही तरीके से इस्तेमाल करें। सुभाष चौक पार्किंग में लोग गाड़ी ही खड़ी नहीं करते हैं।
- डॉ. उमा शशि शर्मा, पूर्व महापौर


 पत्रिका : ३० सितम्बर २०१०

हमने कोर्ट के आदेश पर ही की कार्रवाई

- मनी सेंटर मामले में हाईकोर्ट में आईडीए का जवाब पेश

भूमाफिया बॉबी छाबड़ा के विवादित मनी सेंटर की लीज निरस्ती के मामले में आईडीए ने हाईकोर्ट में जवाब पेश कर दिया है। आईडीए ने कहा है कि कोर्ट के आदेश के अनुसार ही पूरी कार्रवाई की गई है। लीज शर्तों का उल्लंघन करने के कारण ही लीज निरस्त करके मनी सेंटर पर कब्जा लेने का फैसला किया गया है। इस जवाब पर 11 अक्टूबर को सुनवाई होगी।

मनी सेंटर के दुकान मालिक मंजुलता गर्ग और विनय जैन ने याचिका में तर्क दिया है कि लीज शर्तों के आधार पर तय तमाम औपचारिकताएं पूरी देखकर ही डॉ. सजनी बजाज से दुकानें खरीदी गई हैं। भले ही लीज निरस्त हो जाए, लेकिन कानूनन उन्हें हटाया नहीं जा सकता है। कोर्ट में आईडीए ने इसी पर जवाब पेश करके बताया चूंकि हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि दुकान मालिकों की सुनवाई करके ही फैसला करें, इसलिए सुनवाई पूरी कर ली गई है। इसके बाद ही लीज निरस्त का कदम उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर सिनीयर एडवोकेट एके सेठी ने आईडीए के जवाब पर तर्क प्रस्तुत करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। इसी पर जस्टिस एससी शर्मा की कोर्ट ने अगली तारीख तय की। आईडीए की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट अशोक कुटंबले और डॉ. सजनी बजाज की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट जीएम चाफेकर ने पैरवी की।
पत्रिका : २९ सितम्बर २०१०

बीआरटीएस पर लगी पांच याचिकाओं का निपटारा

- एक खारिज, तीन वापस और एक निगम के हवाले

बीआरटीएस के कारण जमीन अधिग्रहण को लेकर लगाई गई पांच याचिकाओं का मंगलवार को हाईकोर्ट में निपटारा हो गया। तीन ने अपनी याचिकाएं वापस ले ली, जबकि एक को कोर्ट ने खारिज कर दिया। एक अन्य के लिए नगरनिगम को सुनवाई का अधिकार सौंपा गया है।

जस्टिस एससी शर्मा की एकल पीठ में लगी याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि जमीन निजी है, इसलिए इसके एवज में मुआवजा दिया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान विजय हालान, जसवंत डोसी और मोहम्मद अकरम की ओर से बताया गया कि उन्होंने सड़क के लिए जमीन नगरनिगम को सौंप दी है, इसलिए याचिकाएं वापस लेना चाहते हैं। एक अन्य याचिकाकर्ता रवि वाघमारे के मुआवजे के तर्क को निगम के प्रतिउत्तर ने खारिज कर दिया। निगम ने कहा जमीन सेटबेक की है और उस पर निगम का अधिकार है। कोर्ट ने याचिका को निरस्त कर दिया। भंडारी कोठी से जुड़ी याचिका पर कोर्ट ने नगरनिगम को आदेश दिया है कि भुवन कुमारी की 19 अक्टूबर तक सुनवाई करके फैसला करें। याचिकाओं में निगम की ओर से एडवोकेट आनंद अग्रवाल ने पैरवी की।



पत्रिका : २९ सितम्बर २०१०

ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हाईकोर्ट में तलब

- सपनि बंद करने के विरोध में लगी दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई
- वैकल्पिक व्यवस्था पर सरकार के जवाब से अदालत असंतुष्ट 

मध्यप्रदेश सड़क परिवहन निगम बंद होने के साथ ही अंतर प्रांतीय, खासतौर से गुजरात से बसों का परिवहन बंद हो जाएगा। सरकार ने इसके विकल्प के तौर पर पर कोई इंतजाम नहीं किया है। इस पर मप्र हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर को हाजिर होकर जवाब देने के आदेश दिए हैं।

सोमवार को दो जनहित याचिकाओं पर जस्टिस शांतनु केमकर एवं एसके सेठ की युगलपीठ में सुनवाई हुई। इसमें शासन की ओर से जवाब पेश किया गया। इसमें केवल स्टेटस रिपोर्ट बता दी कि वर्तमान में सपनि की क्या स्थिति है और कितनी बसें चल रही है। शासन के जवाब से कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा ट्रांसपोर्ट कमिश्नर यहां आकर जवाब दें। कोर्ट को बताया गया कि वे इसी संबंध में जबलपुर में लगी याचिका की सुनवाई में व्यस्त हैं। इस पर कोर्ट ने कहा 29 सितंबर को डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर को खुद आकर जवाब देने के आदेश दिए।

पांच दिन पहले लगी थी पीआईएल
सपनि बसें बंद होने से धार, झाबुआ, खंडवा, खरगोन सहित आदिवासी अंचल का गुजरात से संबंध ही समाप्त हो जाएगा। इसे लेकर पांच दिन पहले नारायण भायल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता चंपालाल यादव एवं मोहन कर्पे की ओर से अधिवक्ता अशोक कुटुंबले द्वारा दायर जनहित याचिका लगाई गई थी। याचिकाओं पर कोर्ट ने रा'य शासन एवं सपनि को 27 सितंबर को जवाब पेश करने के आदेश दिए थे। 


पत्रिका : २८ सितम्बर २०१०